बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष (चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु का साहित्य – तेरहवां भाग)

जिज्ञासु ने लिखा है कि लाहौर की आर्यसमाजी संस्था ‘जाति-पॉंति-तोड़क मंडल’ ने भी बाबासाहेब को नए ब्राह्मणी माया-जाल में फॅंसाने के लिए अपने अधिवेशन में सभापति की हैसियत से भाषण देने के लिए आमंत्रित किया था। आर्य समाज की यह कौन-सी संस्था थी, और क्यों बनी थी, इस पर जिज्ञासु का आकलन गौरतलब है

भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार पुनर्पाठ कर रहे हैं। इसके तहत आज पढ़ें उनकी आठवीं कृति ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ का पुनर्पाठ का अंतिम भाग

‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ : चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की आठवीं कृति 

  • कंवल भारती

गतांक से आगे

‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ के इस तीसरे खण्ड का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय ‘धर्मांतर-घोषणा और विविध अनुभूतियां’ है, जिसमें उनसे संबंधित कई अहम घटनाओं का विवरण दर्ज है। इसमें बाबासाहेब द्वारा 1934 में किए गए भारत-भ्रमण का जिक्र है, जिसमें दौलताबाद के किले को देखने के दौरान किले के मुस्लिम पहरेदार द्वारा उनका जातीय अपमान किया गया था। 1934 में ही वे बम्बई के लॉ कालेज के प्रिंसिपल बनाए गए थे, जिसका सनातनी हिंदू डॉ. परांजपे ने, जो उस समय बम्बई प्रान्त के शिक्षा-सलाहकार थे, अपनी पूरी शक्ति से विरोध किया था। इसी काल में अंग्रेज सरकार ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि से विभूषित करना चाहा था, किन्तु उन्होंने उसे विनम्रता से अस्वीकार कर दिया था। इसी काल में बाबासाहेब ने बम्बई की दादर कालोनी में अपनी पुस्तकों के लिए ‘राजगृह’ नाम से एक विशाल भवन बनवाया था। जिज्ञासु ने लिखा है कि एक बार पंडित मदनमोहन मालवीय ने बाबासाहेब के दुर्लभ ग्रन्थ-संग्रह को दो लाख रुपए में खरीदना चाहा था, पर बाबासाहेब ने किसी भी कीमत पर अपनी पुस्तकें देने से इनकार कर दिया था।

इसी काल में, अर्थात 27 मई, 1935 को बाबासाहेब की पत्नी रमाबाई का निधन हुआ था। जिज्ञासु ने उन्हें ‘साध्वी नारी’ कहा है, और लिखा है– “रमाबाई धार्मिक वृत्तिकी थीं। एक बार उन्होंने बाबासाहेब से पंढरपुर जाने की इच्छा व्यक्त की। पंढरपुर महाराष्ट्र में भागवत सम्प्रदाय का एक बड़ा तीर्थ है। बाबासाहेब ने मंदिर-प्रवेश की आशंका के विचार से उन्हें यह समझाया कि अपने भक्तों को विमुख रखने वाले उस देवता के दर्शन से क्या लाभ? हम अपनी निःस्वार्थ सेवा से अपने दीन-दुखी भाइयों का उद्धार करके अनेक पंढरपुरों का निर्माण कर सकते हैं।” (वही, पृष्ठ 126-27)

इसी कालखंड में, अर्थात 1935 में बाबासाहेब ने धर्मांतरण करने की घोषणा की थी, और 1936 में जाति-पॉंति तोड़क मंडल के लाहौर अधिवेशन के लिए अपना वह ऐतिहासिक भाषण ‘जाति का विनाश’ लिखा था, जिसने गांधी को भी विचलित कर दिया था। धर्मांतरण की परिस्थिति कैसे पैदा हुई थी? इस संबंध में जिज्ञासु ने लिखा है कि पूना-पैक्ट का हिंदुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 1935 में अहमदाबाद के कविठा गॉंव के अछूतों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू किया, तो हिंदुओं ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। जब अछूत स्त्रियों ने धातु के बर्तनों में पानी लाना शुरू किया, तो यह बात वहां के हिंदुओं को असह्य अपमानजनक प्रतीत हुई और उन्होंने अछूत नारियों पर लज्जाजनक आक्रमण किया। इसी काल में जयपुर राज्य के चकवारा गांव के अछूतों ने अपने जातीय भोज में घी के पकवान बनाए। हिंदुओं को यह बरदाश्त न हो सका। उन्होंने ऐन भोजन के समय सैकड़ों की संख्या में लाठियां लेकर निहत्थे अछूतों पर हमला बोल दिया। सारा भोजन खराब हो गया और बेचारे अछूत जान बचाकर भागे।

