विकलांग स्त्रियाें के सवाल भी हैं महत्वपूर्ण

विकलांग यदि पुरुष है तो उसे पितृसत्ता स्वाभाविक रूप से कुछ संबल प्रदान करती है, जिससे विकलांग स्त्रियां वंचित रह जाती हैं। उसमें भी वह यदि गरीब है, दलित है और ग्रामीण है तो उसकी समस्याएं गुणात्मक रूप से बढ़ती जाती हैं। बता रही हैं संध्या कुमारी

साहित्य को समाज का दर्पण माना जाता है। साहित्यकार एक तरफ अपने आस-पास के परिवेश से कथानक ग्रहण करता है तो दूसरी तरफ अपने साहित्य के माध्यम से परिवेश की निर्मिति भी करता है। प्रेमचंद ने कहा भी है– “साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।” साहित्य में हाशिए के समाज की दीन-हीन स्थिति के अध्ययन के माध्यम से समाज में जहां एक ओर जागरूकता आती है, वहीं यह प्रश्न भी उभर कर आता है कि उनके शोषण एवं दमन का मूल कारण क्या है? इसके समाधान के क्या उपाय हो सकते हैं? इस तरह हाशिए के समाज के सशक्तिकरण के नए आयाम उद्घाटित होते हैं।

साहित्य में विकलांग व्यक्तियों की उपस्थिति के अवलोकन से यह ज्ञात होता है कि प्राचीन साहित्य एवं धर्मग्रंथों में विकलांग व्यक्तियों का चित्रण प्रायः खल पात्र के रूप में हुआ है। सुधारवादी आंदोलनों के फलस्वरूप समाज के नजरिए में बदलाव आया और साहित्य में विकलांग पात्रों का चित्रण भी उससे प्रभावित हुआ। साहित्य में विकलांग पात्रों की उपस्थिति दीन-हीन रूप में होने लगी। अस्मितावादी विमर्शों एवं विकलांगता अधिकार आंदोलनों के फलस्वरूप विकलांगता की समस्या को मानवाधिकार की परिधि में देखा जाने लगा। 

विकलांग स्त्रियों का जीवन घर-परिवार तथा समाज में अत्यंत दयनीय एवं उपेक्षित रहता है। विकलांगों एवं स्त्रियों के सशक्तीकरण की दिशा में चलाए जा रहे स्त्री विमर्श एवं विकलांगता अधिकार आंदोलन, दोनों में ही विकलांग महिलाओं की समस्याएं नदारद हैं। 

विकलांग महिलाओं के प्रति अपना नजरिया बदले समाज

पितृसत्तावादी एवं वर्चस्ववादी समाज में आधी आबादी मानी जानेवाली स्त्रियां उपेक्षा की शिकार हैं। विकलांग व्यक्ति भी हाशिएकृत होकर जीवन-संघर्षों से निरंतर जूझता रहता है ताकि उसे समान्य मनुष्य होने का दर्जा हासिल हो सके। विकलांग यदि पुरुष है तो उसे पितृसत्ता स्वाभाविक रूप से कुछ संबल प्रदान करती है, जिससे विकलांग स्त्रियां वंचित रह जाती हैं। उसमें भी वह यदि गरीब है, दलित है और ग्रामीण है तो उसकी समस्याएं गुणात्मक रूप से बढ़ती जाती हैं। 

सिमोन द बोउवार ने कहा है कि “स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है।” हमारा समाज आज भी स्त्रियों के प्रति बहुत अधिक प्रगतिशील विचार नहीें रखता। “संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के द्वारा दुनिया की अस्सी प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले 75 देशों के अध्ययन ‘जेंडर सोशल नाम्र्स इंडेक्स’ के रिपोर्ट में यह नतीजा आया कि नब्बे फीसद स्त्री और पुरुष स्त्रियों के संबंध में पूर्वाग्रह पूर्ण धारणा रखते हैं।” यह सोच ही मूल कारण है स्त्रियों के प्रति होने वाले भेदभाव, शोषण, हिंसा या फिर घरेलू हिंसा का क्योंकि सोच से ही विचार बनता है और विचार से बदलाव आता है। 

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विकलांग स्त्रियों की सामाजिक उपेक्षा, अवहेलना, अनादर को कई रचनाकारों ने अपने साहित्य में अभिव्यक्त किया है। प्रायः सुन्दर लड़कियों को लेकर ही साहित्य-सृजन की परम्परा रही है। इसके विपरीत विकलांगों के प्रति कुछ साहित्यकारों ने समाज के नजरिये से कुरूप, असुन्दर, विकलांग स्त्री पात्रों को लेकर भी कहानियाँ लिखी है। लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है।

