चरणजीत सिंह चन्नी की राह के रोड़े

यदि कांग्रेस बहुमत में आती है तो क्या चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री के तौर पर पंजाब की बागडोर संभालने का मौका दिया जा सकता है? इसका उत्तर बहुत आसान नहीं है। बता रहे हैं द्वारका भारती

विश्लेषण

पंजाब के सीएम के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी कितने स्वीकार होंगे? पंजाब की राजनीति में यह प्रश्न बेशक कोई मायने न रखता हो, लेकिन पंजाब के दलित-हल्कों में यह प्रश्न इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शायद पंजाब में पहला अवसर होगा जब कोई दलित पूरे समय के लिये पंजाब की बागडोर अपने हाथों में लेगा। करीब 111 दिन (विधानसभा चुनाव की आधिकारिक घोषणा होने तक) पंजाब के मुख्यमंत्री रहे चरण सिंह चन्नी के इस छोटे-से कार्यकाल को सियासी क्षेत्र में यदि बहुत चमकदार न भी माना जाये, तो भी इसे बुरा नहीं कहा जा सकता। पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा प्रस्तुत की गई तमाम अड़चनों के बीच चरणजीत सिंह चन्नी ने जिस प्रकार पंजाब राज्य की सत्ता को अपने इस छोटे से कार्यकाल में चलाया, वह उनकी कार्यक्षमता को तो दर्शाता ही है, अपने प्रतिद्वन्द्वी से कैसे निबटना है, इस सूझ-बूझ का परिचय भी देता है। 

नवजोत सिंह सिद्धू ने जिस प्रकार पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के जमे हुए पांव उखाड़ते हैं, चरणजीत सिंह चन्नी के सामने निस्तेज तो दिखाई नहीं दिये, लेकिन चरणजीत सिंह चन्नी उसके तेवरों को अनदेखा करते हुए अपना काम करते रहे। उन्होंने सिद्धू के तेवरों को कुंद कर दिया। यह चरणजीत सिंह चन्नी की सियासी सूझबूझ थी या आगे बढ़ते रहने की ललक, इसका यदि विश्लेषण किया जाये तो कहा जा सकता है कि चन्नी अपनी दोनों खूबियों के साथ आगे बढ़े हैं।

चरणजीत सिंह चन्नी तथा कांग्रेस के आलाकमान के लिए नवजोत सिंह सिद्धू एक बहुत बड़ा सिरदर्द तो हैं ही, कांग्रेस पार्टी की छवि को धक्का भी पहुंचाते हुए दिखाई पड़ते हैं। वे चरणजीत सिंह चन्नी के सबसे निकटतम प्रतिद्वन्द्वी हैं।

इससे भी बढ़कर चरणजीत सिंह चन्नी ने जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पंजाब में आमद के समय उलझी हुई परिस्थितियों को जिस दिलेरी से संभाला और प्रधानमंत्री के प्रहारों का सामना किया, उसने चन्नी का कद और भी ऊंचा किया। ऐसा नहीं कि इसकी आलोचना नहीं हुई, देश का मीडिया जिसे ‘गोदी-मीडिया’ के नाम से भी जाना जाता है, ने इसे चरणजीत सिंह की महाभूल कहा, एक षड्यंत्र की संज्ञा भी दी, लेकिन पंजाब की जनता में इसका कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ा। सोशल मीडिया में चरणजीत सिंह चन्नी की भूमिका को सराहा गया। कुल मिलाकर कहा जाय तो चन्नी के व्यक्तित्व पर कोई आंच आती हुई दिखाई नहीं दी।

