ऐतिहासिक था दलित-बहुजनों का भारत बंद, सवाल अब भी शेष

तीन साल पहले जब 2 अप्रैल, 2018 को भारत बंद किया गया तब दृश्य ऐतिहासिक था। दलित-बहुजन सड़क पर थे और उनके मन में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के संदर्भ में दिए गए न्यायादेश के खिलाफ आक्रोश। बता रही हैं निर्देश सिंह

भारत में दलित-बहुजन जागरूक हुए हैं और अब अपने अधिकारों को लेकर बड़ा आंदोलन भी करते हैं। वे शासक वर्ग के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। इसी बात की पुष्टि तब हुई जब 2 अप्रैल, 2018 को पूरे भारत में दलित-बहुजनों ने बंद को सफल बनाया। भीमा-कोरेगांव में हुई घटना के बाद यह बंद एक नजीर ही था। वजह यह कि यह स्वत:स्फूर्त आंदोलन था, जिसमें किसी भी राजनीतिक दल की कोई भूमिका नहीं थी। 

मुझे तो अब भी याद है जब मुरादाबाद में इसका आयोजन हुआ। दलित-बहुजनों के अंदर सुप्रीम कोर्ट के फैसले जिसमें उसने एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को शिथिल करने की बात कही थी तथा जिसके कारण इसके अनुपालन और जटिल हो जाता, के खिलाफ आक्रोश था। माता सावित्रीबाई फुले महासभा के बैनर तले मैं भी अपने सैकड़ों साथियों के साथ इस आंदोलन में शामिल थी। सभी अपने हाथों में नीला झंडा लिए सड़क पर थे। बाबासाहब डॉ. आंबेडकर की तस्वीरें अपने साथ लिए लोगों का कारवां जब सड़क पर उतरा तो केवल मेरे गृह शहर में ही नहीं, पूरे देश में शासक वर्ग की आंखें चुंधिया गईं। यह एक शानदार नजारा था जिसमें हर आयु वर्ग के लोग थे। किशोर से लेकर वृद्ध तक। सभी अपने लिए आवश्यक कानून, जो उन्हें मनुवादियों के शोषण व उत्पीड़न से बचाता है, की रक्षा के लिए सड़क पर थे। 

हालांकि उस दिन शाम होते-होते कुछ लोगों के शहीद होने की खबरें आईं। लेकिन कुल मिलाकर यह आंदोलन शांतिपूर्वक तरीके से संपन्न हुआ। परंतु, यह तो महज एक शुरुआत भर थी। भारत बंद के बाद सरकारी दमन तेज हुआ और बड़ी संख्या में लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। परंतु, इन सबके बावजूद भारत बंद अपने मकसद में कामयाब रहा। परिणाम यह हुआ कि सरकार को संसद में विधेयक लाकर एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को पूर्ववत बनाए रखने के लिए मजबूर होना पड़ा।

ऐतिहासिक भारत बंद की तस्वीर

लेकिन, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि सरकार ने भले ही संशोधन विधेयक के जरिए सुप्रीम कोर्ट के अवांछित हस्तक्षेप को खारिज कर दिया हो, एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम का कानून द्वारा अनुपालन आज भी एक गंभीर सवाल है। इसके संदर्भ में भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा वर्ष 2019 में जारी ‘क्राइम इन इंडिया’ रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2018 की तुलना में वर्ष 2019 में दलितों के खिलाफ अत्याचार के दर्ज मामलों की संख्या में 7.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वहीं आदिवासियों के मामले में 26.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। आंकड़े के मुताबिक वर्ष 2018 में पूरे देश में दलितों के खिलाफ अत्याचार के कुल 42 हजार 793 मामले दर्ज किए गए जबकि वर्ष 2019 में यह संख्या बढ़कर 45 हजार 935 हो गई। वहीं आदिवासियों के उपर जुल्म के मामले वर्ष 2018 में 6,528 थे जबकि वर्ष 2019 में यह बढ़कर 8,257 हो गया।

इस तरह यह तो साफ है कि जमीन पर स्थिति पहले की तरह ही बरकरार है। इसका एक उदाहरण और यह कि पुलिस और न्यायालय के स्तर पर भी एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में कार्रवाई व सुनवाई तंत्र की विफलता को बयां करते हैं। मसलन, ‘क्राइम इन इंडिया-2019’ रिपोर्ट में भारत सरकार द्वारा यह बताया गया है कि वर्ष 2019 में देश के चार महानगरों (दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई) एससी-एसटी एक्ट के तहत कुल 1398 मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा वर्ष 2017 में 648 मामले लंबित थे तथा एक मामले को अनुसंधान के लिए दोबारा शुरू किया गया। इस प्रकार वर्ष 2019 में उपरोक्त महानगरों की पुलिस के पास अनुसंधान व आवश्यक कार्रवाई हेतु कुल 2047 मामले थे। पुलिस द्वारा कुल 192 मामलों को झूठा मामला बता दिया गया। कुल 83 मामलों को तथ्य आधारित त्रुटियों की वजह से बंद कर दिया गया। कुल 75 मामलों में यह कहा गया कि पर्याप्त सबूत नहीं हैं और केवल 207 मामलों में पुलिस द्वारा संबंधित अदालतों में आरोपपत्र दाखिल किया गया।

उपरोक्त आंकड़े यह बताते हैं कि पुलिस एससी-एसटी से जुड़े मामलों को गंभीरता से नहीं लेती। यहां तक कि बड़ी संख्या में मामले दर्ज ही नहीं किए जाते। यहां तक कि पीड़ितों को ही कसूरवार बना दिया जाता है। इनमें उन मामलों को तो अलग ही माना चाहिए, जिनमें जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल व सामाजिक अपमान की बातें होती हैं। आवश्यकता यह है कि भारत सरकार पुलिसिया तंत्र को संवेदनशील बनाए तभी यह संभव है कि एससी-एसटी एक्ट कारगर बन सकेगा और इसे ही 2 अप्रैल, 2018 को हुए भारत बंद की सफलता मानी जानी चाहिए।

(संपादन : नवल)


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