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आंबेडकर से सीखें : कोविड काल में बंधुत्व

कोविड-19 के कहर के इस दौर में हमें शारीरिक दूरी के साथ-साथ 'सामाजिक नजदीकी' को अपनाने की भी आवश्यकता है – अर्थात सामाजिक एकजुटता की ताकि हमारे भावनात्मक, सांस्कृतिक, सामाजिक और भौतिक संसाधनों का हम साझा उपयोग कर सकें। एकजुटता की इसी भावना को डॉ बी.आर. आंबेडकर बंधुत्व कहते थे, बता रहे हैं रौनकी राम

इस वैश्विक महामारी से हमें क्या सीखने को मिला है? हमें इस दुष्ट वायरस के प्राणलेवा प्रसार को रोके के लिए हर संभव सावधानी बरतनी चाहिए और संपूर्ण मानवता के इस दुश्मन से मुकाबला करने के लिए सामाजिक दृष्टि से एक-दूसरे से जुड़े रहना चाहिए। हमसे कहा जा रहा है कि हम सामाजिक दूरी का पालन करें। परंतु भारतीय सन्दर्भ में सामाजिक दूरी कोई ऐसी निषेधाज्ञा नहीं है, जिसका पालन केवल अस्थायी तौर पर कोविड की इस दुनिया से विदाई तक किया जाना है। हमारे देश में जाति और पंथ के कारण लम्बे समय से लोगों में सामाजिक दूरी बनी हुई है और इस सामाजिक दूरी का महामारी से कोई लेना-देना नहीं हैं।

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लेखक के बारे में

रौनकी राम

रौनकी राम पंजाब विश्वविद्यालय,चंडीगढ़ में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं। उनके द्वारा रचित और संपादित पुस्तकों में ‘दलित पहचान, मुक्ति, अतेय शक्तिकरण’, (दलित आइडेंटिटी, इमॅनिशिपेशन एंड ऍमपॉवरमेंट, पटियाला, पंजाब विश्वविद्यालय पब्लिकेशन ब्यूरो, 2012), ‘दलित चेतना : सरोत ते साररूप’ (दलित कॉन्सशनेस : सोर्सेए एंड फॉर्म; चंडीगढ़, लोकगीत प्रकाशन, 2010) और ‘ग्लोबलाइजेशन एंड द पॉलिटिक्स ऑफ आइडेंटिटी इन इंडिया’, दिल्ली, पियर्सन लॉंगमैन, 2008, (भूपिंदर बरार और आशुतोष कुमार के साथ सह संपादन) शामिल हैं।

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