बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष (चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु का साहित्य – ग्यारहवां भाग)

परिया समुदाय की स्त्रियों को संबोधित करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि “तुम अपने बच्चों को पढ़ने क्यों नहीं भेजतीं? देखो, तुम्हारे गांव का ब्राह्मण, चाहे कितना ही गरीब हो, अपने लड़के को पढ़ाता है। तुम भी ऐसा क्यों नहीं करतीं?” चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की किताब ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ का पुनर्पाठ कर रहे हैं कंवल भारती

भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार पुनर्पाठ कर रहे हैं। इसके तहत आज पढ़ें उनकी आठवीं कृति ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ का पुनर्पाठ का तीसरा भाग

‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की आठवीं कृति 

  • कंवल भारती

गतांक से आगे

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने आगे बम्बई प्रान्तीय अस्पृश्य परिषद के एक जलसे का उल्लेख किया है, जो अप्रैल 1925 में रत्नागिरी जिले के मालवण गांव में हुआ था। इस जलसे में डॉ. आंबेडकर ने जो विचारोत्तेजक भाषण दिया था, उसका एक अंश जिज्ञासु ने उद्धरित किया है। यह भाषण दीन-हीन दलित जनों के लिए आज भी आंख खोल देने वाला है। डॉ. आंबेडकर ने कहा था– 

“अरे तुम्हारी यह दुर्दशा! तुम्हारे करुणाजनक चेहरे और तुम्हारी यह दीन दशा देखकर मेरा कलेजा फटा जा रहा है। तुम अपने दीन-हीन जीवन से दुनिया की दुख-दरिद्रता को क्यों बढ़ाते हो? मां के पेट में ही तुम क्यों नहीं मर गए? अब भी मर जाओ, तो दुनिया पर तुम्हारा उपकार ही होगा। यदि तुम जीना चाहते हो, तो दीनता त्याग दो, जिन्दादिल होकर जिओ, जैसा इस देश के दूसरे मनुष्यों को प्राप्त है, वैसा ही अन्न, वैसे ही कपड़े और वैसे ही मकान तुम लोगों को भी चाहिए। यह तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है। इस अधिकार को प्राप्त करने के लिए तुम्हें ही आगे बढ़ना होगा और मजबूत हृदय से काम करना होगा।” (‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’, पृष्ठ 70-71)

क्या इतिहास में एक भी उदाहरण मिलता है, जब दीन-हीन दलित जनों की दुर्दशा देखकर किसी हिंदू संन्यासी या नेता का इस तरह कलेजा फटा हो, और जिसने आंबेडकर की तरह उन्हें संबोधित किया हो। जवाब है एक भी नहीं। वे तो उन्हें तिरस्कार और घृणा से देखकर बचकर चलते थे; और उनकी दुर्दशा को उनके पूर्वजन्म के कर्मों का फल मानते थे। 

जिज्ञासु ने मालाबार (अब केरल) के अछूतों की दुर्दशा का वर्णन करते हुए लिखा कि “वहॉं ब्राह्मणवाद चरम सीमा पर था। वहां के परिया जाति के लोग पक्के मकान नहीं बना सकते थे, दूध-घी नहीं खा सकते थे, गाय नहीं पाल सकते थे, घुटनों के नीचे कपड़ा नहीं पहन सकते थे, खाने-पीने की चीजें न छू सकते थे और ना उनकी दुकान रख सकते थे, सवर्णों के चलने वाली सड़कों पर नहीं चल सकते थे, सोने-चांदी के गहनें नहीं पहन सकते थे; खाना न मिलने से उन्हें मुरदा पशुओं का मांस खाना पड़ता था, यहां तक कि उनकी स्त्रियॉं भी आधी नंगी रहने के लिए विवश थीं, इत्यादि। जिज्ञासु लिखते हैं, बाबासाहेब ने निश्चय किया कि भारत के इस दक्षिणी छोर से ही, जहां इतनी अधिक दुर्गति है, अपने अछूत बंधुओं की सेवा का काम शुरू करेंगे। अछूतों की एक सभा हुई, जिसमें काफी तादाद में परिया जाति के लोग आए। बाबासाहेब ने अपने भाषण में मार्मिक शब्दों में मरे हुए जानवरों का मांस न खाने के लिए कहा। उन्होंने समझाया कि मुरदा मांस खाने से ही तुम्हारे स्वास्थ्य खराब हैं। इसके बाद बाबासाहेब ने परिया स्त्रियों की सभा बुलाई। इसमें कोई भी मर्द नहीं था। इस सभा में बाबासाहेब ने परिया स्त्रियों को जो शिक्षा दी, उसने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने कहा–

