ओमप्रकाश वाल्मीकि, जिन्हें पीढ़ियां रखेंगी याद

ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित साहित्य को जन साहित्य मानते थे। दलित साहित्य में दलित जीवन और उसके संघर्ष का दर्द प्रमुख है।अतः दलित साहित्य में दलित जातियों की पीड़ा का यथार्थ ही चेतनारूपी अपनी आवाज को प्रखर करता है। यह आवाज मनुष्यता के हक का आवाज है। याद कर रहे हैं कार्तिक चौधरी

ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून, 1950- 17 नवंबर, 2013) पर विशेष

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद में जन्मे ओमप्रकाश वाल्मीकि हिंदी दलित साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर थे। उनका रचनाकाल लगभग 40 वर्षों का रहा। इस अवधि में उन्होंने कवि, कहानीकार, आत्मकथाकार, आलोचक और समाजशास्त्री के रूप में पहचान स्थापित की, जिसके लिए उन्हें इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा।

दलित साहित्य के इस पुरोधा की खासियत यह रही कि उन्होंने साहित्य जगत में एक नई दुनिया की तलाश नहीं की, बल्कि सैंकड़ो वर्षों से द्विज साहित्य जिन सच्चाइयों को छुपाने का प्रयास कर रहा था, उसे साहसिक तरीके से सार्वजनिक किया। अर्थात साहित्य की परंपरागत स्वरूप को बदलने का प्रयास ही ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचनाओं का मुख्य उद्देश्य रहा। उन्होंने दलित साहित्य को परिभाषित करते हुए दलित साहित्य को प्रेम, मित्रता और मानवता का साहित्य बताया। वे दलित शब्द के लिए स्पष्ट कहते हैं कि “दलित एक समूहवाचक शब्द है, जिसके अंतर्गत वह जातियां आती हैं, जो पीढ़ियों से दबाई गयी है।”

उनकी प्रारम्भिक रचना ‘सदियों का संताप’ काव्य संग्रह के रूप में वर्ष 1989 में फिलहाल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। उन दिनों आज के जैसे हालात नहीं थे। जागरूकता की भी कमी थी। इसलिए अपने इस काव्य संग्रह को बेचने स्वयं निकल पड़े। ऐसा कर वह समाज बदलने की भूमि को अपनी लेखनी के माध्यम से तैयार कर रहे थे। यह संग्रह 1974 से 1989 के दरमियान लिखी गयी उनकी कविताओं का संग्रह है, जिनमें वर्णवादी व्यवस्थागत भेदभाव और उत्पीड़न की अभिव्यक्ति है। इसी संकलन में संकलित ‘सदियों का संताप’ कविता में वह लिखते है “दोस्तों! /इस चीख को जगाकर पूछों/ कि अभी और कितने दिन /इसी तरह गुमसुम रहकर /सदियों का संताप सहना है।”

ओमप्रकाश वाल्मीकि का दूसरा काव्य संग्रह ‘बस्स बहुत हो चुका’ (वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) से 1997 में आया। भारतीय समाज में सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज को ही पंक्ति देते हुए वह लिखते हैं कि “झाड़ू थामे हाथों की सरसराहट/ साफ सुनाई पड़ती है भीड़ के बीच / बियाबान जंगल में सनसनाती हवा की तरह / गहरी पथरीली नदी में/ असंख्य मूक पीड़ाएँ / कसमसा रही हैं / मुखर होने के लिए/ रोष से भरी हुई।”

ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून, 1950- 17 नवंबर, 2013) व उनकी चार प्रमुख किताबें

दलित साहित्य में चेतना आत्मसम्मान के करीब है। यही कारण है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित जीवन के संघर्ष, व्यथा, छटपटाहट, सामाजिक सरोकार का जीवंत दस्तावेज अपनी कविता में व्यक्त करते है। चर्चित आत्मकथा ‘जूठन’ (राधाकृष्ण प्रकाशन) भी 1997 में प्रकाशित हुई। 

दरअसल, दलित साहित्य को पहचान आत्मकथा से ही मिली है। ‘जूठन’ आत्मकथा दलित जीवन के यथार्थ और मार्मिकता को ही केंद्र में रखता है। विरोधी परस्थितियों में जिजीविषा ही इस आत्मकथा का सार है। अतः भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते है कि “एक लम्बी जद्दोजहद के बाद, मैंने सिलसिलेवार लिखना शुरू किया। तमाम कष्टों, यातनाओं, उपेक्षाओं, प्रताड़नाओं को एक बार फिर जीना पड़ा।” 

