चर्मकारों का इतिहास और डॉ. आंबेडकर के विचार (चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु का साहित्य – अंतिम भाग)

जिज्ञासु के अनुसार कुछ सुधारवादी हिंदू संगठनों ने चमारों को ‘सूर्यवंशी चॅंवर-क्षत्रिय’ बताने का प्रयास किया था। यह इसी तरह का प्रयास था, जिस तरह का आर्यसमाज ने मेहतर समुदाय को रामायण के रचनाकार कवि वाल्मीकि से जोड़कर वाल्मीकि बना दिया। बता रहे हैं कंवल भारती

[भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार पुनर्पाठ कर रहे हैं। इसके तहत अंतिम किस्त में पढ़ें उनकी कृति ‘भारतीय चर्मकारों व महारों की उत्पत्ति, स्थिति और जनसंख्या तथा उनके संबंध में बाबासाहेब डा. आंबेडकर के विचार’ का पुनर्पाठ]

‘भारतीय चर्मकारों व महारों की उत्पत्ति, स्थिति और जनसंख्या तथा उनके संबंध में बाबासाहेब डा. आंबेडकर के विचार’

  • कंवल भारती

सन् 1964 में, चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की चमार और महार जाति के संबंध में एक ज्ञानवर्द्धक पुस्तक आई, जिसका पूरा नाम था– ‘भारतीय चर्मकारों व महारों की उत्पत्ति, स्थिति और जनसंख्या तथा उनके संबंध में बाबासाहेब डा. आंबेडकर के विचार’। जिज्ञासु ने इसकी भूमिका में लिखा है कि यह पुस्तक सन् 1956 में लिखी और प्रकाशित की गई थी, किंतु प्रचार का प्रयत्न न होने से एक साल तक पड़ी रही। सन् 1957 में उन्होंने बहुजन कल्याण माला की सूची में इसका नाम दिया, जिसके कारण इसकी मांग इतनी बढ़ी कि पुस्तक समाप्त हो गई। सन् 1964 में उन्होंने इसमें कुछ संशोधन किए और एक परिशिष्ट भी जोड़ा, जिसमें महारों और चमारों के संबंध में डॉ. आंबेडकर के विचारों का चयन है। चार साल बाद इसका तीसरा संस्करण प्रकाशित हुआ। प्रस्तुत आलोचना सन् 1968 में प्रकाशित इसी तीसरे संस्करण पर आधारित है।

जिज्ञासु ने भूमिका के अंत में लिखा है– “हमारे विचार में यह छोटी-सी पुस्तक पाठकों को पौराणिक गपोड़ों के काल्पनिक ब्रह्मजाल से छुटकारा दिलाकर यथार्थवादी दृष्टि प्रदान करेगी, जिससे वे अपने भूत, वर्तमान और भविष्य को सही दृष्टि से देखेंगे और अपना कल्याण-मार्ग स्वयं खोजेंगे।” इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिज्ञासु ने इसके लेखन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया है और आज से 66 साल पहले इस पुस्तक ने निश्चित रूप से महार और चमार आदि दलित जातियों में स्वाभिमान और जातीय गौरव भरा होगा।

इस किताब में आरंभ में पंजाब के तत्कालीन विधयक चौधरी चांदराम का अभिमत दिया गया है, जिसमें उन्होने लिखा है कि चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने इस पुस्तक को लिखकर दलित समाज के इस अंग पर भारी एहसान किया है। “दलित और पिछड़ी जातियों के पूर्वजों तथा उनकी स्थिति का अन्वेषण करने की आज अत्यंत आवश्यकता है, और उसे पूरा करने के लिए श्री जिज्ञासुजी सच्चाई से सप्रेम जो कर रहे हैं, वह अति सराहनीय हैं।” 

