ओबीसी नेताओं ने दिया होता आंबेडकर का साथ तो भारत की दूसरी होती तस्वीर : बुद्ध शरण हंस

बुद्ध शरण हंस की पहचान देश के अग्रणी दलित-बहुजन विचारक के रूप में होती है। उनके मुताबिक, ओबीसी के नेताओं की चुप्पी का ही कुफल है कि आज भी ब्राहणवाद का सबसे बड़ा पैरोकार पिछड़ा वर्ग ही बना हुआ है। पढ़ें, बुद्ध शरण हंस और युवा समालोचक अरुण नारायण की यह खास बातचीत

[8 अप्रैल, 1942 को बिहार के गया जिले के वजीरगंज अंचल के तिलोरा गांव में जन्मे बुद्ध शरण हंस हिन्दी साहित्य के उन दुर्लभ लेखकों में हैं, जिनके जीवन और साहित्य दोनों में कोई फांक नजर नहीं आती। उन्होंने कहानी, कविता, जीवनी, आत्मकथा, संपादन और प्रकाशन की दुनिया में फुले और आंबेडकरवाद की वैचारिकी को लेकर जो काम किया है, वह आमतौर पर साहित्य में बहुत कम देखने को मिलता है। उनके अबतक चार कथा संग्रह, आत्मकथाओं के पांच संग्रह, एक कविता संग्रह, और धार्मिक यथास्थितिवाद पर चोट करती दर्जनों पुस्तिकाएं छप चुकी हैं। वे अरसे से ‘आंबेडकर मिशन’ पत्रिका का प्रकाशन करते रहे हैं और इसी नाम से प्रकाशन भी चलाते रहे हैं। वे सन् 1969 से 2000 तक बिहार प्रशासनिक सेवा में रहे। भारतीय दलित अकादमी, दिल्ली द्वारा आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार और बिहार सरकार द्वारा वर्ष 2002 में भीमराव आंबेडकर पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया गया है। बिहार के युवा समालोचक अरुण नारायण ने उनसे विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है संपादित अंश]

साहित्यकार बुद्ध शरण हंस से अरुण नारायण की बातचीत

अरुण नारायण (अ.ना.) : दलित पासवान से बुद्ध शरण हंस बनने की जो यात्रा है, उसके विभिन्न पड़ावों के बारे में आपसे जानना चाहूंगा?

बुद्ध शरण हंस (बु. श. हं.) : मेरा जन्म एक महागरीब परिवार में हुआ। बड़े भाई भागीरथ पासवान पढ़े-लिखे थे। उन्होंने हमारा नाम रख दिया दलित प्रसाद। इस नाम के पीछे ब़ड़े भाई की यह सोच थी कि चूंकि हम विपन्न परिवार में जन्मे हैं, इसलिए यह नाम इस परिवेश को स्पष्ट करता था। जब मेरा दाखिला आठवीं कक्षा में होने को था तो हेडमास्टर ने हमारा नाम पूछा। मैंने कहा कि दिलीप कुमार राय नाम लिख लिया जाए। उन्होंने पूछा कि घर का नाम क्या है? हमने दलित प्रसाद बतलाया तो उन्होंने कहा कि एक नेता हैं भोला पासवान। आज से तुम्हारा नाम दलित पासवान हो गया। और यही नाम आगे की शैक्षिक डिग्रियों में भी चलता रहा।

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