गांधी और उनके हरिजन सेवक संघ ने इन घटनाओं पर कोई कार्यवाही नहीं की। जब कुछ पीड़ित अपनी फरियाद लेकर गांधी के पास गए, तो उन्होंने कहा– “अपने बाबा के पास जाओ, जो तुम्हें अपना उद्धार अपने आप करने का उपदेश देता है।” (वही, पृष्ठ 128)

चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु व उनकी पुस्तक ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ का आवरण पृष्ठ

बाबासाहेब ने इन घटनाओं से दुखी होकर 13 अक्टूबर, 1935 को नासिक जिले के येवला में एक विराट अछूत सम्मेलन में यह ऐतिहासिक घोषणा कर दी– “दुर्भाग्य से मैं हिंदू समाज में माने गए एक अछूत परिवार में पैदा हुआ, यह मेरे बस की बात नहीं थी। किन्तु हिंदू धर्म को मैं न मानूं और हिंदू रहकर मैं मरूं नहीं, यह मेरे बस की बात है।” (वही, पृष्ठ 129)

यहां एक बहुत ही रोचक घटना का उल्लेख जिज्ञासु ने किया है। बाबासाहेब की धर्मांतरण की घोषणा से हिंदू समाज में खलबली मच गई, और ईसाई तथा मुस्लिम धर्मों के लोग बाबासाहेब को ईसाई और मुसलमान बनाने के लिए सम्पर्क करने लगे। उसी समय “एक तेज तबीयत हिंदू मिशनरी ‘मसूरकर महाराज’ ने बड़े दावे के साथ हिंदुओं के हृदय-परिवर्तन की बात कहकर बाबासाहेब से अनुरोध किया कि आप हिंदूधर्म न त्यागें, हम आपको हिंदू समाज में ही यथेष्ट सामाजिक समता दिला देंगे। बाबासाहेब ने उन्हें उत्तर दिया– “हमारे अछूत महात्मा श्री सकटजी को एक साल तक श्रीशंकराचार्य की गद्दी पर बिठाया जाए, और सौ चितपावन ब्राह्मण परिवार उनको साष्टांग प्रणाम करें, तो मैं समझूॅंगा कि हिंदुओं का हृदय-परिवर्तन हुआ है। क्या ऐसा करने की आपमें शक्ति है?’ महाराजजी बाबासाहेब का मुॅंह ताकते रह गए।” (वही, पृष्ठ 129-30)

जिज्ञासु ने लिखा है कि लाहौर की आर्यसमाजी संस्था ‘जाति-पॉंति-तोड़क मंडल’ ने भी बाबासाहेब को नए ब्राह्मणी माया-जाल में फॅंसाने के लिए अपने अधिवेशन में सभापति की हैसियत से भाषण देने के लिए आमंत्रित किया था। आर्य समाज की यह कौन-सी संस्था थी, और क्यों बनी थी, इस पर जिज्ञासु का आकलन गौरतलब है। उन्होंने लिखा– “धर्मांतरण-घोषणा के बाद जब मुसलमान, ईसाई, सिख आदि बाबासाहेब के पास दौड़ लगाने लगे, तो आर्यसमाजियों के पेट में भी चूहे कूदने लगे। … जहां तक सुधारों का संबंध है, आर्यसमाज के सिद्धांत मानव-मात्र के लिए ग्रहणीय थे, और हिंदू जन्मवादी व्यवस्था व अधिकार-भेद से पीड़ित जनता ने उसे सप्रेम अपनाया भी। … पहले धोखा खाकर बहुत लोग आर्यसमाजी बन गए। लेकिन, मथुरा में आर्यसमाज का एक विशाल शताब्दी समारोह हुआ, जिसमें आर्यसमाज के रिंग लीडर भाई परमानन्द ने साफ घोषित करके आर्यसमाज के स्वतंत्र अस्तित्व को उसी मथुरा में खत्म कर दिया, जहां स्वामी विरजानन्द ने एक दिन उसका बीज बोया था कि आर्यसमाज का उद्देश्य केवल ब्राह्मणी हिंदूधर्म की रक्षा करके उन लाखों-लाखों हिंदुओं को बचाना है, जो ईसाई और मुसलमान हुए जा रहे थे। इससे साफ हो गया कि वस्तुतः आर्यसमाजी गुण-कर्म-वाद केवल प्लेटफार्मी बकवास था, अमली नहीं। यही कारण था कि जितने लोग शुद्ध वैदिक-धर्मी ‘महाशय’ बनाए गए, वे सब हिंदूसमाज से पृथक ही रहे, गुण-कर्मानुसार खानदानी हिंदुओं के भीतर उनकी खपत नहीं हुई, अतः उनकी एक अलग ‘आर्य-बिरादरी’ बना दी गई। इसी आर्य-बिरादरी का दूसरा नाम ‘जाति-पॉंति-तोड़क मंडल’ रखा गया, जिसका संचालन आर्यसमाजी करते थे।” (वही, पृष्ठ 130-31)

