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ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद के बरअक्स आंबेडकर का समतामूलक राष्ट्रवाद

अस्मिता और राष्ट्र से संबंधित मसलों की डॉ. आंबेडकर की समझ, जाति पर आधारित समाज पर हावी ब्राह्मणवाद के दमनकारी चरित्र के उनके गहन विश्लेषण पर आधारित थी, बता रहे हैं रौनकी राम

डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956) एक मूर्तिभंजक समाज सुधारक थे। अपने करियर के शुरूआती दौर में ही उन्हें यह अहसास हो गया था कि भारत में अछूत होने का क्या मतलब है और अछूत प्रथा के खिलाफ किस तरह का संघर्ष किया जाना चाहिए। वे सवर्ण हिंदुओं के समाज सुधार आन्दोलन का हिस्सा कभी नहीं बने क्योंकि उन्हें अछूत प्रथा के त्रास का व्यक्तिगत अनुभव था।

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लेखक के बारे में

रौनकी राम

रौनकी राम पंजाब विश्वविद्यालय,चंडीगढ़ में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं। उनके द्वारा रचित और संपादित पुस्तकों में ‘दलित पहचान, मुक्ति, अतेय शक्तिकरण’, (दलित आइडेंटिटी, इमॅनिशिपेशन एंड ऍमपॉवरमेंट, पटियाला, पंजाब विश्वविद्यालय पब्लिकेशन ब्यूरो, 2012), ‘दलित चेतना : सरोत ते साररूप’ (दलित कॉन्सशनेस : सोर्सेए एंड फॉर्म; चंडीगढ़, लोकगीत प्रकाशन, 2010) और ‘ग्लोबलाइजेशन एंड द पॉलिटिक्स ऑफ आइडेंटिटी इन इंडिया’, दिल्ली, पियर्सन लॉंगमैन, 2008, (भूपिंदर बरार और आशुतोष कुमार के साथ सह संपादन) शामिल हैं।

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