आज की पीढ़ी के लिए क्यों आवश्यक है सावित्रीबाई फुले का स्मरण?

उस दौर में जब स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करना ही पाप माना जाता था, तब ऐसे में पढ़ाने जैसा कार्य करने के लिए सावित्रीबाई फुले को सामाजिक और पारिवारिक तमाम तरह के विरोधों का सामना करना पड़ा। समरण कर रही हैं डॉ. संयुक्ता भारती

आज इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में जब हम महिलाओं को देखते हैं तो हम यह पाते हैं कि समाज के हर क्षेत्र में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी है। इसकी प्रणेता सावित्रीबाई फुले ही रहीं। वह 19वीं सदी के दौर की ऐसी महिला थीं, जिन्होंने अपने समय को पढ़ा भी, लड़ा भी और स्वयं को गढ़ा भी। आज के दौर में भी अनेक सवाल ऐसे हैं जो उस दौर में भी थे और आज भी हैं। ऐसे में सावित्रीबाई फुले का जीवन, उनके संघर्ष और उनके योगदानों को स्मरण करना आवश्यक हो जाता है। 

सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवन में प्राप्त अनुभवों से स्त्री-जीवन में नई मोड़ की शुरूआत की। उनका जन्म 3 जनवरी, 1831 को नायगांव (सतारा, महाराष्ट्र) में हुआ। सन् 1840 में उनका विवाह जोतीराव फुले से हुआ। तब उनकी उम्र महज 9 वर्ष थी। उनकी शिक्षा का उनके पति जोतीराव की देख-रेख में आंरभ हुआ। जोतीराव ने उन्हें शिक्षिका बनाने की ठानी। उन्होंने पूना में मिसेज मिचेल नामक एक ब्रिटिश महिला के शिक्षक प्रशिक्षण स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। छात्रावस्था में ही सावित्रीबाई फुले ने नीग्रो दासता के विरूद्ध संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी थॉमस क्लार्कसन की जीवनी पढ़ी थी। उनकी संघर्ष यात्रा व साहस से वह काफी प्रभावित थीं। वह भारतीय समाज के अछूत व महिलाओं के कल्याण के लिए शिक्षा को आवश्यक समझने लगीं। 

वह 19वीं सदी में सामाजिक जीवन को अंगीकार करने वाली पहली भारतीय महिला थीं। उस दौर में जब स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करना ही पाप माना जाता था, तब ऐसे में पढ़ाने जैसा कार्य करने के लिए सावित्रीबाई फुले को सामाजिक और पारिवारिक तमाम तरह के विरोधों का सामना करना पड़ा। कहना न होगा कि उस दौर के विरोध और अड़चनें कई रूपों में आज भी यह मौजूद हैं। आज भी महत्वाकांझी और आत्मविश्वास भरी महिलाओं को कई तरह के विरोध, व्यांय झेलने होते हैं।

सावित्रीबाई फुले की पेंटिंग

सावित्रीबाई ने न केवल अध्यापन कार्य किया, बल्कि उन्होंने महिला मंडल की स्थापना भी की, जिसका उद्देश्य महिलाओं की समस्याओं व उनकी शिक्षा पर ध्यान देना था। उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया और अपने पति के साथ मिलकर अभियान चलाया। साथ ही, कम उम्र में ही विधवा हो जानेवाली महिलाओं के पुनर्विवाह के प्रयास किये। वे अपने संस्था के माध्यम से पन्द्रह दिनों में नारी समस्याओं पर सभा आयोजित करती थीं। वास्तव में यह संगठन ही भारत में नारी मुक्ति का प्रथम संगठन था। इस लिहाज से वे नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रथम नेत्री सावित होती है। 

सावित्रीबाई की प्रेरणा व सलाह से जोतीराव ने यौन शोषण की शिकार गर्भवती विधवा महिलाओं के प्रसव के लिए एक प्रसूति गृह की स्थापना की। यह कार्य अपने तरह का अलग और क्रांतिकारी कार्य था। यह वह विषय था, जिसके बारे में समाज सुधारक कहे जाने वाले अन्य किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। 

सावित्रीबाई और जोतीराव ने मिलकर 28 जनवरी, 1853 को पहला शेल्टर होम और प्रसूति गृह खोला और नाम रखा बाल हत्या प्रतिबंधक गृह। सावित्रीबाई ने इस गृह की पूरी जिम्मेदारी संभाली। यहां रहने की समय सीमा नहीं थी और बच्चे का ले जाने की या छोड़ने की बाध्यता नहीं थी। 

सावित्रीबाई फूले की जितनी क्रांतिकारी विचारों की धनी थीं, उतनी ही सृजनशील भी थीं। उन्होंने शिक्षा, जातीय विषमता, बाल-कल्याण और किसानों की वास्तविक स्थिति आदि विषयों पर लेख लिखे। उनमें वे सारे गुण थे जो एक अच्छे साहित्यकार में होते है। इसका प्रमाण है– उनका प्रथम काव्य संग्रह, जो 1854 में ‘काव्य फुले’ के नाम से प्रकाशित हुआ। इनका दूसरा काव्य संग्रह 1892 में अमरावती के करणगांव में प्रकाशित हुआ। ‘शूद्रों का दुख’ शीर्षक कविता में वह कहती है–

शूदों का दर्द
दो हजार वर्षो से भी पुराना
ब्राह्मणों के षड़यंत्रों के नाल में
फंसी रही उनकी सेवा 

उनके कविताओं में तर्क, ऐतिहासिकता और संदेश का संतुलन है। वे कुशल वक्ता  भी थीं। उन्होंने समय-समय पर जनसाधारण के समक्ष सीधे अपनी बात रखी। 1890 में जोतीराव फुले के निधन के बाद भी सावित्रीबाई फुले दृढ़तापूर्वक सामाजिक कार्यों में जुटी रहीं। सत्यशोधक समाज संगठन के जरिए वह 1897 में प्लेग से जुझ रहे लोगों की मदद करती रहीं। इसी दौरान एक बच्चे को इलाज के लिए पीठ पर लाद कर ले जाने के क्रम में वह भी संक्रतित हो गयीं और उनका देहावसान 10 मार्च, 1897 को हो गया।

(संपादन : नवल/अनिल)


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