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कोरोना महामारी के दौरान सरकार ही नहीं, संघ की भी खुली पोल

आपदा से सरकार का निकम्मापन ही उजागर नहीं हुआ, बल्कि संघ का राष्ट्र निर्माण, सेवाभाव और समरसता का मुखौटा भी उतर गया। बहुजनों के बीच बनाई गई प्रचारकों और स्वयंसेवकों की सौम्य छवि अब दरक चुकी है। बहुजन देख रहे हैं कि इनकी नैतिकताएं कितनी छिछली हैं और, इनका ध्येय कितना खोखला है। बता रहे हैं डॉ. रविकांत

गांधी ने वर्ष 1934 में महाराष्ट्र के वर्धा में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शिविर को संबोधित करते हुए स्वयंसेवकों के अनुशासन और सेवाभाव की प्रशंसा की थी। आरएसएस को विभाजनकारी और सांप्रदायिक मानने वाले धर्मनिरपेक्ष जवाहरलाल नेहरू ने भारत-चीन युद्ध के समय वर्ष 1962 में दिल्ली की यातायात व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी स्वयंसेवकों के हवाले की और अगले साल 1963 में हुए गणतंत्र दिवस परेड में उन्हें शामिल किया। दरअसल, नेहरू आरएसएस के उन्मादी धार्मिक स्वभाव को बदलने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन बाबासाहेब आंबेडकर न तो संघ के शिविर में कभी गए और ना ही उन्होंने संघ पर कभी भरोसा किया। वे मराठी पेशवा ब्राह्मणों के चरित्र और स्वभाव को बखूबी जानते थे। वैसे भी अपने पुरखों पर पेशवाई ब्राह्मणों द्वारा ढाए गए जुल्म के इतिहास को वे कैसे भुला सकते थे!

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लेखक के बारे में

रविकांत

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के दलित परिवार में जन्मे रविकांत ने जेएनयू से एम.ए., एम.फिल और लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की डिग्री हासिल की है। इनकी प्रकशित पुस्तकों में "समाज और आलोचना","आजादी और राष्ट्रवाद" ,"आज के आईने में राष्ट्रवाद" और "आधागाँव में मुस्लिम अस्मिता" शामिल हैं। साथ ही ये "अदहन" पत्रिका का संपादक भी रहे हैं। संप्रति लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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