किसके बहकावे में आकर तेजस्वी ने की पसमांदा मुसलमानों की उपेक्षा?

बहुजन साप्ताहिकी के तहत इस बार पढ़ें तेजस्वी यादव के उपर पसमांदा मुसलमानों की उपेक्षा करने संबंधी खबर। साथ ही एक खबर दिल्ली से मासूम गुड़िया की। उसकी लाश को दुबारा उसी श्मशान में जलाया गया, जहां यह बताया जा रहा है कि उसके साथ पहले सामूहिक बलात्कार किया गया और फिर उसकी लाश को जलाकर सबूत मिटने की कोशिश की गयी थी।

बहुजन साप्ताहिकी

बिहार में लालू प्रसाद की राजनीतिक रणनीति में पसमांदा मुसलमानों की अहम भूमिका रही है। एक समय था जब पसमांदा समाज से आने वाले प्रसिद्ध पत्रकार गुलाम सरवर को लालू प्रसाद ने बिहार विधानसभा का अध्यक्ष बनाया था और वे उन्हें अपना राजनीतिक गुरू भी मानते थे। लेकिन अब स्थिति बदल गयी है। बीते 30 जुलाई, 2021 को दिखा जब तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बिहार विधान सभा स्थित उनके कक्ष में मुलाकात की और जातिगत जनगणना से संबंधित एक ज्ञापन उन्हें सौंपा। ज्ञापन में उन्होंने पिछड़े हिंदुओं शब्द का उल्लेख किया है, जिसके कारण वे इन दिनों आलोचना के शिकार हो रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या यह उन्होंने जान-बूझकर किया या फिर किसी ने उन्हें बहका दिया है? 

दरअसल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जो विज्ञापन दिया गया, वह भले ही तेजस्वी प्रसाद यादव के लेटर पैड पर टाइप किया गया, लेकिन उस पर हस्ताक्षर कांग्रेस और वामपंथी दलों के विधायकों के हस्ताक्षर भी हैं। नीतीश कुमार से मिलने वालों में कांग्रेस और वामपंथी दलों के सदस्य भी थे। ऐसे में यह सवाल ही है कि क्या तेजस्वी यादव पर पिछड़े हिदुओं का उल्लेख करने का दबाव बनाया गया?

पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर और राजद नेता तेजस्वी यादव की तस्वीर

वहीं इस मामले में लालू प्रसाद से मुहब्बत रखने वाले पूर्व राज्यसभा सांसद व देश में पसमांदा आंदोलन को नये सिरे से खड़ा करने वाले अली अनवर ने अपना विरोध व्यक्त किया है। फारवर्ड प्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा कि अन्य पिछड़े वर्गों की सरकारी सूची में जब सभी धर्मो के लोग आते हैं तब इसमें सिर्फ हिंदुओं की गणना की मांग करना सामाजिक न्याय के खिलाफ है। अगर अनजाने में इस तरह की गलती हुई है तो तुरंत इसका सुधार होना चाहिए। और यदि यह जान-बूझकर किया गया है तो यह खतरनाक बात है। अनवर ने कहा कि अगर तुरंत इस पत्र को वापस नहीं लिया गया तो भाजपा-जदयू के हाथों में राजद, कांग्रेस व वामपंथी दलों के खिलाफ एक हथियार मिल जाएगा। अगर इनके पत्र का बहाना बनाकर केंद्र सरकार ने पिछड़े-अति पिछड़े मुसलमनों को जातिगत जनगणना से अलग कर दिया गया तो अनर्थ होगा।

दुबारा जली दलित गुड़िया की चिता

बीते 1 अगस्त, 2021 को दिल्ली कैंट के पास पुरानी नांगल गांव की नौ वर्षीया गुड़िया (काल्पनिक नाम) के पार्थिव शरीर को कल 11 अगस्त, 2021 को चिता के हवाले कर दिया गया। परिजनों के मुताबिक, गुड़िया की हत्या सामूहिक बलात्कार के बाद कर दी गयी थी और अरोपियों द्वारा दिल्ली कैंट के श्मशान में ही जलाने की कोशिश की गयी थी। तब जानकारी मिलने पर पहुंचे परिजनों और गांव के लोगों ने मासूम की चिता को बुझा दिया था। तब तक उसके शरीर का उपरी हिस्सा पूरी तरह जल चुका था। बाद में पुलिस ने शेष शरीर को पोस्टमार्टम कराने के लिए भेजा था। 

दूसरी बार जली गुड़िया की चिता। तस्वीर में बैरिकेडिंग में पहली चिता भी है (तस्वीर साभार : मीना कोतवाल)

इस संबंध में पूछने पर स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि चारों आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है और पोस्टमार्टम के बाद पार्थिव शरीर को परिजनों के हवाले कर दिया गया है। हालांकि यह पूछे जाने पर कि क्या पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह और उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया है, इसकी पुष्टि हुई है, अधिकारी ने कुछ भी बताने से इंकार किया। इस घटना के संबंध में फारवर्ड प्रेस द्वारा विस्तृत खबर “दिल्ली कैंट गुड़िया हत्याकांड : कटघरे में पुलिस, सेना से सवाल” शीर्षक से प्रकाशित है।

