बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष (चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु का साहित्य – बारहवां भाग)

जहां कांग्रेस के नेताओं ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया था, वहीं हिंदू महासभा और आर्य समाज के नेताओं ने कुछ अछूतों को साफ-सुथरे कपड़े पहनाकर उनके मुंह से साइमन के समक्ष यह कहलवा दिया कि उन्हें हिंदुओं से कोई परेशानी नहीं है। किन्तु डॉ. आंबेडकर ने इस झूठ का पर्दाफाश किया और कमीशन को अछूतों की वास्तविक संख्या और स्थिति से अवगत कराया। पढ‍़ें, जिज्ञासु की पुस्तक ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ का कंवल भारती द्वारा पुनर्पाठ का चाैथा भाग

भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार पुनर्पाठ कर रहे हैं। इसके तहत आज पढ़ें उनकी आठवीं कृति ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ का पुनर्पाठ का चौथा भाग

‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ : चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की आठवीं कृति 

  • कंवल भारती

गतांक से आगे

दूसरा सत्याग्रह बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने 1930 में नासिक के कालाराम मंदिर में प्रवेश के लिए किया। जिज्ञासु ने लिखा है कि यह सत्याग्रह हिंदू मन्दिर में अछूतों के प्रवेश के लिए किया गया था, और इसका उद्देश्य यह जानना था कि अछूत समाज हिंदू समाज का अंग है या नहीं? हुआ यह था कि महाड़ सत्याग्रह के बाद कांग्रेस के हिंदू नेताओं ने अछूत-हिंदू भाई-भाई कहना शुरू कर दिया था। इसमें उनका राजनीतिक निहितार्थ भी था, और वह यह कि वे अछूतों को हिंदू दिखाकर ब्रिटिश सरकार को हिंदुओं की विशाल संख्या दिखाना चाहते थे। अगर वे ऐसा न करते, तो वे मुसलमानों के समानान्तर अल्पसंख्यक हो जाते। इसलिए बाबासाहेब ने नासिक में मंदिर-प्रवेश का सत्याग्रह करके हिंदुओं के झूठ को बेपर्दा किया था। 

2 मार्च 1930 को गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ करने की सूचना ब्रिटिश सरकार को दी थी। डॉ. आंबेडकर ने भी धर्म-सत्याग्रह के लिए इसी दिन को चुना। जिज्ञासु ने लिखा है– “मानो यह हिंदुओं को चुनौती थी कि क्या तुमने खुद करोड़ों-करोड़ों मानवों को आजादी दे दी है, जो अपनी आजादी के लिए इतने उतावले हो रहे हैं?” (बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष, पृष्ठ 80)

धर्म-सत्याग्रह करने के पीछे मामला क्या था, इसका बहुत ही संक्षिप्त वर्णन जिज्ञासु ने इस प्रकार किया है–

“नासिक में एक मन्दिर है, जिसमें रामचन्द्र की काली मूर्ति है। इसी का नाम कालाराम है। चैत (अप्रैल) महीने की रामनवमी को 15 दिन का लक्खी मेला होता है। उस दिन रथ-यात्रा होती है, यानी कालेराम रथ पर बैठकर गोदावरी स्नान को जाते हैं और उस रथ को हजारों हिंदू खींचते, गोदावरी नहाते और मन्दिर में कालेराम का दर्शन करते हैं। अछूतों को कालेराम के मन्दिर में जाने, रथ को छूने और गोदावरी के मुख्य घाट में नहाने की मुमानियत थी। लेकिन अछूतों की प्रबल इच्छा थी कि वे भी रामजी का रथ चलावें, गोदावरी में स्नान करें और मन्दिर में कालेराम के दर्शन करें। अछूत लोग इसके लिए 5 वर्षों से, यानी 1926 से प्रयत्न कर रहे थे, किन्तु सफल न होते थे। महाड़-सत्याग्रह का समाचार पाकर उन्होंने अब की बार बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर से प्रार्थना की और बाबासाहेब ने नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया।” (वही, पृष्ठ 81-82)