“तुम अपने बच्चों को पढ़ने क्यों नहीं भेजतीं? देखो, तुम्हारे गांव का ब्राह्मण, चाहे कितना ही गरीब हो, अपने लड़के को पढ़ाता है। पहले स्कूल में पढ़ाता है, फिर कालेज में और उसके बाद यूनिवर्सिटी में। तुम भी ऐसा क्यों नहीं करतीं? तुम्हारें भाई-बंदों में आज तक कोई डिप्टी कलेक्टर क्यों नहीं हुआ? तुम अपने बच्चों को क्यों नहीं स्कूल भेजतीं? क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारे बच्चे भी इसी तरह हमेशा मुरदा मांस खाते रहें और दूसरों की जूठन बटोरा करें? तुम ऐसा काम क्यों नहीं करतीं, जिससे तुम्हारे बच्चों की जूठन कोई दूसरा उठावे?”

इसके बाद बाबासाहेब ने उनके नंगे पहिनावे पर उन्हें समझाया–

“तुम अपनी जांघों को क्यों नहीं ढंकतीं और शरीर को क्यों नंगा रखती हो? यह तो बहुत बुरी बात है। इस तरह रहकर तुम अपने सतीत्व की रक्षा कैसे करोगी? दुनिया की किसी जाति की स्त्रियां तुम्हारी तरह नंगी नहीं रहतीं। यह बड़ी लज्जा की बात है। अपनी इज्जत बनाओ। अपना कपड़ा पहनने का तरीका बदलो। तुम्हें अपनी एड़ी से गर्दन तक अंग कपड़े से ढंक कर रखना चाहिए। तभी तुम इज्जतदार कहलाओगी।” 

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु व उनकी पुस्तक ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ का आवरण पृष्ठ

बाबासाहेब के इस भाषण ने परिया जाति की स्त्रियों पर जादू की तरह प्रभाव डाला। जिज्ञासु लिखते हैं कि दूसरे दिन बहुत सी परिया स्त्रियां बाबासाहेब से मिलने आईं, तो वे सब एड़ी से गर्दन तक कपड़े पहने हुए थीं। यह देखकर बाबासाहेब बहुत प्रसन्न हुए। जिज्ञासु बताते हैं कि लगभग पांच महीने तक बाबासाहेब ने लगातार मालाबार का दौरा किया। “इतने ही समय में [बाबासाहेब ने] मालाबार के अछूतों में नई जान डाल दी। उनका सारा ढंग बदल गया। वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे। उनमें नवजीवन आ गया। फलतः आज मालाबार के अछूतों में कई डिप्टी कलेक्टर हैं और कितने ही ग्रेजुएट हैं।” (वही, पृष्ठ 71-73)

जिज्ञासु ने आगे कोरेगांव की उस ऐतिहासिक लड़ाई का उल्लेख किया है, जो पेश्वाओं के खिलाफ महार सैनिकों ने लड़ी थी। 1927 में यहां बाबासाहेब ने एक विशाल अछूत सम्मेलन किया था। जिज्ञासु ने लिखा है कि कोरेगांव वह स्थान है, जहां दूसरे बाजीराव पेशवा की 25 हजार सेना को महार सेना के 500 सैनिकों ने हराकर पेशवा राज्य का विनाश कर दिया था। जिज्ञासु लिखते हैं कि महार सैनिकों का यह कोप पेशवा राज्य में महारों पर किए जाने वाले अमानुषिक अत्याचारों का प्रतिशोध था। इस सम्मेलन में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने कहा– “सैकड़ों महार 1818 के महायुद्ध में अंग्रेजी सरकार की ओर से वीरतापूर्वक लड़े, जिसका पुरस्कार अंग्रेजी सरकार की ओर से यह मिला कि महार जाति को गैर-लड़ाकू जाति करार देकर फौज में महारों की भर्ती बन्द कर दी गई। यह महार जाति का अपमान और ब्रिटिश की कृतघ्नता है। आप इसके विरुद्ध आंदोलन करें और सरकार को अपनी नीति बदलने को विवश करें।” (वही, पृष्ठ 73)

