बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष (चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु का साहित्य – दसवां भाग)

दूसरे खण्ड में जिज्ञासु ने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर द्वारा दलितोत्थान के लिए किए गए सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक संघर्षों का वर्णन किया है। किन्तु आरम्भ में उन्होंने दक्षिण भारत में अछूतों की सामाजिक स्थिति और ब्राह्मणेत्तर सामाजिक आन्दोलनों का उल्लेख किया है, जिनसे डॉ. आंबेडकर प्रभावित हुए थे। कंवल भारती कर रहे हैं पुनर्पाठ

भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार पुनर्पाठ कर रहे हैं। इसके तहत आज पढ़ें उनकी आठवीं कृति ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ का पुनर्पाठ का दूसरा भाग

‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की आठवीं कृति 

  • कंवल भारती

गतांक से आगे

इसी समय कोल्हार के शाहूजी महाराज के आर्थिक सहयोग से ‘मूकनायक’ नामक एक पाक्षिक अखबार का प्रकाशन आरम्भ किया, प्रवेशांक 31 जनवरी, 1920 को निकला। चूंकि डॉ. आंबेडकर को आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाना था, इसलिए उस पत्रिका का संपादक उन्होंने पांडुरंग नन्दराम भटकर को बनाया था। डॉ. आंबेडकर ने आगे की पढ़ाई के लिए सिडेनहम कालेज की नौकरी से इस्तीफा देकर लंदन जाने की तैयारी करने लगे। प्रोफेसर की नौकरी से जो धन इकट्ठा किया, उसमें से कुछ पैसा अपनी पत्नी रमाबाई को देकर वे जुलाई, 1920 के अन्तिम सप्ताह में लंदन पहुंचे। वहां उनके अध्यवसाय का वर्णन करते हुए जिज्ञासु लिखते हैं –

“एम.एससी. की डिग्री प्राप्त करने के लिए उन्होंने ‘प्राविन्सियल डिस्सेंटरालाइजेशन ऑफ इम्पीरियल फिनांस इन ब्रिटिश इंडिया’ विषय पर एक खोजपूर्ण निबंध तैयार करके पेश किया। इस विषय पर उन्हें लन्दन यूनिवर्सिटी ने एम.एससी. की डिग्री प्रदान की। इसके बाद डी.एससी. की डिग्री के लिए वे एक दूसरा निबंध ‘दि प्राब्लम ऑफ दि रुपी’ लिखने लगे। इस निबंध पर अक्टूबर, 1921 में लंदन यूनिवर्सिटी ने उन्हें डी.एससी. की डिग्री प्रदान की। इसके साथ ही वे कानून का भी अध्ययन करते थे, और यथासमय परीक्षा देकर ‘ग्रेज इन’ से उन्होंने बार-एट-लॉ की डिग्री प्राप्त की।” (बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष, पृष्ठ 48)

डी. एससी. की डिग्री के संबंध में यहां बताना आवश्यक है, जिसका उल्लेख जिज्ञासु ने भी आगे किया है कि उन्होंने अपना निबंध ‘दि प्राब्लम ऑफ दि रुपी’ लंदन विश्वविद्यालय में 1921 में प्रस्तुत किया था, पर वह स्वीकृत 1923 के अंत में हुआ था। जिज्ञासु ने लिखा है कि जब डॉ. आंबेडकर अर्थशास्त्र में और भी ज्ञानार्जन के लिए जर्मनी के ‘बान विश्वविद्यालय’ में अध्ययन कर रहे थे, तब उसी दौरान उन्हें लंदन से उनके प्रोफेसर केनन का पत्र मिला कि उनके निबंध पर परीक्षक समिति में कुछ मतभेद हैं, जिनके निवारण के लिए उन्हें लंदन आना होगा। वे लंदन गए, और उन्होंने परीक्षक समिति के मतभेदों को समझा। पर वे आर्थिक तंगी के कारण लन्दन में रहने की स्थिति में नहीं थे। अतः वे 14 अप्रैल, 1923 को भारत लौटे। बंबई में रहकर उन्होंने निबंध में संशोधन करने का काम पूरा किया और उसे लंदन विश्वविद्यालय भेजा। (वही, पृष्ठ 50)

