सरकार की जिद के कारण अबतक 491 किसानों को देनी पड़ी शहादत : जसदीप सिंह

तीन कृषि कानूनों को लेकर चल रहे किसान आंदोलन के छह माह गत 26 मई को पूरे हो गए। इस दौरान 491 किसान शहीद हुए हैं। इस आंदोलन को सबसे करीब से ट्रॉली टाइम्स ने कवर किया है। इसके संस्थापक सदस्य व पंजाबी संस्करण के संपादक जसदीप सिंह से सुशील मानव ने कई सवालों को लेकर खास बातचीत की

साक्षात्कार

जसदीप सिंह पंजाब के मोगा जिले के एक गांव में पले बढ़े हैं और किसान परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्होंने चंडीगढ़ में एक सॉफ्टवेयर कंपनी में जावा प्रोग्रामर के रूप में काम किया। वे अच्छे अनुवादक भी है। उन्होंने गुरविंदर सिंह की दो फिल्मों के लिये डायलॉग और स्क्रीन प्ले लिखा है। जसदीप सिंह वत्रमन में किसान आंदोलन पर आधारित ‘ट्रॉली टाइम्स’ के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और इसके पंजाबी संस्करण के संपादक हैं। किसानों के आंदोलन के छह माह बीतने के बाद इस पूरे आंदोलन के संदर्भ में सुशील मानव ने उनसे दूरभाष पर विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है संपादित अंश 

‘ट्रॉली टाइम्स’ अख़बार निकालने का विचार कैसे आया?

दरअसल “ट्रॉली टाइम्स” के संस्थापक सदस्यों में से एक गुरुदीप धालीवाल मेरे मित्र हैं। हम लोगों ने पहले एक साथ आर्टिजन (लोहार, गड़ेड़िया आदि) समुदाय के लोगों पर फोटोग्राफी क्राफ्ट में डॉक्युमेंट्री बनाई है। इससे पहले चंडीगढ़ में जो भी आंदोलनात्मक गतिविधियां होती थीं, मैं उनमें हिस्सा लेता था। जब किसान आंदोलन शुरु हुआ और किसान दिल्ली आए तो मैं भी मित्रों के साथ भाग लेने दिल्ली आ गया। जबकि गुरुदीप धालीवाल बरनाला स्थित अपने गांव से 26 नवंबर, 2020 को ही ट्रैक्टर ट्राली पर बैठकर किसानों के साथ दिल्ली चले आये थे। 

हम सबको पता था कि यह आंदोलन लंबा चलने वाला है। वहां मुख्य मंच से लेकर ट्रॉलियों की कतार  10 किलोमीटर तक थी। तो मुख्य मंच पर जो बातचीत होती थी, वह बस एक-दो किलोमीटर के दायरे में रह जाती थी। तो आज क्या हुआ? आगे क्या करना है? सरकार ने क्या कहा? लीडर क्या कह रहे हैं? ये बातें आंदोलन में दूर तक नहीं जाती थीं। दूसरी ओर सोशल मीडिया पर हमारे बुजुर्ग किसान लीडर इतने सक्रिय भी नहीं हैं और सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा अफवाह व भ्रम बना रहता है कि क्या सच है क्या झूठ है। जबकि प्रिंट मीडिया पर अभी भी लोगों की विश्वसनीयता क़ायम है। लोग उनमें छपी बातों पर ध्यान देते हैं। मुद्रित बातों की किसानों के बीच भरोसा रहता है और उसमें लिखी बातों पर वो चर्चा भी करते हैं। 

यहीं हम सबने मिलकर ये विचार किया कि हमें कुछ करना चाहिए। चूंकि गुरुदीप धालीवाल फोटोग्राफर व लेखक हैं, मुझे लेखन और अनुवाद में रुचि है, ऐसे में हमें लगा कि जो सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनके साथ मिलकर काम किया जाय। तो सुरमीत मावी और फिर अजय पाल नट और उनकी बहन नवकिरण नट को हमने शामिल किया। ये  तीनों भी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। फिर नरिंदर भिंडर और जस्सी संघा भी जुड़ गए। 

शुरुआत कैसे और किन परिस्थितियों में हुई?

ट्रॉली टाइम्स निकालने की बात 12 दिसंबर को फाइनल हुई। इसके पंजाबी संस्करण का कंटेंट मैं देखता, और हिंदी संस्करण का काम नवकिरण नट और मुकेश। इसका अंग्रेजी संस्करण भी हमने निकाला था। स्वयंसेवकों से अनुवाद करवाकर। उस समय शुरुआत में लोगों में जोश भी था, लेकिन फिर चार-पांच संस्करण के बाद नहीं हो पाया। धीरे-धीरे लोग कम होके बस कोर टीम रह गयी। तो हमारा फोकस फिर हिंदी और पंजाबी संस्करण तक सीमित हो गया। प्रिंट के अलावा हम ट्राली टाइम्स का ऑनलाइन संस्करण भी साथ के साथ मुहैया करवाते हैं। कुछ समय लोगों ने लंदन, ऑस्ट्रेलिया और जालंधर में लोगों ने ट्राली टाइम्स के पीडीएफ को प्रिंट करवाकर बांटा भी था। 

किसान आंदोलन के 6 महीने पूरे हो गए। आगे आप किसान आंदोलन को कहां देखते हैं? 