किताब में विषय-सूची नहीं दी गई है, और ना ही यह अध्यायों में विभक्त है। जिज्ञासु ने ‘सृष्टि-विज्ञानियों के मत से चर्मकारों की उत्पत्ति’ कैसे हुई, सीधे इसी प्रश्न से किताब आरंभ की है। इस मत के अनुसार जिज्ञासु ने लिखा है– “पहले मनुष्य ने शिकारी पशुओं द्वारा मारे हुए शिकारों का पड़ा मिला कच्चा गोश्त खाया, पीछे वह खुद शिकार करने लगा और अग्नि का ज्ञान होने पर मांस को आग में भूनकर खाने लगा। शिकारी होने के साथ मनुष्य को गिरोह बंधकर रहने की भी जरूरत हुई, क्योंकि पशुओं का शिकार अकेले न हो सकता था। किंतु रोज शिकार न मिलने से मनुष्य पशुओं को जिन्दा पकड़कर बांधने और पालने लगा। इस तरह वह पशुपालक बना।” इस मत के अनुसार उस समय मनुष्य तन ढकने के लिए पेड़ों के पत्तों और छालों का प्रयोग करते थे; तथा शिकार किए गए पशुओं का मांस खाने के बाद खालें फेंक दी जाती थीं। किंतु कुछ बुद्धिमान मनुष्य उन खालों को साफ करके और उन्हें नरम बनाकर बांटने लगे। “इन खालों से स्त्री-पुरुषों की लज्जा का निवारण हुआ, शीत आदि से बच्चों की रक्षा हुई।” ये ही लोग आगे चलकर ‘चर्मकार’ या खालपा’ कहलाए और जिज्ञासु के अनुसार भारतीय चर्मकार भी उन्हीं आदिम मानव-सेवकों की सन्तान हैं। (भारतीय चर्मकारों व महारों की उत्पत्ति, स्थिति और जनसंख्या तथा उनके संबंध में बाबासाहेब डा. आंबेडकर के विचार, पृष्ठ 3-4)

आगे जिज्ञासु ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा की है कि क्या आर्यों में चर्मकार या खालपा नाम की कोई पृथक जाति थी? वे जवाब देते हैं कि नहीं थी। “आर्य जाति में अग्नि-कुंड के आगे पशु-वध का कार्य आर्य पुराहित करता और खालें तुरंत उधेड़कर स्वयं ले लेता था और मांस हवन और पकाने-खाने के काम में आता था। उन्होंने रामचरितमानस के अरण्य कांड से एक उद्धरण दिया है, जिसमें सोने का मृग देखकर सीता अपने पति राम से उसे मारकर उसका चमड़ा लाने के लिए कहती हैं। जिज्ञासु लिखते हैं कि उस घोर वन में किसी खालपा या चमार के द्वारा खाल कमाने की कल्पना नहीं की जा सकती। अगर श्रीरामचंद्रजी मृग की खाल लेकर आते, तो सीताजी ही उसे साफ और नरम करने का काम करतीं। जिज्ञासु लिखते हैं कि आर्यों में यही रिवाज था कि बलि के लिए वध किए गए पशुओं की उधड़ी हुई खाल को आर्य पुरोहितानियां ही साफ करके व्यवहार में लाती थीं; और शिकार में मारे गए पशु की खाल क्षत्रिय खुद उधेड़ता था और क्षत्राणियां उसे साफ करती थीं।” (वही, पृष्ठ 5) 

बाद में आर्यों ने खालों को साफ करने का काम क्यों छोड़ा? जिज्ञासु ने इसके तीन कारण बताए हैं– ‘एक तो वह काम कड़ा और गंदा था, विजेता आर्यों के लिए उसका करना शोभनीय न था; दूसरे, भारतीय चर्मकार इस कला में प्रवीण था, जैसा चमड़ा बना देता था, वैसा आर्य ब्राह्मण-क्षत्रिय बना न सकते थे; तीसरे, विजित, दुर्बल और असहाय समझकर यह कठिन काम भारतीय चर्मकार से मुफ्त, बेगार में या नाममात्र मावजा देकर कराया जाने लगा।” (वही, पृष्ठ 6) 

