रूदन नहीं, संघर्ष व सृजन की गाथा है ‘एक मोची का अदबी जिंदगीनामा’

द्वारका भारती पंजाब के होशियारपुर में जूतियां बनाते हैं। साहित्य में इनकी गहरी अभिरूचि रही है। इनकी आत्मकथा के बारे में बता रहे हैं मोहनदास नैमिशराय

जब भी हम किसी दलित समाज की शख्सियत की आत्मकथा पढ़ते हुए उसके जीवन संघर्ष से रू-ब-रू होते हैं, तब अस्मिता के सवाल बार-बार उभरते हैं। फिर चाहे वह आत्मकथा देश किसी भी राज्य में रहने वाले की हो, किसी भी भाषा में हो। हर दलित आत्मकथाकार समाज से सवाल पूछता है। ठीक वैसे ही जैसा कि एक बार डॉ. आंबेडकर ने पूछा था, “मेरा देश कहां है?” 

दरअसल, किसी दलित के जीवन में जन्मना सुख-सुविधाएं नहीं होतीं। समाज में उसे विषमता का दंश झेलना ही पड़ता है। विषम परिस्थितियों से निकल जैसे-तैसे जब वह अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त करता है तो समाज की नंगी तस्वीर सामने आ जाती है।

क्या आज के पाठकों और शोधार्थियों ने कभी ऐसा भी सोचा होगा कि पंजाब के एक कम पढ़े-लिखे व्यक्ति ने मोची के ठीहे से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू), नई दिल्ली तक साहित्यिक दस्तक दी हो। जबकि सामान्य तौर पर ऐसे अवसर विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले प्राध्यापकों को ही प्राप्त होते हैं। जी हां! यह सुखद है कि पंजाब के होशियारपुर में जूतियां बनाने वाले एक मोची, द्वारका भारती, की रचना को भी पाठ्यक्रम में पढ़ाया जा रहा है। उनकी ही आत्मकथा है– “मोची : एक मोची का अदबी जिंदगीनामा”। इसका प्रकाशन नवचेतना प्रकाशन, सिद्धार्थ नगर (बूट मंडी), जालंधर, पंजाब द्वारा किया गया है।

क्या यह विश्वास करने लायक बात होगी कि पंजाब के उसी मोची को शिमला के राष्ट्रपति निवास स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में दलित साहित्य पर अपना पेपर पढ़ने के लिए आमंत्रित किया गया हो? पाठकों को बता दें कि तब संस्थान में फेलो डाॅ. श्योराज सिंह बेचैन  ने उन्हें वर्ष 2007 में आमंत्रित किया था। मैं भी उन दिनों संस्थान में फेलो था। अन्य साथियों के साथ उनसे भी मुलाकात हुई थी।

दलित साहित्य का इतिहास बताता है कि यह शताब्दी शुरु होते-होते दलित लेखकों तथा पत्रकारों की काफी आत्मकथाएं सामने आने लगी थीं। महराष्ट्र के साथ अन्य राज्यों के अलावा पंजाब में भी दलित साहित्य, एक आंदोलन के रूप में उभरने लगा था। 1933 में मुल्कराज आनंद ने दलित समस्या पर एक महत्वपूर्ण उपन्यास अंग्रेजी में लिखा था, जिसका बाद में ‘अछूत’ नाम से अनुवाद प्रकाशित हुआ। हालांकि मुल्कराज आनंद स्वयं दलित समाज से नहीं थे, लेकिन उन्होंने शिद्दत के साथ इसकी रचना की थी। उनसे नजदीकी रिश्ते रखते हुए पंजाब में दलित लेखकों के साथ गैर दलित लेखकों ने भी अच्छी खासी भूमिका निभायी थी। इनमें नानक सिंह से लेकर एस. एस. नूर तक थे। 