डॉ. आंबेडकर की शैक्षिक योग्यता इतनी अधिक और प्रतिभा इतनी विशद थी कि यदि वे प्रशासन में नौकरी के लिए आवेदन करते, तो बड़े से बड़े पद पर चुने जा सकते थे, प्रोफेसर और जज हो सकते थे, परन्तु नौकरी करना उचित नहीं समझा। जिज्ञासु ने लिखा– “उन्होंने सोचा, यदि वे अपने आराम-सुख के लिए कोई नौकरी कर लेते हैं, तो वे उसकी जिम्मेदारियों में बंधकर अपने भाइयों का उद्धार न कर सकेंगे। अतएव, उन्हें अपनी स्थिति के लिए कोई ऐसा स्वतंत्र व्यवसाय करना चाहिए, जिससे वे आजाद रहकर अपने जाति-बंधुओं को निष्ठुर और दारुण हिंदू-दासता से मुक्त करके उनके जीवन को स्वच्छन्द और प्रगतिशील बना सकें। यही सोचकर उन्होंने अपने आपको एक सुयोग्य बैरिस्टर बनाना अत्यावश्यक समझा था।” (वही, पृष्ठ 52)

किन्तु, जिज्ञासु लिखते हैं कि हिंदू वकीलों ने डॉ. आंबेडकर का बैरिस्टर के रूप में स्वागत नहीं किया, बल्कि उनका विरोध किया। “यहां तक कि कोर्ट में बैठने के लिए उन्हें कुर्सी भी नहीं मिली। मि. जिनवाला की कोशिश से बड़ी मुश्किल से उन्हें कोर्ट में बैठने के लिए जगह मिल सकी। वे प्रतिदिन कोर्ट जाते, और बिना किसी मुकदमे के खाली हाथ लौटकर आते। इसका कारण यह था कि उनके पास दलाल नहीं थे। ऐसी स्थिति महीनों रही। पर एक दिन उन्हें एक ऐसे व्यक्ति का मुकदमा मिला, जिसमें सेशन कोर्ट से फांसी की सजा हो चुकी थी, और उसकी अपील हाईकोर्ट में की गई थी। कोई भी वकील इस मुकदमे में दम न होने की वजह से पैरवी करने को तैयार नहीं था। अन्त में एक मजाकिये वकील ने उस दुखी व्यक्ति को यह कहकर बैरिस्टर आंबेडकर के पास भेज दिया कि तुम्हारा मुकदमा अगर कोई ले सकता है, तो वह बैरिस्टर आंबेडकर है, जो डेवलेपमेंट चॉल में रहता है।”

जिज्ञासु ने लिखा कि डॉ. आंबेडकर ने उस मुकदमे को ले लिया। उन्होंने पूरे केस को समझा और दिन-रात कानून की किताबों को पढ़ा। जब केस की तारीख आई, तो, जिज्ञासु लिखते हैं– “उस दिन कोर्ट में बड़ी भीड़ थी। तमाम पुराने घाघ वकील-बैरिस्टर इस बेजान मुकदमे की नए बैरिस्टर द्वारा होने वाली पैरवी और बहस सुनने के लिए अदालत में उपस्थित थे। मुकदमा शुरू हुआ। आरम्भिक कार्रवाई के बाद बहस शुरू हुई। कचहरी में सन्नाटा छाया हुआ था। केवल बैरिस्टर आंबेडकर की आवाज इस निस्तब्ध्ता को भंग कर रही थी। मुकदमा पेचीदा था। बहस एक ही पेशी में समाप्त नहीं हुई, कई पेशियों तक चलती रही। इस बहस का जजों पर गहरा असर पड़ा। मुकदमे का पासा पलट गया। बैरिस्टर आंबेडकर की जीत हुई। सारे घाघ वकील नए बैरिस्टर का मुंह ताकते रह गए। कचहरी में नए बैरिस्टर की धूम मच गई।” (वही, पृष्ठ 54-55)

डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891- 6 दिसंबर, 1956) की युवावस्था की तस्वीर

इस जीत के बाद बैरिस्टर का काम चल पड़ा। और उन्होंने स्वयं को दलितों की मुक्ति के संघर्ष के लिए समर्पित कर दिया।

दूसरे खण्ड में जिज्ञासु ने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर द्वारा दलितोत्थान के लिए किए गए सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक संघर्षों का वर्णन किया है। किन्तु आरम्भ में उन्होंने दक्षिण भारत में अछूतों की सामाजिक स्थिति और ब्राह्मणेत्तर सामाजिक आन्दोलनों का उल्लेख किया है, जिनसे डॉ. आंबेडकर प्रभावित हुए थे। उन्होंने लिखा है कि दक्षिण में ब्राह्मणवाद चरम सीमा पर था। वहां चार वर्णों के स्थान पर ब्राह्मण और ब्राह्मणेत्तर केवल दो ही वर्ण माने गए। जो ब्राह्मण नहीं थे, वे सब शूद्र समझे गए। यहां तक कि मराठा राज्य के संस्थापक छत्रापति शिवाजीराव भौंसले को भी शूद्र कहकर पूना के ब्राह्मणों ने उनका राज्याभिषेक करने से इन्कार कर दिया। बाद में शिवाजीराव द्वारा बनाए गए पेशवा प्रधानों ने जब छल से ब्राह्मणी राज्य स्थापित कर लिया, तो शूद्रों और अछूतों पर अत्याचार भी सीमातीत बढ़ गया था। आंबेडकर के अनुसार, अछूतों को पेशवा-राज्य में सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार नहीं था। पेशवाओं की राजधनी पूना में अछूतों को गले में हांडी और कमर में झाड़ू लटकाकर चलना होता था, ताकि झाड़ू से उनके पैरों के निशान मिटते चले जाएं और वे जमीन पर न थूककर गर्दन में लटकी हांडी में थूकें। जिज्ञासु लिखते हैं कि “मालाबार का ब्राह्मणी अत्याचार इससे भी निराला था। वहां के ब्राह्मण अछूतों के घर को ‘गुजरौरी’ कहते हैं। गुजरौरी का अर्थ है गोबर के ढेर जैसा नीचा घर। वहां का कोई परिया ऊंचा घर नहीं बना सकता था। परिया लोगों के आत्मगौरव को ब्राह्मणों ने इतना अधिक कुचल दिया था कि उनकी स्त्रियॉं सिर्फ कमर में कपड़ा लपेटकर चलने को मजबूर थीं। सीने और जांघों को उन्हें खुला रखना पड़ता था।… दरिद्रता के कारण परिया लोगों को मरे हुए जानवरों का मांस खाकर पेट की ज्वाला शान्त करनी पड़ती थी।” (वही, पृष्ठ 59-60)

जिज्ञासु ने लिखा है कि “अत्याचार की एक सीमा होती है। सीमा के पार हो जाने के बाद प्रकृति प्रदत्त क्रान्ति होती है। दक्षिण में भी प्रतिक्रिया हुई। मुसलमानों के हमले हुए। विजयनगर राज्य पर मुसलमानों का कब्जा हो गया। वहां धर्मांतरण की लहर दौड़ गई। ब्राह्मणी अत्याचारों से उत्पीड़ित छूत और अछूत शूद्र इस्लाम कबूल करने लगे। इसी समय संत धर्म ने भी जोर पकड़ा। सन्तों ने कहा– ईश्वर के दरबार में ब्राह्मण और शूद्र सबको समान अधिकार है। इन संतों में तुकाराम, चोखामेला, नामदेव आदि शूद्र जातियों के संत थे।” 

