सेनारी नरसंहार : रणवीर सेना की तरह एमसीसी के अपराधी भी दोषमुक्त

1990 के दशक में एमसीसी और रणवीर सेना दोनों ने बिहार को नरसंहारों के आग में बारी-बारी से जलाया। बाथे, बथानी और मियांपुर सहित सभी नरसंहारों के आरोपियों को हाईकोर्ट द्वारा बरी किए जाने के निर्णयों को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और अब सेनारी मामले में भी वह सुप्रीम कोर्ट में जाएगी, बता रहे हैं नवल किशोर कुमार

विश्लेषण

गत 21 मई, 2021 को पटना हाईकोर्ट ने वर्ष 1999 में हुए सेनारी नरसंहार के सभी 13 आरोपियाें को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। इनमें से दस आरोपियों, दुक्खन राम, बच्चेश सिंह, बुधन यादव, गोपाल साव, बुटाई यादव, सत्येंद्र दास, ललन पासी, गोराई पसवान, उमा पासवान, करीमन पासवान और द्वारिका पासवान, को निचली अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। इनके अलावा तीन अन्य आरोपियों अरविंद यादव, मुंगेश्वर यादव और बिनय पासवान को उम्र कैद की सजा मुकर्रर की गई थी। 

हाईकोर्ट के फैसले का दलितों-पिछड़ों द्वारा सोशल मीडिया पर स्वागत किया जा रहा है। वजह यह कि सेनारी में जिन 34 लोगों का नरसंहार हुआ था, वे सवर्ण थे और उनका संबंध रणवीर सेना से था। वही रणवीर सेना जिसने बिहार में 1995 से लेकर 2002 के बीच करीब 31 वारदातों को अंजाम दिया, जिनमें 27 नरसंहार शामिल थे। रणवीर सेना के नरसंहारों में तीन सौ से अधिक दलितों और पिछड़ों को मौत के घाट उतार दिया गया था। रणवीर सेना के गुंडों ने गर्भस्थ शिशुओं तक की हत्या यह कहते हुए कर दी थी कि जन्म लेने के बाद वे भी एक दिन नक्सली बनेंगे। रणवीर सेना द्वारा अंजाम दिए गए नरसंहारों में बाथे, बथानीटोला, शंकरबिगहा, नगरी, मियांपुर आदि शामिल हैं।

पटना हाईकोर्ट का मुख्य द्वार

सेनारी नरसंहार को माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) ने अंजाम दिया था। इस घटना में भी क्रूरता की सारी हदें पार की गयी थीं। इस नरसंहार के पीड़ित सवर्ण थे। घटना 18 मार्च, 1999 की है। भूमिहारों के गढ़ माने जाने वाले जहानाबाद जिले के सेनारी गांव में एमसीसी ने शाम साढ़े सात बजे हमला बोला था। करीब चार घंटे तक चले इस नरसंहार के दौरान अपराधियों ने भूमिहारों को गांव के बाहर इकट्ठा किया और एक-एक कर गला काटकर उनकी हत्या कर दी। 

बिहार में इस नरसंहार को बाथे नरसंहार का जवाब करार दिया गया। बाथे नरसंहार को रणवीर सेना ने 30 नवंबर 1997 को अंजाम दिया था। इस नरसंहार में 58 लोगों की हत्या कर दी गयी थी। इनमें अनेक महिलाएं और बच्चियां थीं। कुछ महिलाएं गर्भवती थीं। उनका पेट चीरकर उनके बच्चों को बाहर निकाल दिया गया था।

दरअसल, यह वह दौर था जब रणवीर सेना का गठन हो चुका था और राजनीतिक संरक्षण के कारण उसके हौसले बुलंद थे। जब नीतीश कुमार 2005 में बिहार में सत्ता में आए तब उनकी कैबिनेट ने पहली बैठक में जस्टिस अमीरदास आयोग को भंग करने का निर्णय लिया। इस आयोग का गठन उनके पूर्व की राबड़ी देवी हुकूमत ने किया था और उसे यह जांच करने की जिम्मेदारी दी गई थी कि रणवीर सेना को संरक्षण देने वाले कौन हैं।