संक्षेप में कहें तो गुरदयाल, अजीत कौर, प्रेम गोरखी, लाल सिंह दिल, एल आर बाली, बलवीर माधो पुरी, चरणदास सिंह, मदन वीरा, सोहनलाल शास्त्री, गुरुदास राम आलम, गुरचरण सिंह राऊ, देशराज कोली, भगवत रसूलपुरी, सुरेद्र अज्ञात, ज्ञान सिंह बह, रमेस सिद्धू, कृष्ण कुमार बौद्ध आदि ने पंजाब में दलित साहित्य को आगे बढ़ाया। इनमें एक नाम द्वारका भारती का भी है। हालांकि उनकी स्थिति अन्य लेखकों जैसी नहीं रही। वे एक साधारण परिवार में पैदा हुए, जिसमें जूतियां बनाने का व्यवसाय होता रहा था और आज भी वे यही व्यवसाय कर रहे हैं। 

जूतियों की अपनी दुकान में द्वारका भारती

एकदम सीधे-सरल इंसान हैं द्वारका भारती। वर्ष 1985 के लगभग लिखना शुरू किया। लिखने से पहले खूब पढ़ा। इस पढ़ाई और जीवन में विषमता से संघर्ष के कारण लिखना शुरू हुआ। अब सवाल कि शिक्षा लेने के बाद भी वे अपने पैतृक व्यवसाय से क्यों जुड़े। इस बारे में वे बताते हैं कि वे तीन भाई थे। एक अमेरिका चला गया। शेष बचे दो भाई तो उन्हें पिता की दोनों दुकानें संभालनी थी। लेखन के बीच जूतियां बनाते हुए उन्हें कभी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि वे चमड़ा मथते हैं। यह उनके लिए रोजाना का काम था और अभी भी है। जैसे दुकान में जूतियां टंगी होती हैं, वैसे ही किताबें भी रखी होती हैं। हालांकि कई ऐसे लोग उनकी दुकान पर आते हैं जिनका व्यवहार ठीक नहीं होता। लेकिन क्या करें, सवर्णों की आदत तो रहेगी ही। इन सबसे इतर पढ़ने के जुनून ने उन्हें अनुवाद की ओर अग्रसर किया।

वह एक ऐसी शख्सियत हैं, जो कम उम्र में ही इराक में गोला-बारूद की गंध के बीच रहते हुए भी समाज शास्त्री के रूप मे मानवीय पहलुओं पर विचार करता है। एक ऐसा इंसान बगदाद में जिसकी मुलाकात सद्दाम हुसैन से हुई हो और जिसने ईरान व इराक के शहरों को युद्ध की भट्टी में जलते हुए देखा हो। यह बहुत बाद में पता लगा कि उसी शख्सियत यानी द्वारका भारती नाम के बागी मोची के भीतर भी बहुत कुछ जलता रहा था। कहने को सिर्फ मैट्रिक पास लेकिन जिसके पास विचारों का भंडार रहा हो। इराक में वही बागी मोची फुरसत के पलों में होता तो साथ रह रहे पाकिस्तानी, बांग्लादेशी मजदूरों संग मिल-बैठकर बातें करता। उनमें पंजाबी भी होते थे। पंजाबी में तब किसी ने पूछा, “बाबा, तुहारी जूतियों की दुकान है होशियारपुर में?” बाबा यानी द्वारका ने सर हिलाया था। वहीं किसी ने पूछा– ‘बाबा मोची हो‍?’

उसने कहा कि, “क्या मोची आदमी नहीं होता?” सवाल पूछने वाला निरूत्तर हो गया था।

द्वारका भारती जी मेरे बहुत पुराने मित्र रहे हैं। पिछली शताब्दी में मेरी उनसे सोहनलाल शास्त्री जी के घर पर मुलाकात हुई थी। पाठकों को बता दें कि शास्त्री जी उन दिनों पटेल नगर, दिल्ली में  रहते थे और मैं हर दूसरे-तीसरे दिन उनसे मिलने उनके निवास पर जाता था। शास्त्री जी ने ‘बाबा साहेब डाॅ. आंबेडकर के साथ मेरे पच्चीस वर्ष’ पुस्तक लिखी थी। पंजाब से उनका संबंध था और द्वारका भारती जी से भी। 1990 के दशक के आरंभिक दौर की मुलाकातों ने द्वारका जी के बारे में मुझे पता चला था कि वे सामाजिक कार्यकर्ता हैं और डाॅ. आंबेडकर के पक्के भक्त। बाद में मेरी उनसे चंढ़ीगढ़, जालंधर, अमृतसर तथा होशियारपुर में भी मुलाकातें हुईं। इन मुलाकातों के कारण हम एक-दूसरे के नजदीक आए। 