ओमप्रकाश वाल्मीकि का तीसरा काव्य संग्रह ‘अब और नहीं’ वर्ष 2009 में प्रकाशित हुई। अपनी इस कविता संग्रह में वह दलित जीवन के आवाज को मुखर तरीके से अभिव्यक्त करते हैं। जैसे कि “छद्मवेशी शब्दों का प्रताप जारी है / सुन चुके अर्थहीन तर्क भी /बहुत दिन जी चुके हताशा और नैराश्य के बीच/कलाबाजी और चतुराई भरे शब्दों को /खेल हो चुका /अब और नहीं।” इस संदर्भ में बजरंग बिहारी तिवारी लिखते हैं कि “ओमप्रकाश वाल्मीकि की भाषा कभी रिरियाने वाली नहीं रही। अधिकार चेतना उनके सम्पूर्ण लेखन और सृजन की बुनियाद में है।”

दलित साहित्य का लेखन संघर्ष का लेखन है। लेकिन कुछ आलोचकों ने ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचनाओं पर काल्पनिक होने का आरोप लगाया तो उन्होंने बेबाकी से जवाब भी दिया। उनका चौथा काव्य संग्रह : ‘शब्द झूठ नहीं बोलते’ वर्ष 2012 में प्रकाशित हुई। इस संकलन में शामिल अपनी एक कविता में उन्होंने मानो अपने आलोचकों को जवाब देते हुए लिखा कि “मेरा विश्वास है/तुम्हारी तमाम कोशिशों के बाद भी/शब्द ज़िन्दा रहेंगे/समय की सीढ़ियों पर/अपने पाँव के निशान/गोदने के लिए/बदल देने के लिए/हवाओं का रुख … क्योंकि, शब्द कभी झूठ नहीं बोलते!”

यह भी पढ़ें : अनुपस्थित होकर भी हमारे बीच उपस्थित हैं ओमप्रकाश वाल्मीकि

चर्चित कहानी संग्रह ‘सलाम’ ओमप्रकाश वाल्मीकि का पहला कहानी संग्रह है, जो वर्ष 2000 में प्रकाशित हुई। “सलाम” कहानी भारतीय समाज में समानता के लिए आंदोलन का प्रतीक है। वहीं अपनी एक कहानी “घुसपैठिये” में वह शैक्षणिक संस्थानों में दलित छात्रों की स्थिति को बयां करते हैं। ‘छतरी’ कहानी संग्रह 2013 में भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन से प्रकाशित हुई। ‘छतरी’ कहानी समाज में सांप्रदायिक सद्भाव को कायम करने की बात करती है। भंगी समाज की ऐतिहासिक, संस्कृतिक, और सामाजिक पृष्ठभूमि पर ‘सफाई देवता’ पुस्तक उन्होंने वर्ष 2008 लिखी। 

‘दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र’ और ‘दलित साहित्य : अनुभव, संघर्ष एवम यथार्थ’ ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रमुख समालोचनात्मक पुस्तकें हैं। अपनी आलोचनात्मक पुस्तक में वे दलित साहित्य की परिभाषा को विस्तारित करते हुए लिखते है कि “दलित साहित्य जन साहित्य है, यानी मास लिटरेचर। सिर्फ इतना ही नही, लिटरेचर ऑफ एक्शन भी है, जो मानवीय मूल्यों की भूमिका पर सामंती मानसिकता के विरुद्ध आक्रोशजनित संघर्ष है। इसी संघर्ष और विद्रोह से ऊपजा है दलित साहित्य।”

ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित साहित्य को जन साहित्य मानते है। दलित साहित्य में दलित जीवन और उसके संघर्ष का दर्द प्रमुख है।अतः दलित साहित्य में दलित जातियों की पीड़ा का यथार्थ ही चेतनारूपी अपनी आवाज को प्रखर करता है। यह आवाज मनुष्यता के हक का आवाज है, मनुष्य को मनुष्य समझने की आवाज है, दलितों के एकजुट होने का आवाज है, दलितों के संवैधानिक अधिकार की आवाज है। इसकी रूप-रेखा पूरी तरह संविधान प्रदत है।

पुनः ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में कहें तो “दलित साहित्य नकार का साहित्य है, जो संघर्षों से उपजा है तथा जिसमे समता, स्वतंत्रता और बंधुता का भाव है, और वर्णव्यवस्था से उपजे जातिवाद का विरोध है।” 