लोकप्रिय होने के बावजूद सवाल बरकरार : चरणजीत सिंह चन्नी, मुख्यमंत्री, पंजाब

सबसे बड़ा प्रश्न अब यह सामने उभरता है कि इन विधानसभा के चुनावों में, यदि कांग्रेस बहुमत में आती है तो क्या चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री के तौर पर पंजाब की बागडोर संभालने का मौका दिया जा सकता है? इसका उत्तर बहुत आसान नहीं है। नवजोत सिंह सिद्धू की भावभंगिमा बताती है कि वे इस पद को हथियाने के लिए अपने सभी पैंतरे आजमाने से बाज नहीं आयेंगे। हमने देखा है कि वे कांग्रेस के आलाकमान को भी धमकाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। वे अपना ‘पंजाब मॉडल’ बताते हुए कहते हैं कि पंजाब का सीएम हाईकमान तय नहीं करेगा, बल्कि पंजाब के लोग करेंगे। साथ वे यह भी कहते हैं कि इस पर मैं कोई समझौता कदापि नहीं करूंगा। उनके इन सभी क्रियाकलापों से स्पष्ट है कि सिद्धू स्वयं को पंजाब के भावी मुख्यमंत्री के रूप में परोसने की भूमिका में आ चुके हैं। वे कदम पीछे हटाने वाले नहीं। चरणजीत सिंह चन्नी तथा कांग्रेस के आलाकमान के लिए नवजोत सिंह सिद्धू एक बहुत बड़ा सिरदर्द तो हैं ही, कांग्रेस पार्टी की छवि को धक्का भी पहुंचाते हुए दिखाई पड़ते हैं। वे चरणजीत सिंह चन्नी के सबसे निकटतम प्रतिद्वन्द्वी हैं।

पंजाब की सियासत में जाट होना तथा सिक्ख होना अनिवार्य रहा है। यहां की राजनीति की यही खास पहचान रही है। दलित की बात करें तो उसकी स्थिति वही है जो कि राष्ट्र की राजनीति में हम देखते आये हैं। कांग्रेस में बहुत से दलित-नेताओं का बोलबाला रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी सदा उनके लिये बहुत दूर की कौड़ी रही है। दलितों के लिए कांग्रेस हमेशा एक ऐसी सरकारी पार्टी रही है, जिसे आंखें मूंदकर वोट दी जाती रही है। इस परंपरा को सबसे पहले रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (आरपीआई) जिसके संगठनकर्ता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर थे, ने तोड़ा। उसके बाद बसपा ने भी दलितों को कांग्रेस से अलग किया है। इस बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी दलितों के वोटों पर अपना वर्चस्व कायम करने का प्रयत्न करती हुई देखी जाती है।

वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो दलित मतों के तीन दावेदार दिखाई देते हैं। मालवा का दलित-सिक्ख अकाली दल का वोटर है। दोआबा का दलित कभी बहुजन समाज का वोटर था, लेकिन अब उनका झुकाव कांग्रेस की ओर है। बसपा को भी अपने कैडर का वोट मिलने की उम्मीद है। इन स्थितियों में हम यह नहीं कह सकते कि दलित-वोटर का चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में बहुत ज्यादा मदद कर पायेंगे। लेकिन चन्नी यह मानने का लाभ अवश्य पहुचायेंगे कि कांग्रेस आज भी दलित-हितैषी संगठन है। 

कुल मिलाकर देखें तो हम पायेंगे कि चरणजीत सिंह चन्नी ऐसे बहुत बड़े चर्चित नेता नहीं हैं जो कि अपने कंधों पर कांग्रेस को ढो सकें। यही कारण है कि आलाकमान उसके नाम पर चुनाव की वैतरणी पार करने की हिम्मत नहीं दिखा सकता, जिस प्रकार उसने पिछले चुनावों में कैप्टन अमरिंदर को पंजाब का सीएम घोषित करके दिखाई थी। कांग्रेसी आलाकमान यह भी जानते हैं कि पंजाब में लगभग 30 प्रतिशत दलित वोटर हैं। यदि वह कांग्रेस को मत देते हैं तो उसे आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन यहां के दलित मतदाता बंटे हुए हैं।

जाट-सिक्ख आज भी एक दलित को मत देने में सौ-बार सोचता है। यदि कांग्रेस आलाकमान चाहे भी तो उसके सामने सिद्धू एक बहुत बड़ी बाधा बनकर मुंह बाये खड़ी है। आम आदमी पार्टी का बढ़ता हुआ जनाधार, किसान संगठनों का अपना राजनैतिक संगठन चरणजीत सिंह चन्नी की स्थिति को और भी पतला करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।

(संपादन : इमामुद्दीन/नवल/अनिल)


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