एक आदिवासी महिला, जिसके जुनून ने दी सोहराई कला को नयी पहचान

सोहराई पेंटिंग झारखंड की सांस्कृतिक पहचान रही है। इस कला के विस्तार और रोजगारोन्मुख बनाने में जयश्री इंद्रवार की अहम भूमिका है। उनकी कला यात्रा और संघर्षों के बारे में बता रही हैं प्रियंका

झारखंड एक ऐसा प्रदेश है, जो खनिज संपदा के मामले में ही नहीं, संस्कृति और कला के नजरिये से भी भारत के धनी राज्यों में से एक है। झारखंड में विभिन्न तरह की बोलियां, आदिवासी संस्कृति, कला की झलक देखने को मिलती है। झारखंड भी अपने ऐसे समृद्ध लोक संस्कृति औऱ आदिवासी चित्रकारी के लिए जाना जाता है। यहां 15 से भी अधिक तरह की आदिवासी चित्रांकन कलाएं हैं। लेकिन इससे आज की पीढ़ी अंजान है। इनमें सोहराई चित्रकारी कला खास है, जिसमें जल-जंगल-जमीन का तालमेल दिखता है और आदिवासी संस्कृति औऱ उनके प्रकृति प्रेम की झलक देखने को मिलती है। 

एक दशक पहले सोहराई पेंटिग का चलन बहुत कम रह गया था। दीवाली के समय आदिवासी गांवों में सोहराई पेंटिंग घर के दीवारों की शोभा बढ़ाने तक ही सिमटे हुए थे। लेकिन गांव के मकानों की कच्ची दीवारों से निकलकर ये पेंटिंग आज देश के कई राज्यों, रेलवे स्टेशनों, सार्वजानिक स्थानों की शोभा बढ़ा रहे हैं। लुप्त हो रही सोहराई पेंटिंग को राष्ट्रीय स्तर पर यह पहचान दिलाने के काम में मनोयोग से लगी हुई हैं जयश्री इंदवार। हालांकि सोहराई कला को लेकर सबसे पहले काम बुलू इमाम ने किया। पर्यावरण कार्यकर्ता के तौर पर झारखंड में आदिवासी संस्कृति और विरासत को संरक्षित करने वाले बुलू इमाम ने 1991 में झारखंड की पहली चट्टान कला की खोज की। वर्ष 1993 में वे खोवर (कोहबर) कला और मिट्टी के घरों की दीवारों पर चित्रित सोहराई (फसल) कला को सामने लेकर आए। उन्होंने इस कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलायी। वह भी तब जब भारत के लोग ही इस कला से अपरिचित थे।

झारखंड की राजधानी रांची में जन्मी जयश्री इंदवार की सोहराई कला को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका रही है। कला में गहरी रुचि रखने वाली जयश्री को शुरू से पेंटिंग, सिलाई-कढ़ाई का शौक रहा, लेकिन अपनी शौक को न उन्होंने सिर्फ अपना व्यवसाय बनाया, बल्कि बड़ी संख्या में महिलाओं को इससे जोड़कर उन्हें भी रोजगार दिया। तथा इस प्रकार किताबों और इतिहासों में सीमित हो रही सोहराई पेंटिंग को एक नई पहचान भी दी है।

आज की तारीख में जयश्री औऱ इनकी संस्था स्तंभ से जुड़ी महिलाएं बड़े पैमाने पर सोहराई पेंटिंग का काम कर रही हैं, जिससे उन्हें अच्छी आमदनी भी हो रही है। लेकिन आज जिस मुकाम पर वे हैं, क्या यहां तक पहुंचना इतना आसान था? शायद नहीं, हर अच्छे काम की शुरूआत संघर्ष से होती है। जयश्री बताती है कि 2002 में संजय कुमार से उनकी शादी हुई औऱ वह रांची से लोहरदगा आ गयीं, जहां उन्हें सोहराई कला के बारे में पता चला। उनकी दिलचस्पी बढ़ी और फिर शुरू हुई उनके प्रयास और संघर्ष की कहानी।

