विचारधारा पर डटे रहनेवाले विरले साहित्यकार रहे सूरजपाल चौहान

सूरजपाल चौहान का जाना दलित साहित्य में एक युग के अवसान सरीखा है। अपनी बेबाकी के लिए भी याद किए जाएंगे जो कि न सिर्फ एक निर्भिक लेखक के लिए बेहद अनिवार्य है, बल्कि एक स्वतंत्र और मजबूत लोकतंत्र के लिए भी आवश्यक तत्व है। श्रद्धांजलि स्वरूप स्मरण कर रहे हैं प्रो. नामदेव

सूरजपाल चौहान (20 अप्रैल, 1955 – 15 जून, 2021)

गत 15 जून, 2021 को दलित साहित्य के प्रमुख आधार स्तंभों में से एक सूरजपाल चौहान जी नहीं रहे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के फुसावली गांव में हुआ था। वे दिल्ली में भारत सरकार के सार्वजनिक लोक उपक्रम स्टेट ट्रेडिंग काॅरपोरेशन ऑफ इंडिया में मुख्य प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त होकर नोयडा में रह रहे थे। किडनी की बीमारी के कारण कई वर्षों से डायलिसिस करवा रहे थे। बावजूद इसके दो महीने पहले तक वाट्सऐप आदि सोशल साइट्स पर अपनी वैचारिकी को रखने में सक्रिय थे। “तिरस्कृत” और “संतप्त” (आत्मकथाएं), “हैरी कब आएगा” (कहानी संग्रह) , “प्रयास” (कविता संग्रह), बाल साहित्य, इत्यादी रचनाओं में उन्होंने दलित जीवन का जो चित्रण पेश किया है, वह दलित अनुभूति और रचनात्मक श्रेष्ठता की सशक्त मिसाल है। 

इस दृष्टिकोण से “मेरा गाँव” और “ये दलितों की बस्ती है” जैसी कविताएं दलित साहित्य की अमूल्य निधि बनकर ऊभरी हैं, जिनमें दलित जीवन बिना किसी काट-छांट के समाहित हुआ है। उनकी “बदबू” कहानी भी बेहद प्रासंगिक और उल्लेखनीय है, जिसमें कहानी और किस्सागोई की दलित शैली की सशक्त धारा का रेखांकन होता है। 

कहने का तात्पर्य यह है कि सूरजपाल चौहान साहित्य लेखन की लगभग सभी विधाओं में निपुण थे। उनकी रचनाएं इसका प्रमाण हैं। दरअसल, लेखक की पहचान और अस्तित्व सिर्फ किताबें लिख देने भर से या सभा-संगोष्ठियों या अन्य सामाजिक और आभासी मंचों पर हो-हल्ला कर देने मात्र से ही नहीं बनता, बल्कि इसके लिए उसे अपने विचारों और दर्शन पर आजीवन डटे रहना पड़ता है। सूरजपाल चौहान को कई बार संगोष्ठियों और सभाओं में मैंने “मेरा गाँव” कविता वाचन करते हुए सुना है। वाचन करते हुए अक्सर उनकी आंखें डबडबा जाती थीं और वाचन इतनी असरदार होती थी कि पूरे माहौल में सन्नाटा छा जाता था। 

दलित साहित्यकार सूरजपाल चौहान (20 अप्रैल, 1955 – 15 जून, 2021)

इसी तरह वह “बहुजन” शब्द को राजनीति तक सीमित रखने की बात करते थे। उनका मानना था कि दलित साहित्य को बहुजन साहित्य कहना हर दृष्टिकोण से गलत है। क्योंकि दलितों का दर्द कोई दलित ही महसूस कर सकता है। कोई और नहीं। उनका यह भी कहना था कि पिछड़ों को अपना साहित्य लिखना चाहिए। अनेक अस्मिताओं के घाल-मेल से सबकी पहचान धूमिल हो जाएगी। एक तरह से दलित दंश और पीड़ा का सवाल भी अस्पष्ट हो जाएगा। 

वास्तव में सूरजपाल चौहान एक बहुत संजीदा दलित लेखक थे, लेकिन स्त्रियों को लेकर तंग ख्याल भी रखते थे। पिछ्ले कुछेक वर्षों से अक्सर दलित लेखिकाओं का कपोलकल्पित चरित्र हनन करना भी उनकी आदत बन गयी थी, जिसके कारण उनके खिलाफ असहमतियां भी बनींजो उचित भी थीं। उनके व्यक्तिगत रंजिश और असहमतियों के बावजूद अगर उनके लिखे साहित्य के आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाए तो वह निश्चित तौर पर हिंदी दलित साहित्य के प्रमुख आवाज और चिन्ह के रूप में उभरते हैं। 