जिज्ञासु के अनुसार बाबासाहेब 2 मार्च, 1930 को नासिक पहुंचे। उनकी अध्यक्षता में एक विशाल सभा हुई, जिसमें सर्वसम्मति से निश्चय हुआ कि सत्याग्रह किया जाए, उसमें अछूत हर प्रकार का कष्ट सहने के लिए तैयार हैं। यह सत्याग्रह से भी अधिक चला, पर कालाराम मन्दिर के दरवाजे अछूतों के लिए नहीं खुले। दूसरे दिन जैसे ही डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में 500 अछूत स्त्री-पुरुषों का जत्था, जुलूस के रूप में, समता सैनिक दल के बैंड-बाजे के साथ मन्दिर की ओर बढ़ा, पुजारियों द्वारा मन्दिर के दरवाजे बन्द कर दिए गए और पुलिस का पहरा बैठा दिया गया। नासिक के मजिस्ट्रेट ने दफा 144 लगा दी। जिज्ञासु लिखते हैं कि तब 125 सत्याग्रही पुरुष और 25 स्त्रियां स्वर-ताल से भजन गाते हुए, मन्दिर के सामने ही धरने पर बैठ गए। “इस तरह रोज सत्याग्रह होता रहा। दरवाजे बराबर बन्द रहे। यह सत्याग्रह लगभग एक महीने चलता रहा और रामनवमी आ गई।” रामनवमी को रथयात्रा होती है। सत्याग्रही अछूतों ने मांग की कि वे भी रथ खींचेंगे। “सिटी मजिस्ट्रेट ने समझौता कराया कि रथ के एक ओर हिंदू युवक और दूसरी ओर अछूत युवक दोनों मिलकर रथ खींचेंगे।” 

इस रथयात्रा का क्या परिणाम निकला? इसका वर्णन जिज्ञासु ने इस प्रकार किया है–

“हिंदू मुस्टंडों ने समझौता भंग करके अछूत युवकों पर, जो रथ के पास रथ को खींचने के लिए खड़े थे, एकाएक ‘मारो-मारो’ कहते हुए हमला कर दिया और दूसरे हिंदू लोग रथ को खींचते हुए ले भागे। रथ ले जाकर एक तंग रास्ते में खड़ा किया गया और रथ के आगे-पीछे सशस्त्र पुलिस खड़ी हो गई, ताकि कोई अछूत रथ के निकट न आने पावे। परन्तु कुछ अछूत युवक, जो अपनी शपथ पूरी करने के लिए पागल थे, सशस्त्रा पुलिस के बीच से, नहीं मालूम किस तरह, निकलकर रथ के पास पहुॅंच गए। इन युवकों पर सवर्ण हिंदुओं ने इतनी क्रूरता से हमला किया कि बेचारों को लहूलुहान कर दिया। इसी समय बाबासाहेब भी अपने साथियों के साथ वहां पहुंचे, तो उन पर भी पत्थरों की वर्षा होने लगी, जिससे उन्हें काफी चोटें लगीं। चूॅंकि बाबासाहेब अछूतों को प्राणों से अधिक प्यारे थे, इसलिए सैकड़ों अछूत-बंधु तुरन्त उन्हें घेरकर खड़े हो गए। इस प्रकार उनकी रक्षा हुई।” (वही, पृष्ठ 84-85) 

