क्या असफल हो रहा डॉ. आंबेडकर का प्रयोग‍?

वर्ष 1951 की जनगणना के मुताबिक भारत में बौद्ध धर्मावलंबियों की आबादी केवल 0.05 प्रतिशत थी जो वर्ष 1956 में डॉ. आंबेडकर के द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद वर्ष 1961 में 0.74 फीसदी हो गई। लेकिन बाद में इसमें कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है। सवाल उठा रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

ब्राह्मणवादियों के लिए धर्म मूलतः राजनीति है, जो उनके विशेषाधिकारों का संरक्षण करती है। किंतु अशिक्षित समाज जब सामान्य राजनीति को नहीं समझ पाता तो धर्म के नाम पर चली जाने वाली राजनीति की महीन चालें वह भला कैसे समझ पाता! अधिसंख्यक बहुजनों के धर्मांतरण का महत्व एक नाव से दूसरी नाव में सवार हो जाने जितना है। यही कारण है कि दलित और बहुजन राजनीति के शोर-शराबे के बावजूद बौद्ध धर्म की प्रगति पूरी तरह ठहरी हुई है। 1951 में भारत में बौद्धों की संख्या मात्र 0.05 प्रतिशत थी। डॉ. आंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद, 1961 में कुल जनसंख्या का 0.74 प्रतिशत बौद्ध धर्मावलंबी थे। 1991 में वे बढ़कर 0.76 प्रतिशत हो गए। उसके बाद उनका जनसंख्या-अनुपात निरंतर गिर रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार दलितों की कुल जनसंख्या 20.14 करोड़ थी। उनमें से मात्र 84.43 लाख, लगभग 0.70 प्रतिशत ने खुद को बौद्ध घोषित किया था। नए-नए बने बौद्धों में से 87 प्रतिशत ‘अछूत’ जातियों से थे। इन आंकड़ों से सवाल उठता है कि क्या हिंदू धर्म की ब्राह्मणवादी राजनीति का सामना बौद्ध धर्म से करने का डॉ. आंबेडकर का महान प्रयोग असफल साबित हो रहा है?

सर्वविदित है कि हिंदू धर्म में दलितों के अपमान तथा अत्याचारों से आहत डॉ. आंबेडकर ने 1935 में उसे छोड़ने की घोषणा कर दी। उस समय उन्होंने कहा था─‘मैं जन्म से हिंदू था क्योंकि मेरा इस पर कोई नियंत्रण नहीं था, लेकिन मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।’ धर्मांतरण, डॉ. आंबेडकर के लिए निजी आस्था का विषय नहीं था। प्रबुद्ध व्यक्ति धर्म की बैशाखी के बिना भी नैतिक जीवन जी सकता है। लेकिन अशिक्षा और रूढ़ियों में डूबे जिस समाज का वे नेतृत्व करते थे, वह अपनी अच्छी-बुरी सभी प्रेरणाओं के लिए धर्म पर निर्भर था। धर्म-रहित जीवन की एकाएक परिकल्पना करना उसके लिए असंभव था। बावजूद इसके हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म तक जाने में आंबेडकर ने पूरे बीस वर्ष लगाए थे। इस बीच हिंदू धर्म से अपनी शिकायतों को लेकर उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की थी। उनमें जाति का विनाश  (1936), ‘शूद्र कौन थे? ’(1946) तथा ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ दस्तावेजी महत्व की कृतियाँ हैं।

डॉ. आंबेडकर और बौद्ध धर्म

1935 में जब डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा की थी, गांधी सहित अनेक नेता हिंदू धर्म में सुधार में लगे थे। उनके अलावा कई समाज-सेवी संस्थाएं भी उनके नेतृत्व में जमीनी स्तर पर कार्यरत थीं। उन सबके प्रयासों को देखकर हिंदू धर्म में सुधार की क्षीण-सी उम्मीद डॉ. आंबेडकर को थी। मगर आजादी के बाद वह उम्मीद खत्म होने लगी थी। आखिरकार 1956 में, यह मानते हुए कि हिंदू धर्म के कर्ताधर्ता सुधार के लिए तैयार नहीं हैं, अपनी मृत्यु से कुछ ही महीने पहले, लाखों समर्थकों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली। उन्हीं दिनों उन्होंने ‘भगवान बुद्ध और उनका धर्म’ शीर्षक से पुस्तक की रचना भी की थी। यह पुस्तक कई मायनों में मौलिक थी।