स्वयं आत्मकथाकार के शब्दों में “प्रस्तुत आत्मकथा एक मोची के लगभग 60 वर्षों का एक ऐसा साहित्यिक लेख-जोखा है जो कि आपके जहन में यह प्रश्न अवश्य पैदा कर देगा कि क्या किसी मोची की भी कोई आत्मकथा हो सकती है? इस समाज के अंतिम छोर पर खड़े एक मोची के जीवन में ऐसा क्या विशेष घटित हो सकता है कि उसे पढ़ने के लायक माना जाय? समाज ने जिस व्यक्ति के जीवन के अर्थ भी उससे छीन लिए गये हों? उसकी आत्मकथा के क्या अर्थ हो सकते हैं?” (पृष्ट-14)

द्वारका भारती द्वारा लिखित आत्मकथा ‘मोची (एक मोची की अदबी जीवनगाथा)’ का कवर पृष्ठ

प्रस्तुत जिंदगीनामा एक मोची की रूदन-कथा नहीं है, बल्कि चमड़े को मथने के  समान आत्मकथाकार के जीवन में हुई घटनाओं को आगे बढ़ाया गया है, जिनसे पाठकों के भीतर से अनेक सवाल खुद-ब-खुद उभरने लगते हैं। कहना न होगा कि इस स्वकथन के बहाने द्वारका भारती भारतीय समाज की पुरातनपंथी का फातिहा पढ़ने का इरादा रखते हैं और इसे नेस्तनाबूद करने की इच्छा भी रखते हैं। लेखक उस दर्शन और संस्कृति का भी विरोध करता है, जिसने उस जैसे अनेक शिल्पियों के लिए भयानक परिस्थितियों  के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। ‘मोची’ नाम से इस आत्मकथा में लेखक के न सिर्फ बगावती तेवर सामने आता हैं बल्कि दलित समाज को वह इनका सामना करने का आह्वान भी करता है।

आत्मकथा के अनुक्रम के आधार पर देखा जाय तो लेखक ने मोची का ठीहा से शुरूआत की है। दसवीं कक्षा में पढ़ रहे आत्मकथाकार ने अपने अध्यापक विद्यासागर के जातिवादी मुखौटे को उतारते हुए उनकी मानसिकता को रेखांकित किया है। स्वयं लेखक के शब्दों में, “प्रतिदिन की प्रार्थना में विद्यासागर के द्वारा देखा जाता था कि किसके माथे पर तिलक नहीं लगा है। तिलक नहीं होने पर उस विद्यार्थी को सजा दी जाती थी। इसके साथ हनुमान चालीसा का पाठ भी याद करना जरूरी होता था।” (पृष्ठ-19)

जातिवादी बातें यहीं तक सीमित नहीं थीं इसके आगे तक नागफनी  के रूप में आत्मकथाकार के भीतर गहरे तक चुभती जाती थी। यथा– 

“एक दिन मेरा पेपर फेंकते हुए विद्यासागर ने पूछ। ‘तुम्हारा बाप क्या करता है?’

“मैं चुप था, बोला ही नहीं जा रहा था। एक सहपाठी रतन ने बताया, ‘जूते बनाता है। मोची है।’ 

यह सुनकर विद्यासागर ने मेरे सिर के बालों को कसकर पकड़ लिया और पूरी ताकत से खींचा। मेरे बालों में ज्यादा तेल लगा होने के कारण उसके हाथ चिकने हो गए। अपने चिकने हाथों को देखकर विद्यासागर का पारा और तेज हो गया। उसने मेरे बाल छोड़ कर अपने हाथ मेरी सफेद कमीज से रगड़-रगड़ कर पोंछे। मैं संज्ञा-शून्य-सा सिर झुकाए खड़ा था। उस समय वह अध्यापक कह रहा था, ‘कितना तेल चुपड़ रखा है इस चमार ने … मेरे हाथों को भी तेल से भर दिया इसने।’

“तभी उसने कहा, ‘चल भाग यहां से, अपने बाप के साथ जूते बना। पढ़कर क्या करेगा तू ओये!’

“मैंने क्षण भर के लिए विद्यासागर की आंखों में झांका था। उसकी आंखों से घृणा का लावा दहक रहा था। मुझे लगा कि यह दहकता हुआ लावा मेरे लिए कम, मेरी जाति के लिए ज्यादा था। सदियों से चली आ रही घृणा को उसने जैसे एक बार में ही मेरे वजूद पर उड़ेल दिया हो। मैंने पूरी कक्षा की ओर नजर दौड़ाई। उनकी आंखों में एक ऐसा अजनबी अहसास था कि जैसे मैं उन पलों में उनके लिए पराया हो गया था।” (पृष्ठ-21)

दूसरे भाग यानी ‘सींगों वाला चेहरा’ में आत्मकथाकार ने व्यास सतलुज लिंक डैम प्रोजेक्ट के तहत काम करते हुए वहां की परिस्थितियों के बारे में लिखा है– “मेरे ताया [पिता के बड़े भाई] जी, जो डैम पर फोरमेन थे और स्वयं को राजपूत कहते थे। उनकी ही सिफारिश से मुझे किराये का मकान मिला। मकान मालिक मुझे भी राणा जी कहकर संबोधित करता था। हिमाचल प्रदेश में राजपूत जाति के लोगों को बहुत ही सम्मान से देखा जाता था। अस्पृश्यता बहुत थी। डैम में काम करने वाले लोगों को यहां के मकान मालिक उनकी जाति पूछकर ही कमरा किराये पर देते थे।”

डैम पर काम करने वाले कर्मचारियों के बारे में वे आगे लिखते हैं– “एक दिन जब डैम की कैंटीन में मैं खाना खा कर बाहर आया तो एक वृद्ध व्यक्ति ने पानी पीने की इच्छा व्यक्त की। जब मैंने उससे कहा वह अंदर कैंटीन में जाकर स्वयं पानी पी ले, तो वह कहने लगा, अंदर वह [वृद्ध व्यक्ति] कैसे जा सकता है? क्योंकि वह तो चमार है। मैंने कैंटीन से लाकर उसे पानी दिया।” लेखक स्वयं अपने बारे में लिखता है– “मैं भी अपनी जाति से त्रस्त था। आज  भी मैं उसका घिघियाता हुआ चेहरा भूल नहीं पा रहा हूं।”

कभी कभी वे गांव जाते थे। इस बारे में वे लिखते हैं– “गांव के ब्राह्मण की किराने की दुकान पर जाने का जब मौका मिलता था, तो मैं देखा करता था कि उसे दूर से ही दुकान के बाहर से पैसे फेंके जाते थे। फिर वह भी सौदा तौल कर उसे बाहर फेंक दिया करता था।” 

आत्मकथाकार ने राधास्वामी डेरा ब्यास का भी जिक्र किया है– “गद्दी पर जो भी आसीन होता, उनकी तस्वीर हमारे घर में लगी होती। जिस पर रोज सवेरे उठ कर मेरी माता अपना माथा झुकाया करती थी। सत्संग में भी हम जाते थे।” कहना न होगा कि राधास्वामी डेरा ब्यास का प्रभाव स्वयं आत्मकथाकार पर भी था, जब वे जीवन के आरंभिक चरण में थे। वे लिखते हैं– “उस समय मैं राधास्वामी मत का एक निष्ठावान श्रद्धालु था।”(पृष्ठ-40) 

परंतु बाद के दिनों में लेखक के भीतर से तर्क उभरने लगे थे। उदाहरण के लिए राधास्वामी का मत भगवान के बारे में अस्पृष्ट है। राधास्वामी के अनुयायी यह भी मत देते हैं कि हमारा शरीर एक हरिमंदिर अर्थात भगवान का घर है। इसमें मलिन वस्तुएं नहीं डालनी चाहिए। यानी मांस-भक्षण नहीं करना चाहिए। 

