जात-पाँत तोड़क मंडल के सौ साल और वर्तमान में प्रासंगिकता

जात-पॉंत तोड़क मंडल का गठन नवंबर, 1922 में हुआ था। इस मंडल ने जाति व्यवस्था के खिलाफ संगठित रूप से अभियान की शुरूआत की। हालांकि वर्णाश्रम को लेकर इसके सदस्यों में मत भिन्नता रही, परंतु उन दिनों जाति के खिलाफ जो बिगूल फूंका गया, उसकी अनुगूंज भारत के अलग-अलग हिस्सों में दूर तक सुनाई देती रही। इसके जनशताब्दी वर्ष के आगाज के पहले इसकी वैचारिकी और अंतरद्वंद्वों पर प्रकाश डाल रहे हैं युवा समालोचक सुरेश कुमार

बीसवीं सदी का तीसरा दशक सामाजिक, राजनैतिक, साहित्यिक और स्वाधीनतावादी सरगर्मियों से भरा रहा। इस दशक में जहां स्वराज के प्रति ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ भारतीय गोलबंद हुए, वहीं अछूत समस्या के समाधान की पहलक़दमियों की आहट भी सुनाई देने लगी थी। इसी दशक में उत्तर भारत में स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ के अस्मितावादी ‘आदि-हिंदू’ आंदोलन का उदय हुआ, जिसने दलितों के मुल्की हकों का मुद्दा बड़ी शिद्दत से उठाया था। जब असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था, तब उसी समय इंग्लैंड भारत की यात्रा पर प्रिंस आफ़ वेल्स आए थे। कांग्रेसी नेताओं ने उनका असहयोग और विरोध किया था। परंतु स्वामी अछूतानन्द ने उन्हें अछूतों की ओर से सत्रह सूत्री मांगों का ज्ञापन दिया था। इस ज्ञापन का काफी असर हुआ और अछूत अधिकारों को लेकर सरगर्मी ने काफी ज़ोर पकड़ लिया था। इसके बाद कांग्रेस ने अपने स्वराजवादी एजेंडे में अस्पृश्यता निवारण का मुद्दा जोड़ लिया। बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में जाति-प्रथा को मिटाने की क़वायदें और गतिविधियों में नया मोड़ उस समय आया जब संतराम बी.ए. ने जात-पाँत तोड़क मंडल की स्थापना लाहौर में की। 

जात-पाँत तोड़क मंडल की स्थापना 

सन् 1922 में जात-पाँत तोड़क मण्डल, लाहौर का स्थापित होना बीसवीं सदी के तीसरे दशक की बड़ी क्रांतिकारी की घटना थी। यह मंडल सामाजिक बदलाव और जाति तोड़ने की आकांक्षा रखने वाले चंद युवकों की सोच का नतीजा था। सन् 1922 में आर्य समाज का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में हुआ था। इस अवसर पर भाई परमानंद के आवास पर संतराम बी.ए. सहित बीस-बाईस युवक इकट्ठा हुए, जिन्होंने जाति-तोड़ो संगठन बनाने की इच्छा प्रकट की थी। इस तरह 10 मार्ग शीर्ष 1977 विक्रमी (नवंबर, 1922 ईस्वी) को भाई परमानंद के आवास पर जात–पाँत-तोड़क मण्डल की नीव पड़ी। वहां उपस्थित युवकों ने इस मंडल के प्रधान सभापति भाई परमानंद और मंत्री संतराम बी.ए. को चुन लिया। 

जात-पाँत तोड़क मण्डल का उद्देश्य 

इस मण्डल की स्थापना के पीछे संतराम बी.ए. का उद्देश्य था कि समाज में व्याप्त जात-पाँत और वर्ण-व्यवस्था का संघार कर समाज के भीतर समता क़ायम की जाए। मंडल का दावा था कि समाज से जब तक जाति प्रथा का विनाश नहीं किया जाएगा, तब तक समाज में विषमता की विषबेल फैलती रहेगी। यह मंडल जात-पाँत की जननी वर्ण-व्यवस्था को मानता था। इसलिए मंडल का दावा था कि जाति प्रथा की जननी वर्ण-व्यवस्था का जब तक समूल नाश नहीं होगा, तब तक जाति प्रथा को नहीं मिटाया जा सकता है। जात-पाँत तोड़क मंडल का मत था कि जो सुधारक वर्ण-व्यवस्था के विनाश के बिना जाति-प्रथा को मिटाने की बात करते हैं, यह एकदम वैसा ही है जैसे किसी ज्वर (बुखार) के रोगी को दवा दिए बिना उसका उपचार बर्फ के टुकड़े से करने की बात करते हैं।