जिज्ञासु ने लिखा कि “अछूत न कालाराम के दर्शन कर सके, न उनका रथ खींच सके और न गोदावरी में स्नान कर सके (क्योंकि वहॉं भी पुलिस और हिंदुओं ने उनकी बर्बर पिटाई की, जिससे हजारों अछूत घायल हुए)। बाद में, कालाराम की रथयात्रा ही बन्द कर दी गई।” जिज्ञासु ने लिखा है कि गांधी ने अछूतों के इस सत्याग्रह का समर्थन नहीं किया था। उनका कहना था कि सत्याग्रह विदेशियों के विरुद्ध किया जाना चाहिए, न कि अपने ही लोगों के विरुद्ध। किन्तु गांधी अच्छी तरह जानते थे कि मूलनिवासी अछूतों का सत्याग्रह बाहर से आई हमलावर आर्य जाति के लोगों ही विरुद्ध था। किन्तु बाद में, जैसाकि जिज्ञासु का भी मत है कि गांधी और हिंदुओं ने अछूतों के लिए मन्दिर-प्रवेश आंदोलन चलाया, जिसके पीछे यह डर था कि कहीं अछूत मुसलमान और ईसाई न बन जाएं, पर इसे हिंदुओं का व्यापक समर्थन नहीं मिला।

बाबासाहेब के राजनीतिक संघर्ष का पहला दौर

जिज्ञासु लिखते हैं– “नासिक-सत्याग्रह से पूर्व कई बातें और भी हुईं, जिनमें एक साइमन कमीशन का भारत में आना था। सन् 1919 की मांटेगु चेम्सफोर्ड योजना में सुधार और संवर्द्धन करने के लिए इंगलैंड की सरकार ने साइमन कमीशन भेजा। यह कमीशन 3 फरवरी 1928 को बम्बई में उतरा। कांग्रेस की तरफ से कमीशन का बायकाट किया गया।” (वही, पृष्ठ 80)

साइमन कमीशन क्यों आया था और कांग्रेस ने उसका बहिष्कार क्यों किया था? असल में 1919 की मांटेगु-चेम्सपफोर्ड योजना में लागू सुधारों की प्रगति देखने के लिए इंगलैंड की सरकार ने साइमन कमीशन की नियुक्ति की थी। जिज्ञासु के अनुसार यह कमीशन 3 फरवरी, 1928 को बम्बई में उतरा। कॉंग्रेस की तरफ से कमीशन का बहिष्कार किया गया। लेकिन भारत सरकार ने केन्द्रीय असेम्बली द्वारा निर्वाचित सदस्यों की एक कमेटी बनाई, जिसके सहयोग से कमीशन ने अपना काम पूरा किया। इस कमेटी के सदस्यों में एक सदस्य डॉ. आंबेडकर भी थे। जहां कांग्रेस के नेताओं ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया था, वहीं हिंदू महासभा और आर्य समाज के नेताओं ने कुछ अछूतों को साफ-सुथरे कपड़े पहनाकर उनके मुंह से साइमन के समक्ष यह कहलवा दिया कि उन्हें हिंदुओं से कोई परेशानी नहीं है। किन्तु डॉ. आंबेडकर ने इस झूठ का पर्दाफाश किया और कमीशन को अछूतों की वास्तविक संख्या और स्थिति से अवगत कराया। इसके बावजूद साइमन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में, जो मई 1930 में प्रकाशित हुई थी, अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लिए पृथक निर्वाचन की सिफारिश की, परन्तु दलित वर्गों के लिए संयुक्त निर्वाचन और सुरक्षित सीटों की सिफारिश की। किन्तु दलित वर्गों को कमीशन की यह सिफारिश स्वीकार नहीं थी। जिज्ञासु के अनुसार इसके विरोध में 8 अगस्त, 1930 को नागपुर में बाबासाहेब की अध्यक्षता में अखिल भारतीय दलित वर्ग कांग्रेस हुई। 

चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु व उनकी पुस्तक ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ का आवरण पृष्ठ