बाबासाहेब ने इस संबंध में अपने निबंध ‘दि अनटचेबिल्स एण्ड दि पैक्स ब्रिटानिका’ में विस्तार से बताया है कि दलितों ने न केवल अंग्रेजों को भारत को जीतने में मदद की, बल्कि ब्रिटिश राज को बनाए रखने में भी उनकी मदद की थी। किन्तु 1857 के गदर के बाद जब विक्टोरिया राज कायम हुआ, तो ब्राह्मणों के दबाव में सेना में दलितों की भर्ती पर यह कहकर रोक लगा दी कि वे गैर-लड़ाकू जाति हैं। इस संबंध में डॉ. आंबेडकर का, 18 जून 1941 को ‘दि टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित एक पत्र विचारणीय है। इस पत्र के अनुसार ‘महारों ने सेना से निर्वासन रोक के विरुद्ध विशाल आंदोलन चलाया, जिसका कोई परिणाम नहीं निकला। किन्तु 1914 के युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने अपनी आवश्यकता के अनुसार प्रतिबंध को हटा लिया और एक महार बटालियन का निर्माण किया। बाद में उसे भी बंद कर दिया गया। किन्तु डॉ. आंबेडकर ने हार नहीं मानी। अन्ततः 1941 में उनके प्रयासों से बम्बई गवर्नर की सिफारिश पर सरकार ने महार बटालियन को खड़ा करने का निश्चय किया।

18 नवंबर, 1951 को बंबई में एक कार्यक्रम के दौरान डॉ. आंबेडकर के साथ सीताराम केशव बोले। अधिवक्ता बोले बंबई लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य थे और भंडारी समुदाय से आते थे। 1923 में उन्होंने ही कौंसिल में सार्वजनिक परिसंपत्तियों पर अछूतों के अधिकार हेतु प्रस्ताव रखा था, जिसे स्वीकार कर लिया गया था।

जिज्ञासु ने आगे लिखा है कि “बाबासाहेब की भावना और उनके कामों को देखकर 1921 में बम्बई की सरकार ने उनको बम्बई कौंसिल का सदस्य नियुक्त किया।” (पृष्ठ 74) किन्तु यह सन् सही नहीं है। यह प्रूफ की गलती प्रतीत होती है। डॉ. आंबेडकर वास्तव में बम्बई कौंसिल में सदस्य फरवरी, 1927 में नियुक्त किए गए थे। 

इसके बाद जिज्ञासु लिखते हैं कि 1923 में बम्बई कौंसिल में महाराष्ट्र के समाज-सुधारक श्री बोले [सीताराम केशव] ने बम्बई कौंसिल में एक प्रस्ताव रखा– “सरकार द्वारा अथवा सार्वजनिक धन द्वारा संचालित संस्थाएं, जैसे कि कचेहरी, दफ्तर, विद्यालय, अस्पताल, पार्क, सड़क, धर्मशाला, वेटिंग रूम, रेल के डिब्बे, कुएं, तालाब, नदी, पनघट आदि स्थानों में प्रवेश करने तथा उनका उपयोग करने का अधिकार सरकार अछूत वर्ग को प्रदान करे।” यह प्रस्ताव 4 अगस्त, 1923 को पास हुआ, और 11 सितम्बर, 1923 को बम्बई सरकार ने इसे सभी विभागों को जारी करके उसको कार्य रूप में परिणत करने का आदेश दिया। 