जात-पाँत तोड़क मण्डल का जाति तोड़ने का फार्मूला 

जात-पाँत तोड़क मंडल ने जाति प्रथा के विनाश के लिए दो फार्मूलों पर काम किया था। पहला फार्मूला था कि समाज से वर्ण-व्यवस्था को मिटा दिया जाए, जिससे जाति-तोड़ने की संभावनाओं को काफी बल मिलेगा। वहीं दूसरा फार्मूला यह था कि हिंदू समाज में अंतरजातीय विवाह पर बल दिया जाए। इस मंडल का मत था कि यदि उच्च श्रेणी के हिंदू रोटी-बेटी की हदबंदी से बाहर निकल कर यदि अंतरजातीय विवाह करने लगे तो जाति प्रथा का संहार हो जाएगा। यह मंडल अपने वार्षिक अधिवेशनों और कार्यकर्म में अंतजतीय विवाह पर काफी बल देता था। इस मंडल के बैनर तले संतराम बी.ए. ने सैकड़ों अंतरजातीय विवाह करवाने का काम किया था। मंडल का जहां कहीं भी अधिवेशन होता था, वहां अंतरजातीय विवाह के फार्म मौजूद रहते थे और जाति-तोड़ने की आकांक्षा रखने वाले युवक-युवतियों इन फार्मों का भर दिया करते थे। इसके बाद मंडल उनका अंतरजातीय विवाह करवाने में मदद करता था।

जात-पांत तोड़क मंडल के संस्थापक सदस्यों की तस्वीर

जात-पाँत तोड़क मंडल के आलोचक 

जब यह मंडल संतराम बी.ए. की अगुआई में आकार लेना लगा था, तब इसके शुरुवाती दौर में उच्च श्रेणी के हिंदू मज़ाक उढ़ाते थे। ऐसे लोगों का मानना था कि यह मंडल ऐसे लोगों का जत्था है, जो नीच जाति के होने कारण अपनी जाति को छुपाना चाहते हैं। बड़ी दिलचस्प बात है कि जब मंडल वर्ण-व्यवस्था को मिटाने की बात करने लगा तो इसका विरोध पंडित लज्जाराम शर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और किशोरीदास वाजपेयी जैसे दिग्गज साहित्यकारों ने किया था। हिंदी लेखकों और सुधारकों को वर्ण-व्यवस्था के खात्मे और अंतरजतीय विवाह वाला फार्मूला रास नहीं आया था। इन लेखकों की दलील थी कि यह मंडल जाति-तोड़ने के बहाने हिंदुओं को तोड़ने का काम कर रहा है। यदि इसका वश चले तो वह अछूत और ब्राह्मणों को एक ही पायदान पर लाकर खड़ा कर दें। हिंदी के लेखकों ने जात-पाँत तोड़क मंडल के साथ संतराम बी.ए. की शिक्षा-दीक्षा का भी मज़ाक उढ़ाया था। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का तो यहां तक कहना था कि यदि “अंग्रेजी स्कूलों और कालेजों में जो शिक्षा मिलती है, उससे दैन्य ही बढ़ता है और अपना अस्तित्व भी खो जाता है। बी.ए.पास करके धीवर, लोध अगर ब्राह्मणों को शिक्षा देने के लिए अग्रसर होंगे, तो संतराम बी.ए. की तरह हास्यास्पद होना पडे़गा।” जब जात-पाँत तोड़क मंडल के मंच से वर्ण-व्यवस्था के नाश होने का ऐलान हुआ तो अधिकांश उच्च श्रेणी के हिंदू लेखक इस मंडल के विरोधी हो गए थे। किशोरी दास वाजपेयी जैसे बड़े लेखक वर्ण-व्यवस्था की रक्षा में उतर आये थे। इस भाषाविद् की दलील थी कि वर्ण-व्यवस्था का जाति-प्रथा और छुआछूत से कोई लेना-देना नहीं है। इस तरह से तमाम हिंदी के लेखक और संपादक जात-पाँत तोड़क मंडल और इसके मंत्री संतराम बी.ए. का विरोध और आलोचना करते दिखायी दिए थे।