जिज्ञासु ने लिखा है कि अंग्रेज भारतीयों को स्वशासन देना चाहते थे। पर वे ऐसा शासन चाहते थे, जिसमें सभी के अधिकार सुरक्षित हों और किसी के साथ अन्याय न हो। इसके लिए उन्होंने भारत का भावी संविधान तय करने के लिए लन्दन में एक गोलमेज सभा करने का आयोजन किया, जिसमें देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को अपने प्रतिनिधि भेजने का निमंत्रण दिया गया। जिज्ञासु के अनुसार, 12 नवम्बर, 1930 को लन्दन में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमजे मैकडानल्ड की अध्यक्षता में गोलमेज सभा हुई। इसमें शामिल होने के लिए कांग्रेस को छोड़कर सभी दलों के 89 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें 53 ब्रिटिश भारत के, 20 देशी रियासतों के और 16 ब्रिटिश दलों के प्रतिनिधि थे। जिज्ञासु के अनुसार ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों में सर सप्रू, जयकर, रामास्वामी अय्यर, मिस्टर जिन्ना और डॉ. मुंजे आदि प्रमुख नेता थे और दलित वर्गों की ओर से डॉ. आंबेडकर और श्रीनिवासन थे। जिज्ञासु ने लिखा है कि “इन सब प्रतिनिधियों में उम्र के लिहाज से बाबासाहेब सबसे छोटे थे। उन्हें देखकर लोग हंसते थे कि यह नौजवान भला क्या बोलेगा? लेकिन बाबासाहेब ने दलितों की ओर से जो भाषण दिया, उसे सुनकर सब दंग रह गए।” (वही, पृष्ठ 88-89)

बाबासाहेब के उस भाषण का आज पूरा मूल पाठ उपलब्ध है, जिसमें बाबासाहेब ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष प्रश्नों की लड़ी लगा दी थी। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की इतनी तीखी आलोचना की कि वहां उपस्थित भारतीय प्रतिनिधि भी उनके साहस को सराहे बिना नहीं रह सके। जिज्ञासु ने उनके भाषण के कुछ अंश अपने पाठकों को उपलब्ध कराए हैं, उसके अनुसार, उन्होंने कहा था– 

“मैं जिन अछूतों के प्रतिनिधि की हैसियत से यहां खड़ा हूं, भारत में उनकी संख्या वहां की जनसंख्या का पांचवां भाग है, अर्थात इंगलैंड या फ्रांस की जनसंख्या के बराबर। परन्तु मेरे उन अछूत भाइयों की स्थिति गुलामों से भी बदतर है। [पश्चिम के देशों में] गुलामों के मालिक उनको छूते थे, परन्तु भारत में उन्हें छूना भी पाप समझा जाता है। ब्रिटिश राज्य से पहले हम अस्पृश्यता के कारण घृणित अवस्था में थे, क्या ब्रिटिश सरकार ने अपने सैकड़ों वर्ष के शासन में हमारी हालत सुधारने के लिए कुछ किया? पहले हम गांव के कुएं से पानी नहीं भर सकते थे, क्या ब्रिटिश सरकार ने हमें यह अधिकार दिलाया? पहले हम मन्दिर में प्रवेश नहीं कर सकते थे, क्या अब हम प्रवेश कर सकते हैं? पहले हमें पुलिस दल में शामिल नहीं किया जाता था, क्या ब्रिटिश सरकार हमें पुलिस दल में शामिल करती है? पहले हम सैनिक सेवा नहीं कर सकते थे, क्या आज हमारे लिए सेना के दरवाजे खुले हैं? इन प्रश्नों में से किसी का भी उत्तर ‘हॉं’ में नहीं मिल सकता। डेढ़ सौ वर्षों के ब्रिटिश-राज्य में हमारी हालत जैसी थी, वैसी ही रही है। ऐसी सरकार से हमारा क्या भला होगा?”

बाबासाहेब ने आगे कहा–

“आज अछूत भी मौजूदा राज्य के स्थान पर जनता की भलाई के लिए जनता द्वारा संचालित जनता का राज्य चाहते हैं। मजदूरों और किसानों का शोषण करने वाले पूंजीपतियों और जमींदारों की रक्षक सरकार हम नहीं चाहते। हमारे दुख हम स्वयं दूर करेंगे और इसके लिए हमारे हाथों में राजनीतिक सत्ता होनी चाहिए। मौजूदा हालात में कोई ऐसा विधान व्यवहार्य नहीं हो सकता, जो देश के बहुमत को स्वीकार न हो। वह जमाना बीत गया जब आप फैसला करते थे और हिन्दुस्तान मानता था। वह जमाना अब कभी नहीं लौटेगा।” (वही, पृष्ठ 89-90) 

