‘आग में डूबा कथानक’ तराशते कवि जगदीश पंकज का मुक्त स्वर

नवगीत परंपरा में जगदीश पंकज ही मात्र ऐसे कवि हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य में जन्मी इस नवीन गीत विधा में सदियों से जाति-व्यवस्था के शिकार, उपेक्षित, तिरस्कृत और बहिष्कृत समुदायों की आवाज को स्वर देने का कार्य किया है और बहुत कम समय में साहित्य की मुख्यधारा कही जाने वाली पंक्ति में अपना स्थान और पहचान सुनिश्चित की है। बता रही हैं पूनम तुषामड़

हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में अनेक नवीन साहित्यिक विधाओं का जन्म हुआ। साहित्य की इसी परिवर्तनगामी प्रक्रिया में काव्य के क्षेत्र में भी ‘नवगीत’ के रूप में एक नवीन काव्यात्मक परंपरा का प्रारंभ हुआ जो अब तक की पुरानी गीत परम्परा से पूर्णतः भिन्न थी। नवगीत को प्रतिष्ठित करने के क्रम में डॉ. शंभुनाथ सिंह जी का विशेष योगदान रहा है। उन्होंने ‘नवगीत दशक’ एक, दो और तीन खण्डों में लिख कर नवगीत विधा को साहित्य में स्थापित किया। परंतु इस विधा का साहित्यिक नामकरण राजेंद्र प्रसाद सिंह द्वारा संपादित कृति ‘गीतांगीनी’ में ‘गीत, रचना और नवगीत उन्वान’ शीर्षक से लिखी भूमिका से हुआ। 

साहित्य में नवगीत काव्य की एक नवीन विधा है, जो नवता तथा गीतत्व का मिलाजुला रूप है। साहित्य में जैसे ‘नई कविता’ है, उसी तरह गीत परंपरा में ‘नवगीत’ का उदय हुआ। 1964 में ओम प्रभाकर और भगीरथ भार्गव के ‘कविता 64’ नामक संकलन में डॉ. शम्भुनाथ सिंह, रविंद्र भ्रमर, रामदरश मिश्र, रमेश कुंतल मेघ के लेखों ने नवगीत को आलोचनात्मक स्वीकृति दे दी थी। 

तत्कालीन परिस्थितियों में परिवर्तित जीवन मूल्यों, सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक समस्यों के चलते जनता में उत्पन्न असंतोष, महानगरीय जीवन में उत्पन्न एकाकीपन, स्वतंत्रता के पश्चात उत्पन्न संत्रास, दुख, मोहभंग तथा सत्ता द्वारा रचित राजनैतिक षड्यंत्रों को परंपरागत गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त कर पाना संभव नहीं था, ऐसे में ‘नवगीत’ ने काव्य और गीत दोनों को समाहित करते हुए कविमन को एक नवीन आधार भूमि प्रदान की।

आधुनिक जीवन की संवेदनाओं से जुडी अनुभूतियों की छंदात्मक अभिव्यक्ति का नाम ही नवगीत है। नवगीत को नवीन प्रयोगधर्मिता से गुजारने का श्रेय हम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को दे सकते हैं। 

नवगीत परंपरा को विस्तार देने वाले प्रमुख कवियों में राजेंद्र प्रसाद सिंह, शंभुनाथ सिंह, उमाकांत मालवीय, नईम, देवेंद्र शर्मा इंद्र, राजेंद्र गौतम, रविंद्र भ्रमर, कृष्ण बिहारी के अलावा वर्तमान समय में कुमार रविंद्र, जगदीश व्योम, श्री राम परिहार, वीरेंद्र आस्तिक, कुंवर बैचैन, जगदीश पंकज आदि नवगीतकार नवगीत विधा में साहित्य के नवीन प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं।

इस पूरी नवगीत परंपरा में जगदीश पंकज जेंद (जगदीश पंकज के नाम से प्रसिद्ध) ही मात्र ऐसे कवि हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य में जन्मी इस नवीन गीत विधा में सदियों से जाति-व्यवस्था के शिकार, उपेक्षित, तिरस्कृत और बहिष्कृत समुदायों की आवाज को स्वर देने का कार्य किया है और बहुत कम समय में साहित्य की मुख्यधारा कही जाने वाली पंक्ति में अपना स्थान और पहचान सुनिश्चित की है।