जात-पाँत तोड़क मण्डल और अछूत 

जात-पाँत तोड़क मंडल अछूतों का प्रबल पक्षधर था। इसका दावा था कि स्वराज का अर्थ तब तक अधूरा है, जब तक अछूत समस्या का समाधान नहीं हो जाता है। इसलिए उच्च श्रेणी के हिंदू सुधारकों को अपनी हठधर्मिता को त्यागकर अछूत समस्या की ओर उन्हें ध्यान देना चाहिए। इस दौर के अछूत सुधारक मंडल द्वारा चलाये जा रहे जाति-तोड़ो आंदोलन की प्रशंसा करते थे। संतराम बी.ए. का डॉ. आंबेडकर से घनिष्ठ संबंध था। उन्होंने डॉ. आंबेडकर को सन् 1936 में जात-पांत-तोड़क मंडल के वार्षिक अधिवेशन का सभापति बनाया था। इस अधिवेशन के होने के चंद महीने पहले ही डॉ. आंबेडकर ने जाति-व्यवस्था से तंग आकर यह घोषणा कर दी थी कि ‘यद्यपि मैं हिंदू जन्मा हूं, लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं’। डॉ. आंबेडकर की इस घोषणा से पूरे देश में तहलका मच गया था। लाहौर के भद्रवर्ग समाज ने संतराम बी.ए. को धमकी दे डाली कि यदि डॉ. आंबेड़कर मंडल के वार्षिक अधिवेशन में आएंगे तो हम काला झंडा दिखाकर उनका विरोध करेंगे। संतराम बी.ए. ने अंत में डॉ. आंबेडकर की गरिमा का ख़याल रखते हुए 1936 में होने वाले जात-पांत-तोड़क मंडल का वार्षिक अधिवेशन स्थगित कर दिया गया था। संतराम बी.ए. ने अपना कथन इस प्रकरण को लेकर गांधी को उनके पत्र हरिजन में प्रकाशनार्थ भेजा था, उसके मुताबिक “हमने अपने अधिवेशन की अध्यक्षता करने के लिए डॉ. आंबेडकर को इसलिए नहीं आमंत्रित किया था कि वे दलित वर्ग के हैं, क्योंकि हम अस्पृश्य हिंदू को स्पृश्य हिंदू से अलग नहीं मानते। इसके विपरीत, हमने उन्हें इसलिए चुना कि हिंदू समुदाय के इस मरणांतक मर्ज का उनका निदान वही है, जो हमारा है अर्थात‍ उनका मत भी यही है कि हिंदुओं के विघटन और पतन का मूल कारण जाति प्रथा है। डॉक्टर की उपाधि के लिए डॉक्टर (आंबेडकर) का शोध प्रबंध जाति प्रथा पर था, इसलिए उन्होंने इस विषय का गहराई से अध्ययन किया है। चूंकि हमारे अधिवेशन का उद्देश्य हिंदुओं को जाति का उन्मूलन करने के लिए समझाना था, इसलिए धार्मिक और सामाजिक मामलों में एक ग़ैर-हिंदू की सलाह उन पर कुछ असर नहीं कर सकती। डॉक्टर ने अपने व्याख्यान के पूरक हिस्से में यह कहने पर बहुत जोर दिया कि हिंदू के रूप में उनका यह अंतिम व्याख्यान है, जो अप्रासंगिक तो था ही, अधिवेशन के हितों को चोट पहुंचाने वाला भी था। अत: हमने यह वाक्य निकाल देने का अनुरोध किया, क्योंकि वे यह बात किसी अन्य अवसर पर भी कह सकते हैं। लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और हमारे जलसे को दिखावे की चीज बनाने की कोई उपयोगिता नहीं लगी। इस सबके बावजूद, मैं उनके व्याख्यान की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। जो, जितना मुझे पता है, इस विषय पर सबसे ज्यादा विद्वतापूर्ण प्रबंध है और जिसका अनुवाद भारत की प्रत्येक भाषा में करने के योग्य है।” (बी. आर. आंबेडकर, जाति का विनाश, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली, 2018, पृष्ठ 134-135)