जिज्ञासु के अनुसार बाबासाहेब के इस भाषण का ब्रिटिश राजनीतिज्ञों और वहॉं के अखबारों पर गहरा प्रभाव पड़ा। चूंकि इस सभा में कांग्रेस के प्रतिनिधि शामिल नहीं हुए थे, इसलिए दूसरी गोलमेज सभा की आवश्यकता हुई। दूसरी गोलमेज सभा की तारीख 7 सितम्बर, 1931 रखी गई। जिज्ञासु के अनुसार इस बीच हिंदू नेताओं द्वारा बाबासाहेब को देशद्रोही और गांधी को अछूतों का एकमात्र नेता बताने के लिए देश-भर में प्रचार किया गया। जिज्ञासु नें लिखा है कि सेठों की थैलियां खुल गईं थीं और बहुत से अछूत नेता तोड़ लिए गए थे। “किन्तु अछूतों में जागृति हो गई थी, इसलिए हिंदू प्रोपेगैंडा का उन्होंने देशव्यापी विरोध किया और बाबासाहेब का समर्थन।”

दूसरी गोलमेज सभा में भाग लेने के लिए डॉ. आंबेडकर 15 अगस्त, 1931 को लन्दन के लिए रवाना हुए; जबकि कांग्रेस की ओर से गांधी, मालवीय और सरोजनी नायडू 26 अगस्त को रवाना हुए। बाबासाहेब जानते थे कि गांधी गोलमेज सभा में अछूतों के अधिकारों का विरोध और स्वयं को अछूतों का प्रतिनिधि घोषित करने वाले हैं। इसलिए जिज्ञासु के अनुसार “बाबासाहेब ने भी गांधी और कांंग्रेस को मुंहतोड़ उत्तर देने के लिए पहले से ही अपनी ‘गांधी और कांग्रेस ने अछूतों के लिए क्या किया?’ पुस्तक तैयार कर ली थी।” जिज्ञासु यह भी लिखते हैं कि इस पुस्तक के लिए लखनऊ से भी अखबारों की कटिंग्स भेजी गई थीं, जिनमें इस तरह के कार्टून भी थे कि कौंसिल की मेज पर मेम्बरों के बीच झाड़ू-पंजा लिए एक अछूत भी बैठने का प्रयत्न कर रहा था।” (वही, पृष्ठ 96)

यहां उल्लेखनीय है कि दूसरी गोलमेज सभा के लिए बाबासाहेब द्वारा जिस ‘गांधी और कांग्रेस ने अछूतों के लिए क्या किया’ पुस्तक लिखने का जिक्र जिज्ञासु ने किया है, उसका पहला प्रकाशन जून 1945 में ठाकर एण्ड कंपनी ने किया था। इससे यह बात संदिग्ध साबित हो जाती है कि यह पुस्तक दूसरी गोलमेज सभा के लिए तैयार हो गई थी। बाबासाहेब ने इस पुस्तक के ‘प्रीफेस’ में लिखा है कि मूल कार्य 75 पृष्ठों का था, जिसका पुनरावलोकन और परिवर्द्धन करने पर वह बड़ी पुस्तक बन गई। उन्होंने यह भी लिखा है कि उन्होंने 1937 में इस विषय को अध्ययन के लिए चुना था। इससे यह बात तो स्पष्ट है कि यह पुस्तक गोलमेज सभा के लिए नहीं लिखी गई थी, परन्तु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि गोलमेज सभा में बाबासाहेब के पास प्रतिनिधियों और विदेशियों को गांधी तथा कांग्रेस के दावों की पोल खोलने वाली पर्याप्त दस्तावेज और तथ्य मौजूद थे।

