राज्यसभा में मनोज कुमार झा का संबोधन – ‘उल्टे पांव की यात्रा’

गत 25 मार्च, 2022 को प्रो. मनोज कुमार झा ने कहा– पेरियार, सावित्रीबाई फुले, जोतिबा फुले, बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर – आप एक साझी सोच देखिए। क्यों हमारे दलित-बहुजन चिंतक उस तरह से नहीं सोचते हैं, जैसा आप सोच रहे हैं, जैसा आपका रिजोल्यूशन सोच रहा है। कहीं तो केमिकल लोचा है। ऐसा क्यों हो रहा है, उसको एड्रेस करने की जरूरत है।

[गत 25 मार्च, 2022 को राज्यसभा में भाजपा के राकेश सिन्हा द्वारा एक निजी प्रस्ताव पेश किया गया। इसका केंद्रीय विषय अन्य मसलों के साथ-साथ, सरकार से यह अनुरोध भी करना था कि वह ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए, नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की तर्ज पर राज्य और जिला स्तर पर भी रिसर्च फाउंडेशन स्थापित करे। राजद सांसद प्रो. मनोज कुमार झा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। संसद टीवी द्वारा प्रसारित उनके संबोधन का अंश लिप्यांतरित स्वरूप में यहां प्रकाशित कर रहे हैं।] 

उपसभापति महोदय, मैं समझता हूं कि हम लोग मैकॉले को काफी तंज करके रेफर [बात] करते हैं, लेकिन कभी हम लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि दलित-बहुजन चिंतक मैकॉले को तंज क्यों नहीं करते हैं? वे क्यों मानते हैं कि मैकॉले ने कुछ द्वार भी खोले? 

मैं बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की बात कर रहा हूं। बाबासाहेब वाज ऑफ दी व्यू दैट इंडियाज फ्यूचर लाइज इन वेस्टर्न एजुकेशन एंड वेस्टर्न इंस्टीट्यूशंस [बाबा साहेब समझते थे कि भारत का भविष्य पश्चिमी शिक्षा और पश्चिमी संस्थाओं में है]। बाबा साहेब पर तो माला पहनायी जाए, उन पर फिल्में बनायी जाएं, लेकिन उनके विचारों को आत्मसात न किया जाए, क्योंकि बाबा साहेब आपके एथनोसेंट्रिक एप्रोच [जाति आधारित श्रेष्ठतावादी दृष्टिकोण] को चैलेंज (चुनौती) करते हुए उसको धूल-धूसरित करने की कोशिश करते हैं। इस तरह के कांट्रडिक्शंस (अंतर्विरोधों) में मैं समझता हूं कि बाबा साहेब ने स्वयं न सिर्फ इन कांट्रडिक्शंस (अंतर्विरोधों का जिक्र किया, बल्कि इन कांट्रडिक्शंस को एक आंदोलन – उन्होंने बिला वजह नहीं कहा था, एजिटेट एंड एजुकेट व्हाई? बिकाउज ही नेव द काइंड ऑफ एजुकेशन [आन्दोलन करो और शिक्षित बनो? क्योंकि वे जानते थे कि शिक्षा किस तरह की है]। 

आप जिस प्राचीन भारत का जिक्र कर रहे हैं – हर वह चीज़ जो प्राचीन होती है, वह गोल्डेन [स्वर्णिम] नहीं होती है। हम सब लोगों को बताया गया कि गुप्ता पीरियड वाज द गोल्डेन पीरियड ऑफ इंडियन हिस्ट्री [गुप्त काल भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग था]]। जब ग़ौर से पढ़ा तो पता चला कि स्लेवरी [गुलामी] से आई थी, वीमेन के स्टेटस [महिलाओं की स्थिति] में डिटोरिएशन [गिरावट] वहीं हुआ। … अगर इस सदन और हम सबको कोई व्यवस्था बहाल करनी है तो द गोल्डेन पीरियड शैल बी इन द फ्यूचर, व्हिच वी शैल टेक; इफ नॉट पॉसिबल वी शैल स्नैच – [तो स्वर्णिम काल आगे चल कर आएगा, जिसे हम बनाएंगे और यदि यह संभव नहीं हुआ तो हम छीन लेंगे] मैं चाहता था कि इस नजरिए से अपनी एक बात रखूं।