एक और बड़ी ऐतिहासिक क्रान्ति यह हुई कि भारत पर अंग्रेजों का राज कायम हो गया और 1818 में पेशवाओं के क्रूर मराठा-राज्य का भी अन्त हो गया। जिज्ञासु ने लिखा कि मराठा-राज्य का अंत और अंग्रेजी राज्य की स्थापना महारों के पराक्रमम से हुई थी। अंग्रेजों की फौज में एक महार सिपाहियों भी थी, जो अंग्रेजों की ओर से पेशवा सेना से लड़ी थी और पेशवाई सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। अंग्रेजी राज्य कायम होने के बाद जो नवजागरण हुआ, उसके संबंध में जिज्ञासु लिखते हैं– “अंग्रेजी शासन कायम होने पर ईसाई मिशनरियों ने धर्म-प्रचार और शिक्षा-विस्तार का काम शुरू किया। अगणित शूद्रों और अतिशूद्रों के लड़के अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करके ऊंचे-ऊंचे पदों पर पहुंचने लगे। ईसाई मिशनों की देखादेखी हिंदुओं में भी प्रार्थना-समाज और सत्यशोधक-समाज जैसी सुधारक संस्थाएं खुलीं।” इनमें सत्यशोधक समाज के बारे में जिज्ञासु लिखते हैं कि सत्यशोधक-समाज के प्रवर्तक महात्मा ज्योतिबा फुले ‘माली’ जाति के थे। इसीलिए सत्यशोधक-समाज के नियम अधिक ठोस और क्रान्तिकारी थे। वह जातिभेद के नितान्त विरुद्ध था, और जातिगत ऊंच-नीच को मानव-द्रोह मानता था। एएकेश्वरवाद का प्रचार, पुरोहितवाद का विरोध, मूर्तिपूजा-निषेध, तीर्थयात्रा-निषेध, किसी ग्रन्थ को ईश्वरवाणी न मानना, मानव जाति की समता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता इस समाज के सिद्धांत थे। इस कारण इसका व्यापक प्रचार हुआ और इससे अस्पृश्यता-निवारण आन्दोलन को काफी बल मिला और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध ब्राह्मणेत्तर आन्दोलन चल पड़ा।” (वही, पृष्ठ 61-62)

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु व उनकी पुस्तक ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ का आवरण पृष्ठ

जिज्ञासु आगे एक महत्वपूर्ण बात बताते हैं कि दक्षिण में अछूत जातियों का सबसे पहला उद्धारक नेता भी महार ही हुआ, जिसका नाम गोपाल बुवा कृष्ण बलंगकर था, जिनपर महात्मा ज्योतिबा फुले के विचारों का प्रभाव था। श्री बलंगकर ने फौज में भरती होकर नार्मल की परीक्षा पास की और अछूत लड़के-लड़कियों के लिए पूना में स्कूल खोला, जिसमें वह खुद पढ़ाते थे। उन्होंने ‘विटाल विध्वंसन’ नामक किताब भी लिखी थी, जिसमें उन्होंने साबित किया था कि अस्पृश्यता मनुष्य की रचना है, इसे ईश्वर ने नहीं बनाया है। उन्होंने ‘अनार्य दोष परिहार मंडली’ नाम की एक संस्था का भी निर्माण किया था। जिज्ञासु ने लिखा है कि श्री बलंगकर के विचारों का आंबेडकर पर भी प्रभाव पड़ा था।

वह ब्रिटिश शासन का दौर था, और कांग्रेस पार्टी उससे मुक्ति के लिए स्वराज आन्दोलन चला रही थी। किन्तु अछूतों की मुक्ति का प्रश्न उनके कार्यभार में नहीं था। हालांकि कांग्रेस पार्टी में सुधारवादी दल था, जो समाज-सुधारों पर जोर देता था, किन्तु कट्टरपंथी ब्राह्मण नेता समाज-सुधारों के विरुद्ध थे। जिज्ञासु लिखते हैं, “फिर भी आठ साल तक कांग्रेस के अधिवेशनों में एक ही पंडाल में समाज-सुधार सम्मेलन भी होता, परन्तु पूना के अधिवेशन में, जो 1895 में हुआ था, तिलक के नेतृत्व में कट्टरवादी ब्राह्मण नेताओं ने समाज-सुधर सम्मेलन नहीं होने दिया।” जिज्ञासु लिखते हैं कि यह कांग्रेस में समाज-सुधार का अंतिम सम्मेलन था। “इसके बाद कांग्रेस ने समाज-सुधार का नाम नहीं लिया– वर्णव्यवस्था, जातिभेद, अस्पृश्यता, विधवा-विवाह और अन्तरजातीय विवाह इत्यादि कांग्रेस क्षेत्र की सीमा से बाहर की चीजें हो गईं।” (वही, पृष्ठ 63-64)