सोहराई पेंटिंग बनातीं जयश्री इंदवार

हजारों साल पुरानी है सोहराई कला

जयश्री इंदवार के संघर्ष और उनकी सफलता पर बात करने से पहले बात आदिवासी सोहराई कला की। यह कला करीब हजारों साल पुरानी है। राज्य के हजारीबाग जिले के पहाड़ी इलाकों में रॉक गुफा कला के रूप में सोहराई-खोवर कला के प्रमाण मिलते हैं। भारत के मशहूर एंथ्रोपोलोजिस्ट शरत चन्द्र रॉय और ब्रिटिश जमाने में आसपास के इलाके में काम करने वाले प्रसिद्ध अधिकारी डब्ल्यूजी आर्चर ने अपनी किताबों और लेखों में सोहराई कला का जिक्र किया। सोहराई एक स्थानीय त्योहार है, जो धान की नई फसल के आने की खुशी में मनाया जाता है। वही खोवर (कोहबर) नवविवाहित जोड़े के कमरे को कहा जाता है, जहां नया जोड़ा शादी के बाद कुछ समय के लिए रहता है। शादी और नई फसलों के आने के समय घरों पर यह पेंटिंग की जाती थी। इसमें प्राकृतिक रंगों या यूं कहे कि मिट्टी का इस्तेमाल होता था. इसमें दुधिया मिट्टी (सफेद मिट्टी), लाल मिट्टी, पीली मिट्टी, चारकोल और चूना के मदद से चित्रकारी की जाती है। सोहराई चित्रकला की पुरानी शैली में चार तरीके से पेंटिंग होती थी। इनमें ऊंगलियों से आकृति बनाना, लकड़ी के छोटे से टुकड़े की मदद से कलाकारी करना, टूटी कंघी से पेंटिंग और कपड़े की कूची से चित्रकारी करना शामिल हैं।  

संसाधनों की कमी हौसले के आगे गौण 

अपनी चुनौतियों के बारे में जयश्री इंदवार बताती हैं कि कई चुनौतियों का सामना कर वो आज इस मुकाम तक पहुंची हैं। उनका मानना है कि अगर इच्छा शक्ति हो तो संसाधन की कमी हो या कोई और दूसरी समस्या, कुछ भी आड़े नहीं आता। उनकी शादी एक संपन्न परिवार में हुई थी। घर की महिलाएं शिक्षण के कार्य से जुड़ी थीं। ऐसे में उन्हें भी कुछ करना था और शुरूआत में परिवार का सहयोग भी रहा, तब जयश्री ने सोहराई पेंटिंग पर काम शुरू किया। अपने संघर्ष के दिनों को याद कर जयश्री बताती है कि शुरूआत में बहुत परेशानी हुई। कोई इस बात के लिए तैयार नहीं था कि सोहराई चित्रकारी के जरिये रोजगार भी मिलेगा और कला को पहचान भी। वह घर-घर जाकर महिलाओं को इस कला से जुड़ने के लिए इकट्ठा करने की कोशिश करने लगीं। गांव में रिक्शा चलाने वाले, मजदूरी करनेवालों की पत्नियां थीं, लेकिन वे इस बात के लिए राजी ही नहीं होती थीं कि सोहराई से पैसे भी कमाये जा सकते हैं। काफी कोशिशों के बाद शुरूआत में कुछ ऐसी लड़कियां ही साथ आयीं, जिनकी पढ़ाई छूट गयी थी। पहले जयश्री ने घर के आंगन से ही काम का आगाज किया। कुछ महिलाओं के साथ काम शुरू किया और अपने घर से कुछ पैसे इन महिलाओं को दिये, ताकि वो इससे जुड़ी रहें। हालांकि घर से सामान-पैसे लगाने को लेकर उन्हें अपने ही घर में विरोध झेलना पड़ा।

निरंतर प्रयास के बाद 2005-06 में जयश्री ने सोहराई पेंटिंग पर गंभीरता से काम करना शुरू किया और बड़े पैमाने पर काम करने के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत थी, जिसके लिए उन्होंने बैंक से लोन लेने के बारे में सोचा। परंतु यह इतना आसान नहीं था, क्याोंकि तब जब घर के अपने ही रिश्तेदारों ने गारंटर बनने से मना कर दिया। परिजनों ने बैंक कर्मियों को घर आने से रोका। लेकिन पति के सहयोग के कारण जयश्री ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बैंक से लोन भी पास हुआ और 2007 में उन्होंने गुमला में अपनी संस्था स्तंभ का पंजीकरण कराया, जिससे बड़ी संख्या में महिलाएं स्वावलंबी बन रही हैँ। हालांकि कुछ समय तक काम अच्छा चला। महिलाओं को रोजगार मिला। जयश्री को काम के साथ नाम और झारखंड की आदिवासी कला को और प्रसिद्धि मिली। हालांकि 2010 में जयश्री ने जब अपनी दूसरी बेटी को जन्म दिया तो उनके समक्ष चुनौतियां और बढ़ गयीं। उनकी बेटी को विशेष देख-रेख की आवश्यकता होती है। पति के सहयोग से वह अपने दुख से उबरने में सफल रहीं।