महोदय, हम अक्सर अतीत के नोस्टॉलजिया [विषाद] में जाते हैं। नोस्टॉलजिया में कहते हैं कि प्राचीन काल में ऐसा था, प्राचीन काल में वैसा था। मैं पेरियार को कोट [उद्दृत] करना चाहता हूं। उत्तर भारत में अभी भी बहुत कम लोग ऐसे हैं,जिन्होंने उनके नाम के सिवाय उनकी रचनाओं को भी पढ़ा हो। 

महोदय, यह एक किताब है– ‘सच्ची रामायण’। यह बैन [प्रतिबंधित] कर दी गई थी। उनकी कई अन्य किताबें भी बैन हुईं। उनकी किताबें बैन होने के बाद जब लोगों ने संघर्ष किया तो पेरियार के बारे में इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने क्या कहा, यह हम सबको जानना चाहिए। 

राकेश जी, मैं इसे आपके समक्ष रखता हूं, ‘हमें यह मानना संभव नहीं लग रहा है कि इसमें लिखी बातें आर्य लोगों के धर्म को अथवा धार्मिक विश्वासों को चोट पहुंचाएंगीं। लेखक का उद्देश्य जान-बूझकर हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की बजाए, अपनी जाति के साथ हुए अन्याय को दिखलाना भी हो सकता है, निश्चय ही ऐसा करना असंवैधािनक नहीं माना जा सकता है।’ 

यह इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है। पेरियार का क्या मानना था, क्या हमें उसे नहीं देखना चाहिए! बाबा साहेब का क्या मानना था! क्यों ऐसा होता है कि प्राचीन भारत की हमारी संकल्पना . जो हमारे तमिलनाडु के साथी भी कह रहे थे, शिवदासन जी भी कह रहे थे – उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान, यह जो काऊ बेल्ट [गाय पट्टी] है, इसकी संकल्पना को ही हम प्राचीन भारत की संकल्पना मानेंगे, तो कैसे होगा – ‘एक भारत,श्रेष्ठ भारत’। ‘एक भारत,श्रेष्ठ भारत’ के लिए अगर आप कहते हैं कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक है तो सांस्कृतिक विविधता और बहुलवाद के आधार पर बिना एथ्नो सेंट्रिक एप्रोच के हमें आगे बढ़ना होगा। 

सर, मैंने अतीत के उलटे पांव की यात्रा की बात कही। क्रिटिकल पॅडोगॉजी [समालोचनात्मक शिक्षण] एक चीज़ होती है। एजुकेशन (शिक्षा) की कई डिफिनेशंस [परिभाषाएं] हो सकती हैं, लेकिन अल्टीमेट [बुनियादी] परिभाषा क्या है – एजुकेशन शुड बी ऍन इंस्ट्रूमेंट फॉर इमॅनशिपेशन [शिक्षा मुक्ति का, स्वतंत्रता का उपकरण होना चाहिए]। उन लोगों को हर तरह के बंधनों से आज़ाद करें। चाहे वैचारिक बंधन हों, या धार्मिक बंधन हों, या किसी भी प्रकार का बंधन हो।