पहले जब किसान दिल्ली आए तो सरकार ने उनकी बातें नही मानीं पांचवी मीटिंग के बाद सरकार समझौते पर आई। सरकार ने तीनों काले कनूनों को डेढ़ साल के लिये स्थगित किया। मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। कुछ मियाद और बीतने के बाद मुमकिन है कि सरकार ‘2024 में लोकसभा चुनाव के पहले फिर से स्थगन का प्रस्ताव लेकर आए। 

देखिए, यह आंदोलन जितना लंबा चलेगा, समाज को उतना फायदा होगा। इसके लंबा खिंचने से जो जनचेतना विकसित हो रही है, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों में, वह इस आंदोलन की उपलब्धि है। अलग-अलग वर्गो और कार्य समूहों में यह चेतना विकसित हुई है कि अगर आपको अपने हक़ में कोई बात सरकार से मनवानी है तो आपको संगठित होकर ही लड़ना पड़ेगा। किसानों के साथ इस आंदोलन में कृषि मजदूर और दूसरे क्षेत्रों के मजदूर समर्थन में उतरे हैं। तो यह चेतना मजदूरों के बीच गयी है कि अगर हम भी किसानों की तरह संगठित होकर आंदोलन करें, एकजुट होकर सरकार, मंत्रियों और नेताओं का घेराव करें तो सरकार से अपनी बातें मनवा पाएंगे। इस प्रकार  यह एक गुणात्मक बदलाव हुआ है। ये केवल खेत-खलिहान ही नहीं, बल्कि कृषि और किसान संस्कृति को बचाने के लिये भी है।

राजस्थान-दिल्ली की सीमा शाहजहांपुर बार्डर पर शहीद किसानों की स्मृति में बनाया गया स्मारक व जसदीप सिंह, संपादक, ट्रॉली टाइम्स, पंजाबी संस्करण की तस्वीर

क्या आपको नहीं लगता है कि अब इस मामले में राजनीति भी खूब हो रही है?

देखिए, जब से भाजपा सत्ता में आयी है, प्रचंड बहुमत के नशे में है। इसी कारण केंद्र सरकार ने हर मामले में विपक्ष को नजरअंदाज किया है। किसान आंदोलन की शुरुआत में केंद्र सरकार कह रही थी कि यह केवल एक राज्य के किसानों की लड़ाई है। सदन में विरोध करने के लिये विपक्ष के पास आवश्यक संख्या नहीं है। वे पंजाब के किसानों को कोई महत्व ही नहीं दे रहे थे, परंतु देना पड़ा। अब हरियाणा में किसान कड़ी चुनौती दे रहे हैं। वहां किसान रोज ही किसी न किसी नेता, मंत्री व विधायक को घेरते रहते हैं। कभी खट्टर के घेर लेते हैं तो कभी चौटाला को। हरियाणा में कहीं न कहीं किसानों द्वारा नेता को घेरने की खबरें रोज सुर्खियां बनती हैं । यह चेतना किसान आंदोलन से आई है। यह प्रतिरोध की दृढ़ता है। 

चाहे सरकार किसी की हो। सहभागिता वाले लोकतंत्र का दायरा बहुत बड़ा होता है। किसान आंदोलन ने चुनावी लोकतंत्र के दायरे से मुक्त करवाकर यह चेतना विकसित की है कि सिर्फ चुनाव से लोकतंत्र नहीं बनता, उसमें लोगों की हिस्सेदारी से बनता है। किसान आंदोलन ने यह स्थापित किया है। फेसबुक और वाट्सएप पर आप चाहे जो कर लें, सरकार उसका हल निकाल लेती है। लेकिन जब लोग इकट्ठा होकर सड़क पर निकल आएं तब सरकार चुप नहीं बैठ सकती। आंदोलनकारियों ने उस मीडिया को भी देख लिया जो सरकार के पक्ष में जनमत तैयार करती है। 

बताया जा रहा है कि किसान आंदोलन में अब तक करीब 491 किसानों की मौत हुई है? आप क्या वजह मानते हैं??