14 अक्टूबर, 1956 को महाराष्ट्र के नागपुर में बौद्ध धर्म की दीक्षा लेते डॉ. आंबेडकर

अधिकांश विद्वानों ने गौतम बुद्ध के संन्यास को जीवन-जगत के प्रति उपजी निराशा की परिणति माना है। उनके अनुसार कपिलवस्तु के मार्गों से गुजरते हुए युवा सिद्धार्थ की नजर सबसे पहले बूढ़े, फिर एक बीमार व्यक्ति पर पड़ी। परिणामस्वरूप उनके मन में जीवन-जगत को लेकर निराशा पैदा होती है। उस निराशा से वे उबर भी नहीं पाए थे कि अगली बार एक व्यक्ति की शवयात्रा देखकर उनका मन संसार से पूरी तरह उचट गया। उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पूरा संसार ही दुखमय है। इसी से उनके मन में वैराग्य जन्म लेता है; और वे अर्धरात्रि में, बगैर किसी को बताए, पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को सोते हुए छोड़, घर से निकल पड़ते हैं। बुद्ध के संन्यास के बारे में हर जगह यही कहानी सुनने को मिलती है, जिससे बुद्ध और संसार के प्रति निराशाजनक तस्वीर बनती है। डॉ. आंबेडकर इस व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। उन्हें यह स्वीकार्य नहीं कि 29 वर्षीय राजकुमार सिद्धार्थ ने उससे पहले किसी बीमार, वृद्ध और मृत व्यक्ति का साक्षात ही न किया हो। बुद्ध द्वारा ‘बूढे-रोगी-मृत-साधु’ को देखकर घर छोड़ देने का विवरण त्रिपिटक साहित्य में भी नहीं है। इसलिए बुद्ध के गृह-निष्क्रमण संबंधी मान्यताओं का खंडन करते हुए वे लिखते हैं─‘जीवन स्वाभावतः दुख है, यह सिद्धांत बौद्ध धर्म की जड़ पर ही कुठाराघात करता प्रतीत होता है। यदि जीवन ही दुख है, मरण भी दुख है, पुनरुत्पत्ति भी दुख है, तब तो सभी कुछ समाप्त हो जाता है। न धर्म ही किसी आदमी को संसार में सुखी बना सकता है और न दर्शन ही। यदि दुख से मुक्ति ही नहीं है तो फिर धर्म भी क्या कर सकता है और बुद्ध भी किसी व्यक्ति को दुख से मुक्ति दिलाने के लिए क्या कर सकता है, क्योंकि जन्म ही स्वाभावतः दुखमय है।’1

अहिंसा और गणतंत्र के प्रति सकारात्मक रवैया तथा बुद्धिवादी दृष्टिकोण─बौद्ध धर्म की ये विशेषताएं उसे आधुनिक धर्म बनाती हैं। इन्हीं के कारण डॉ. आंबेडकर उसकी ओर आकर्षित हुए थे। उनके  अनुसार, ‘जो बात बुद्धि-संगत है, जो बात तर्क-संगत है─वही बुद्ध वचन है।’ इसलिए, ‘कोई भी ऐसी बात जिसका मानव कल्याण से कोई संबंध न हो, यदि भगवान बुद्ध के सिर मढ़ी जाती है तो उसे बुद्ध-वचन नहीं कहा जा सकता।’[1]

अश्वघोषकृत ‘बुद्धचरित’ तथा धम्मानंद कोसंबी से प्रेरणा लेते हुए वे बुद्ध के गृह-त्याग की नवीन व्याख्या करते हैं। तदननुसार शाक्यों के राज्य से सटा हुआ कोलियों का राज्य था। रोहिणी नदी दोनों के बीच विभाजक रेखा थी। नदी के पानी के बंटवारे को लेकर दोनों के बीच संघर्ष चलता ही रहता था। समस्या के स्थायी समाधान हेतु शाक्यों ने सभा बुलाई। उसमें सेनापति ने कोलियों के राज्य पर हमला कर देने की सलाह दी। इसपर सिद्धार्थ ने सेनापति के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा─‘युद्ध से कभी किसी समस्या का हल नहीं होता। युद्ध छेड़ देने से हमारे उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। इससे एक दूसरे युद्ध का बीजारोपण हो जाएगा … केवल अवैर से ही वैर शांत हो सकता है।’[2]