प्रो. मनोज कुमार झा, राज्यसभा सांसद

उपसभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से यहां दो चीजें रेफर करना चाहूंगा। दो किताबें हैं। पहली मणि मुग्ध शर्मा ने ‘अल्लाहू-अकबर’ किताब लिखी। उन्होंने अकबर को कांटेंपररी [तत्कालीन सन्दर्भों] में समझने की कोशिश की और दूसरा हमारे जयराम रमेश जी की किताब ‘द लाइट ऑफ एशिया : द पोएम दैट डिफाइंड द बुद्धा’। मैं आग्रह करूंगा कि इन इन किताबों को पढ़ा जाए। इनसे संदर्भ व्यापक होगा। हम तो यह कहते कि वैश्विक दृष्टिकोण क्या है? विश्वविद्यालय में विश्व शब्द पहले क्यों आता है? ऐसे ही यूनिवर्सिटी का अनुवाद विश्वविद्यालय नहीं हुआ। दर्शन वैश्विक होना चाहिए, साइंटिफिक टेंपरामेंट [वैज्ञानिक समझ] होना चाहिए, अन्यथा प्रो. तुलसीराम जी ने जो आत्मकथाएं लिखीं, वे न लिखनी पड़तीं, ओमप्रकाश वाल्मीकि को ‘जूठन’ नहीं लिखना पड़ता और रोहित वेमुला को दुनिया से नहीं जाना पड़ता। यह हमारी हकीकत है। मैं यह नहीं कहता कि आपने ही यह हकीकत पैदा की, लेकिन पैदा हुई हकीकत के खात्मे के लिए हमने साझा रूप से कुछ नहीं किया। हम इस हकीकत से कंफर्टेबुल [संतुष्ट] हैं। अरे, जाति है कि जाती नहीं, स्वीकार कर लिया। यह क्यों नहीं जा रही है? यानी यह प्रीविलेज [विशेषाधिकारों] का बंटवारा है। जो प्रीविलेल्ड [विशेषाधिकार प्राप्त लोग] हैं, उनको खुशी है कि रिचुअल, सिंबॉलिक [औपचारिक, प्रतीकात्मक] बातें बोलकर बाकी बनी रहे जाति। इसी सदन में बैठे बहुत से लोगों को शिक्षा के लिए सघर्ष करना पड़ा होगा, शायद हममें से बहुतों को नहीं करना पड़ा। राकेश जी को नहीं करना पड़ा होगा, मुझे नहीं करना पड़ा।

अंग्रेजी में एक कहावत है – देयर इज नथिंग इन अ नेम [नाम में कुछ नहीं रखा है]। हम हिंदुस्तानी हैं – देयर इज अ लॉट इन द सरनेम [परन्तु यहाँ सरनेम में बहुत कुछ है]। नाम में कुछ नहीं है, लेकिन सरनेम में सब कुछ है। सरनेम ही तय करता है कि कहां तक पहुंचोगे और कहां रोक दिए जाओगे। मैं यह कहना चाहता था कि उसके लिए वैश्विक दृष्टिकोण है। जैसे आप बाबा साहेब आंबेडकर को माला पहनाएंगे, अप्रैल के महीने में कई आयोजन भी किए जाएंगे, लेकिन यह नहीं सोचेंगे कि जॉन डेवी का बाबा साहेब पर क्या इंफ्लूएंस [प्रभाव] था? जॉन डेवी से बाबा साहेब को अलग कर देंगे, तो कुछ हासिल नहीं होगा। फिर यह वही बात हो गई कि मेरे दादा के पास एक हाथी था, हाथी मर गया, लेकिन मैं इस हाथी के सपने में आज भी कविताएं लिख रहा हूं। हमें इस प्रवृत्ति से बचना होगा। मैं फिर कहना चाहता हूं कि सावित्रीबाई फुले ने मैकॉले के बारे में क्या कहा, मार्डन एजुकेशन [आधुनिक शिक्षा] के बारे में क्या कहा, इंग्लिश इंस्टीट्यूशंस और इंग्लिश एजुकेशन [पश्चिमी संस्थाओं और पश्चिमी शिक्षा] के बारे में क्या कहा?

पेरियार, सावित्रीबाई फुले, जोतिबा फुले, बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर – आप एक साझी सोच देखिए। क्यों हमारे दलित-बहुजन चिंतक उस तरह से नहीं सोचते हैं, जैसा आप सोच रहे हैं, जैसा आपका रिजोल्यूशन [प्रस्ताव] सोच रहा है। कहीं तो केमिकल लोचा है। ऐसा क्यों हो रहा है, उसको एड्रेस करने [देखने] की जरूरत है।

सर, आज भी हमारे यहां क्वालिटी एजुकेशन [गुणवत्तापूर्ण शिक्षा] की बात नहीं होती है। अकसर हम आंकड़ों में यह देखते हैं कि इतना पैनिट्रेशन [कितने नीचे स्तर तक शिक्षा पहुँची] हुआ, लेकिन यह नहीं देखते हैं कि गुणवत्ता पर कितना काम हुआ, एक्सेस [पहुँच] पर कितनी बात हो रही है। अभी कोरोना के दौरान डिजिटल एजुकेशन ने प्रीविलेज्ड को और प्रीविलेज्ड बनाया और बाकियों से सब कुछ छीन लिया। अभी रिसर्च [शोध] की बात कर रहे हैं और एमफिल खत्म कर दी गयी है। क्या इसका कोई आधार था? न्यू एजुकेशन पॉलिसी [नई शिक्षा नीति] आई। उसके बहुत गाने गाए जा रहे हैं, लेकिन दुख के साथ कहता हूं कि सदन में न्यू एजुकेशन पॉलिसी की चर्चा नहीं होती है। 

माननीय उपसभापति जी, मैं आपके समक्ष दुख के बारे में इसलिए भी कह रहा हूं, क्योंकि आप बहुत गंभीरता से सुनते हैं। दुख इसलिए भी होता है कि साल-दर-साल मुझसे पहले भी कई लोग बोले होंगे, पिछले सदन में भी बोला होगा, लेकिन हमारी कुछ सामाजिक हकीकत भी है, वह जा नहीं रही है। जब तक वह हकीकत नहीं जाएगी, मैं फिर से एक मिनट का समय लूंगा, मैंने पहले भी सदन में कहा कि मेरे साथ एक स्टूडेंट पढ़ता था और वह बहुत ब्राइट स्टूडेंट [प्रतिभाशाली] था, उसके दसवीं कक्षा में हमेशा मुझसे अच्छे अंक आते थे। मैंने दसवीं कक्षा के बाद जब पता किया कि वह कहां हैं, तो मुझे यह पता चला कि वह चाय की दुकान खोलकर बैठा है। क्योंकि वह फर्स्ट जेनरेशन लर्नर (पहली पीढ़ी का विद्यार्थी) था। उसके परिवार में कोई नहीं था। मेरे माता-पिता दोनों प्रोफेसर थे। 

सर, ज्यादातर संसाधन तय करते हैं, जाति तय करती है, सरनेम तय करता है, अगर इस हकीकत को हम सब स्वीकार करेंगे, तो शायद आज नहीं तो कल हम इसका निदान खोज पाएंगे।

प्राचीन विश्वविद्यालयों के बारे में आपकी चिंता बहुत अच्छी लगी, लेकिन प्राचीन के लिए आंसू बहाने से पहले जरा हम पहले समकालीन विश्वविद्यालयों को भी देख लें। अगर मैं अपने ही बिहार को, उत्तर प्रदेश को और अलग-अलग राज्यों को देखता हूं, तो वाइस चांसलर्स [कुलपति] के अप्वाइंटमेंट [नियुक्ति] का तरीका – फिर मैं यह कह रहा हूं कि यह मत कहिएगा कि आपकी आलोचना कर रहा हूं – वाइस चांसलर का अप्वाइंटमेंट एक खैरात की तरह बंटता है, तो दिलचस्पी इस बात में नहीं है कि विश्वविद्यालय का विमर्श व्यापक हो, विश्वविद्यालय का अपना वाला कहां एडजस्ट हो जाए, जब तक यह परंपरा खत्म नहीं होगी, मैं समझता हूं कि दिक्कत रहेगी। 