जिज्ञासु लिखते हैं कि इस आदेश के जारी होने के बाद पहला अछूत सत्याग्रह वायकोम में हुआ। यह केरल का एक गांव है, जो त्रावणकोर रियासत के अधीन था। वायकोम की कई सड़कों पर अछूतों को चलने का अधिकार नहीं था। जिज्ञासु ने लिखा है– “प्रसिद्ध अब्राह्मण नेता श्री रामासामी नायकर के नेतृत्व में अछूतों ने उन सड़कों पर चलना आरम्भ किया। ब्राह्मणों ने उनको पीटा। अछूतों में जोश आ गया। हजारों अछूत चारों तरफ से आकर इकट्ठा हो गए। ब्राह्मणों ने बहुत कोशिश की कि रियासत की ओर से उनका दमन हो, लेकिन रियासत के अधिकारी दब गए, उन्होंने कुछ नहीं किया। राज सहायता न मिलने से ब्राह्मण भी दब गए और सत्याग्रह सफल हो गया, सड़कों पर आम तौर से अछूत चलने लगे।” (पृष्ठ 75)

सीधी कार्यवाही आंदोलन

इतिहास में डॉ. आंबेडकर के नाम दो विशाल और क्रान्तिकारी सत्याग्रह दर्ज हैं। एक महाड़ का जल-सत्याग्रह और दूसरा नासिक का धर्म-सत्याग्रह। महाड़ सत्याग्रह के द्वारा बम्बई सरकार के प्रस्ताव की भी असली परीक्षा हुई थी। इस सत्याग्रह से डॉ. आंबेडकर ने दलितों के आंदोलन में सीधी लड़ाई (डाइरेक्ट एक्शन मूवमेंट) का भी आरम्भ किया था। 

जिज्ञासु के अनुसार, बाबासाहेब के पास रोज ढेरों पत्र आते थे, जिनमें अछूतों पर होने वाले अत्याचारों का विवरण रहता था और उनसे सहायता करने की प्रार्थना की जाती थी। एक दिन उन्हें कोलाबा जिले के महाड़ से एक पत्र मिला, जिसमें बताया गया था कि वहां के चाबदार तालाब से उन्हें पानी नहीं लेने दिया जाता है। हिंदू उसे अपना तालाब कहते हैं, जबकि वह सार्वजनिक है। कुछ अछूत वहां पानी पीने गए, तो इस पर झगड़ा हुआ। “हिंदुओं ने उनको मारा, उनके घर जला दिए, उनकी स्त्रियों की बेइज्जती की, बलात्कार किया और उनकी स्त्रियों के सामने ही उनके पतियों, भाइयों और बेटों को बांधकर जूतों से पीटा।” (पृष्ठ 75-76)

जिज्ञासु लिखते हैं कि बाबासाहेब ने जब यह पत्र पढ़ा, तो उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने तुरन्त महाड़ जाकर सत्याग्रह करने का निश्चय किया। जिज्ञासु ने इस सत्याग्रह का वर्णन इस प्रकार किया है–

“बाबासाहेब महाड़ गए, और वहां 19 तथा 20 मार्च 1927 को बाबासाहेब की अध्यक्षता में कोलाबा जिले के प्रमुख अछूतों की बैठक हुई। इस सभा में सम्मिलित होने के लिए सारे महाराष्ट्र और गुजरात तक के अछूत आए थे। सभा के लिए गांव के देवता के नाम से ‘वीरेश्वर पंडाल’ बनाया गया। दोपहर के बाद से सभा की कार्यवाही शुरू हुई। बाबासाहेब ने अपने भाषण में सरकार द्वारा बन्द की गई फौज में अछूतों की भर्ती और हिंदुओं द्वारा अछूतों पर किए गए गैर-कानूनी अत्याचारों की कड़े शब्दों में आलोचना की, और अछूत भाइयों को सम्बोधित करते हुए मार्मिक शब्दों में कहा– “भाइयों, ऐसा प्रयत्न करो, जिससे तुम्हारे बच्चे तुमसे अच्छी हालत में जिन्दगी बिता सकें। अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते, तो फिर तुम मनुष्य कहलाने योग्य न रहोगे। फिर मनुष्य के माता-पिता और पशुओं के नर-मादा में क्या फर्क रहा?”