इंग्लैंड की सरकार ने 1909 में कुछ राजनीतिक सुधार लागू किए, जो ‘मिन्टो मारले सुधार’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन सुधारों के अन्तर्गत मुसलमानों को पृथक प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचन का अधिकार मिल गया। इससे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की खाई और भी गहरी हो गई। जिज्ञासु लिखते हैं कि इस खाई को कम करने के लिए 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में संयुक्त निर्वाचन के लिए मुसलमानों के साथ, उन्हें कुछ विशेष अधिकार देकर, एक कागजी समझौता किया गया। किन्तु इस समझौते के साथ ही दलितों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ। जिज्ञासु आगे लिखते हैं कि “उस समय प्रथम महायुद्ध चल रहा था। इस महायुद्ध में भारतीय जनता ने अंग्रेजों का साथ दिया था। इसलिए 20 अगस्त 1917 को भारत-मंत्री लार्ड मांटेग्यु ने हाउस ऑफ कामंस में घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार भारत को ‘होम-रूल’ देने को तैयार है। इस घोषणा के बाद भारत के लोगों का मत जानने के लिए लार्ड मांटेग्यु ने भारत का दौरा किया। भारत में वह सभी दलों के नेताओं से मिले, जिनमें दलित जातियों के नेता भी शामिल थे। अछूत नेताओं ने उन्हें अपनी सामाजिक और आर्थिक दुर्दशा के बारे में बताया।” जिज्ञासु लिखते हैं कि “अछूत वर्ग में राजनीतिक चेतना का शायद यह पहला अवसर था। इसका फल यह हुआ कि 1892 में फौज में अछूतों की भरती, जो कानूनन बन्द हो गई थी, वह 1917 में खुल गई।” (वही, पृष्ठ 64-65)

जिज्ञासु के अनुसार लाहौर कांग्रेस के सभापति नारायणराव चन्दावरकर की अध्यक्षता में 11 नवम्बर, 1917 को ‘डिप्रेस्ड क्लासेज मिशन’ नाम से अछूतों की एक सभा हुई, जिसमें कांग्रेस से अछूतोद्धार की प्रार्थना की गई। जिज्ञासु लिखते हैं कि इसी समय दूसरी सभा बापूजी बागले की अध्यक्षता में हुई, जिसमें यह मांग की गई कि “यदि हिंदू लोग अछूतों को राजनीतिक अधिकार नहीं देते, तो उन्हें ‘होम-रूल’ मांगने का क्या अधिकार है?” 

यह वह समय था, जब डॉ. आंबेडकर सिडेनहम कालेज में प्रोफेसर थे। वे अभी राजनीति में प्रवेश करने की स्थिति में नहीं थे। किन्तु समाज-सुधार के कार्यों में वे सक्रिय थे; और एक अर्थशास्त्री के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे। इसलिए जब 1919 में भारत में लार्ड साउथबरो की अध्यक्षता में इंडियन फेंचाइज कमेटी आई, तो जिज्ञासु के अनुसार, बम्बई सरकार ने कमेटी के सामने दलित वर्गों का मसला पेश करने के लिए कर्मवीर शिंदे और डॉ. आंबेडकर को नियुक्त किया। जिज्ञासु के अनुसार डॉ. आंबेडकर ने कमेटी के सामने दलित वर्गों के लिए उनकी संख्या के अनुपात से प्रतिनिधित्व की मांग की और मतदान के लिए जो योग्यता निर्धारित हुई थी, उसको दलितों की गरीबी और अशिक्षा को देखकर पुनर्निर्धारित करने की प्रार्थना की। लेकिन जिज्ञासु लिखते हैं कि शिंन्दे महोदय ने इसके विरुद्ध दलित-प्रतिनिधियों का चुनाव कौंसिलों के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किए जाने की मांग की। डॉ. आंबेडकर ने शिंदे की मांग का न सिर्फ विरोध किया, बल्कि उसे “दलित वर्गों का अपमान” भी कहा। 

