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महिलाओं की अस्मिता से खिलवाड़ कर कैसा देश बनाना चाहते हैं हमारे हुक्मरान?

‘सुल्ली डील्स’ के बाद अब ‘बुल्ली बाई’ ऐप में कुछ नए एंगल जोड़ दिए गए हैं। उन्हें सिर्फ़ अल्पसंख्यक महिलाओं को टारगेट नहीं करना, उन्हें सिक्खों और किसानों को भी नीचा दिखाना है, जिनकी ज़िद और जज़्बे ने प्रधानमंत्री को भी माफ़ी मांगने पर मजबूर किया। वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा की टिप्पणी

इधर चौतरफ़ा ‘बुल्ली बाई’ नाम से तैयार किये गए मोबाइल ऐप को लेकर राजनीतिक माहौल में एक ओर आक्रोश का माहौल है, दूसरी ओर एक बड़ी जमात अपनी इस नई खुराफाती ईजाद पर लहालोट है। बदसलूकी के चरम पर पहुंचा हुआ यह ऐप भारतीय संस्कृति, तहज़ीब और नैतिक मूल्यों के तो परखच्चे उड़ा ही रहा है, बहुत से ज़रूरी सवालों को भी जन्म दे रहा है। ये सवाल सिर्फ़ महिलाओं की अस्मिता से जुड़े सवाल नहीं हैं, ये सवाल हमारे देश के दिन-पर-दिन होते हुए पतन और क्षरण को बयां कर रहे हैं। इससे आका़ओं का एक बड़ा तबका लहालोट है कि आखिर बरसों की मशक्कत के बाद वे 18-22 वर्ष के युवाओं के अंदर खास धर्म व तबकों के लोगों के प्रति, स्त्रियों के प्रति इतना जहर भरने में कामयाब रहे।

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लेखक के बारे में

सुधा अरोड़ा

चर्चित कथाकार सुधा अरोड़ा स्त्री आन्दोलनों में भी सक्रिय रही हैं। अब तक उनके बारह कहानी संकलन तथा एक उपन्यास और वैचारिक लेखों की दो किताब। 'आम औरत : जि़ंदा सवाल’ और 'एक औरत की नोटबुक’ प्रकाशित हो चुकी हैं। सुधा जी की कहानियां भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी, फ्रेंच, पोलिश, चेक, जापानी, डच, जर्मन, इतालवी, ताजिकी भाषाओं में अनूदित।

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