“रात की बैठक में तय हुआ कि चाबदार तालाब का पानी पीने के अपने जायज अधिकार को प्राप्त करने के लिए कल सत्याग्रह किया जाए। सवेरे पांच बजे हजारों अछूत बंधु इकट्ठे हुए। बाबासाहेब ने सबको शांत अहिंसात्मक भाव से सत्याग्रह करने का आदेश दिया। चार-चार आदमी खड़े करके लंबा जुलूस बनाया गया। बाबासाहेब आगे थे। उनके पीछे यह नियंत्रित सेना। हजारों वर्षों के दबोचे और मुर्दा बनाए गए अछूत मानवों में नई रूह फूंकने की यह एक नई ऐतिहासिक क्रांति का श्रीगणेश था। जुलूस शांति के साथ तालाब के किनारे पहुंचा। बाबासाहेब खड़े हो गए और फिर तालाब का पानी चुल्लू में भरकर पिया। उनके बाद उसी तरह बहुतों ने पानी पिया। इस तरह पानी पीकर जुलूस शांतिपूर्वक पंडाल की ओर लौटा।” (पृष्ठ 76)

यह भारत के अछूतों का पहला विद्रोह था। वास्तव में इस सत्याग्रह से ही भारत के दलित आंदोलन के इतिहास में अनुनय-विनय और अपीलों का युग समाप्त हुआ था, जो अनसुनी कर दी जाती थीं; और विद्रोह का नया युग आरम्भ हुआ था। यह अपने अधिकारोें के लिए संघर्ष करने का दौर था, जिसने दलित जातियों को संगठित करने की राह दिखाई थी। इस सत्याग्रह से महाड़ के सवर्ण हिंदू बहुत बिगड़े। जिज्ञासु के अनुसार यह झूठी हवा फैला दी कि अछूतों ने आज चाबदार तालाब भ्रष्ट किया और कल वीरेश्वर मन्दिर भ्रष्ट करेंगे। इस अफवाह से हजारों की संख्या में क्रोधित सवर्ण पंडाल की ओर दौड़े और जहां जो अछूत मिला, उसे पीटने लगे। जिज्ञासु लिखते हैं– “उस समय पंडाल में अछूत लोग भोजन कर रहे थे। उन पर लाठियों और ईंटों की वर्षा होने लगी। दंगाई लोगों ने पंडाल नष्ट कर दिया, सारा भोजन और अन्न मिट्टी में मिला दिया। सैकड़ों अछूत जख्मी हो गए, स्थान खून से लाल हो गया। निहत्थे अछूतों ने भागकर मुसलमानों के घरों में शरण ली। बहुत से पहले ही अपने घर चले गए थे। दूर-दूर से आए अछूत पंडाल में थे। दंगाई हिंदुओं का एक दल उस बंगले की ओर दौड़ा, जहां बाबासाहेब अपने साथियों के साथ बातें कर रहे थे। दंगाइयों ने उन पर भी आक्रमण किया। कई लोग जख्मी हुए। बाबासाहेब के भी चोट आई, बापूसाहेब राजभोज तो इतने जख्मी हुए कि 15 दिन अस्पताल में रहे। कुछ महार सैनिकों को जोश आ गया। लेकिन बाबासाहेब ने उन्हें यह कहकर शांत किया कि सत्याग्रह में बदला नहीं लिया जाता।” (पृष्ठ 77) 

यह हिंदुओं के साथ दलितों का सीधा मुकाबला था, जिसने सम्पूर्ण हिंदू समाज को ही नहीं, बल्कि अंग्रेजों से स्वराज की मांगने करने वाले गांधी और कांग्रेस को उद्वेलित कर दिया था। जिज्ञासु के अनुसार, “बाबासाहेब के बम्बई पहुंचने के पहले सारे महाराष्ट्र में यह बात फैल गई। उदार अखबारों में बाबासाहेब के शांत सत्याग्रह की प्रशंसा हुई और हिंदू दंगाइयों की निन्दा। पुलिस ने नौ दंगाइयों को गिरफ्तार किया, जिन्हें चार-चार महीने की सजा हुई।” 

