जब महाड़ में उच्च जातियों ने चावदार तालाब का ‘निजीकरण’ करना चाहा

इन दिनों सरकारी उपक्रमों के निजीकरण का अभियान चल रहा है और सार्वजनिक संस्थानों में सभी वर्गों को समानुपातिक प्रतिनिधित्व देने के संवैधानिक प्रयासों का विरोध हो रहा है। उच्च जातियों को तब तक कोई समस्या नहीं थी जब तक सार्वजनिक संस्थानों पर उनका एकाधिकार था। समस्या तब शुरू हुई जब आम लोगों – शूद्रों और अतिशूद्रों – ने भी इन संस्थानों पर अपना अधिकार जताना शुरू कर दिया। उच्च जातियों के लागों को यह मंज़ूर नहीं है। बता रहे हैं अनिल वर्गीस

सामान्य तौर पर महाड़ सत्याग्रह को हम एक दिवसीय घटनाक्रम के रूप में देखते आए हैं। वह दिन था 20 मार्च 1927। उस दिन डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में हजारों दलित महाड़ स्थित चावदार तालाब पहुंचे और उसका पानी पीया। ये सभी सत्याग्रही एक सम्मेलन में भाग लेने महाड़ पहुंचे थे। वर्तमान में यह क़स्बा महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले का हिस्सा है। महाड़ में उस दिन जो कुछ घटा, वह करीब एक दशक तक चली लंबी लड़ाई का महज एक अध्याय भर था – भले ही वह एक महत्वपूर्ण और मूलभूत अध्याय रहा हो। इस लड़ाई में अंतिम विजय तब हासिल हुई जब बम्बई हाईकोर्ट की अंग्रेज़ और पारसी जजों की खंडपीठ ने अदालत के बाहर और उसके अंदर चली एक दशक तक चली लंबी लड़ाई के बाद ऊंची जातियों की उस अपील को ख़ारिज कर दिया, जिसमें चावदार तालाब पर उनके मालिकाना हक का दावा किया गया था।

बम्बई हाईकोर्ट ने 17 मार्च, 1937 को दिए अपने निर्णय में तालाब की अवस्थिति का वर्णन निम्न शब्दों में किया– 

“चावदार एक छोटा-सा तालाब या बड़ा-सा कुंड है। यह नगर की सरहद के करीब है और चार-पांच एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके चारों ओर नगर निगम (म्युनिसिपेलिटी) की सडकें हैं और उनके पार घर हैं, जिनमें सवर्ण हिन्दू (और कुछ बहुत थोड़े से मुसलमान) रहते हैं। इन घरों के मालिक, तालाब के किनारों, उसके घाटों और उसके चारों ओर बनाये गए परकोटे से लगी ज़मीन की संकरी पट्टियों के मालिक भी हैं। आसपास अछूतों का कोई रहवास नहीं है। … वास्तुस्थिति, जिसे स्वीकार किया गया है, उसके मुताबिक अछूतों ने तालाब का उपयोग 1927 के पहले कभी नहीं किया, जब अस्पृश्यता बरकरार रखने के खिलाफ उनके प्रतिवादी संख्या एक [आंबेडकर] द्वारा अभियान चलाया गया और कुछ ‘अछूत’ वहां गए तथा विरोध स्वरूप पानी पीया।” 

दरअसल, अछूतों द्वारा तालाब का पानी पीना, सविनय अवज्ञा न होकर सामाजिक अवज्ञा थी क्योंकि बम्बई विधान परिषद् ने 4 अगस्त, 1923 को ही एक प्रस्ताव पारित कर सरकारी और सार्वजनिक धन से संचालित सुविधाओं, स्थलों और संस्थानों जैसे अदालत, स्कूल, कार्यालय, अस्पताल, पार्क, सड़क, धर्मशाला, रेलवे प्रतीक्षा कक्ष, ट्रेन के डिब्बे और पानी के स्त्रोतों को अछूतों के लिए खोल दिया था। इसके कुछ दिन बाद, 11 सितम्बर, 1923 को बम्बई की प्रांतीय सरकार ने अपने सभी विभागों से इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए कहा। इसी निर्देश के परिपालन में महाड़ म्युनिसिपेलिटी ने कस्बे की बाहरी हिस्से में स्थित चावदार तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया था। 

डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में अछूतों का जुलूस 20 मार्च, 1927 को बिना किसी परेशानी के तालाब तक पहुंच गया और उन्होंने उसका पानी भी पीया। परंतु, उन्हें क्या पता था कि मनुस्मृति के आदेशों के इस उल्लंघन के कारण ऊंची जातियों के लोगों के मन में आग लगी थी। उस समय न तो मोबाइल फ़ोन था और ना ही सोशल मीडिया। फिर भी, मात्र दो घंटे में पूरे नगर में यह अफ़वाह फैला दी गई कि अछूत वीरेश्वर मंदिर में प्रवेश करने की योजना बना रहे हैं। अब तो सवर्ण हिन्दुओं के क्रोध का पारावार न था। सम्मेलन में भाग लेने वाले जब अपने-अपने घरों को कूच करने के लिए अपना सामान बांध रहे थे, तभी उन पर हमला कर दिया गया। इस हमले में करीब बीस लोगों को चोटें आईं। पुलिस ने सवर्ण हिन्दुओं के खिलाफ मामले दर्ज किए और 6 जून, 1927 को जिला मजिस्ट्रेट ने उनमें से पांच को चार महीने के कारावास की सजा सुनायी। 

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परन्तु ऊंची जातियां तब भी हार मानने को तैयार न थीं। उन्होंने बाकायदा तालाब का शुद्धिकरण किया। तालाब का कुछ पानी बहा दिया गया और फिर मंत्रोच्चारण के साथ, उसमें गौमूत्र और गाय का गोबर डाला गया। साथ ही, महाड़ म्युनिसिपेलिटी ने चावदार तालाब को अछूतों के लिए खोलने वाला 1924 का अपना संकल्प रद्द कर दिया। इस घटनाक्रम से आंबेडकर और उनके साथी अछूतों को बहुत धक्का लगा। उन्होंने बम्बई में कई बैठकें कीं और अंततः एक प्रस्ताव पारित कर यह घोषणा की कि वे 25-26 दिसंबर, 1927 को सत्याग्रह द्वारा चावदार तालाब से पानी पीने के अपने अधिकार की पुनः उद्घोषणा करेंगे। 

उच्च जातियों ने 12 दिसंबर, 1927 को एक स्थानीय अदालत में प्रकरण दायर कर अछूतों की ‘अवज्ञा की घोषणा’ को चुनौती दी और अदालत से मांग की कि अछूतों द्वारा तालाब के इस्तेमाल के खिलाफ अंतरिम निषेधाज्ञा जारी किया जाय। दो दिन बाद, सब-जज जी.वी. वैद्य ने अंतरिम निषेधाज्ञा जारी कर दी। जज ने कहा, “आवेदकों ने इस आशय की न्यायिक उद्घोषणा जारी करने के लिए वाद दायर किया है कि “चावदार तालाब स्पृश्य जातियों की निजी संपत्ति है और अछूतों को तालाब पर जाने या उसका पानी लेने का अधिकार नहीं है … सैकड़ों वर्षों से केवल स्पृश्य जातियां तालाब का प्रयोग करतीं आईं हैं … प्रतिवादी के नेतृत्व में, अछूत वर्गों के कुछ सदस्य अचानक तालाब पर पहुंचे और उसके पानी से अपने हाथ और चेहरे धोये और इस तरह तालाब को प्रदूषित किया। इस प्रदूषण के कारण स्पृश्य जातियां 24-25 घंटों तक तालाब से पानी नहीं ले सकीं अर्थात तब तक जब तक कि काफी धन का व्यय कर, हिंदू शास्त्रों द्वारा निर्धारित विधि से तालाब के पानी का शुद्धिकरण न कर दिया गया। इस तरह, स्पृश्य जातियों को बहुत कठिनाई झेलनी पड़ी।” 

डॉ. आंबेडकर और अन्य को चावदार तालाब से पानी पीते हुए दिखाता एक भित्ति चित्र; और आरक्षण बचाने की मांग करते हुए लोगों का एक प्रदर्शन

तालाब पर अपने मालिकाना हक को साबित करने के लिए ऊंची जातियों के म्युनिसिपेलिटी का एक पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें उनमें से एक को उसके घर के सामने उसके द्वारा बनाई गई तालाब की चहारदीवारी की मरम्मत करने के लिए कहा गया था। एक अन्य दस्तावेज भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें चहारदीवारी के एक हिस्से के एक परिवार के सदस्यों के बीच विभाजन का उल्लेख था। 

दिसंबर 25-26 को पूर्व घोषणानुसार एक मुसलमान की ज़मीन पर सम्मेलन आयोजित किया गया क्योंकि कोई सवर्ण हिंदू आयोजन के लिए अपनी ज़मीन देने को तैयार नहीं था। सम्मेलन को आंबेडकर के संबोधित किया और उनके ब्राह्मण मित्र जी.एन. सहस्त्रबुद्धे ने मनुस्मृति के उन अंशों का वाचन किया, जिसमें शूद्रों के साथ व्यवहार के सम्बन्ध में प्रावधान वर्णित थे। इसके बाद, नाराज़ प्रतिभागियों ने मनुस्मृति की एक प्रति का दहन किया। अगले दिन, जिले का अंग्रेज़ कलेक्टर सम्मलेन स्थल पर पहुंचा। उसने प्रतिभागियों से कहा कि सरकार अछूतों को उनके अधिकार देने के प्रति प्रतिबद्ध है और आंबेडकर और अन्य दलितों से यह अनुरोध किया कि वे तब तक के लिए अपना सत्याग्रह स्थगित कर दें जब तक कि अदालत अंतरिम निषेधाज्ञा रद्द नहीं कर देती। आंबेडकर राजी हो गए। सभी प्रतिभागी तालाब तक गए, परंतु उसका एक चक्कर लगा कर लौट गए।

उसी सब-जज ने फरवरी, 1928 में अंतरिम निषेधाज्ञा रद्द कर दी, क्योंकि ऐसे शिलालेख पाए गए थे, जिनमें तालाब को म्युनिसिपेलिटी की संपत्ति बताया गया था। तीन साल बाद, 1931 में, एक अन्य सब जज वी.आर. सराफ ने उच्च जातियों के इस दावे को ख़ारिज कर दिया कि तालाब पर उनका मालिकाना हक है और अछूतों के पक्ष में फैसला सुनाया। जिला अदालत में अपीलें हुईं और अंततः 1933 में मामला बम्बई हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने 1937 में अपील को ख़ारिज करते हुए महाड़ की अदालत की निर्णय को कायम रखा। 

ज्ञातव्य है कि 1927 और 1937 के बीच, आंबेडकर ने गोलमेज़ सम्मेलनों में भाग लेते हुए अंग्रेजों से मांग की कि अछूतों को पृथक मताधिकार दिया जाए। इसी बीच, उन्होंने मजबूरी में पूना पैक्ट पर दस्तखत किये और ‘जाति का विनाश’ लिखी। 

महत्वपूर्ण यह भी है कि ऊंची जातियों ने मालिकाना हक और स्मृति आधारित रिवाजों के बूते तालाब पर एकाधिकार साबित करने के लिए एक दशक तक कानूनी लड़ाई लड़ी। 

क्या यह विवरण आपको आज के घटनाक्रमों के प्रति सचेत नहीं करता है? इन दिनों सरकारी कंपनियों के निजीकरण का अभियान चल रहा है और सार्वजनिक संस्थानों में सभी वर्गों को समानुपातिक प्रतिनिधित्व देने के संवैधानिक प्रयासों का विरोध हो रहा है। जब तक सार्वजनिक संस्थानों में उनका एकाधिकार था, तब तक उच्च जातियों को कोई समस्या नहीं थी। समस्या तब शुरू हुई जब आम लोगों – शूद्रों और अतिशूद्रों – ने भी इन संस्थानों पर अपना अधिकार जताना शुरू कर दिया। उच्च जातियों को यह मंज़ूर नहीं था। सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों के समावेशी बनने की प्रक्रिया अभी शुरू ही हुई थी और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और सरकारी विभाग, सामाजिक न्याय की स्थापना की ओर बढ़ रहे थे। परन्तु यह प्रक्रिया भला आगे कैसे चल सकती है? उसे रोकना आवश्यक है!  

(अनुवाद अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)


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