 ‘जाति-पॉंति-तोड़क मंडल’ के आमंत्रण पर बाबासाहेब ने अपना जो अध्यक्षीय भाषण तैयार किया, वह ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ (जाति का विनाश) नाम से छपा, परन्तु अधिवेशन में नहीं पढ़ा जा सका। इसका कारण बताते हुए जिज्ञासु लिखते हैं कि मंडल के संचालकों ने भाषण की छपी कापियों को, जिसे बाबासाहेब ने बम्बई में छपवाया था, चतुराई से महाशय हरभगवान द्वारा लाहौर मंगा लिया। “अब क्या था, भाई परमानन्द, महाशय हंसराज, डॉ. गोकुलचन्द नारंग, राजा नरेन्द्रनाथ आदि मंडल के सवर्ण हिंदू संचालकों ने भाषण को खूब पढ़ा। पहले तो उन्होंने भाषण में फेरबदल की चेष्टा की। किन्तु जब बाबासाहेब ने जवाब दिया कि उसमें एक कॉमा भी लगाया नहीं जा सकता, न उसमें कोई कॉंट-छॉंट हो सकती है, मैं अपने विचारों का जिम्मेदार स्वयं हूॅ, तब यह कहकर मंडल की स्वागत-समिति ने सम्मेलन को भंग कर दिया कि स्वागत-समिति सभापति के विचारों से सहमत नहीं है। वस्तुतः मंडल वाले डर गए कि इस भाषण से पंजाब में ऐसी आग लग जायेगी, जिसको बुझाना सम्भव न होगा।”

आगे की लड़ाई 

जिज्ञासु ने इस अध्याय में बाबासाहेब के उस राजनीतिक संघर्ष का वर्णन किया है, जिसने उन्हें दलित वर्गों का मसीहा बनाया। अनेक हिंदू विद्वानों ने उन पर आरोप लगाया है कि उन्होंने आजादी की लड़ाई में भाग नहीं लिया, और वे ब्रिटिश सरकार के समर्थक बने रहे। यह आरोप सही नहीं है। मुख्य समस्या देश की नहीं, बल्कि देश के गुलाम लोगों की आजादी की थी। गांधी और अन्य तमाम हिंदू नेता जो स्वराज मांग रहे थे, वे उन लाखों दलितों की आजादी के सवाल पर मौन थे, जिन्हें हिंदू-समाज-व्यवस्था ने सदियों से गुलाम बनाया हुआ था। वे पढ़ नहीं सकते थे, साफ कपड़े नहीं पहन सकते थे, सरकारी नौकरी में नहीं लिए जा सकते थे, गंदे काम और बेगार करना ही उनकी नियति बनी हुई थी। डॉ. आंबेडकर इसी अछूत समाज से आए थे, इसलिए उनके लिए इन गुलामों की आजादी का प्रश्न देश के प्रश्न से बड़ा था। 

जिज्ञासु ने लिखा है कि 1935 में नया इंडिया एक्ट लागू हुआ। इस कानून के अनुसार फरवरी, 1937 में प्रान्तों का चुनाव होना था। इसको ध्यान में रखते हुए बाबासाहेब ने 1936 में इंडिपेडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की। उस समय वे मराठी साप्ताहिक पत्र ‘जनता’ का संपादन करते थे। इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी  मजदूरों की पार्टी थी और इसमें सभी जातियों के मजदूर शामिल थे। इस पार्टी की शाखाएं मद्रास तथा मध्य प्रदेश में भी कायम हो गईं थीं। जिज्ञासु ने लिखा है कि बाबासाहेब ने अपने विद्यार्थी-जीवन में मजदूरों के खाने के डब्बे उनके घरों से लाकर मिलों में पहुंचाने का काम किया था। इसलिए मिलों के मजदूर बाबासाहेब से बहुत प्यार करते थे। इसी का परिणाम था कि बम्बई प्रान्त में इंडिपेडेंट लेबर पार्टी के टिकट पर खड़े किए गए 17 उम्मीदवारों में से 15 विजयी हुए। इंडिया एक्ट के अन्तर्गत बम्बई में अछूतों को 15 सीटें थीं। इनमें केवल दो सीटें कांग्रेस के उम्मीदवारों को मिली थीं। 

