हूल दिवस मनायेंगे किसान, संयुक्त किसान मोर्चा ने लिया फैसला

सारी लड़ाइयां कार्पोरेट और कंपनियों के ख़िलाफ़ लड़ी गयी हैं। जिन्होंने कार्पोरेट व कंपनियों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी है, उनका अनुभव हमारे लिये ज़रूरी है। सिदो-कान्हू ने ब्रिटिश कंपनी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी। आज हम कार्पोरेटपरस्त हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं। किसान नेता डॉ. आशीष मित्तल से विशेष बातचीत

किसान नेता डॉ. आशीष मित्तल से खास बातचीत

कल बुघवार 30 जून, 2021 को सिंघु, टिकरी और गाजीपुर आदि आंदोलन स्थल पर करीब सात महीने से आंदोलनरत किसान हूल विरोध दिवस का आयोजन करेंगे। इस आशय की जानकारी किसान नेता डॉ. आशीष मित्तल ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में दी है। गौरतलब है कि इससे पहले संयुक्त किसान मोर्चा बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, जोतीराव फुले, सावित्री बाई फुले और सर छोटू राम जैसे दलित बहुजन नायक-नायिकाओं को याद कर चुका है। इस संबंध में किसान नेता डॉ आशीष मित्तल से इस मसले पर बातचीत का संपादित अंश :

संयुक्त किसान मोर्चा ने हूल दिवस मनाने का निर्णय लिया है। कृपया इसके बारे में बताएं। 

देखिए, आदिवासियों का संघर्ष किसानों के संघर्ष का अभिन्न हिस्सा है। संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने चल रहे किसान आंदोलन की, आदिवासियों की ज़मीन, वन उत्पाद, संस्कृति तथा राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए चल रहे संघर्षों के साथ एकजुटता का प्रदर्शन किया है। संयुक्त किसान मोर्चा छत्तीसगढ़ के सुकमा-बीजापुर जिले के बॉर्डर पर स्थित सेलेगर गांव में आदिवासियों द्वारा सीआरपीएफ कैंप की स्थापना के उनके विरोध का समर्थन करता है। यह सभी जानते हैं कि उनकी ज़मीनें भूमि संविधान की पांचवी अनुसूची में आती है और उनकी जमीनों को ग्रामसभा की अनुमति के बिना छीनी जा रही है। इन सब विषयों को केंद्र में रखकर 30 जून को जनजातीय क्षेत्रों के सदस्यों को किसान मंच पर आमंत्रित किया जायेगा। ज़मीन जंगल और पर्यावरण बचाने को लेकर सिदो कान्हू के बहाने तमाम मंचों पर बातचीत होगी। 

हम यह मानते हैं कि 30 जून, 1855 को शुरु हुए औपनिवेशिक शासकों ने हूल विद्राेह का नाम दिया। यह शानदार संघर्ष, अंग्रेज शासकों और उनके अधीनस्थ स्थानीय ज़मींदारों के शोषण व उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आदिवासियों ने सिदो-कान्हू के नेतृत्व में लड़ा था। अंग्रेजों ने इस संघर्ष को कुचलने के लिए अपनी अपनी उपनिवेशिक फौज को भेजा और इस संघर्ष में करीब पंद्रह हजार आदिवासियों ने अपनी जान की कुर्बानी दी।  इसका हथियारबंद दौर जनवरी 1956 तक चला। यह संघर्ष राजमहल पहाड़ियों के संथाल आदिवासियों का संघर्ष था, जो इलाका अब झारखंड में है। यह औपनिवेशिक शासकों और जमींदारों द्वारा जमीन तथा वन उत्पाद पर कब्जा करने और जबरन मुफ्त में मजदूरी कराने के विरुद्ध लड़ा गया था। उस समय अंग्रेज वहां पर रेल लाइनें इसलिए बिछवा रहे थे ताकि वे जंगल और पहाड़ों का दोहर कर सकें तथा इस काम के लिए वे आदिवासियों का क्रूरतापूर्वक शोषण कर रहे थे।

हूल दिवस के संबंध में संवाददाता सम्मेलन में एलान करते संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधि (मध्य में डॉ. आशीष मित्तल)

फिर भी यह सवाल तो उठता ही है कि आंदोलनरत किसानों के लिए आदिवासी महत्वपूर्ण क्यों हो गए हैं?