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सूरजपाल चौहान उन विरले लेखकों में शुमार हैं जो अपनी जिंदगी में साहित्य और विचारधारा के लिए प्रतिबद्ध रहते हैं। हालांकि हमेशा एक निश्चित विचारधारा पर चलना कठिन होता है जैसा कि आजकल दलित शब्द और दलित साहित्य के प्रति फिसलन एक नये ट्रेंड के रूप में सामने आ रहा है। कुछ नये-पुराने दलित लेखक, बहुजन साहित्य, बौद्ध साहित्य तो कोई वंचित साहित्य इत्यादि का नाम देकर दलित साहित्य का नया नामकरण कर, दलित साहित्य की कब्र खोदने में शिद्दत से मशगूल हैं। लेकिन इस वैचारिक फिसलन के दौर में भी सूरजपाल चौहान ताउम्र दलित साहित्य के एक ईमानदार सिपाही के रूप में न सिर्फ सजग रहे बल्कि अन्य लोगों को भी नामकरण की इस साजिश और राजनीति के प्रति अगाह करते रहे। 

सूरजपाल चौहान अपनी बेबाकी के लिए भी याद किए जाएंगे जो कि न सिर्फ एक निर्भिक लेखक के लिए बेहद अनिवार्य है, बल्कि एक स्वतंत्र और मजबूत लोकतंत्र के लिए भी आवश्यक तत्व है। समाज, साहित्य में भले ही तमाम असहमतियां और मत मौजूद हों, अगर वो सब एक-दूसरे को नीचा न दिखाकर या एक दूसरे को निगलने का उपक्रम न कर अपने-अपने स्तर अपनी-अपनी समस्याओं की जड़ों को पहचान करके उनका निदान खोजें तो उससे अच्छा और क्या हो सकता है। इसी स्थिति में अस्मितामूलक समाज और उसके साहित्य का अनुभव समस्त समाज के लिए सकारात्मक तौर पर उपयोगी हो सकता है। 

बहरहाल हिंदी दलित साहित्य के इस कद्दावर साहित्यकार सूरजपाल चौहान की मृत्यु से दलित साहित्य में जो रिक्तता आ गई है, उसे भरा तो नहीं जा सकता। लेकिन उनकी वैचारिक ईमानदारी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। 

अंत में दलित साहित्य के प्रखर और बुलंद आवाज सूरजपाल चौहान को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी एक कविता यहां साझा कर रहा हूं, जिससे उनकी जीवन दर्शन की वैचारिक स्पष्टता स्पष्ट झलकती है यथा : 

कविता : “मेरा गाँव” 

कैसा गाँव?
न कहीं ठौर
न कहीं ठाँव! 

कच्ची मड्डिया
टूटी खटिया
घूरे से सटकर
बिना फूँस का—
मेरा छप्पर
मेरे घर न
कौए की काँव।
मेरा गाँव
कैसा गाँव?
न कहीं ठौर
न कहीं ठाँव! 

उनके आँगन
गैया बछिया
मेरे आँगन
सूअर, मुर्ग़ियाँ
मेरे सिर
उनकी लाठी
बेगारी करने को गाँव।
मेरा गाँव
कैसा गाँव?
न कहीं ठौर
न कहीं ठाँव! 

उनका खेत
उन्हीं का बैल
और उन्हीं का है ट्यूब-वेल
“मेरे हिस्से मेहनत आयी
उनके हिस्से है आराम”
मेरा गाँव
कैसा गाँव?
न कहीं ठौर
न कहीं ठाँव! 

ब्याह-बरात का—
काम कराते
देकर जूठन बहकाते
जब मरता है
कोई जानवर
दे-देकर गाली उठवाते
दिन-रात
ग़ुलामी कर-करके
थक गये—
बिवाई फटे पाँव।
मेरा गाँव
कैसा गाँव?
न कहीं ठौर
न कहीं ठाँव! 

उनका दूल्हा
चढ़ घोड़ी पर
घूमे सारा गाँव-गली
मेरी बेटी की शादी पर
कैसी आफ़त आन पड़ी
जिन पर आया—
घोड़ी चढ़ वो
अलग पड़े हैं दोनों पाँव।
मेरा गाँव
कैसा गाँव?
न कहीं ठौर
न कहीं ठाँव! 

(संपादन : नवल)


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