बाबासाहेब ने विधायक की हैसियत से बम्बई कौंसिल में मजदूर-हित के अनेक काम किए, जो इससे पहले नहीं हुए थे। उन्होंने वतन-प्रथा और कोंकड़ की खोती-प्रथा समाप्त कराने के लिए बिल पेश किए, मजदूरों का हड़ताल करने का अधिकार दिलाया और कपड़ा-मिलों के बुनाई विभाग तथा रेलवे के पोर्टर विभाग में अछूतों को नौकरी दिलाने का कानून पास कराया। अस्पृश्यता के कारण इन विभागों में अछूतों को काम नहीं दिया जाता था। 

जिज्ञासु ने लिखा है कि इसी समय 1938 में बाबासाहेब ने राजनीतिक व्यस्तता के कारण लॉ कालेज के प्रिंसिपल के पद से इस्तीफा दे दिया था। 

इसी बीच दूसरे महायुद्ध ने जोर पकड़ लिया। इसके परिणामस्वरूप वायसराय लार्ड लिनलिथगो ने अपनी कार्यकारिणी कमेटी में कुछ भारतीय सदस्य लिए जाने तथा भारतीयों के परामर्श से एक ‘सुरक्षा सलाहकार समिति’ बनाए जाने की घोषणा की। इस समय दो महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएं हुईं। एक यह कि गांधी की सलाह पर आठ प्रांतों की कांग्रेसी मंत्रिमंडल ने त्यागपत्र देकर युद्ध-विरोधी सत्याग्रह आरम्भ किया, और दूसरी यह कि मुस्लिम लीग ने 1940 में पाकिस्तान की मांग प्रस्तुत की। इसके नतीजे में शासन गवर्नरों ने संभाल लिया। जिज्ञासु के अनुसार, इसी समय बाबासाहेब ने बम्बई के गवर्नर को महारों की बटालियन बनाने का सुझाव दिया और गवर्नर के स्वीकार कर लेने पर बाबासाहेब ने महारों को सेना में भर्ती होने का आदेश दे दिया। इसी समय वायसराय ने दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी बाबासाहेब को दीं। एक, उन्हें ‘सुरक्षा सलाहकार समिति’ का सदस्य नामजद किया गया और दो, उन्हें 2 जुलाई 1942 को कार्यकारिणी परिषद का सदस्य नियुक्त करके श्रम, पी.डब्लू.डी. तथा माइन्स विभागों का कार्य सौंपा गया। इस पद पर रहकर बाबासाहेब ने कई क्रान्तिकारी कार्य किए, जिनमें से कई कार्यों का उल्लेख यहां जिज्ञासु ने किया है।

इसके बाद जिज्ञासु ने ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन (1942), बाबासाहेब की 50वें जन्मदिन, क्रिप्स योजना में अछूतों की उपेक्षा और बाबासाहेब द्वारा उसका विरोध, पाकिस्तान पर उनकी ऐतिहासिक पुस्तक का प्रकाशन, राजगोपालाचारी योजना, सप्रू कमेटी, बेवल योजना और केबिनेट मिशन आदि विषयों पर विस्तृत चर्चा करने के बाद स्वतंत्र भारत में उनके नेहरू-मंत्रिमंडल में शामिल होने तथा कानून मंत्री और संविधन-निर्माता होने की घटनाओं का वर्णन किया है। इसके बाद हिंदू कोड बिल का जिक्र है, जिसे बाबासाहेब ने 24 फरवरी, 1949 को लोकसभा में बहस के लिए पेश किया था। इसके बाद जिज्ञासु ने बाबासाहेब द्वारा सरकार के रवैए से क्षुब्ध होकर मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने की चर्चा की है। जिज्ञासु ने उन पांच कारणों का भी उल्लेख किया है, जो उनके त्यागपत्र के मूल में थे। इसमें एक कारण कश्मीर-समस्या भी थी, जिसका बाबासाहेब के विचार में सही समाधन उसका विभाजन था।

पुस्तक का अंत बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर द्वारा 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में बौद्ध धर्म ग्रहण करने, नवबौद्धों की बाईस प्रतिज्ञाओं, विश्व-बौद्ध सम्मेलन, नेपाल में उनके व्याख्यान, भारतीय रिपब्लिकन पार्टी की स्थापना और उसके पश्चात उनके निधन और अंत्येष्टि के वर्णन के साथ होता है। हिंदी पट्टी में दलित वर्गों में सामाजिक और राजनीतिक नवजागरण लाने की दृष्टि से ‘बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष’ नाम से चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की इस पुस्तक का योगदान महत्वपूर्ण है। 

(समाप्त)

(संपादन : नवल/अनिल) 


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