सरकार और कॉरपोरेट मीडिया किसान आंदोलन को पहले समृद्ध अपर क्लास लोगों की पिकनिक कहकर दुष्प्रचार कर रहे थे। लेकिन मौत के ये आंकड़े बताते हैं कि आंदोलन में एक बीघा की मिल्कियत वाला किसान और ज़मीनहीन कृषि मजदूर भी शामिल हुए हैं। सबके खाने के लिये प्रदर्शन स्थल पर लंगर चलता था और ओढ़ने बिछाने के लिये गर्म बिछौने कंबल किसान आंदोलन में उपलब्ध थे। लेकिन फिर भी कितना भी हो ट्राली या टेंट में पड़े हैं तो जो घर का एक कंफर्ट होता है, खुद को बचाने का, वह तो नहीं मिलता है। दिसंबर जनवरी महीने में बारिश हुई, आंधी तूफान से टेंट टूटे, पुलिस और सरकार के लोगों ने टेंट तोड़े। तो किसान आंदोलन में ठंड के महीने में निमोनिया, कोल्ड स्ट्रोक, हार्ट अटैक आदि से जो भी मौतें हुईं, सबका मूल कारण ठंड लगना ही था। 

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किसानों को कुछ बीमारियों पहले से भी होती हैं, जैसे डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और हृदय रोग आदि की। इसके अलावा अन्य छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज भी वो गरीबी के कारण नहीं करवाते। वे ध्यान ही नहीं देते। तो ऐसे में अधिक उम्र और प्रतिकूल मौसम उन्हें मार देता है। आप देखेंगे कि मरने वाले अधिकांश किसानों की उम्र 50-60 या उससे ज़्यादा है। लेकिन कम उम्र के किसान या कृषि मजदूर भी बड़ी मात्रा में जो हार्ट अटैक से मरे हैं। यह जानकर मैं भी स्तब्ध हूं। छोटी जोत (1-3 बीघा खेत) के किसान अगर कृषि के अलावा कोई अतिरिक्त काम नहीं करता है, तो वह सर्वाइव नहीं कर सकता है। ऐसे में वो खेती के साथ उन्हें डेयरी फ़र्मिंग, बिजली की दुकान, कोई नौकरी नहीं करेंगे तो उनकी आय का कोई जरिया नहीं होता है। फिर तो वे गरीबी में बीमारियां पालने के लिये बाध्य होते हैं। क्योंकि जो स्वास्थ्य सुविधाएं हैं, वह बेहद महंगी हैं। सरकारी स्वास्थ्य संरचनाएं खस्ताहाल हैं। लोगो का भरोसा भी नहीं है उनपर अब। तो किसानों के परिवार में अगर कोई गंभीर बीमार पड़ गया, या कोई दुर्घटना घट गयी तो वो कर्ज़ के बोझ में डूब जाते हैं। 

मैं तो मानता हूं कि मरने वाले ज़्यादातर किसान पिछड़े वर्ग से थे और गरीब थे। मैं फिर भी कहूंगा कि हर एक किसान की मौत के लिये सरकार जिम्मेदार है। उसने कोरोना काल में काले क़ानून बना दिये और उन्हें यह गुमान भी था कि उन्हें कोई नहीं रोक पाएगा। सरकार की वजह से ही आंदोलन इतना लंबा चला है और किसान आंदोलन में हुई सारी मौतों की जिम्मेदार सरकार है।    

किसान आंदोलन में जान गंवाने वाले किसानों के कर्ज़ के लिये कुछ सोचा है क्या ?

किसान यूनियनें शहीद हो चुके किसानों के संबंध में पहल कर रही है। वह प्रशासन से दबाव बनवाकर कर्ज़ माफ करवाती हैं व मुआवजा दिलवाती हैं। सूदखोरों और आढ़तियों को भी उस तरह से पीड़ित परिवार को तंग नहीं करने देते।

क्या कोरोना से भी किसान मरे हैं? मीडिया में ऐसी बातें सामने आ रही हैं। 

जब पूरे देश में लोग कोरोना संक्रमित हुए और उनकी मौतें हुई हैं तो किसान आंदोलन स्थल उससे मुक्त कैसे रह सकता है। लोग प्रभावित तो हुए ही हैं और मरे भी हैं। लेकिन उतनी मौतें कोरोना से नहीं हुई हैं जितना कि कारपोरेट मीडिया द्वारा दावा किया जा रहा है। किसान सैनिटाइजर और मास्क और पर्याप्त दूरी बनाकर रखते हैं। टीकाकरण के बारे में भी नेताओं ने सरकार से अपील की थी कि सरकार किसानों का टीकाकरण आंदोलनस्थल पर करवाए। 

अंतिम सवाल, ट्राली टाइम्स का सफ़र आंदोलन के बाद क्या होगा? 

किसान आंदोलन के खत्म हो जाने से किसानों के मसले नहीं खत्म हो जाएंगे। इसे जारी रखने का विचार है लेकिन इसका स्वरूप क्या होगा, अभी इसपर विचार नहीं किया है। यह अखबार, पत्रिका या केवल ऑनलाइन किस स्वरूप में आएगा, काफी कुछ भविष्य पर निर्भर करेगा।  

(संपादन : नवल/अनिल)


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