पितृसत्तावादी सामंती समाज में पारिवारिक ‘बंधुआ’ की कहानी

एक बंधुआ मजदूर वे भी होते हैं जो सूदखोरों के हत्थे नहीं चढ़ते, लेकिन ब्राह्मणवादी व्यवस्था उन्हें बंधुआ मजदूर बना देती है। इसी तरह की एक कहानी ‘दहेज में आए कोरोना में गए’ डॉ. रजत रानी मीनू की है, जो हंस पत्रिका के जनवरी, 2021 अंक में प्रकाशित हुई। बता रहे हैं अनुज कुमार

भारतीय समाज में बंधुआ मजदूर के कई रूप हैं। इनमें से एक मजदूर वे, जो सूदखोरों के शिकार हो जाते हैं। भारत में बैंकिंग सेवा के इतने विकास के बावजूद सुदूर इलाकों में लोग महाजनों के जुल्म का शिकार होते हैं। इसके अलावा सामंती तबके के लोग गरीबों को बंधुआ मजदूर बनाकर रखते हैं, जिन्हें वे मजदूरी के नाम पर पेट भरने के लिए रूखा-सूखा देते हैं और तन ढंकने के लिए किसी तीज-त्यौहार के मौके पर वस्त्र। एक बंधुआ मजदूर वे भी होते हैं जो सूदखोरों के हत्थे नहीं चढ़ते, लेकिन ब्राह्मणवादी व्यवस्था उन्हें बंधुआ मजदूर बना देती है। इसी तरह की एक कहानी ‘दहेज में आए कोरोना में गए’ डॉ. रजत रानी मीनू की है, जो ‘हंस’ मासिक पत्रिका के जनवरी, 2021 अंक में प्रकाशित हुई।

यह कहानी समसामयिक समय में पारिवारिक रिश्तों में बढ़ती उपयोगितावादी दृष्टि का जायज़ा लेती है। इसमें रिश्तों में आई भावात्मक कमतरी के तहत व्यक्ति को एक मशीन समझकर जीवन में उसकी उपयोगिता के आधार पर उसके साथ किए जाने वाले व्यावहार का चित्रण हुआ है। इस उपयोगिता ने रिश्तों में मौजूद संवेदनात्मक धरातल को तोड़कर उसके स्थान पर स्वार्थ की भूमि का निर्माण किया है। कहानी में विक्रम मामा इसी प्रकार के पात्र हैं। जो जीवन भर तन, मन और धन से सभी की सेवा करते रहे अंत में उन्हें अपनों से उपेक्षा और अपमान के सिवा और कुछ नहीं मिला। अपनों की निष्ठुरता का प्याला पीते हुए विक्रम मामा की यह दास्तां समाज में व्याप्त दहेज जैसी कुप्रथा का भी यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती है।

कहानी की शुरुआत विक्रम मामा की मृत्यु की खबर से होती है। विक्रम मामा कहानी में कहीं भी सशरीर मौजूद नहीं है। मीना की स्मृतियां ही विक्रम मामा के चरित्र को उद्घाटित करती है। विक्रम मामा की मृत्यु की खबर सुनकर मीना की स्मृतियों में करीब 50 साल पहले के युवक का बिंब उभरने लगता है – “करीब पांच फुट पांच इंच लम्बाई, रंग गोरा, मझला कद, हृष्ट-पुष्ट गठा हुआ शरीर, नाक-नक्श आकर्षक, घुंघराले बाल।”

बांस से टोकरी बनाता एक आदमी (चित्र साभार : संजय लाहोरी)

विक्रम मामा श्रमशील व्यक्ति थे। प्रतिवाद और प्रतिरोध उनके स्वभाव के हिस्से नहीं थे। सहनशीलता का प्रतिबिंब उनके नम्र स्वभाव में नजर आता था। वफादारी उनके स्वभाव में था, जिसका निर्वाह उन्होंने जीवन भर किया। उनकी दिनचर्या में चारा काटना, चारे के गट्ठरों को उठाकर घर लाना, सानी करना, गोबर समेटना आदि काम शामिल थे। 

कहानी में विक्रम मामा दहेज बनकर आते हैं। उनका सीधापन ही लोगों की स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बन जाता है। उनका उपयोग दहेज में आए समान की तरह किया जाता है। जब वे बढ़ती उम्र के साथ घर का काम फुर्ती से नहीं कर पाते थे तब का चित्र कहानीकार ने कुछ इस प्रकार खींचा है- “जब उनकी उम्र बढ़ रही थी उनके अफसर बहनोई रिटायर होकर घर आ गए थे। उम्र तो उनकी भी रिटायर्ड लायक हो चुकी थी जैसे कभी घर के कामों से गृहणी कभी रिटायर नहीं होती है ठीक उसी तरह वह भी कभी रिटायर नहीं हुए थे। पेट के दो ऑपरेशन होने के बाद उनके कमर झुक गई थी। वह घर आए मेहमानों को झुकी कमर से ही ट्रे पकड़कर पानी और चाय-नाश्ता देते रहे थे।”

कहानीकार डॉ. रजत रानी मीनू

सही मायनें में देखा जाए तो कहानी उस मानसिकता को रेखांकित करती हुई नजर आती है जिसमें श्रम करने वाले व्यक्ति को कमतर समझा जाता है। विक्रम मामा का जीवन श्रम का जीवन था। किंतु जब वे श्रम के लायक नहीं बचते हैं तो उनकी बहन भी उनका साथ छोड़ देती है। 

स्मृतियों के माध्यम से लेखिका ने जिस भाषा में विक्रम मामा के चरित्र को रचा है, उसमें पाठक को बांधने की क्षमता है। भारतीय समाज में भाषा के माध्यम से बड़ों का सम्मान किया जाता है। बड़ों के लिए हम ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिनमें आदर होता है। किंतु देखा जाए तो आजकल के पढ़े लिखे युवा अपनों से बड़ो के समक्ष अपमानित करने वाली भाषा का प्रयोग करते हैं। कहानी में विक्रम मामा का भांजा उन्हें नाम से पुकारता है और उन्हें अपमानित भी करता है। बुजुर्गों के साथ ऐसा व्यवहार आज की पीढ़ी के लिए सामान्य जान पड़ता है। गालियां तो उनके लिए आधुनिक होने का पर्याय बनती जा रही हैं। उपेक्षा और तिरस्कार से भरा व्यवहार विक्रम मामा को एक यातना से गुजरने पर मजबूर कर देता है। उनसे किसी को भी सहानुभूति नहीं होती। 

कहानी में जब बहन की नातिन की शादी होती है तो विक्रम मामा भी जाते हैं। शादी हो जाने के बाद वो वहीं रुक जाते हैं। तो बहन रामरती उन्हें गांव लौटा देना चाहती है। कारण वे अब सेवा करने के लायक नहीं रहे अपितु सेवा करवाने लायक हो गए हैं। जिस दौर में हम जी रहे हैं, वहां इंसानों से ज्यादा कुत्तों की कीमत है। कहानी में विक्रम मामा जब तक शारीरिक श्रम करने का सामर्थ्य रखते हैं, तब तक उनसे काम लिया जाता है। किंतु जब वे काम करने लायक नहीं बचते हैं तब उन्हें कोई नहीं पूछता। विक्रम मामा के साथ जैसा व्यवहार किया जाता है उसको देखकर वे सोचते हैं-“घर में शेर जो उनका पालतू कुत्ता था उसे भी समय से दोनों टाइम खाना खिलाते थे। बाहर घुमाने ले जाते थे और एक मैं हूं, जिसने पूरी जिंदगी इनकी ही सेवा में कुर्बान की, मगर इन्हें जरा भी तरस नहीं आता।”

इस संवाद में विक्रम मामा के जीवन की विडंबना छुपी हुई है। जहां बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति की कीमत घटती है। कहानी में एक प्रसंग ऐसा आता है जहां वे अपनी जमीन भी अपने भाई की बहू के नाम कर देते हैं। जिसके बाद उनके प्रति अपनापन धीरे-धीरे घटने लगता है। उनका बिस्तर तक उनके कमरे से निकाल कर टीन में लगा दिया जाता है। कहानी के इस प्रसंग से उषा प्रियंवदा की कहानी “वापसी” के मुख्य पात्र गजाधर बाबू की याद आना स्वाभाविक है। परिवार में जब उन्हे उनकी अनुपयोगिता का एहसास करा दिया जाता है तो वे स्वयं अपनी दुनिया में लौट जाते हैं। और उनके कमरे से उनकी चारपाई भी बाहर निकाल दी जाती है।

यह कहानी विक्रम मामा के माध्यम से आधुनिक होते समाज में रिश्तों के यथार्थ को उद्घाटित कर व्यक्ति की उपयोगिता के आधार पर उसके मूल्य को कसती हुई मानसिकता का रचाव है। भाषा का सामर्थ्य ही रहा है कि मीनू की स्मृतियों में उभरे विक्रम मामा का चरित्र सजीव हो उठता है साथ ही रिश्तों में मौजूद प्रेम के हनन की दास्तां में पाठक की संवेदना विक्रम मामा के साथ जुड़ जाती है। इस प्रकार यह कहानी रिश्तों के खोखलेपन की हर दर्जे की खुदगर्जी का भयावह रूप प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।


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