जिज्ञासु लिखते हैं कि 7 सितम्बर को दूसरी गोलमेज सभा की कार्रवाही आरम्भ होने पर पहली सभा की रिपोर्ट पढ़ी गई और पास की गई। इसमें अछूतों के स्वतंत्र अधिकारों का समर्थन था। यह सुनते ही गांधी परेशान हो गए। उस वक्त तो नहीं, पर 15 सितम्बर की फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी की बैठक में उन्होंने अपने मन्तव्यों की भूमिका बांधते हुए कहा– “प्रधनमंत्री और मित्रों! कांग्रेस ने आरम्भ से ही अछूतोद्धार का काम अपने हाथ में ले रखा है और सन् 1920 से तो उसने अछूतपन मिटाने का एक राजनीतिक कार्यक्रम बना लिया है। इसलिए यह हमारा घरेलू मसला है, जिसे सुधारने में हम लगे हैं।” (वही, पृष्ठ 97) 

किन्तु 28 सितम्बर, 1931 की अल्पसंख्यक कमेटी की बैठक में बाबासाहेब ने गांधी के दावे का खंडन किया और कांग्रेसी अछूतोद्धार की सारी पोल खोल दी। उन्होंने गांधी के इस दावे का भी खंडन किया कि वे अछूतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अन्त में साम्प्रदायिक समस्या के निर्णय का अधिकार ब्रिटिश प्रधनमंत्री को सौंपकर, दूसरी गोलतेज सभा 1 दिसम्बर 1931 को भंग हो गई और प्रतिनिधि भारत लौटे।

20 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री के साम्प्रदायिक निर्णय (कम्यूनल अवार्ड) की घोषणा हुई। जिज्ञासु ने लिखा– “इसमें दलितों के पृथक निर्वाचन को स्वीकार कर लिया गया था तथा आम चुनाव में भी वोट देने और उम्मीदवार होने का अधिकार उनको दे दिया गया था। यह बाबासाहेब की जीत थी और गांधीजी की हार। गांधीजी उस समय यरवदा सेन्ट्रल जेल में थे। इस खबर से वह इतने खिन्न हुए कि उन्होंने वहीं से ब्रिटिश प्रधनमंत्री को सूचित किया कि “मैं 20 सितम्बर से अछूतों के पृथक प्रतिनिधित्व के विरुद्ध आमरण अनशन आरम्भ करूंगा।” (वही, पृष्ठ 108)

ब्रिटिश प्रधनमंत्री ने गांधी को सूचित किया कि यह निर्णय साम्प्रदायिक हितों का ख्याल रखकर किया गया है। इसलिए यह निर्णय उस समय तक नहीं बदला जा सकता, जब तक कि सम्प्रदाय आपस में मिलकर कोई समझौता नहीं करते हैं। डॉ. आंबेडकर ने गांधी के विरोध और अनशन को दलित वर्गों के हितों के विरुद्ध माना और कहा कि दलित वर्ग भी अपने हितों की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा देगा। उन्होंने गांधी को समझाने की कोशिश की कि पृथक प्रतिनिधित्व का अर्थ यह नहीं है कि दलित वर्ग हिंदू समाज से अलग हो जायेंगे। (वही, पृष्ठ 109)

लेकिन गांधी ने अपनी जिद नहीं छोड़ी और 20 सितम्बर, 1932 को अपना तयशुदा अनशन आरम्भ कर दिया। सारे देश में, खास तौर से हिंदू समाज में चिन्ता की लहर दौड़ गई। यह अनशन एक समझौते के साथ खत्म हुआ, जो भारतीय राजनीति के इतिहास में ‘पूना पैक्ट’ के नाम से जाना जाता है। इस पैक्ट पर 24 सितम्बर को हस्ताक्षर हुए थे। इसका वर्णन करते हुए जिज्ञासु ने लिखा है–