ओमप्रकाश वाल्मीकि को जितनी ख्याति कथा साहित्य और कविता आदि के कारण मिली, आलोचना के क्षेत्र में वह ख्याति उन्हें नही मिल पायी। लेकिन उनकी आलोचना दृष्टि समाज शास्त्रीय पद्धति के नजदीक है। उनकी आलोचना दलित साहित्य के सौंदर्य शास्त्र के संबंध में है जो कि हवाई किला न होकर भारतीय सामाजिक यथार्थ है। ओमप्रकाश वाल्मीकि अपनी आलोचना में स्पष्ट कहते है कि “दलित साहित्य प्रेम का साहित्य है, और प्रेम विश्वास से ही अर्जित किया जाता है।” दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि उन तथाकथित आलोचकों को भी दिशा-निर्देश देते हैं जो दलित कहानियों के टेक्स्ट को न पढ़कर पहले से ही मनोग्रंथि किसी रचना और रचनाकार के लिए पाले रहते है। उनका मानना था कि जो आलोचक प्रेमचंद को दलित साहित्य के समक्ष खड़े करते हैं, वह कहां तक सही हैं? सीधी सी बात है कि हिंदी दलित साहित्य का आगमन 1990 के दशक में हुआ है और ऐसे में दलित रचनाकारों को खारिज का करने के लिए प्रेमचंद को खड़ा करना कहा तक सही है? प्रेमचंद के संदर्भ में वे कहते हैं कि “प्रेमचंद को पढ़ कर मैंने भी कहानियों का लेखन किया है। लेकिन मेरा सुझाव है कि दलित कहानियों को पढ़ने के बाद प्रेमचंद को पढ़िए।”

ओमप्रकाश वाल्मीकि स्पष्टवादी आलोचक रहे। वह साहस के साथ दलित आलोचना का आधार बाबा साहेब आंबेडकर की समानता के दर्शन से जोड़ते हैं। उन्हें हिंदी आलोचना में गुरूवाद की परंपरा से परहेज है। तभी तो जो तथाकथित आलोचक दलित साहित्य पर ज्ञान बांटते रहे हैं, उनसे असहमति व्यक्त करते हुए वे कहते है कि “गुरु बनना बंद कीजिए। वर्षों जिस प्रेम की साहित्य की अवधरणा बनी है, वहां दलितों का स्थान कहां है?”

ओमप्रकाश वाल्मीकि का आलोचकीय विवेक वैज्ञानिकता का पक्षधर है। यही कारण है कि वह पाठक और रचना के संदर्भ में कहते है कि “किसी भी रचना को पढ़ने के लिए पाठक का एक संस्कारगत मनोदशा भी काम करती है। यह मनोदशा उसके जीवन के अनुभव से ही आया है।” तभी तो बहुत से ऐसे शिक्षक हैं जो दलित साहित्य की आत्मकथा विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम में होने के बावजूद नाक-भौं सिकुड़ा लेते हैं। उनका मानना होता है कि यह पहले कभी हुआ होगा। जबकि सच्चाई यह है कि असल भारत का तस्वीर दलित साहित्य में है, जिसे नकारा नही जा सकता है।

बहरहाल, ओमप्रकाश वाल्मीकि ‘प्रज्ञा साहित्य’, 1995 के अतिथि सम्पादक, ‘तीसरा पक्ष’ पत्रिका के संपादकीय सलाहकार भी रहे। उन्होंने कांचा आइलैय्या की पुस्तक (व्हाई आय ऍम नॉट अ हिंदू?) का हिंदी अनुवाद भी किया। उन्हें कई सम्मानों से नवाजा गया। इनमें डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार, 1993, परिवेश सम्मान, 1995, जयश्री सम्मान 1996, कथाक्रम सम्मान, 2001, न्यू इंडिया बुक प्राइज 2004 शामिल हैं। इनके अलावा उन्हें मार्च 2012 में आउटलुक पत्रिका में दलित सर्वे के माध्यम से लोकप्रिय कथाकार के रूप में व्यापक स्तर पर ख्याति मिली।

बहरहाल, ओमप्रकाश वाल्मीकि का लेखन और साहित्यिक नज़रिया को हिंदी साहित्य में मील का पत्थर बन चुका है, जिसके सहारे ही वर्तमान और आने वाले समय में सभी साहित्यकारों को चलना पड़ेगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply