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एक्जिट पोल : मीडिया कंपनियों का खेल और मनोविज्ञान

पहला सवाल यही होता है कि आखिर मतदान के बाद एक्जिट पोल के नतीजों को सत्ताधारियों और खासतौर से भाजपा के पक्ष में दिखाने का क्या लाभ हो सकता है? क्योंकि मतदान तो हो चुके हैं और उसकी गिनती सब लोगों के सामने 10 मार्च को हो जाएगी। पढ़ें, अनिल चमड़िया का विश्लेषण

बीते 7 मार्च, 2022 को भारतीय गणराज्य के पांच प्रदेशों में विधानसभा के लिए मतदान पूरे होने के बाद देश भर के टेलीविजन चैनलों व दूसरी मीडिया कंपनियों ने यह बताया है कि प्रदेशों में किस किस पार्टी की सरकार बन सकती है। मीडिया कंपनियां इसे एक्जिट पोल कहती है। उनका यह भी दावा होता है कि वे चुनाव के संभावित नतीजों के बारे में यह संकेत मतदान के बाद मतदाताओं से पूछताछ करने के बाद जारी किया है। लेकिन इस एक्जिट पोल के नतीजों को लेकर बहुत सारे लोगों ने अपनी नाराजगी प्रकट की है और कहा है कि वे सत्ताधारियों और खासकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पक्ष में किया गया एक्जिट पोल है। 

जिन लोगों ने इन प्रदेशों में जाकर मतदान से पहले मतदाताओं से जो बातचीत की या मतदाताओं के बीच भारतीय जनता पार्टी की सरकारों के खिलाफ जो गुस्सा और नाराजगी देखी व सुनी है, उसके मद्देनजर एक्जिट पोल के नतीजें बिल्कुल विपरीत है। लेकिन सवाल है कि आखिर मतदान के बाद एक्जिट पोल के नतीजों को सत्ताधारियों और खासतौर से भाजपा के पक्ष में दिखाने का क्या लाभ हो सकता है? क्योंकि मतदान तो हो चुके हैं और उसकी गिनती सब लोगों के सामने 10 मार्च को हो जाएगी ।

इस सवाल का जबाव क्या हो सकता है? यह जवाब क्या काफी है कि पहले भी एक्जिट पोल के नतीजे गलत साबित होते रहे हैं और इस बार भी हो सकते हैं? ऐेसे में सवाल यही है किर इन्हें मतदान और मतगणना के बीच भाजपा के लिए लाभकारी एक्जिट पोल के रूप में कैसे देख सकते हैं? 

भारत में चुनाव में कंपनियों की भागीदारी का विस्तार 

पहले इस बात को समझने की कोशिश की जा सकती है कि भारतीय लोकतंत्र में कंपनियों की भागीदारी बहुत ही तेजी के साथ बढ़ी है। भारतीय लोकतंत्र में विधानसभा व लोकसभा के लिए मतदान के पहले ओपिनियन पोल और मतगणना के पहले एक्जिट पोल का एक नया अध्याय तीसेक साल पहले जुड़ा। कारपोरेट कंपनियां भारतीय लोकतंत्र की चुनावी राजनीति में कई स्तरों पर सक्रिय रहती है। राजनीतिक पार्टियों के लिए बहुत सारी अपनी पूंजी लगाने की बात तो सर्वविदित हैं। मुख्य बात है कि मतदाताओं को किसी खास पार्टी या खास तरह की पार्टियों के पक्ष में आकर्षण पैदा करना उनका लक्ष्य होता है। इस आकर्षण को पैदा करने के लिए कई तरह की कवायद होती रहती है। उनमें ओपिनियन पोल को पहले बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था। लेकिन जैसे-जैसे यह अनुभव किया गया कि कोरपोरेट कंपनियों ने ओपिनियन पोल को किसी खास के पक्ष में आकर्षण पैदा करने का औजार बना लिया है तो काफी शोर शराबे के बाद चुनाव आयोग को इस पर पांबदी लगानी पड़ी। जैसे ओपिनियन पोल की एक भूमिका होती है उसी तरह से एक्जिट पोल की भी एक भूमिका होती है।

एक्जिट पोल पर सवाल

यानी मतदान के लिए, मतदान के दौरान और मतदान के बाद कंपनियां मतदाताओं के बीच निरंतर भिन्न तरह की भूमिकाओं में रहती है। संसदीय लोकतंत्र में कंपनियों को हर समय मतदाताओं के बीच अपनी मौजूदगी को बनाए रखना होता है क्योंकि वे किसी खास तरह की राजनीति और उसकी सत्ता की पक्षधर होती है। लिहाजा हर संभव तरीके से वे उस राजनीति या पार्टी को सत्ता तक पहुंचने के दौरान अपनी भूमिका निश्चित करती है। 

सवाल का जवाब और सवाल 

एक्जिट पोल पर अंगुली उठाने वाले से जो सवाल किए जाते हैं कि इससे आखिर क्या लाभ होगा तो पहले उसके जवाब में एक सवाल यह किया जा सकता है कि मतदान के बाद 72 घंटों के अंदर चुनाव नतीजे मतगणना से आ सकते हैं तो फिर कंपनियों को एक्जिट पोल के जरिये नतीजों को जाहिर करने की क्यों जल्दीबाजी होती है। यह सवाल तब तो और महत्वपूर्ण हो जाता है जब यह देखा जाता है कि कंपनियों के एक्जिट पोल अक्सर गलत साबित होते हैं। यह अधिकांश उसी पार्टी और राजनीति के पक्ष में झुकी होती हैं, जिसकी निजीकरण में आस्था होती है। 

दूसरा, पार्टी को मिलने वाले लाभ या फायदे को किस तरह से देखा जा रहा है? क्या किसी राजनीतिक पार्टी के लिए लाभ केवल मत यानी वोट का मिलना ही होता है? राजनीतिक पार्टियां जब लोकप्रिय मत पाती है तो उन्हें वोट के साथ मतदाताओं का सक्रिय समर्थन भी मिलता है। राजनीतिक पार्टियों के लिए लोग अपनी जान तक गंवाते हैं। जेल जाते हैं। तरह तरह के कष्ट उठाते हैं। क्योंकि वे यह मानते हैं कि लोकतंत्र में चुनाव उसके जीवन के लिए आधारभूत जरूरतों को सुनिश्चित करने का एक ढांचा तैयार करता है। यानी मतदाताओं का सक्रिय समर्थन वोट से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। समर्थन की तरह ही लोकप्रिय विरोध से भी उसी तरह से राजनीतिक पार्टियां सबसे ज्यादा परेशानी महसूस करती है। कोई राजनीतिक पार्टी वोट के रूप में ज्यादा हासिल कर लें और मतदाता उसके सक्रिय विरोध में खड़े हो तो राजनीतिक पार्टियां कैसे सत्ता संचालित कर सकती है? 

एक्जिट पोल आखिर करता क्या है? उसका मकसद क्या मतदाताओं को वैधानिक मतगणना के पहले यह सूचित भर करना है कि किसकी सरकार बन सकती है? एक्जिट पोल ठीक उसी तरह से एक खास तरह का मनोविज्ञान तैयार करता है जैसे कि ओपिनियन पोल का मतदान से पहले एक निश्चित मनोविज्ञान तैयार करने का होता है। एक उदाहरण यहां दिया जा सकता है। जैसे मान लें कि जलती आग से एक तवा नीचे उतारा जाए और उस पर किसी की अंगुली लग जाए तो उस समय उसकी किस तरह की प्रतिक्रिया होगी। दूसरा किसी को मानसिक तौर पर तैयार किया जाए कि आग से उतरे तवा पर अंगुली लग जाए तो वह जल सकती है। यानी किसी चीज के लिए एक मनोविज्ञान तैयार करना होता है। राजनीति के लिए मनोविज्ञान तैयार करना चुनाव के मैनेजरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। 

पांच राज्यों में खासतौर से उत्तर प्रदेश में लोकप्रिय बहुमत सत्ताधारियों के पक्ष में नहीं दिखता है। लेकिन ऐसे हालात में ईवीएम से यह नतीजा निकलता है कि वोटो का बहुमत सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में है तो उस पर तत्काल तीखी प्रतिक्रिया हो सकती है। एक्जिट पोल मतदाताओं की प्रतिक्रियाओं की जो आशंका हो सकती है उसे ठंडा करने की प्रक्रिया का कारगर हिस्सा होता है। पिछले कई चुनावों में देखा गया है कि बहुमत के आसपास पहुंचकर भी विपक्षी पार्टियां सरकार बनाने का इंतजाम करने से रह जाती है । 

दरअसल राजनीतिक पार्टियों का उद्देश्य तकनीकी तौर पर बहुमत हासिल करने का होता है और सत्ताधारी पार्टी को मतदान एवं मतगणना के बाद उसे हासिल करने के लिए इंतजाम करने की एक तरफ कोशिश करनी होती है तो दूसरी तरफ लोकप्रिय विरोध को भी मैनेज करने की जरूरत होती है। एक्जिट पोल सत्ताधारी पार्टी के सत्ता में बने रहने की समस्त योजनाओं का हिस्सा होता है। यह समझ ही एक्जिट पोल से मिलने वाले लाभ का जवाब हो सकती है ।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

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