यह जानते हुए भी कि बहुमत सेनापति के साथ है, बुद्ध न केवल युद्ध के प्रस्ताव का विरोध करते हैं, बल्कि अनिवार्य सैन्य भर्ती को भी गैर-जरूरी बताकर युद्ध में शामिल न होने की घोषणा कर देते हैं। लगातार विरोध से नाराज सेनापति संघ के नियमों का हवाला देकर, सिद्धार्थ तथा उनके परिवार के सामाजिक बहिष्कार की धमकी देता है। इसपर वे परिवार को दंडित करने के बजाय, खुद नगर छोड़ देने का वचन देते हैं। पूरी बहस लोकतांत्रिक विमर्श का शानदार नमूना है। उसके माध्यम से आंबेडकर केवल बुद्ध के चरित्र का नवोन्मेष करते हैं, बल्कि पाठकों को लोकतांत्रिक विमर्श का महत्व भी समझा रहे होते हैं। केवल आंबेडकर जैसा तर्कवादी लेखक ही ऐसा कर सकता था।

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बुद्ध के गृह-त्याग की यह व्याख्या इतनी अनूठी और क्रांतिधर्मी है कि उसने अनेक बौद्ध विद्वानों को भी नाराज कर दिया था। 1957 में जब यह पुस्तक पहली बार प्रकाशित होकर बाजार में आई तो न केवल भारत, अपितु विश्व के बौद्ध विद्वानों ने भी उसकी जोरदार आलोचना की थी। लोग यहां तक कहने लगे थे कि पुस्तक ‘बुद्धिज्म नहीं अंबेडकरिज्म है’। आरोप था कि बुद्ध ने अपनी बात की पुष्टि हेतु के लिए आवश्यक संदर्भ नहीं दिए हैं। बाद में जब उस पुस्तक का भदंत आनंद कौसल्यायन ने हिंदी अनुवाद को संदर्भ के साथ प्रकाशित कराया तो आलोचकों के मुंह बंद हो गए।

क्या धर्मांतरण अपरिहार्य था

ऊपर हमने हिंदू समाज में जातिवाद और छुआछूत की बुराई की चर्चा की। उन कारणों पर विचार किया, जिन्होंने डॉ. आंबेडकर को हिंदू धर्म छोड़ने पर विवश किया था। उसके बाद बौद्ध धर्म की उन विशेषताओं की चर्चा भी की, जिन्होंने उन्हें बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित किया था। सवाल है कि क्या बौद्ध धर्म को अपनाना उतना ही अपरिहार्य था? हिंदू धर्म की जिन बुराइयों से बचने के लिए उन्होंने उसका त्याग किया था, क्या बौद्ध धर्म उनसे सर्वथा मुक्त रह सका? ‘भगवान बुद्ध और उनका धम्म’ में डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म की जिन विशेषताओं को रेखांकित किया, जरूरत पड़ने पर उनकी मौलिक व्याख्या की लोकतांत्रिक छूट भी ली थी─उनकी प्रेरणा से बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलित उन मूल्यों को कितना आत्मसात कर पाए? बौद्ध धर्म को अपना चुके दलित क्या जातिभेद की भावना से मुक्त हो पाए? यदि हिंदू धर्म ब्राह्मणवादी राजनीति का औजार रहा है तो क्या बौद्ध धर्म अतीत में दलित राजनीति तथा वर्तमान में बहुजन राजनीति का औजार नहीं है? उत्तर में कहा जा सकता है कि यह कांटे से कांटा निकालने की युक्ति है। लेकिन क्या इससे बुद्धिवाद और लोकतंत्र, जो ब्राह्मणवादी वर्चस्व से मुक्ति के कारगर औजार हो सकते हैं─की उपेक्षा नहीं हो रही है? धर्म के समानांतर दूसरे धर्म को खड़ा करने का ही दुष्परिणाम है कि बीते वर्षों में भारतीय राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर अनेक हमले हुए, तो दलित-बहुजन उसके विरुद्ध बड़ा मोर्चा नहीं खोल पाए।

