h n

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव : कबतक हाशिए पर रहेंगे दलित?

पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय जिसमें नमो शूद्र समुदाय के लोग भी शामिल हैं, की आबादी ढाई करोड़ से अधिक है। जबकि बंगाल की कुल आबादी करीब 9 करोड़ है। यानी ये चुनाव में एक अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन इसके बावजूद वे हाशिए पर क्यों हैं? ललित कुमार का विश्लेषण

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 को लेकर राजनीति चरम पर है। भाजपा एक तरफ हिंदुत्व की राजनीति कर रही है तो दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी पीछे नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि बंगाल में दलित-बहुजनों के सवाल कब महत्वपूर्ण होंगे? इस वक्त जब पूरे राज्य में ‘मोदी बनाम ममता’ के बीच चुनावी घमासान और तेज होता जा रहा है, ऐसे में दलित राजनीति का आखिर यहाँ क्या अस्तित्व है? और क्या कारण है कि दलित राजनीति बंगाल में आजादी के बाद से अब तक हाशिए पर रही?

पूरा आर्टिकल यहां पढें : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव : कबतक हाशिए पर रहेंगे दलित?

लेखक के बारे में

ललित कुमार

डॉ. ललित कुमार पश्चिम बंगाल के सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं मीडिया के अध्येता हैं

संबंधित आलेख

अर्जक संघ में शामिल हों महिलाएं : रीता चौधरी
लखनऊ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. रीता चौधरी ने अपने वक्तव्य में अर्जक संघ के आंदोलन में शामिल स्त्री-विमर्श को रेखांकित किया। उन्होंने अर्जक संघ...
बहुजन स्पोर्ट्स : मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के आदिवासी स्केटबोर्डिंग खिलाड़ियों का टूट रहा सपना
जनवार गांव में 50 से ज्यादा आदिवासी लड़के-लड़कियां हैं, जो स्केटबोर्डिंग के खेल में माहिर हैं। इनमें कई लड़के-लड़कियों ने तो गोल्ड मेडल भी...
‘त्रिवेणी संघ हमें फासीवादी, जातिवादी, सांप्रदायिक और पूंजीवादी ताकतों से लड़ने की प्रेरणा देता है’
मेरी दृष्टि में त्रिवेणी संघ महज़ तीन बड़ी पिछड़ी जातियों का राजनीतिक गठबंधन नहीं था। यह उत्तर भारत के इतिहास में उत्पीड़ित जातियों के...
झारखंड में राज्यसभा चुनाव : लोकतंत्र को धन्नासेठ की चुनौती
जिस भाजपा को खुद यकीन नहीं कि वह चार विधायकों को जुटा सकेगी, उसने नाथवानी नामक रेस के घोड़े पर दांव लगा दिया है,...
अमित शाह के हत्थे चढ़ गए उपेंद्र कुशवाहा
सम्राट चौधरी के रहते अब भाजपा को दूसरे कोईरी नेता की जरूरत नहीं रही। हालांकि उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को सम्राट चौधरी के मंत्रिपरिषद...