रणवीर सेना के मुकाबले में तब एमसीसी थी, जिसका शीर्ष नेतृत्व द्विजों के पास था। दरअसल, बिहार में भूमि संघर्ष बहुत तीखा रहा है। सबसे पहला नरसंहार पूर्णिया के रूपसपुर चंदवा में हुआ। इसे 22 नंवबर 1971 को अंजाम दिया गया था। इस नरसंहार में पीड़ित पक्ष आदिवासी थे तो आक्रमणकारी पक्ष स्थानीय सामंतों का था। इस घटना में सैकड़ों की संख्या में आदिवासी मारे गए थे परन्तु पुलिसिया रिकार्ड में केवल 14 लोगों के मरने की बात कही गई। 

फिर नक्सलबाड़ी आंदोलन की तर्ज पर बिहार में भूमि संघर्ष तेज हुआ। इस कड़ी में 5 सितंबर, 1974 को सवर्णों ने बिहार के लेनिन जगदेव प्रसाद की हत्या कुर्था प्रखंड परिसर में उस वक्त कर दी जब वे एक सभा को संबोधित कर रहे थे। इस घटना ने दलितों और पिछड़ों को आक्रोश से भर दिया था। संघर्ष की आग भड़क चुकी थी। शाहाबाद के इलाके में जगदीश मास्टर के नेतृत्व में सशस्त्र आंदोलन ने सामंती ताकतों को बैकफुट पर ला दिया था। लेकिन यह संघर्ष का एक अंश मात्र था। सवर्णों ने अपनी भूमि सेना का गठन किया। फिर तो नरसंहारों का सिलसिला चल निकला।

वर्ष 1990 का दौर बिहार के लिए सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ। बिहार की सत्ता पर पिछड़े वर्ग के लालू प्रसाद यादव काबिज हुए। पहले तो सवर्णों ने उन्हें राजनीतिक षडयंत्र के जरिए हटाने की पूरी कोशिश की। लेकिन जब वे असफल रहे तब रणवीर सेना का गठन किया गया।

1990 के दशक में एमसीसी और रणवीर सेना दोनों ने बिहार को नरसंहारों के आग में बारी-बारी से जलाया। रणवीर सेना द्वारा अंजाम दिए गए सभी नरसंहारों के आरोपी पहले ही पटना हाईकोर्ट के द्वारा बाइज्जत बरी किए जा चुके हैं। इनमें से एक शंकरबिगहा नरसंहार, जो कि 25 जनवरी, 1999 को अंजाम दिया गया और जिसमें 22 दलितों-पिछड़ों की हत्या कर दी गई थी, के आरोपियों को निचली अदालत ने ही बरी कर दिया था।

बहरहाल, बाथे, बथानी और मियांपुर सहित सभी नरसंहारों के आरोपियों को हाईकोर्ट द्वारा बरी किए जाने के निर्णयों को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और अब सेनारी मामले में भी वह सुप्रीम कोर्ट में जाएगी। 

वैसे यह राजनीतिक रणनीति के अलावा कुछ भी नहीं है। बाथे और बथानी टोला का मामला वर्ष 2012 से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। वहीं सेनारी मामले को बिहार के अखबार और तथाकथित सवर्ण बुद्धिजीवी बाथे का बदला करार देते रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि बाथे, बथानी, मियांपुर सहित सभी मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। जब तक सुप्रीम कोर्ट रणवीर सेना के अपराधियों को सजा नहीं सुनाती है तब तक बदला या फिर इंसाफ जैसी कोई भी बात बेमानी है। रही बात सेनारी के अपराधियों की तो इस मामले को भी सुप्रीम कोर्ट देखे।

सनद रहे कि हिंसा और प्रतिहिंसा से कोई समाज आगे नहीं बढ़ सका है। 

(संपादन : अनिल/अमरीश)


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