यह ठीक है कि बुद्ध ने जातिभेद को नकारा। भिक्षु-विहारों में सभी जाति-वर्ग के लोगों को शामिल होने की अनुमति थी। प्रवज्या ग्रहण करने वालों में उपालि (नाई), सुणीत (वाल्मीकि), सोपाक तथा सुप्पिय (अछूत), सुमंगल (अतिशूद्र), प्रकृति (चांडाल) के अलावा अंगुलिमाल जैसे डाकू भी शामिल थे। इसके बावजूद यह भी सत्य है कि बुद्ध को केवल जाति और वर्ण-व्यवस्था पर आधारित भेदभाव से शिकायत थी। समाज में जाति और वर्ण के आधार पर विभाजन की पद्धति समाप्त हो, इसे लेकर बुद्ध का कोई निर्देश नहीं है। बुद्ध द्वारा मना करने के बावजूद भिक्षु संघों में जातिभेद कायम था। यही कारण है कि बौद्ध धर्म के रास्ते सभी जाति-वर्गों के लिए खोल देने के बावजूद बहुत कम शूद्रातिशूद्र उसकी ओर आकर्षित हुए थे। जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्मों की कहानियां दी गई हैं। उनमें बुद्ध के विभिन्न जातियों में पुनर्जन्म लेने के उल्लेख है। लेकिन उनमें जितना उल्लेख ब्राह्मणों का हुआ है, उतना किसी और जाति का नहीं। अपने पूर्वजन्मों में खुद बुद्ध भी सबसे ज्यादा बार ब्राह्मणों के घर ही जन्म लेते हैं।

निश्चित तौर पर  डॉ. आंबेडकर जैसी विलक्षण प्रतिभा, ऐसे विद्वान के लिए जो ज्ञान तक पहुंचाने वाली संश्लेष्णात्मक और विश्लेषणात्मक, दोनों प्रकार की प्रविधियों में दक्ष हो, को सदाचारी और नैतिक बने रहने के लिए, जिसे धर्म का उद्देश्य बताया जाता है─बौद्ध धर्म या किसी भी अन्य धर्म की कतई आवश्यकता नहीं थी। वे कबीर और रैदास की संत-परंपरा से निकले थे, जो हर तरह के कर्मकांड को ललकारने की साहस रखती थी। सवाल है कि क्या धर्मांतरण संबंधी घोषणा के मूल में ‘बुद्धत्व’ के प्रति विश्वास से अधिक, हिंदू धर्म को छोड़ देने की अपनी वर्षों पुरानी घोषणा का दबाव था?

संभव है कि इसके पीछे हिंदू धर्म के चंगुल में फंसे लाखों-करोड़ों बहुजनों को निकालने का संकल्प भी रहा हो। कदाचित वे सोचते थे कि हजारों वर्षों से आस्था के गुलाम रहे बहुजनों के हाथ से धर्म की बैशाखी एकाएक छीन लेना, उचित न होगा। इसलिए धर्मांतरण के पक्ष में लिया गया उनका निर्णय आस्था और विश्वास का विषय न होकर, राजनीतिक था। धर्मांतरण के स्थान पर यदि वे धर्म को ही त्याग देने का फैसला करते तो वह युगांतरकारी कदम होता। बुद्ध के समय में भी निम्न जातियों के लोग आजीवक दर्शन में विश्वास रखते थे।

समाधान क्या है?

बहरहाल, हर धर्मसत्ता की कोई न कोई केंद्रीय शक्ति होती है, जो मानव स्वभाव के लोकतांत्रिकरण का निषेध करती है। उससे मनुष्य और समाज दोनों के प्रबोधीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध होती है। इसलिए जिन्हें बौद्ध धर्म या किसी और धर्म में आस्था है, वे उस धर्म का चयन करें। लेकिन जिन्हें समाज में व्याप्त असमानता, असुरक्षा, सामाजिक भेदभाव आदि से शिकायत है, जो मनुष्य को अधिकाधिक स्वतंत्र और खुशहाल देखने चाहते हैं─उनके लिए अच्छा होगा कि वे बुद्धिवादी बनें, आधुनिक जीवन मूल्यों को अपनाएं जिनकी व्याख्या भारतीय संविधान में मौजूद है, जिसे तैयार करने में डॉ. आंबेडकर ने बड़ी भूमिका का निर्वहन किया। अन्यथा वे कभी धर्म, कभी जाति, कभी अर्थ तो कभी राजनीति की राजनीति का शिकार होते ही रहेंगे।

संदर्भ :

[1] डॉ. आंबेडकर, भगवान बुद्ध और उनका धर्म, बुद्धभूमि प्रकाशन, नागपुर, अनुवाद भदंत आनंद कौसल्यायन,  1997, पृष्ठ 279।

[2] उपर्युक्त, पृष्ठ-279।

(संपादन : नवल/अनिल)


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