“गांधी जी के अनशन से देश में एक तूफान सा आ गया था। सारे देश में सभाएं हो रही थीं और अछूतों को फुसलाने के लिए सहभोज हो रहे थे। बड़े-बड़े वकील झाड़ू-फड़ुही लिए सड़कें और नालियां साफ कर रहे थे। अछूतों को देव-दर्शन कराए जा रहे थे। एक ओर हिंदू लोग अछूतों के साथ सहभोज करते थे, तो दूसरी ओर गोबर आदि पंचगव्य पीकर अपनी शुद्धि भी करते थे। और बम्बई का अजीब दृश्य था। बड़े-बड़े हिंदू नेताओं की सैकड़ों सुन्दर रमणियॉं बाबासाहेब को घेरे हुए महात्मा गांधी के प्राणों का दान मांग रही थीं। इनमें मिसेज कमला नेहरू, मिसेज कैप्टन और मिसेज हंसा मेहता तो बाबासाहेब के पीछे पड़ गईं थीं। ‘तीन मीनारें’ में, जहां बाबासाहेब रहते थे, हर वक्त घुसी रहती थीं और बाबासाहेब जब बाहर जाते, तब भी उनका साथ न छोड़तीं। अपनी बड़ी-बड़ी तृष्णापूर्ण आंखों और याचनापूर्ण मुखाकृृति से महात्मा गांधी के प्राणों की भीख मांगती थीं। दूसरी ओर, सर सप्रू, जयकर, टैगोर, मालवीय, बिड़ला, राजगोपालाचारी और राजेन्द्र प्रसाद जैसे प्रभावशाली हिंदू नेता बड़े-बड़े आश्वासन और ऊॅच-नीच दिखाकर दबाव डाल रहे थे। ऐसी विकट स्थिति में इस मनोवैज्ञानिक मायाजाल से बेचारे असहाय अछूत नेताओं के हृदय का क्या हाल हुआ होगा? विवश हो उन्होंने 24 सितम्बर को समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए।” (वही, पृष्ठ 115-116)

जिज्ञासु ने लिखा कि पूना-पैक्ट के दूसरे दिन, यानी 25 सितम्बर को बम्बई में मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में हिंदू नेताओं की सभा हुई, जिसमें यह प्रस्ताव पास किया गया कि आज से हिंदू जाति में किसी को जन्म से अछूत न समझा जायगा और जिन्हें अब तक अछूत समझा जाता रहा है, उन्हें अन्य हिंदुओं की भांति ही कुओं, तालाबों, स्कूलों, सड़कों तथा अन्य सार्वजनिक संस्थाओं का उपयोग करने का अधिकार रहेगा। जिज्ञासु के अनुसार उसके बाद ‘अस्पृश्यता निवारक संघ’ की स्थापना हुई, जिसका नाम बाद में ‘हरिजन सेवक संघ’ हो गया। जिज्ञासु के अनुसार, इस संघ के अध्यक्ष घनश्यामदास बिड़ला और मंत्री अमृतलाल ठक्कर बनाए गए थे। “इसके केन्द्रीय बोर्ड में तीन सदस्य अछूत वर्ग के थे– डॉ. आंबेडकर, रायबहादुर श्रीनिवासन और रायबहादुर एम. सी. राजा।” (वही, पृष्ठ 118)

लेकिन बाद में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर हरिजन सेवक संघ से अलग हो गए। इसका कारण बताते हुए जिज्ञासु ने लिखा है कि डॉ. आंबेडकर ने 14 नवम्बर 1932 को संघ के मंत्री ठक्कर बापा को दलित वर्गों के उत्थान और कल्याण का एक क्रांतिकारी कार्यक्रम लिखकर भेजा था, पर संघ ने उसे स्वीकार नहीं किया। गांधी ने कहा कि दलितों का उद्धार हिंदुओं को स्वयं करने दो। डॉ. आंबेडकर ने हरिजन सेवक संघ और दलितोत्थान के प्रश्न पर अपनी पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया’ में विस्तार से पूरा अध्याय लिखा है। पाठकों को उसे भी देखना चाहिए।

(क्रमश:)

(संपादन : नवल/अनिल) 


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply