झारखंड : सरकारी तंत्र द्वारा विसु मुंडा की उपेक्षा

डोंबारी बुरू पहाड़ी, जहां 9 जनवरी, 1900 को बिरसा मुंडा के नेतृत्व में बड़ी संख्या में आदिवासी जुटे थे और अंग्रेजी हुकूमत ने हमला बाेल दिया था। इस हमले में अनेक आदिवासी शहीद हुए। उन्हीं शहीदों की याद में वहां बनाए गए स्मारक के लिए जमीन दान देनेवाले विसु मुंडा की दास्तान बता रहे हैं विशद कुमार

यह दास्तान है विसु मुंडा की। विसंगतियां कहिए या फिर सरकारी तंत्र की उपेक्षा कि बिरसा मुंडा को अपना पुरखा माननेवाला यह आदिवासी वृद्ध आज भी इंसाफ की बाट जोह रहा है। दरअसल, विसु मुंडा गुटुहातू के डोंबारी बुरू शहीद स्थल के हैं, जहां बिरसा मुंडा का समारक बनाया है। यह स्मारक विसु मुंडा की जमीन पर अवस्थित है। यह स्मारक आदिवासियों के लिए बेहद खास है। इसी स्थल पर 9 जनवरी 1900 को बड़ी संख्या में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में बड़ी संख्या में आदिवासी जुटे थे। इस दौरान अंग्रेजी हुकूमत के सिपाहियों ने अचानक हमला बोल दिया था, जिसमें अनेक आदिवासी शहीद हो गए थे। इन्हीं शहीदों के स्मारक के लिए विसु मुंडा ने अपनी 80 डिसमिल जमीन दान में दे दिया था। यह बात है 1990 की। तब राज्य सरकार द्वारा उन्हें स्मारक स्थल के प्रहरी के रूप में काम करने की जवाबदेही दी गयी थी। इसके लिए उन्हें दिहाड़ी मजदूरी दी जाती थी। परंतु, 1996 में उन्हें इस पद से हटा दिया गया और मजदूरी बंद कर दी गई। 

विसु मुंडा पूछने पर एक पत्र दिखाते हैं। पत्र 1990 में जिला अभियंता, जिला परिषद कार्यालय, रांची द्वारा ज्ञापांक 223, दिनांक 24.8.1990 के तहत बताया गया है कि “कुपु मुण्डा पिता भोज मुण्डा ग्राम जोजोहातू एवं विशु मुण्डा पिता सुगना मुण्डा ग्राम गुटुहातू को डोम्बारी स्थित बिरसा भगवान की मूर्ति प्रतिस्थापन के बाद दिनांक 1.8.1990 से दैनिक मजदूरी पर रात्री प्रहरी सह चौकीदार सह पहरेदार के पद पर अस्थायी तौर पर नियुक्त किया जाता है। यह नियुक्ति अस्थायी है एवं बिना किसी कारण बताए किसी भी समय में नियुक्ति रद्द की जा सकती है।”  

अपनी मजदूरी बंद किए जाने पर विसु मुंडा संबंधित अधिकारियों के यहां दर्जनों चक्कर लगाए। मगर कोई परिणाम नहीं निकला। 

डोंबारी बुरू शहीद स्मारक और विसु मुंडा की तस्वीर

वह बताते हैं कि 1 अगस्त 1990 को इस स्मारक स्थल का उद्घाटन हुआ और उसी दिन से चौकीदारी का जिम्मा मिल गया। काम दिहाड़ी मजदूर का था। महीने में पैसे का भुगतान होता था। रकम होती थी आठ सौ रुपए। इससे मैं अपना परिवार चलाता था। परंतु, जब 27 जुलाई 1996 को यह बन्द कर दिया गया तब स्थानीय विधायक, सांसद, स्थानीय नेताओं आदि से प्रायः बंद मजदूरी को फिर से शुरू करने के लिए गुहार लगाता रहा हूं। 

विसु मुंडा के मुताबिक उनका परिवार आर्थिक तंगी का शिकार है। यदि मजदूरी मिलना शुरू हो जाय तो घर चलाने में आसानी होगी। उनके परिवार में उनकी पत्नी नंदी देवी, बड़ा बेटा सोमा मुंडा, छोटा बेटा करम सिंह मुंडा, दो पताेहू और दस साल का एक पोता व 7 साल की एक पोती है। करीब 65 साल के विसु मुंडा अपने दोनों बेटों के साथ खेती-बाड़ी करके फिलहाल किसी तरह अपना परिवार चला रहे हैं। 

विसु मुंडा का नियुक्ति पत्र

हालांकि ऐसा नहीं है कि विसु मुंडा के आवेदन सरकारों के संज्ञान में नहीं आए। वर्ष 2012 में उप विकास आयुक्त-सह मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, जिला परिषद, खूँटी द्वारा पत्रांक 156/ जि.प. दिनांक 08.05.12 के आलोक में उप विकास आयुक्त-सह मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, जिला परिषद, रांची को एक पत्र भेजकर कहा गया कि “उपर्युक्त विषय प्रासंगिक के संबंध में कहना है कि आपके आदेश ज्ञापांक 117 दिनांक 26.05.1993 द्वारा श्री विसु मुंडा, पिता स्व० सुगना मुंडा, ग्राम-गुटुहातु टोला सेकरे, थाना-मुरडू, जिला-खूँटी को डोम्बारी पहाड़ पर स्थापित बिरसा भगवान की मूर्ति की देखभाल हेतु चौकीदार के पद पर दैनिक मजदूरी पर नियुक्त किया गया। श्री मुण्डा, द्वारा उपलब्ध कराये गये आवेदन में दिनांक 01.08.1990 से दिनांक 01.10.1996 तक नियमित रूप से मजदूरी का भुगतान करने की बात कही गयी है एवं दिनांक 01.11.1996 से मजदूरी का भुगतान बंद रहने के फलस्वरूप लंबित मानदेय राशि का भुगतान करने का अनुरोध किया गया है। आवेदन पत्र पर माननीय मंत्री श्री नीलकण्ठ सिंह मुण्डा, ग्रामीण विकास विभाग, झारखण्ड, रांची के द्वारा नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई हेतु अग्रसारित किया गया है। उक्त मामला राँची जिला से संबंधित है। अतः श्री मुण्डा का आवेदन मूल रूप में संलग्न करते हुए अनुरोध है कि उनके आवेदन पर सहानुभूति पूर्वक विचार करते हुए नियमानुसार अग्रेतर कार्रवाई की जाय।” 

अपने घर के सामने खड़ा विसु मुंडा का बेटा

लेकिन इस बार भी बात आगे नहीं बढ़ी। लोक कलाकार व संस्कृति कर्मी सुखराम पाहन, जो कि विसु मुंडा के बगल के गांव के निवासी हैं, कहते हैं कि विसु मुंडा के हिस्से में वैसे तो तकरीबन छह एकड़ जमीन है। उसमें भी खेती योग्य जमीन बहुत कम है। फिर भी इन्होंने अमर शहीदों के लिए जमीन दान की, यह राज्य के लिये गर्व की बात है। परंतु उनकी उपेक्षा राज्य के लिए शर्म की बात है।  

(संपादन : नवल/अनिल)


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