सोहराई पेंटिंग के बारे में वह बताती हैं कि झारखंड सरकार की संस्था झारक्राफ्ट से उन्हें काफी सहयोग मिला। वर्ष 2010 से पहले से ही वो झारक्राफ्ट से जुड़ीं और इसके जरिये उन्होंने बड़ी संख्या में महिलाओं को ट्रेनिंग दी, और फिर उन्हें अपने ही काम से जोड़ लिया। झारक्राफ्ट में बल्क में ऑर्डर मिलता था, जिसके बाद सोहराई पेंटिंग का व्यावसायिक रूप सामने आया। जयश्री और उनकी टीम ने साड़ी, शॉल, पर्दे, बेड शीट, स्टोल, कुशन पर सोहराई चित्रकला की आकृतियों को बखूबी उकेरा। हालांकि प्राकृतिक रंगों की जगह फैब्रिक कलर ने ले ली। जल-जंगल-जमीन-जानवरों के तालमेल वाली चित्रकारी इन कपड़ों को सुंदर रूप देने लगी। लेकिन 2014 के आसपास झारक्राफ्ट के जरिये भी काम मिलना कम हो गया जो कि 2015 आते-आते काम बिल्कुल ठप पड़ गया। अब जयश्री के सामने चुनौती और भी बड़ी थी, क्योंकि वह अकेली नहीं थी, इनके साथ कई महिलाओं का भविष्य भी दांव पर था। लेकिन इस आदिवासी महिला ने एकबार फिर हार नहीं मानी और फिर से अपने हौसले को उड़ान देने की कोशिश की। झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास से मिलकर उन्होंने अपनी समस्या बतायी, जिसके बाद गांव के कच्चे मकानों की दीवारों पर बनाये जानेवाली सोहराई पेंटिंग को सरकारी दीवारों पर उभरने का मौका मिला। वैसे भी जयश्री का एक सपना है, हर कोना खुबसूरत दिखे, हर दीवार कुछ कहती हुई लगे। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन के तहत, साफ-सफाई और रंग-रोगन के काम में सोहराई कला भी शामिल हो गयी। इसके बाद जयश्री और इनकी संस्था से जुड़ी महिलाओं ने राज्य के लगभग हर जिले के सरकारी दीवारों को सोहराई कला से जीवंत और आकर्षक बना डाला। बाद में 2018 में भारतीय रेलवे के साथ मिलकर भी जयश्री ने काम शुरू किया और आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में सीमित और धीरे-धीर सिमट रही सोहराई चित्रकारी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलायी। आज 100 से अधिक रेलवे स्टेशनों को सोहराई पेंटिंग से खूबसुरत बनाने का काम जयश्री इंदवार कर चुकी हैं। इनके बेहतर काम के लिए तत्कालीन रेल मंत्री पीयूष गोयल ने इन्हें सम्मामित भी किया। आदिवासियों के प्रकृति प्रेम से जुड़ी इस कला को जयश्री इंदवार ने अलग ऊंचाई पर पहुंचाया। उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें स्थानीय स्तर पर कई बार सम्मानित भी किया गया।
वर्तमान में इनका पूरा परिवार रांची में रहता है। इनकी संस्था स्तंभ से आज करीब 50 महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हैं और तकरीबन 200 से ज्यादा महिलाएं इस अभियान से जुड़कर अपने आपको आर्थिक रूप से मजबूत बना रही हैं। ये सभी आदिवासी समाज की महिलाएं हैं। जयश्री बताती हैं कि उनके दो उद्देश्य रहे। पहला तो आदिवासी कला को पुनर्जीवित करना और दूसरा समाज के लोगों को अपनी कला और संस्कृति का इस्तेमाल कर आत्मनिर्भर बनाना। इसके लिए उन्होंने रांची, गुमला, सिमडेगा और लोहरदगा में बड़ी संख्या में महिलाओं को ट्रेनिंग दी। अपने भविष्य की योजना के बारे में जयश्री इंदवार कहती है कि उनका लक्ष्य है कि ज्यादा-से-ज्यादा महिलाओं को इस अभियान से जोड़ना ताकि उन्हें स्वावलंबी बना सके और इसके जरिये सोहराई कला को नई बुलंदियों तक पहुंचा सके।

(संपादन : नवल/अनिल)


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