बहरहाल, परसों जब गुड़िया की लाश को दुबारा जलाया जा रहा था तब बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। लोगों ने नम आंखों से मासूम को विदायी दी।

दलित महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के विरोध में अधिकार यात्रा

आगामी 17 अगस्त से दलित महिलाओं की एक टीम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के करीब 20 शहरों में यात्रा करेगी। इस यात्रा को अधिकार यात्रा की संज्ञा दी गयी है। इस यात्रा का आयोजन माता सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय महासभा और पे बैक टू सोसायटी टीम के द्वारा संयुक्त किया गया है। इस संबंध में महासभा की अध्यक्ष निर्देश सिंह ने जानकारी दी है कि यह यात्रा दलित-बहुजन महिलाओं को जागरूक बनाने के लिए निकाली जा रही है। इस दौरान महिलाओं को अत्याचार के खिलाफ बनाए गए कानूनों के बारे में जानकारी दी जाएगी। साथ ही उन्हें अन्य मुद्दों यथा महंगाई, बेरोजगारी, लूट-खसोट और वोटों का सदुपयोग करने के बारे में बताया जाएगा। यह यात्रा करीब 1300 किलाेमीटर की होगी। निर्देश सिंह ने बताया कि यात्रा की शुरूआत दिल्ली कैंट के पुरानी नांगल गांव से की जाएगी जहां बीते दिनों एक नौ साल की दलित बच्ची की हत्या सामूहिक बलात्कार के बाद कर दी गयी। 

अंधविश्वास को तहस-नहस करना ही आंबेडकरवादी कविता की विशेषता : दामोदर मोरे

“मैं उसे आंबेडकरवादी कहता हूं, जो संघर्ष के मैदान में बिगुल बजाते हों। जिसमें संघर्ष का संगीत हो, जिसमें जातिभेद की जंजीरें टूटने की झंकार हो। संघर्ष किसलिए? एक अच्छी जिंदगी के लिए। संघर्ष किस लिए? मनुष्यता के लिए। संघर्ष किस लिए? सामाजिक न्याय की प्रस्थापना के लिए। यह संघर्ष आंबेडकरवादी कविता का उद्देश्य है। अरविंद पासवान की कविता संग्रह– ‘मैं रोज लड़ता हूं’ में इसी आबेडकरवाद की अनुगूंज है।” ये बातें मराठी व हिंदी के प्रसिद्ध दलित लेखक दामोदर मोरे ने कही। मौका था स्त्रीकाल फेसबुक लाइव एवं यूटयूव कार्यक्रम का। इस कार्यक्रम के दौरान दी मार्जिनलाइज्ड, दिल्ली द्वारा प्रकाशित अरविंद पासवान की कविता संग्रह ‘मैं रोज लड़ता हूं’ का ऑनलाइन लोकार्पण किया गया। इसमें लेेखक अरविंद पासवान के साथ ही साहित्यकार कर्मानंद आर्य, ज्योति स्पर्श और श्वेता शेखर ने भी हिस्सा लिया।

दामोदर मोरे, मराठी दलित लेखक

दामोदर मोरे ने इस मौके पर कहा कि बेहतर जिंदगी के लिए सामाजिक न्याय के लिए, समता के लिए, आंबेडकरी कविता एक लॉन्ग मार्च है। इस लॉन्ग मार्च में जय भीम के एक युवा सिपाही अरविंद पासवान ‘मैं रोज लड़ता हूँ’ कविता संग्रह के माध्यम से शब्दों के मोर्चा में शामिल हुए हैं। इस कविता संग्रह की पहली कविता वह बाबा साहेब पर है, और इसी से सूचित होता है कि उनके आदर्श कौन हैं। उनके कविता की रीढ़ कौन-सी है। उनकी कविता की प्रेरणा कौन-सी है। 

श्री मोरे ने अरविंद के कविता संग्रह के शीर्षक की चर्चा करते हुए कहा कि यह शीर्षक अपने आप में एक बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहां जो ‘मैं’ आता है, वह बहिष्कृत भारत का, बहिष्कृत भारत के हर आदमी का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि इस व्यवस्था ने क्या दिया? दुख दिया, दर्द दिया, दासता दी। अनुसूचित जाति जनजाति, एवं घूमंतु जातियों को प्रतिदिन लड़ना पड़ता है। और इसी संदर्भ में यह जो कविता संग्रह का शीर्षक है ‘मैं रोज लड़ता हूं’ मुझे बहुत ही अर्थपूर्ण लगता है। उन्होंने कहा कि इस शीर्षक से बाबा साहेब के संदेश ‘पढ़ो, शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो’-का भी बोध पैदा होता है।

(संपादन : अनिल)


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