आंबेडकर का मंतव्य 

वहीं डॉ. आंबेडकर ने इस संबंध में मंडल के एक सदस्य हर भगवान को पत्र लिखा। इसके मुताबिक, “मुझे विश्वास है कि श्री संत राम इस बात की तसदीक करेंगें कि उनके एक पत्र के जवाब में मैंने उन्हें लिखा था कि अंतरजातीय भोज और अंतरजातीय विवाह जाति प्रथा को समाप्त करते के सही तरीके नहीं हैं। इसका सही तरीका है उन धार्मिक विचारों को नष्ट करना, जो जाति का आधार हैं। अपने प्रत्युत्तर में श्री संत राम ने मुझसे कहा कि मैं अपने इस दृष्टिकोण, जिसे उन्होंने एकदम नया बताया, को तफसील से समझाऊँ। उनके इस अनुरोध के प्रकाश में मैंने सोचा कि जिस बात को मैंने अपने पत्र में एक वाक्य में कहा था, मैं अपने भाषण में विस्तार से उसका वर्णन करूं। इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि जो विचार मैंने व्यक्त किये हैं, वे नए हैं। कम से कम श्री संत राम, जो आपके आंदोलन के प्रणेता और उसके प्रमुख सदस्यों में एक हैं, के लिए तो वे बिलकुल ही नए नहीं हैं।” (बी आर आंबेडकर, द प्रोलॉग टू “द एनीहिलेशन ऑफ कास्ट”, कोलंबिया यूनिवर्सिटी

जात-पाँत तोड़क मंडल वर्ण-व्यवस्था के समर्थकों का आलोचक था 

जात-पाँत तोड़क मंडल ने औनिवेशिक भारत में वर्ण और जाति-प्रथा के विरोध में एक विमर्श का माहौल निर्मित किया था। मंडल ने अछूत समस्या और जाति-व्यवस्था के मसले पर अपने दौर के किसी उच्च श्रेणी के सुधारक के साथ मित्रता नहीं निभायी। वर्ण-व्यवस्था के समर्थन में महात्मा गांधी और पंडित मदनमोहन मालवीय जैसे विचारकों की खुलकर आलोचना और उनसे प्रतिवाद भी करता था। यह मंडल और संतराम बी.ए. अछूत मसले पर पंडित मदनमोहन मालवीय के ‘मंत्र-दीक्षा’ की खुलकर आलोचना करते हुए, ‘मंत्र-दीक्षा’ को उच्च श्रेणी के हिंदुओं का शिगूफा करार दिया था। संतराम बी.ए. की दलील थी कि उच्च श्रेणी के सुधारकों को मंत्र-दीक्षा का ढोंग छोड़कर अछूतों को सामाजिक, राजनैतिक और शैक्षिक अधिकारों को देने की परियोजना पर बल देना चाहिए। 

जात-पाँत- तोड़क मण्डल की स्थापना के सौ वर्ष 

जात-पाँत तोड़क मण्डल की स्थापना के चंद महीनों बाद अर्थात सन 1922 में सौ साल पूरे हो जाएंगे। आज से सौ साल पहले मंडल ने जाति-तोड़ने के जो फार्मूले सुझाए थे। आधुनिक भारत के बुद्धिजीवी उन्हीं फार्मूलों पर ज़ोर देते दिखाई देते हैं। आज भी जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाने वाले बुद्धिजीवियों की ओर से जाति-तोड़ने का सर्वोत्त्म साधन अंतरजातीय विवाह को ही बताया जाता है। यह अलगा बात है कि आधुनिक भारत में भी जातिवादी ताकते अंतरजातीय विवाह को बड़ी हिकारत भरी नज़र से देखती हैं। हम देखते हैं कि सौ साल बाद भी इस नयी सदी में जाति-पाँत-तोड़क मंडल के विचार और दलीलें प्रासंगिक और अनुकरणीय है। महत्वपूर्ण यह भी है कि सर्वसमवेशी और प्रगतिशील होने का दावा करने वाले हिंदी लेखक और इतिहासकार मंडल की प्रासंगिकता पर कोई विमर्श करते नहीं दिखायी देते हैं।

 (संपादन : नवल/अनिल)

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