कवि जगदीश पंकज हिंदी दलित साहत्य में नवगीत शैली के एक विशिष्ट रचनाकार हैं। दलित साहित्य और आंबेडकरवादी विचारों से लैस जगदीश पंकज जी की कविताएं नवगीत शैली में पढ़ा और सुना जाने वाला उत्कृष्ट आख्यान है, जिसे सुनकर कोई भी कवि की अनूठी शब्द शैली और रचनाशीलता की प्रशंसा किये बिना नही रह सकता।

जगदीश पंकज, नवगीत रचनाकार

जगदीश पंकज का जन्म 10 दिसम्बर 1952 को गांव पिलखुवा, जिला गाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनका पहला नवगीत संग्रह ‘सुनो मुझे भी’ वर्ष 2015 में आया। इसके पश्चात् ‘निषिद्धो की गली का नागरिक’ 2016 प्रकाशित हुआ। इनका तीसरा नवगीत संग्रह ‘समय है सम्भावना का’ 2018 तथा चौथा ‘आग में डूबा कथानक’ 2019 में प्रकाशित हुआ। कवि का पांचवां नवगीत संग्रह है ‘मूक संवाद के स्वर’ जो वर्ष 2019 में प्रकाशित हुआ। वहीं छठा संग्रह अभी प्रकाशनाधीन है।

दरअसल, किसी भी कवि की रचनाशीलता बुनियादी तौर पर तीन चीजों पर टिकी होती है। एक तो उसकी संवेदन शक्ति, दूसरी समाज एवं स्थितियों की गहन अनुभूति तथा तीसरा भावबोध के साथ सुक्ष्म विश्लेषण क्षमता। जगदीश पंकज की रचनाओं में ये तीनों ही गुण उनकी बेहद तरोताज़ा कर देने वाली तरंगित शैली में मौजूद हैं। इन कविताओं का स्वर केवल समाज की उपेक्षित उत्पीड़ित अस्मिताओं के दुःख दर्द और पीड़ा का आर्तनाद नहीं है, बल्कि इन गीतों में दमित, दलित अस्मिताओं की पीड़ा के बीच उठी चीख से उपजा आक्रोश और प्रतिरोध भी है।

कवि जगदीश पंकज अपने समय के नवगीतकार दुष्यंत कुमार, शैलेन्द्र कुमार, कवि गोपालदास नीरज, नरेश सक्सेना आदि की श्रेणी के नवगीतकार है। यह विडबंना ही है कि जगदीश पंकज जैसे रचनाकारों अथवा नवगीत ग़ज़लकारों को दलित साहित्यिक क्षेत्र में कुछ देर से पहचान मिली, किन्तु ऐसी अमूल्य प्रयोगधर्मी प्रतिभाएं ही दलित साहित्य को अपनी अनूठी लेखन शैली से सुसज्जित करेंगीं।

गीतकार जगदीश पंकज अपनी संग्रह ‘मूक संवाद के स्वर’ में लिखित आत्मकथ्य में लिखते हैं कि “साहित्य अपने समय का साक्ष्य होता है। अतः अपने युग सत्य को साहित्य का विषय बनाना समकालीन साहित्य का मुख्य सरोकार है। मौन होते जा रहे संवाद को वाणी देने के लिए साहित्यिक हस्तक्षेप ज़रूरी है।” गीतकार इस मौन को तोड़ने के लिए हर क्षण बैचैन है इसीलिए कह उठते हैं–

कांच का घर /पारदर्शी खिड़कियों पर
कब तलक/ परदे गिराकर बच सकेगा
जो कथानक खड़ा है मौन होकर
काल्पनिक संवाद कितने रच सकेगा?