डॉ. आंबेडकर ने साउथबरो कमेटी के समक्ष अपना साक्ष्य 25 जनवरी, 1919 को लिखित में दिया था, जिसका परीक्षण 27 जनवरी, 1919 को हुआ था। उनका यह वक्तव्य ‘रिफार्म कमेटी : फेंचाइज’ की रिपोर्ट के दूसरे खंड में शामिल है। उन्होंने अपने वक्तव्य में हिंदू समुदाय को दो वर्गों में विभाजित किया– स्पृश्य और अस्पृश्य; और कहा कि अस्पृश्य वर्ग की आबादी 8 प्रतिशत है। उन्होंने अस्पृश्यों के लिए 9 प्रतिशत सीटों का प्रस्ताव रखा, जिनको पृथक निर्वाचन से भरे जाने की मांग की; साथ ही उन्होंने दलित वर्गों के लिए बड़े निर्वाचन क्षेत्रों की मां की, जैसा कि मुसलमानों के लिए स्वीकार किए गए हैं।

इसी समय शाहूजी महाराज से डॉ. आंबेडकर का परिचय हुआ। उन्होंने शाहूजी महाराज के समक्ष दलितों का दृष्टिकोण रखने के लिए एक अखबार निकालने का विचार रखा, जो महाराज को पसन्द आया और तुरन्त ही उन्होंने इस प्रयोजन के लिए आर्थिक सहायता देने की स्वीकृति दे दी। फलतः शाहूजी महाराज की सहायता से डॉ. आंबेडकर ने एक मराठी पाक्षिक अखबार ‘मूकनायक’ निकाला, जिसका पहला अंक 31 जनवरी 1920 को निकला। डॉ. आंबेडकर ने इसका संपादक पांडुरंग नन्दराम भटकर को बनाया था, जो महार जाति से थे। किन्तु इसके आरम्भिक 13 अंकों के संपादकीय लेख स्वयं डॉ. आंबेडकर ने लिखे थे।

जिज्ञासु ने लिखा है कि 21 मार्च 1920 को शाहूजी महाराज ने अपनी रियासत के मांड गांव में अछूतों की एक सभा कराई, जिसकी अध्यक्षता डॉ. आंबेडकर ने की थी। इस अवसर पर शाहूजी महाराज ने डॉ. आंबेडकर की योग्यता की प्रशंसा की और कहा कि उन्हें खुशी है कि दलितों को डॉ. आंबेडकर के रूप में उनके हितों का रक्षक नेता मिल गया है। उन्हें पूरी आशा है कि डॉ. आंबेडकर उनकी गुलामी की बेड़ियों को तोड़ देंगे। आगे जिज्ञासु लिखते हैं कि मई 1920 में डॉ. आंबेडकर ने ‘अखिल भारतीय बहिष्कृत परिषद’ की एक सभा में, जिसकी अध्यक्षता शाहूजी महाराज ने की थी, अछूत बंधुओं को अपना उद्धार स्वयं करने का परामर्श दिया था और सभा द्वारा यह प्रस्ताव पास भी कराया था। (वही, पृष्ठ 66-67)