किन्तु हिंदुओं पर कोई असर नहीं हुआ। प्रत्युत, “पाखंडी ब्राह्मणों ने अछूतों के छूने से भ्रष्ट चाबदार तालाब की शुद्धि की। तालाब का 108 घड़ा जल निकालकर बाहर फेंका और पंचगव्य से भरे कुछ घड़े मंत्र पढ़ते हुए तालाब में उड़ेलें। इस तरह शुद्धि करके तालाब के पानी का फिर प्रयोग करने लगे।” (पृष्ठ 77)

लेकिन अभी यह आंदोलन समाप्त नहीं हुआ था। नौ महीने बाद यह पुनः आरम्भ हुआ और उसने एक महान इतिहास की रचना की। चाबदार तालाब के शुद्धिकरण ने बाबासाहेब और महाड़ के अछूतों को नाराज कर दिया। इसलिए उन्होंने महाड़ में एक और सत्याग्रह करने के लिए 25 और 26 दिसम्बर 1927 की तारीखें तय कीं। इस सत्याग्रह के लिए हजारों अछूतों ने, बाबासाहेब के आह्वान पर, अपने नाम लिखवाए थे। बाबासाहेब 24 दिसम्बर को दो सौ साथियों के साथ महाड़ पहुंचे, तो वहां 15 हजार अछूत सत्याग्रह के लिए एकत्रित थे। शाम को सभा हुई। जिज्ञासु लिखते हैं कि उसी समय कोलाबा जिले के पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट सभा में आए और उन्होंने बाबासाहेब को बताया कि 12 हिंदुओं ने चाबदार तालाब पर अपना दावा पेश करके अछूत-पक्ष के विरुद्ध अदालत से, अन्तिम फैसले तक, स्टे प्राप्त कर लिया है, इसलिए उन्होंने अदालत के फैसले तक उन्हें सत्याग्रह को स्थगित करने की सलाह दी। बाबासाहेब कानून का आदर करते थे, सो उन्होंने अपने साथियों से विचार-विमर्श कर सत्याग्रह को स्थगित करना ही ठीक समझा। 

किन्तु दूसरा दिन, अर्थात 25 दिसम्बर 1927 का दिन, भारत के दलित आंदोलन के इतिहास में नया सवेरा लेकर आया। उस दिन सम्मेलन में दो प्रस्ताव पास किए गए– एक, मनुस्मृति को काला कानून घोषित कर, उसे जलाने का निर्णय किया गया, और दूसरा, मनुष्य के रूप में एक हिंदू के अधिकारों का घोषणा-पत्र जारी करना। जिज्ञासु ने हिंदू के घोषणा-पत्र का उल्लेख नहीं किया है, पर मनुस्मृति-दहन के बारे में उन्होंने लिखा है– “मनुस्मृति की होली तो उस कानूनी किताब को ही फॅूंक देना था, जिसकी बिना पर शूद्र और अछूत की सृष्टि हुई। यह ब्राह्मणी व्यवस्था के मूल पर कुठाराघात था।” (पृष्ठ 78-79) बाबासाहेब ने इसे फ्रांस की राज्य-क्रान्ति की संज्ञा दी थी।

“इसके बाद बाबासाहेब ने”, अध्याय में जिज्ञासु लिखते हैं, “कोर्ट में चाबदार तालाब पर अछूतों के अधिकार का दावा दायर किया। कई साल मुकदमा चलता रहा। अन्त में (दस साल बाद) 10 मार्च, 1937 को बम्बई हाईकोर्ट ने अछूतों के पक्ष में फैसला कर दिया, और चाबदार तालाब पर अछूतों का भी अधिकार हो गया।” (वही)

क्रमश: जारी

(संपादन : नवल/अनिल)


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