(कविता– ‘एक उजाला शीर्षक देकर’, संग्रह– ‘मूक संवाद के स्वर’,पृष्ठ-41)

जगदीश पंकज के गीतों को पढ़ते हुए आप इतिहास से वर्तमान तक दमित-उपेक्षित अस्मिताओं की छोटी-बड़ी अनेक संघर्षशील परिस्थितियों की यात्रा करेंगे। इन गीतों में एक सफल कवि और गीतकार का अपने समाज और उससे जुडी रचनाओं के प्रति प्रेम और समर्पण तब दिखाई देता है जब कवि अपने एक गीत की पंक्ति को अपनी उसी ओजस्वी शैली में कहते हैं– गीत है वह जो /जो सदा आंख उठाकर /हो जहां पर भी /समय से जूझता है।

ऐसा बेबाक स्वर, ऐसी सधी हुई भाषा और ऐसी निर्भीकता अनायास ही नहीं आ जाती, बल्कि यह कवि की अबाध जीवन संघर्ष यात्रा का ही परिणाम है।

कवि जगदीश पंकज जैसी संवेदनशील, जागरूक अमूल्य प्रतिभाओं ने ही दलित साहित्य को समृद्धि प्रदान की है। नवगीत शैली में अपने समाज की सच्चाई और पीड़ा को कलमबद्ध करते हुए वे अपने अनूठे आक्रोशित अंदाज़ में चुनौती देते हैं–

चीखकर ऊँचे स्वर में कह रहा हूँ, क्या मेरी आवाज तुम तक आ रही है?
चिर बहिष्कृत हम रहे प्रतियोगिता में, रोकता हमको तुम्हारा हर कदम है।

क्यों व्यवस्था अनसुना करते हुए भी ,एकलव्यों को नहीं अपना रही है?
बस तुम्हारी जीत पर ताली बजाएं, हाथ खली सब सजा कर मौन संयम
अब नहीं स्वीकार यह अपमान हमको, चेतना प्रतिकार के स्वर पा रही है।

कवि का यह प्रतिकार केवल दलित और सवर्ण के बीच सदियों से चली आ रही असमानता एवं भेदभावपूर्ण व्यवहार के विरूद्ध ही नहीं है, बल्कि उससे भी आगे चलकर एक पूरे समाज को उनके सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित करके उन्हें अपना गुलाम बनाये रखने की साजिश के खिलाफ है। कवि की काव्य कृति उनकी वाणी का पर्याय कैसे बन जाती है, यह उनकी इस नवगीत में देखा जा सकता है–

गुलमुहर के गीत ही गाते रहे, दूब को हर बार ठुकराते रहे।
इन कनेरों में छिपे अभिमन्त्र हैं ,ये व्यवस्थित तंत्र के षड्यंत्र हैं।

(संदर्भ : कविता– ‘गुलमुहर के गीत ही गाते रहे’, संग्रह– ‘समय है संभावना का’, पृष्ठ 30)  

कवि पंकज की कविता किसी प्रकार के काल्पनिक प्रभाव या दबाव से परे उनकी अनुभूति का प्रामाणिक बयांन है। ज़ाहिर है कि ये कोरी तल्ख़बयानी नहीं है, बल्कि इसका एक-एक शब्द कवि की वैचारिकता में उपस्थित मार्क्सवाद और आंबेडकरवादी विचारों का सामंजस्य है, जो उनकी इस कविता में स्पष्ट परिलक्षित होता है–

सह रहा हैं पीठ पर वह / हर तरह के वार / पर झुकता नहीं।
वह दलित, वह सर्वहारा / वक्त से लाचार / पर रुकता नहीं।
वह श्रमिक, सृजक / चितेरा कर रहा प्रतिकार / पर चुकता नहीं।

गीतकार की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए महसूस हुआ कि दलित साहित्य में दलितों के श्रम और सर्वहारा श्रमिक को लेकर इतनी सुदृढ़ पंक्तियां मिल पाना संभव नहीं है। दरसल कवि भलीभांति जानते हैं कि समाज में श्रमिक मजदूर कौन हैं और किसे तमाम संघर्ष के बावजूद भी उसके श्रम के वास्तविक मूल्य से विहीन करके मुनाफा कौन लूट रहा है। इतना ही नहीं कि कवि केवल दलित मुद्दों के प्रति ही संजीदा हैं, बल्कि समाज में धर्म और संप्रदाय को लेकर होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं के प्रति भी आप गहरा रोष प्रकट करते हैं–