पति यदि विकलांग हो तो पत्नी उसकी हर प्रकार से सेवा और देखभाल करती है। पत्नी के विकलांग होने पर पति एवं सुसराल वालों का रवैया बिल्कुल बदल जाता है। बहुत कम ही पति ऐसे होते हैं जो  पत्नी का साथ देते हैं। पति चाहे विकलांग ही क्यों न हो पुरुष होने का श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित रहता है और पत्नी पर धौंस जमाना अपना अधिकार समझता है। जहां एक तरफ स्त्री विमर्श की पैरोकार स्त्रियां परिवार और विवाह संस्था को नकारती हैं, वहीं घर-परिवार बसाना एक सपना होता है।

विकलांग स्त्रियों को प्राय: यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है। ‘बौद्धिक विकलांगता की शिकार 25 प्रतिशत महिलाओं को बलात्कार जैसी हिंसा झेलनी पड़ती है। विकलांग स्त्री को उसके परिवार घोर उपेक्षा और अनादर झेलना पड़ता है। परिवार का मुखिया, उसका रक्षक ही उसे अपनी हवस का शिकार बनाने से नहीं हिचकता।

कई बार विकलांग व्यक्ति स्वयं भी अपने शोषण को समझ नहीं पाता। हर युवक-युवती की इच्छा किसी से प्यार पाने की होती है। विकलांग व्यक्ति में अपनी विकलांगता को लेकर कई बार एक प्रकार की कुंठा होती है कि क्या वह किसी का प्यार पाने के लायक है भी या नहीं? ऐसी मनोद में किसी की झूठी सहानुभूति या प्यार पाकर आसानी से उसके शोषण के गिरफ्त में फंस जाता है। 

भारतीय पितृसतात्मक समाज में लड़कियों को वैसे ही बोझ माना जाता है। उन पर खर्च करना लोगों को व्यर्थ लगता है क्योंकि उन्हें आगे दहेज देने की भी चिन्ता होती है। इस पर भी यदि लड़की नेत्रहीन हो तो मां-बाप के दुःखों की सीमा नहीं रह जाती। वे उसकी मृत्यु तक की कामना करने से नहीं हिचकते। ऐसे में अपने सामान्य बच्चों की तुलना में विकलांग बच्चों के साथ माता-पिता का व्यवहार भी भेदभावपूर्ण हो जाता है। कुसुमलता मलिक की कहानी ‘उपहार’ के माता-पिता भी अपनी नेत्रहीन बेटी के साथ सौतेला व्यवहार करते हैं। कुछ अभिभावक अपने बच्चियों को विद्यालय छोड़ने के बाद कभी मिलने या घर ले जाने नहीं आते। वे लड़कियां छुट्टियों में भी छात्रावास में ही रहती हैं।

विकलांग व्यक्ति विशेषतकर स्त्री चाहे जितना भी पढ़-लिख ले, उसे शोषित होना ही पड़ता है। जब शोषक घर वाले ही हो तो फिर विकलांग कहां जाएं? यदि किसी परिवार में कोई बच्चा विकलांग हो जाता है तो बच्चे की विकलांगता का माता-पिता पर दो तरह से प्रतिक्रिया देखने को मिलती है। कुछ माता-पिता इसे नियति का क्रूर मजाक समझकर बौखला जाते हैं। उन्हें यह लगने लगता है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। उनके ही बच्चे के साथ ऐसा क्यों हुआ। यह किस पाप की सजा मिली है आदि-आदि। समाज में हर चीज को कर्म-फल से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति के कारण वे बीमारी या विकलांगता को सहज रूप में स्वीकार नहीं कर पाते। अंधविश्वास के कारण उन्हें अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा दांव पर लगी महसूस होने लगती है। इस तरह की भावना से ग्रस्त होने के कारण वे हताशा और निराशा के शिकार होकर कुंठित हो जाते हैं। उनकी मनोदशा का प्रभाव उनके बच्चे पर भी पड़ता है और बच्चे की जिजीविषा प्रभावित होती है। कई बार विकलांग को उन्हीं लोगों के द्वारा घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है जो उनके रक्षक हैं। हिंसा का मतलब सिर्फ मार-पीट ही नहीं है, विकलांग व्यक्ति के साथ भेदभाव, उसकी उपेक्षा करना, उसे समान अवसरों से वंचित रखना, मानसिक रूप से प्रताड़ित करना भी हिंसा के दायरे में आते हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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