इसके बाद जिज्ञासु ने हिन्दू-धर्मशास्त्रों में चर्मकारों की स्थिति का वर्णन किया है। उनके अनुसार, हिंदू धर्मशास्त्रों में चर्मकारों को वर्णसंकर लिखा है, वह भी एक नहीं, डबल वर्णसंकर। “मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण से वैश्य स्त्री में निषाद पैदा होता है और निषाद से कारावर (करवल) स्त्री में चर्मकार पैदा होता है।” लेकिन जो श्लोक जिज्ञासु ने उद्धरित किया है, उसमें ब्राह्मण का उल्लेख नहीं है। वह पूरा श्लोक इस प्रकार है–

कारावरो निषादात्तु चर्मकारः प्रसयूते।
वैदेहिकादन्ध्मेदौ बहिग्रॉंमप्रतिश्रयौ।।

इसका अर्थ पं. ज्वालाप्रसाद चतुर्वेदी ने इस प्रकार किया है– “निषाद जाति से वैदेह पत्नी में उत्पन्न पुत्र ‘कारावर’ नाम की ‘चमार’ जाति उत्पन्न होती है और वैदेह जाति से (सैरिन्ध्र, मैत्रोय, मार्गव या दास) पत्नियों में ‘अन्ध्र’ और ‘मेद’ क्रम से उत्पन्न होते हैं। ये ग्राम से बाहर घर बनाकर रहते हैं।”

चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु व उनकी पुनर्पाठित पुस्तक का शीर्षक पृष्ठ

 

ब्राह्मण का उल्लेख ‘याज्ञवल्क्य (1/53) और मनुस्मृति (10/11) में आया है, जिसमें जिज्ञासु के अनुसार ‘सूत’ नामक एक प्रतिलोम वर्णसंकर का नाम लिखा है, जो क्षत्रिय के वीर्य से ब्राह्मणी कन्या में पैदा हुआ। “इस सूत से महर्षि ‘उशनी’ के लेखानुसार ब्राह्मण की लड़की में वेणुक अर्थात बॅंसफोड़ या भंगी पैदा हुआ और क्षत्रिय की लड़की से चमार पैदा हुआ। इस प्रकार चमार और बॅंसफोड़ का पिता एक ही सूत (वर्णसंकर) है, सिर्फ माताएं अलग-अलग हैं।” (वही, पृष्ठ 7)

जिज्ञासु के अनुसार कुछ सुधारवादी हिन्दू संगठनों ने चमारों को ‘सूर्यवंशी चॅंवर-क्षत्रिय’ बताने का प्रयास किया था। यह इसी तरह का प्रयास था, जिस तरह का आर्यसमाज ने मेहतर समुदाय को रामायण के रचनाकार कवि वाल्मीकि से जोड़कर वाल्मीकि बना दिया। जिज्ञासु के अनुसार चमारों को क्षत्रिय बनाने का काम भी आर्यसमाजियों ने किया। उन्होंने लिखा है– “किसी आर्यसमाजी विद्वान ने, जिसने अपना नाम छिपा दिया है, एक ‘चॅंवर पुराण’ नाम की पुस्तिका लिखकर उसे ‘श्री बाबा गोविन्ददासजी श्री 108 महात्मा रविदास मंदिर अयोध्याजी’ के नाम से प्रकाशित कराया है। इस पुस्तिका में पहले महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 35 के सुप्रसिद्ध 17-18 श्लोकों को उद्धृत करके ‘चॅंवर-क्षत्रिय’ की मिथ्या स्थापना की गई।” जिज्ञासु के अनुसार वह श्लोक और उसका अर्थ इस प्रकार है, जिसमें ‘चौरा’ और ब्राह्मणानाममर्षणात्’ पाठान्तर हैं–

“मेकला द्रविड़ा लाटा पोंड्रा कोवशिरस्ज्ञतथा।
शैंडिका दरदा दर्वाश्चौडा शबर बर्वरा:।
किराता यवनश्चैव तास्ता: क्षत्रिय जातय:।
वृषत्वं गता लोके ब्राह्मणानामदर्शनात्।

अर्थ– मेकल, द्रविड़, लाट, पौंड्र, कोण्वशिर, शौंडिक, दरद, दर्ब, चोड अथवा चौर, शबर, बर्बर, किरात और यवन, ये सब क्षत्रिय जाति के थे, किंतु ब्राह्मणों का दर्शन न मिलने अथवा ब्राह्मणों के कोप के कारण संसार में वे सब शूद्र हो गए।” (वही, पृष्ठ 8-9)

जिज्ञासु ने इन श्लोकों का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि चॅंवर पुराण के लेखक ने ‘चोड’ या ‘चौर’ शब्द को ‘चॅंवर’ बनाकर, और एक निराधार काल्पनिक कथा गढ़कर, चमारों को ‘सूर्यवंशी चॅंवर क्षत्रिय’ बताने का काम किया है। जिज्ञासु लिखते हैं– “महर्षि दयानंद के ‘सत्य का ग्रहण’ और असत्य का त्याग’ नियतम की टॉंग तोड़ते हुए महाशयजी ने त्रिकालदर्शी ऋषियों की तरह लिखा है कि सतयुग के आदि से 2 करोड़ 56 लाख 97 हजार वर्ष भूमंडल पर चॅवर वंश का राज्य रहा। इस वंश के प्रथम राजा चॅंवरसेन थे और अंतिम राजा चामुन्डराय। चामुन्डराय अंत में चामुन्ड ऋषि हो गए और 179 वर्ष तक विष्णु की आराधना व तपस्या की, लेकिन अंत में विष्णु ने उन्हें शाप दिया कि ‘आज से तेरा वंश इस पृथ्वी से सदैव के लिए नष्ट हो और आज के पश्चात तेरे वंश वाले ‘चमार’ कहलावें। तेरे वंशज शूद्रों में भी नीच समझें जावें और तेरी संतान नीच से नीच कर्मों को करे और सर्वदा पत्थर, वृक्ष, घूरे इत्यादि जड़ पदार्थों को पूजती हुई स्वयं जड़-तुल्य हो जाए।” (वही, पृष्ठ 8-9) 

जिज्ञासु के अनुसार, चॅंवर-पुराण के लेखक ने अंत में लिखा है कि अगर ‘चमार आर्यसमाजी बनकर स्वामी दयानंद सरस्वती और वेदों के भक्त बन जाएं, तो विष्णु के शाप से उनका उत्तर हो सकता है। वास्तव में, चॅंवर-पुराण लिखने वाले का लक्ष्य भी चमारों को वेद-भक्त बनाने का था। ऐसे ही एक आर्यसमाजी पंडित अमीचन्द शर्मा ने 1920 के दशक में मेहतर समुदाय को रामायण के रचयिता आदिकवि वाल्मीकि से जोड़ने के लिए ‘वाल्मीकि-प्रकाश’ की रचना की थी। दुर्भाग्य से मेहतर समुदाय तो आर्यसमाज के जाल में फॅंस गया, किंतु चमार समुदाय उनके जाल में नहीं फॅंसा।

चॅंवर-पुराण की सारी कहानी, जिज्ञासु की दृष्टि में काल्पनिक, निराधार और नितांत मिथ्या है। किसी जाति का जन्म किसी के शाप से, या प्रतिलोम वर्णसंकर से होना अपने आप में ही हास्यास्पद सिद्धांत है। जिज्ञासु ने ब्राह्मणों के इस दुष्प्रचार का भी खंडन किया है कि चमार कश्यप गोत्र के हैं। उन्होंने रोहतक-निवासी गोगनराम लोमोड़ की सूचना के हवाले से लिखा है कि पंजाब में चमारों के घर ब्याह, मृतक-तर्पण आदि कर्म कराने के लिए जो ब्राह्मण पुरोहित आते हैं, वे चमारों को ‘कश्यप-गोत्र’ कहते हैं। किंतु, जिज्ञासु कहते हैं कि ब्राह्मणी विधान के अनुसार ‘कश्यप-गोत्र’ चमारों का ही नहीं, सभी ऐरे-गैरे पचकल्यानियों अर्थात् भारत की समस्त वर्णसंकर शूद्र और अछूत कही गई (भारत की आदिनिवासिनी) जातियों का गोत्र गढ़ा गया है। उनके अनुसार आर्यवंशीय ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि का ‘कश्यप-गोत्र’ होता ही नहीं। उनके गोत्र वशिष्ठ, भारद्वाज, अंगिरा, अत्रि, मरीचि, कात्यायन, शांडिल्य, पाराशर इत्यादि होते हैं। इस संबंध में जिज्ञासु बड़े मार्के की बात कहते हैं कि किसी को ‘कश्यप-गोत्र’ कहना ही इस बात का सबूत है कि ‘सनातनी ब्राह्मण भारतीय चर्मकारों को आर्यवंशीय नहीं मानते। (वही, पृष्ठ 11-12)

हिन्दू समाज में चमार एक अछूत जाति है। उसके माथे पर अछूतपन के कलंक को न मुस्लिम शासन मिटा सका और न अंग्रेजी राज्य। जिज्ञासु का मत है कि मुस्लिम-शासन में भी चर्मकारों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं हुआ। उन्होंने लिखा कि हालांकि मुस्लिम धर्म में चमड़ा नापाक नहीं है। इसलिए मुसलमानों को चमड़े के डोल, मशक या जूता आदि बनाने वाले चमार से धर्मिक रूप से कोई परहेज न था। किंतु, उनका मत है कि मुस्लिम अमलदारी में भारतीय चर्मकारों की दशा बहैसियत ‘चमार’ नहीं सुधरी, वह उसी नरक में पड़ा रहा, जिसमें आर्य व्यवस्थापकों ने उसे धकेला था। हालांकि जब वह मुसलमान हो गया, तो जरूर उसकी सामाजिक स्थिति में कुछ सुधार हुआ। किंतु, जिज्ञासु इसे सुधार नहीं मानते। उनके अनुसार यह इस्लाम का प्रचार है। निस्सन्देह अछूत जातियों के लोग सम्मान प्राप्त करने के लिए लगभग सभी धर्मों में गए, परंतु जिज्ञासु का मत है कि ईसाई धर्म ने उनका ज्यादा विकास किया, क्योंकि ईसाइयों ने उन्हें न केवल शिक्षा दी, जिससे उनमें सांस्कृतिक बदलाव आया। (वही, पृष्ठ 12-13)

सन् 1930 के दशकों में कुछ चमार जातियों ने अपने आपको ‘यादव-क्षत्रिय’ होने का दावा करना आरंभ कर दिया था। इसका उल्लेख जिज्ञासु ने इस प्रकार किया है– 

“शायद सन् 1922 में दिल्ली में ‘प्राचीन भारत’ के संपादक वीररत्न श्री देवीदास जाटव के उद्योग से एक सभा हुई थी, जिसमें जटिया चर्मकारों के हिंदू सामाजिक क्षेत्रों में ‘क्षत्रिय’ होने का दावा पेश किया गया। कहा गया, ‘जटिया’ शब्द प्रेष्य है। इसका शुद्ध रूप ‘जाटव’ और इसका मौलिक रूप ‘यादव’ है। इस घोषणा के अनुसार दिल्ली, आगरा, मेरठ, कानपुर के अनेक जटिया लोग अपने आपको ‘यादव-क्षत्रिय’ कहने लगे। इसी सिलसिले में आगरा से ‘यादव’ नाम का एक पत्र निकला। इस पत्र में अहीर यादवों को चेलेंज दिया गया था कि अहीर सच्चे यदुवंशी नहीं हैं, जाटव ही असली यादव हैं। एक जाटव सुलेखक ने अपना उपनाम ‘यादवेंदु’ रक्खा। इसी समय ‘चानोर’ चर्मकारों ने भी, जिनके नेता दिल्ली-निवासी मुंशी किशनसहाय थे, चानोरों को उत्तम क्षत्रिय होने की घोषणा करते हुए एक इश्तहार निकाला, जिसमें चमारों को अनेक ऐसी खापों या गोत्रों के नाम थे, जो राजपूत, गूजर, मीना और जाटों के गोत्रों के नाम हैं। कुछ चमारों ने अपनी जाति को ‘गहलोत’ क्षत्रिय घोषित का दिया, कुछ ने 1941 की मर्दुमशुमारी में अपने को सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी क्षत्रिय लिखे जाने का आग्रह किया है।” (वही, पृष्ठ 15)

जिज्ञासु ने इस वर्णांतरण का समर्थन नहीं किया। उन्होंने इसे जातीय जगमगाहट की बातें कहकर खारिज कर दिया। किंतु उन्होंने डा. आंबेडकर की धर्मांतरण-घोषणा और सन् 1956 में बौद्ध धर्म ग्रहण करने के निर्णय का समर्थन किया और लिखा कि इसका “भारतीय चर्मकारों पर गहरा प्रभाव पड़ा और देश में सामूहिक धर्म-परिवर्तन की एक लहर सी दौड़ गई।” इस प्रकार तब से अब तक एक करोड़ से अधिक संख्या में अछूत भाई हिंदू धर्म त्यागकर भगवान बुद्ध के शरणापन्न हुए। इस धर्मांतरण से भारत में 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में बौद्धों की संख्या 8 प्रतिशत बढ़ गई, और दिन-दिन बढ़ती जाती है। इस आधार पर जिज्ञासु ने भविष्य का चित्र खींचते हुए लिखा– “शायद निकट भविष्य में ही सभी चर्मकार बौद्ध हो जायेंगे, और उनकी देखादेखी अन्य दबी-पिछड़ी जातियॉं भी नीच-ऊंच भेदवादी हिंदू धर्म को त्यागकर समतावादी बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेंगी।” (वही, पृष्ठ 16-17)

चमारों का मस्तिष्क ब्राह्मणों के समान

जिज्ञासु ने आगे चर्मकारों के संबंध में एक ऐसी विचित्र जानकारी साझा की है, जिससे सहमत होना मुश्किल है। उन्होंने लिखा– “यू.पी., बिहार और बंगाल के ब्राह्मणों और चमारों के मस्तिष्क का वजन लगभग बराबर है। सेंसस ऑफ इंडिया, 1931 की भूमिका में लिखा है कि भारतीय मस्तिष्क-मान के अनुसार यू.पी. के ब्राह्मणों के मस्तिष्क का औसत वजन 73.1 है, और बंगाल के ब्राह्मणों के मस्तिष्क का औसत वजन 79.6 है, और यू.पी. के चमारों के मस्तिष्क का औसत वजन 72.8 है तथा बिहार के चमारों के मस्तिष्क का औसत वजन 79 है।” जिज्ञासु आगे लिखते हैं, ‘लगभग ऐसा ही मस्तिष्क-संतुलन अन्य दलित जातियों का भी पाया जाता है।’ उनका मानव-विज्ञानियों की रिपोर्ट से यह निष्कर्ष दिया है कि मस्तिष्क-शक्ति में भारतीय चर्मकार ब्राह्मण के बराबर ही नहीं, बल्कि उससे भी बड़ा है। (वही, पृष्ठ 18)

यह निष्कर्ष ठीक नहीं है। अवसरों और अधिकारों से वंचित करके किसी भी मानव-समाज को हमेशा के लिए पिछड़ी और पतित स्थिति में रखा जा सकता है। दलित-पिछड़ी जातियों को हजारों साल से हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था ने मानवीय अधिकारों से वंचित करके और दास बनाकर रखा, इसलिए विकास में ये जातियां पीछे रहीं और ब्राह्मणादि द्विज जातियां आगे रहीं। अभी थोड़े समय से ही, जब देश आजाद हुआ, और लोकतंत्र कायम हुआ, दलित-पिछड़ी जातियों को वर्ण व्यवस्था के बंधन से मुक्ति मिली है और उन्हें आरक्षण के द्वारा विकास के अवसर प्राप्त हुए हैं। निस्संदेह, इस थोड़े से समय में ही इन जातियों के लोगों ने काफी तरक्की की है, पर अभी भी इनकी एक बड़ी आबादी शिक्षा और विकास के अन्य साधनों से वंचित है। 

जिज्ञासु ने आगे एक और नई जानकारी साझा की है। उन्होंने लिखा है कि दक्षिण भारत के चर्मकारों की अपेक्षा उत्तर भारत के चर्मकारों में दासता की मनोवृत्ति अधिक है। इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा–

“दक्षिण भारत समुद्र से घिरा है, अतएव युरोपियनों से पहले कोई विदेशी जाति दक्षिण मार्ग से भारत में नहीं आई। आर्य, शक, हूण, पारद, पल्हव, यवन, मुसलमान सब उत्तर द्वार से आए। अतएव भारत में सबसे प्रथम विदेशी जातियों का प्रभाव उत्तर भारत के आदि-निवासियों पर पड़ा। बहुत काल तक विदेशियों से पदाक्रांत रहने के कारण उत्तर भारत के आदि-निवासी तेजहीन से हो गए, इनमें दासता की मनोवृत्ति अधिक व्याप गई। दक्षिण भारत में विदेशी बहुत देर में पहुंचे, इस कारण दक्षिण भारत के आदि-निवासियों में, स्वतंत्रता और संघर्ष की भावना अब भी पाई जाती है, बहुत अधिक दले-कुचले-लूटे और चूसे जाने पर भी दासता का भाव उनमें बद्धमूल नहीं हुआ। यही अंतर्भाव उत्तर भारत और दक्षिण के चमारों के बीच में भी दिखाई देता है। दक्षिण भारत के चर्मकारों की अपेक्षा उत्तर भारत के चर्मकारों में दासता की मनोवृत्ति अधिक घर कर गई है।” (वही, पृष्ठ 24-25)

इसके बाद जिज्ञासु ने उत्तर भारत के चर्मकारों के भिन्न-भिन्न वर्गों और अंतर्वर्गों के नामों की सूची दी है, जो इस जाति के लोगों के लिए भी एक प्रकार से नई जानकारी हो सकती है। कुछ महत्वपूर्ण वर्ग इस प्रकार हैं– चॉंदौर, झासिया, छादिया, घोर, सेनन, सरकी, सरिया और सोराठी; और अंतर्वर्ग इस प्रकार हैं– महरा, होलिया, परवारी, पुलायॉं, चोखामेला, मंगा, मिरासी, डोन्बा, हलसाब, भूयाल और भूमिपुत्रा। जिज्ञासु ने और भी खुलासा किया है। लिखा है– “यू.पी. में सरकारी गणना में ‘डबगर’ और ‘घरामी’ चमार ग्रुप में रखे गए हैं। कुछ लोग जैसवारों को भी चमारों का एक वर्ग समझते हैं; परंतु कलकत्ते का ‘जैसवार मित्र’ (पत्र) जैसवारों को ‘कोरी’ ग्रुप में मानता है। स्थान-भेद से कोरी और चमारों के कई वर्ग एक ही हैं; जैसे कि चॉंनोर, चॉंदौर, तवर। परंतु राजस्थान में ‘चॉंनोर’ जुलाहे कहलाते हैं और दिल्ली में भी चॉंनोर जुलाहे नाम से प्रसिद्ध हैं। गुड़गॉंव जिले के 23 ग्रामों में ‘कोली’ चमार कहलाते हैं। शायद इसी से कई सवर्ण हिंदू लेखकों ने कोरी और चमार दोनों का निकास एक ही मूल से माना है। परन्तु सरकारी सेंसस रिपोर्ट में दोनों की गणना अलग-अलग की गई है।” (वही, पृष्ठ 25)

किताब के अंत में जिज्ञासु ने एक परिशिष्ट जोड़ा है, जिसमें ‘चर्मकारों और महारों के संबंध में बाबासाहेब डा. आंबेडकर के विचार’ दिए हैं और साथ में चमारों और जाटों के गोत्रों में एकता दिखाई है।

बाबासाहेब की शोधपूर्ण पुस्तक ‘दि अनटचेबिल्स’ (अछूत कौन) के हवाले से जिज्ञासु ने लिखा है कि दक्षिण के द्रविड़ और उत्तर के असुर अथवा नाग एक ही नस्ल के लोग हैं। ये केवल दो भिन्न नाम हैं, नस्ल एक ही है। नाग नाम जातिगत है और द्रविड़ भाषागत। उनके अनुसार भारत में अधिक से अधिक दो ही नस्लें रही हैं– आर्य और नाग। दास भी वे ही लोग हैं, जो नाग हैं। (वही, पृष्ठ 27)

जिज्ञासु ने जाटों और चमारों के गोत्रों में एकता के संबंध में जो जानकारी दी है, वह उन्हें गुड़गॉंव के एक लेखक गोगनराम जी से मिली थी। उनके अनुसार यह एकता इस प्रकार है–

गुड़गावॉं ग्राम में ‘कटारिया’ गोत्र के सैकड़ों जाट हैं। दिल्ली सूबे के नजबगढ़ कस्बे में ‘कटारिया’ गोत्रा के चर्मकार हैं।

‘लोमाड़’ गोत्र के अहीर गुड़गॉंव जिले के नाथूपुर में मौजूद हैं और दिल्ली सूबे में रंगपुरी गॉंव के पास ‘लोमोड़’ गोत्र के गूजर हैं। हमारे छारा गॉंव में 50 घर ‘लोमाड़’ चमारों के हैं।

रोहतक जिले के बादली गॉंव में ‘दहिया’ गोत्रा के जाट भी हैं और चमार भी। झज्झर तहसील में भी ‘दहिया’ जाट और चमार हैं।

छारा ग्राम में तीस घर ‘सहरावत’ गोत्र के चमार हैं और दिल्ली सूबे के एक ग्राम में ‘सहरावत’ जाट भी मौजूद हैं।

रोहतक जिले में ‘माड़िया’ चमार भी हैं और जाट भी।

‘हुड्डा’ गोत्र के जाट भी हैं और चमार भी। 

‘सॉंभरिया’ गोत्र के जारट भी हैं और चमार भी।

‘तवर’ गोत्र के चमार भी हैं, खटिक भी हैं और कोली भी। इसी तरह ‘गोठवाल’ गोत्र के चमार और खटिक दोनों हैं। 

‘चौहान’ गोत्र के चमार, राजपूत और जाट तीनों हैं।

जालंधर जिले और दिल्ली के रमदसिया चमारों में ‘अहीर’ गोत्र है। ज्ञात हुआ है कि सिख जाटों में भी ‘अहीर’ गोत्र है।

‘नूनीवाल’ गोत्र के अहीर सिरोल ग्राम में हैं, और ‘नूनीवाल’ चमारों के घर छावनी गुड़गावॉं में हैं।

रोहतक जिले में ‘गहलोत’ जाट भी हैं और ‘गहलोत’ चमार भी हैं।

गुड़गावॉं जिले के महेन्द्रगढ़ में ‘ढोंकवाल’ गोत्र के जाट भी हैं और चमार भी हैं।

झाड़सा ग्राम में ‘बड़गूजर’ गोत्र के जाट हैं और घासेड़ा ग्राम में ‘बड़गूजर’ चमार हैं।

तहसील रिवाड़ी में ‘गोठवाल’ गोत्र के अहीर और चमार दोनों हैं।

जिज्ञासु लिखते हैं कि यदि पता लगाया जाए तो सैकड़ों गोत्र ऐसे मिल सकते हैं, जो चमारों में भी मौजूद हैं और जाटों, अहीरों एवं अन्य राजपूत, गूजर, खजिक और कोली जाति में भी। (वही, पृष्ठ 29-30) 

चमार जाति के संबंध में इतनी विशद जानकारी को देखते हुए यह कहना कदाचित गलत न होगा कि जिज्ञासु की यह छोटी सी पुस्तक 1960 के दशक में चमार जाति के पाठकों के लिए विचारोत्तेजक रही होगी, बल्कि आज भी प्रासंगिक है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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