आत्मकथाकार मोची द्वारका भारती लिखते हैं कि “जब मैंने संसार के महान व्यक्तियों को पढ़ना शुरू किया तो मुझे स्पष्ट हो गया कि किसी व्यक्ति द्वारा खायी जाने वाली खुराक, उसके व्यक्तित्व को कभी प्रभावित नहीं करती। बल्कि उसके द्वारा किए जाने वाले अच्छे-बुरे काम ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।” यहां तक कि उन्होंने बुद्ध को भगवान कहने संबंधी एक घटना का जिक्र सुरेन्द्र अज्ञात के संदर्भ में किया है– “बुद्ध को भगवान कहने पर एक बार विवाद इतना बढ़ गया कि जालंधर में आयोजित एक बौद्ध समागम इसी बहस की भेंट चढ़ गया। बौद्धों के एक गुट का यह मानना है कि बुद्ध को भगवान न लिखा जाय, लेकिन दूसरे गुट का कहना था कि बुद्ध को भगवान लिखा जाय। क्योंकि भगवान का अर्थ ईश्वर से नहीं है।” 

स्वयं लेखक के विचार में बुद्ध को यदि हम ‘महात्मा’ बुद्ध कहते हैं तो यह बुद्ध की विचारधारा के साथ घोर अन्याय होगा। वैसे ही बुद्ध को सम्मान के साथ भगवान बुद्ध कहना ठीक नहीं।

अपनी इस आत्मकथा में लेखक अपने जीवन में आये मित्रों तथा सहयोगियों को भी बराबर याद करते हुए चलते हैं। वे उन सहयात्रियों को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। सुरेन्द्र अज्ञात से वे प्रभावित भी रहे और उनके मित्र भी हैं। दूसरे ज्ञान सिंह बल के बारे में वे लिखते हैं “जालंधर में निर्मित आंबेडकर भवन के निर्माण में बल साहब की अहम भूमिका रही थी। पूरे पंजाब के पीसीएस. और आईएएस कैडर के अफसरों से उनका अच्छा-खासा तालमेल रहा था। कभी-कभी वे मुझे भी साथ ले जाते  और मेरा परिचय, ‘यह हमारे मित्र हैं, बहुत अच्छी जूतियां बनाते हैं’, कह कर दिया करते थे। बल साहब स्वयं पंजाब में उच्च अधिकारी थे। साहित्य की उनकी परख गहरी थी। ‘नवां जमाना’ या अन्य पत्रा-पत्रिका में मेरी कथा, कहानी, कविता जब छपती तो वे उसका जिक्र करते।”

लेखक की आरंभ से ही जिज्ञासु प्रवृति रही है। साहित्य, समाज और लेखन, इनमें तालमेल रखते हुए वे सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं। जमीन से जुड़ कर रहने की ललक उनके भीतर अभी भी है। उन्होंने जितना लिखा, वह संभवतः अभी तक पाठकों तक नहीं पहुंच पाया है। बहुत कम साथी जानते हैं कि उन्होंने ‘जूठन’ का पंजाबी अनुवाद किया था, जिसे वर्ष 1998 में चेतना प्रकाशन ने छापा। पंजाब के डाॅ. गुरुचरण सिंह के दलित उपन्यास ‘मशालची’ का हिंदी अनुवाद द्वारका भारती ने ही किया था, जिसे वर्ष 2009 में शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली द्वारा छापा गया। इसका विमोचन रांची में राजेन्द्र यादव जी के द्वारा हुआ। रमणिका फाउंडेशन की ओर से अनुवाद के लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया। 

निश्चित तौर पर आत्मकथाकार की तर्कशीलता के कारण ही उनके भीतर लेखक और कवि का विकास भी हो पाया। चमड़े को मथते हुए वे समाज को भी मथते हैं। गलत परंपराओं पर सवाल उठाते हैं। जातियों के पचड़ों में न पड़ कर मानवतावादी विचार रखते हैं। इसीलिए उन्होंने मानववादी रचना मंच को जिस मनोयोग से चलाया, वह उनकी विचारधारा की प्रतिबद्धता को बखूबी दर्शाता है।

समीक्षित पुस्तक : मोची (एक मोची की अदबी जीवनगाथा)
आत्मकथाकार : द्वारका भारती
प्रकाशक : नवचेतना प्रकाशन, सिद्धार्थ नगर (बूट मंडी), जालंधर, पंजाब
मूल्य : 150 रुपए (सजिल्द), 100 रुपए (अजिल्द)

(संपादन : नवल/अमरीश)


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