राकेश जी, एक फ्रेज [वाक्यांश] मुझे बहुत अच्छी लगी, मैं बधाई देता हूं। राकेश जी, मुस्कराइए, आप इतने गंभीर क्यों बैठे हैं? विचारों का स्वराज, यह सुनने में कितना अच्छा लगता है – सचमुच बहुत अच्छा लगता है। आजकल जितने भी ये स्लोगन्स [नारे] आ रहे हैं। वे सुनने में बहुत अच्छे लगते हैं, उनकी ध्वनि बहुत अच्छी लगती है, लेकिन ध्वनि को समझने के लिए उसके अंतर्निहित तत्व को समझें। यह जो विचारों का स्वराज है, इसमें कौन-कौन से विचार होंगे, इसमें इंक्लूलन-एक्सक्लूजन क्राइटेरिया [बहिष्करण और समावेशीकरण के मानदंड] क्या होगा, कौन से विचार आपको प्रीतिकर लगेंगे और कौन से अप्रीतिकर लगेंगे, कौन से विचारों को आप कहेंगे कि वे देशद्रोही हैं या देश के खिलाफ विचार हैं, कौन सा विचार ऐसा है, जो देशभक्त विचार है, क्योंकि हम तो यहां देख रहे हैं कि एक कपड़ा भी कंट्रोवर्सी [विवाद का विषय] बन जाता है, जहां आपस में बाड़ें खिंच जाती हैं, जहां तस्वीरें बदल जाती हैं। आपने गांधी जी को कोट किया। गांधी जी ने कई दफा प्रार्थना-प्रवचनों में कहा कि मैं अपने घर के दरवाजे-खिड़कियों को बंद नहीं करना चाहता हूं। सर, मैं बस एक मिनट में अपनी बात खत्म कर दूंगा। गांधी जी ने कहा था कि मैं घर के दरवाजे-खिड़कियों को बंद नहीं करना चाहता हूं, तो हम क्यों बंद करना चाहते हैं? हमें नहीं बंद करने चाहिए। वेस्टर्न इंस्टीट्यूशंस और वेस्टर्न एजुकेशन ने बहुत सारी चीज़ें दी हैं। मैं यह भी मानता हूं कि डेमोक्रेसी [लोकतंत्र] का जो स्वरूप हमारा पहले था और जो स्वरूप आज है, क्या उसमें फर्क नहीं है? उसमें फर्क है। इसलिए मैं कह रहा हूं कि अपने ट्रेडिशन [परम्परा] पर गर्व जरूर होना चाहिए, लेकिन नज़िरया क्रिटिकल [समालोचनात्मक] होना चाहिए। गांधी जी ने कंपोजिट नेशन [समग्र राष्ट्र] की बात भी कही थी। एंड आई कोट, “द रिजोल्यूशन इग्नोर्स वेस्टर्न एंड एशियन इमेजनिंग्स ऑफ नेशनल हिस्ट्रीज व्हीच हैव गॉन बियांड द बाउंड्रीज ऑफ द नेशन” [मैं उद्धृत करता हूं, “यह प्रस्ताव राष्ट्रीय इतिहास की वैश्विक और एशियाई समझ को नज़रअंदाज़ करता है, वह समझ जो राष्ट्र की सीमाओं के पार की है] । हमने वेस्ट [पश्चिम] को कितना दिया है, इसकी पड़ताल हो। हमने वेस्ट को बहुत दिया ह है, इसलिए एहसास-ए-कमतरी में नहीं सोचना है। मेरा मानना है कि ऐसी व्यवस्थाएं हों, जैसे आपने रिसर्च इंस्टीट्यूट [शोध संस्थान] की बात की है, वह बहुत बढ़िया है, लेकिन वहां भी यह तय होना चाहिए कि एक्सक्लूजन-इन्क्लूजन के क्राइटेरिया [बहिष्करण और समावेशीकरण के मानदंड] क्या हैं? 

अगर हम वह नहीं करेंगे, तो इंडियनेस [भारतीयता] के नाम पर कहीं ऐसा न हो कि एक बहुत संकीर्ण दायरे की सोच में उल्टे पांव की यात्रा करते रहें। उल्टे पांव की यात्रा के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि आपको पता नहीं होता है कि आप कब खाई में गिर जाते हैं। इन्हीं शब्दों के साथ, मैं इस रिजोल्यूशन [प्रस्ताव] पर अपनी आपत्ति दर्ज कर रहा हूं – इसके कुछ तत्वों पर, इसके मर्म पर नहीं। बस व्यवस्थाएं ऐसी हों कि फिर से एजुकेशन कुछ प्रीविलेज्ड [शिक्षा कुछ विशेषाधिकार प्राप्त] वर्गों के हाथों की मुट्ठी की चीज़ न हो जाए, क्योंकि एजुकेशन (शिक्षा) ने इमानशिपेशन [मुक्ति] के लिए काफी कुछ किया है, उसका डेमोक्रेटाइजेशन [लोकतांत्रिकरण] हुआ है। 

सर, अगर इस तरह की पद्धतियों से हम आगे चलेंगे, तो वह डेमोक्रेटाइजेशन का प्रोसेस [लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया] रूक जाएगा। राकेश जी, आखिर में आपके लिए

“अब भीख मांगने के तरीके बदल गए,

लाजिम नहीं कि हाथ में कासा दिखाई दे।”

जय हिंद!

(साभार : संसद टीवी)


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