आज भूखे पेट ही सोना पड़ेगा, शहर में दंगा हुआ है
एक नत्थू, दूसरा यामीन है, आँख दोनों की मगर ग़मगीन है,
बिन मजूरी दर्द को ढोना पडेगा।

जगदीश पंकज के प्रतीक और बिम्ब दलित साहित्य और आंबेडकरवादी वैचारिकी को एक नवीन फलक प्रदान करते हैं। उनकी सधी हुई भाषा शैली में पिरोये गए शब्दों से सजी पंक्तियां किसी अनुभवी कारीगर द्वारा तराशी गई अनमोल कृति सी महसूस होती हैं–

चलो भाषा से कहें, कुछ शब्द दे दे / तोड़ दे जो इस सदी की / क्रूर जड़ता की घुटन को।
अंकुरित हों इस तरह स्वर आस्था के / बंधुता का बोध गहराए पटल पर।
और निजता के हनन की हर व्यवस्था, टूट जाए, लय मिला विश्वास पाकर।
चलो शब्दों से कहें ,कुछ अर्थ दे दें / तोड़ दें जो कसमसाते धैर्य के बेबस चलन को।

कवि जगदीश पंकज की कविताएं तुकांत एवं अतुकांत दोनों प्रकार की शैली में बेहद प्रभावी हैं। कवि कविताओं में काव्यगत प्रामाणिक शैली एवं निर्धारित मापदंडों का भी अधिकतम पालन करते हैं। काव्य में कहां कितनी मात्राएं एवं छंद का प्रयोग किया जाना उपयुक्त है,। कवि की कविताओं में यह सुन्दर संयोजन बेहद बारीकी से देखा जा सकता है। कवि अपनी कविता को जमीनी संवेदना के धरातल से उठकर किस प्रकार अपनी ओजस्वी वाणी की विशालता का फलक तैयार करता है। इस कड़ी में वे स्त्री पर होने वाले अन्याय के प्रति असंवेदनशील समाज एवं व्यवस्था को भी प्रश्नांकित करते हैं–  

कहां मुज्जफर, देवरिया / हरदोई क्या क्या मुकाम है
दिल्ली जाते हुए मार्ग पर / अभियोगी का कहां नाम है।
मासूमों के नयन पूछते / मौन सभ्यता के खम्बों से,
करुणा दिखा छला अपनों ने / आगे कितना सही बेटियां।

पितृसत्ता को चुनौती देती स्त्री को भी कवि रेखांकित करते हुए कहते हैं कि इस क्रूर समय में भी वह वक्त को ठेंगा दिखाकर साहस के साथ निकली है, लेकिन समाज में पसरी वहशियाना नज़रों का खौफ उसे भी है। वे लिखते हैं–

एक लड़की वक्त को ठेंगा दिखाकर / रात के गहरे अँधेरे में अकेली चल रही है।
डर उसे भी लग रहा है, बढ़ रही हैवानियत के/ इस बदलती सभ्यता में दनदनाते हर चलन से।
एक लड़की / फेंक कर संचित घुटन को / सांकलों की वर्जनाएं तोड़ अब हर पल रही है। (कविता– ‘जहां सुरक्षित रहें बेटियां’, संग्रह– ‘मूक संवाद के स्वर’ , पृष्ठ 32, 33)

कहने का अभिप्राय यही हैं कि गीतकार जगदीश पंकज के गीत केवल नवगीत शैली में रची गई काव्यमयी रचनाएं भर नहीं हैं, बल्कि रचनाओं का समृद्ध संसार हैं। वे अपनी इस अभूतपूर्व नवगीत शैली में हिंदी साहित्य के अनेक कवियों को पछाड़ कर आगे निकल गए हैं। कहीं वे सुदामा पांडेय धूमिल की कविता से आगे के आक्रोशित तेवर के साथ जनता को जगाते दिखते हैं, तो कहीं निराला को पीछे छोड़ जाते हैं। फिर कहीं त्रिलोचन तो कहीं नागार्जुन के समकक्ष नज़र आते हैं। यही उनकी भाषा शैली की विशालता हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)

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