देखिए, सारी लड़ाइयां कार्पोरेट और कंपनियों के ख़िलाफ़ लड़ी गयी हैं। जिन्होंने कार्पोरेट व कंपनियों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी है, उनका अनुभव हमारे लिये ज़रूरी है। सिदो-कान्हू ने ब्रिटिश कंपनी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी। आज हम कार्पोरेटपरस्त हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं। इस लड़ाई की जड़ में कार्पोरेट हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र के जंगलों से आदिवासियों का उजाड़ा जा रहा है।  

किसान आंदोलन दलित, बहुजन, आदिवासी समाज के नायकों के योगदानों का सम्मान करता है और प्ररेणा ग्रहण करता है। किसी भी संघर्ष की ऐतिहासिक चेतना मौजूदा लड़ाई को मजबूती देती है। एकजुट होकर संघर्ष करने के लिये प्रेरित करती है। तो हूल क्रांति दिवस के जरिये कार्पोरेट कंपनी के खिलाफ़ 165 सालों के संघर्ष से आंदोलन और समाज को जोड़ना है।

इसके पहले हमलोगों ने सर छोटू राम की जयंती पर उन्हें याद किया। वे हरियाणा क्षेत्र में पैदा हुये थे। लेकिन उन्हें उत्तर प्रदेश के लोग भी जानते हैं। लेकिन सिदो-कान्हू का नाम जाट समाज ने नहीं सुना था। लेकिन अब चर्चा होगी, उनके बारे में जानेंगे और बात करेंगे। 

तो क्या आप यह मानते हैं कि जंगल और ज़मीन बचाने का विमर्श मुख्यधारा के समाज का विमर्श बनता जा रहा हे? 

हां, बिल्कुल। किसान आंदोलन यह शुरुआत कर उस रूढ़ि को तोड़ रहा है। इसीलिये हम कह रहे हैं कि ये नयी चीजें हैं। जो समुदाय एक ही मोर्चे पर भारत सरकार और कार्पोरेट के ख़िलाफ़ लड़ रहा था और वो कार्पोरेट के हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ लड़ रहा था, वह सारा विमर्श अब किसान आंदोलन और हिंदी पट्टी का विमर्श बनता चला जा रहा है। सबका विमर्श बनता जा रहा है। जैसे भारत में 2 करोड़ मछुआरे हैं। और बड़े-बड़े कार्पोरेट जहाजों ने मछुआरों और तटों पर रहने वाले लोगों के जीवन को खत्म कर दिया। तटों पर कब्ज़ा करके बंदरगाह बनाये जा रहे हैं। पर्यावरण का अत्याधिक दोहनकर नष्ट किया जा रहा है। उनकी आबादी खत्म की जा रही है। बंदरगाहों के पास जो तटवर्ती जंगल थे, उनको काटा जा रहे है, जिससे ताउते जैसे बड़े प्रकोप सामने आते रहते हैं। ये तमाम सवाल किसान आंदोलन के जरिये देश के विमर्श के सवाल बनते चले जा रहे हैं। किसान जागृति धीरे धीरे देश के तमाम जनवादी लोकतांत्रिक सवालों को अपने भीतर समाहित करते हुये एक नया देशव्यापी उभार बनता चला जा रहा है। 

हमें याद रखना चाहिए कि भारत कृषि प्रधान देश है। 50 प्रतिशत आबादी इससे जुड़ी हुयी है तो यह सवाल राज्य से है। और अगर राज्य जनहितों का ख्याल नहीं रखेगा तो सवाल तो उठेंगे ही। 

क्या संयुक्त किसान मोर्चा डा. आंबेडकर, सिदो-कान्हू, सर छोटूराम आदि के जरिए किसान आंदोलन को दलित-बहुजनों को जोड़कर अपने आंदोलन को व्यापक बनाना चाहता है?

बेशक़, उनकी भागदारी को सुनिश्चित करने का प्रयास है। लेकिन यह केवल डॉ. आंबेडकर औरसिदो-कान्हू को संबोधित करने तक सीमित नहीं है। बल्कि सिदो-कान्हू और डॉ. आंबेडकर के संघर्षों में जो सवाल थे, उन सवालों को संबोधित करने का सवाल है। और उन सवालों का किसान आंदोलन का अभिन्न हिस्सा बनाने का सवाल है। वैसे किसान आंदोलन छोटे किसान, मझोले किसान, कृषि मज़दूर, बटाईदार किसान, कृषि व्यापार से जुड़े लोग, दलित, पिछड़ा वर्ग और आदिवासी सभी के आंदोलनों के साथ खड़ा हैं। यह भारत का नवजागरण है।

अंतिम सवाल, यह तो आप मानेंगे ही कि संयुक्त किसान मोर्चा पहले इस तरह की पहल नहीं कर सका था और कहीं न कहीं भेदभाव हुआ, जिसके कारण सभी एक साथ मंच पर नहीं आ सके? 

हाँ, यह विभेद होता है। लेकिन जब एक साथ एक मंच पर आते हैं तो धीरे-धीरे सारे विभेद खत्म होते जाते हैं। विभिन्नतायें पीछे हो जाती हैं और समानतायें आगे आ जाती हैं। किसान आंदोलन का नेतृत्व सबके सवालों को संबोधित करते हुए आह्वान कर रहा है। सब साथ आएं। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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