इसके कुछ समय बाद डॉ. आंबेडकर, सिडेनहम कालेज की नौकरी से इस्तीफा देकर, 5 जुलाई 1920 को अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए, लंदन चले गए। वहां से वे एम.एससी., डी.एससी. और बार-एट-लॉ की डिग्रियॉं लेकर 14 अप्रैल, 1923 को बम्बई वापस आए। बम्बई आकर उन्होंने देखा कि अछूत अपने पैरों पर नहीं खड़े हैं, बल्कि अछूतोद्धार का काम सवर्ण हिंदू कर रहे हैं। जिज्ञासु लिखते हैं– “सवर्ण हिंदुओं द्वारा होने वाला अछूतोद्धार वैसा ही हो सकता था, जैसाकि बिल्लियों द्वारा चूहों, बाघों द्वारा बकरियों और बाजों द्वारा बटेरों की नस्ल का सुधार।” जिज्ञासु ने सवर्णों के समाज-सुधर का एक उदाहरण इस तरह दिया : “ईसाई विद्वानों ने पूना के मिशन स्कूल में एक जलसा करके व्याख्यान देने के लिए प्रार्थना समाज के विद्वानों को निमंत्रित किया और जस्टिस रानाडे, लोकमान्य तिलक आदि विद्वान गए। खूब जोशीले भाषण हुए। अन्त में चाय-पान हुआ। ईसाइयों के हाथ की चाय पीने से पूना के कट्टर ब्राह्मणों ने तिलक और रानाडे के विरुद्ध बावेला मचाया और श्री शंकराचार्य ने तिलक और रानाडे को प्रायश्चित करने का दण्ड दिया। तिलक ने काशी जाकर इस पाप का विधिपूर्वक प्रायश्चित किया। यह है चोटी के सवर्णों का समाज-सुधार।” जिज्ञासु लिखते हैं कि लगभग ऐसा ही हाल गांधीजी का था। “गांधीजी हिंदू र्ध्म में कोई मौलिक सुधर करने के पक्षपाती न थे। वह ब्राह्मण-प्रधान हिंदू समाज का ढांचा बदलना नहीं चाहते थे– वर्णव्यवस्था, अवतार, गीता, रामायण, विष्णु-भक्ति, रघुपति राघव राजाराम, सब कुछ कायम रखकर अस्पृश्यता-निवारण की बातें करते थे।” (वही, पृष्ठ 68-69)

अतः डॉ. आंबेडकर ने इन तथाकथित समाज-सुधरकों से विपरीत अपना काम शुरू किया। जिज्ञासु के अनुसार, उन्होंने अपने साथियों के सहयोग से ‘अन्त्यज संघ’ की स्थापना की और अपने जाति-भाइयों से चन्दा इकट्ठा किया और उस चन्दे से वजीफा देकर अछूत विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। संघ के चन्दे से उन्होंने वाचनालय और छात्रावास भी खोले। इस संघ की ऐसी ख्याति हुई कि उसकी शाखाएं सारे बम्बई प्रान्त और मद्रास तक में खुल गईं। जिज्ञासु कहते हैं कि “एक जगह ऐसा भी उल्लेख मिला कि बाबासाहेब ने 20 जुलाई 1924 को बम्बई में ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की थी, जिसमें छह उपाध्यक्ष थे, और अध्यक्ष स्वयं बाबासाहेब ही थे।” लेकिन यह सूचना सही नहीं है। जिज्ञासु के समय में जानकारी के उतने प्रामाणिक स्रोत उपलब्ध नहीं थे, जितने आज हैं। आज प्राप्त दस्तावेजों से पता चलता है कि डॉ. आंबेडकर द्वारा ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना 1920 में की गई थी, पर चूंकि उन्हें पढ़ाई के लिए लंदन जाना था, इसलिए वे पदाधिकारी नहीं बने थे। 1923 में जब वे वापस आए, तो डॉ. आंबेडकर ने उसका पुनर्गठन किया और उसके अध्यक्ष बने। इस सभा के माध्यम से शाहूजी महाराज के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल वायसराय से मिला था और उन्हें अछूतों की समस्याओं से अवगत कराया था।

क्रमश: जारी

(संपादन : नवल/अनिल)


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