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नेतरहाट के आदिवासियों के पक्ष में उतरे राकेश टिकैत

नेतरहाट के आदिवासी फील्ड फायरिंग रेंज के लिए अधिगृहित जमीन को मुक्त कराने के लिए संघर्षरत हैं। बीते 22-23 मार्च को दो दिवसीय विरोध कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें किसान नेता राकेश टिकैत भी शामिल हुए। विशद कुमार की खबर

बीते 22-23 मार्च, 2022 को झारखंड के लातेहार जिला अंतर्गत नेतरहाट के टुटुवापानी में बड़ी संख्या में आदिवासी जुटे थे। मौका था ‘नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जनसंघर्ष समिति’ की ओर से आयोजित दो दिवसीय विरोध एवं संकल्प दिवस कार्यक्रम का। इसमें प्रसिद्ध किसान नेता राकेश टिकैत भी शामिल हुए। अपने संबोधन में टिकैत ने कहा कि जहां भी गरीब, मजदूर और किसानों का आंदोलन होगा, वहां मेरा समर्थन रहेगा। कोई भी आंदोलन आदमी से नहीं, बल्कि विचारधारा से चलता है। ऐसे आंदोलनों में युवाओं को आगे आना होगा। 

टिकैत ने अपने संबोधन में कहा कि नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज निर्माण के विरोध की शुरुआत लगभग 3 दशक पूर्व हुई थी। आंदोलन की शुरुआत करने वाले कई लोग आज जीवित नहीं होंगे। बावजूद इसके, यह आंदोलन आज भी मजबूती से चल रहा है। यह जनसंघर्ष समिति की सबसे बड़ी जीत है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में एक आंदोलन शुरू हुआ था, जो 13 महीने तक चला। इस आंदोलन को पूरे देश का समर्थन मिला। जिसके बाद हमारी जीत हुई। उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 विचारों के आदान-प्रदान का साल है। देश में गरीब, मजदूर और किसान जहां भी आंदोलन करेंगे, मेरा उनको भरपूर समर्थन मिलेगा। किसान अपनी जमीन नहीं देना चाहते हैं, क्योंकि यह उनका अधिकार है। सरकार जमीन लेने की बजाए शिक्षा देने का काम करे, तो समाज एवं देश की प्रगति होगी। 

बताते चलें कि पूर्व में सरकार द्वारा अधिसूचना के अनुसार नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अवधि 11 मई 2022 को समाप्त हो जाएगी। वक्ताओं ने कहा कि यह इलाका संविधान की 5वीं अनुसूची में अधिसूचित है और 5वीं अनुसूची इलाके में केन्द्र सरकार व राज्य सरकार की एक इंच जमीन नहीं है। यहां के प्राकृतिक संसाधन जल, जगंल, जमीन पर यहां के समुदाय का सामुदायिक अधिकार है। पेसा कानून के अन्तर्गत स्पष्ट है कि ग्राम सभाओं की सहमति के बगैर कोई भी गांव का सामुदायिक संसाधन किसी को भी हस्तान्तरित नहीं किया जा सकता है। 

नेतरहाट में राकेश टिकैत

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए माले विधायक विनोद सिंह ने कहा कि “गत 20 दिसंबर, 2021 को विधानसभा में मैंने सरकार से कहा था कि बिहार सरकार की अधिसूचना संख्या 1862 दिनांक 20.08.1999 के अनुसार नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज का उक्त क्षेत्र के ग्रामीण विरोध कर रहे हैं। इस बावत मैंने यह भी पूछा था कि यह एक इको सेंसेटिव क्षेत्र है और 11 मई, 2022 को राज्य सरकार फील्ड फायरिंग रेंज की समयावधि विस्तार पर रोक लगाने का विचार रखती है? इस सवाल पर सरकार ने बताया कि इस संबंध में विभाग को अब तक कोई प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है।” विनोद सिंह ने कहा कि फायरिंग रेंज की समयावधि विस्तार पर सरकार जब तक रोक नहीं लगाती तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा।

कोयलकारो आन्दोलन को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध की अगुवाई करने वाले रेजन गुड़िया ने कहा कि इसी राज्य के खूंटी के मुण्डाओं तथा स्थानीय समुदायों ने अपने सामुदायिक संसाधनो की रक्षा का संघर्ष किया। आज केन्द्र और राज्य सरकार को परियोजना को स्थागित करने पर मजबूर होना पड़ा। आज जनसंघर्ष ही एकमात्र रास्ता है। 

केंद्रीय जनसंघर्ष समिति के वरिष्ठ सदस्य अनिल मनोहर ने कहा कि हम जिस मजबूती से विगत 29 वर्षों से इस विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक आन्दोलन को जारी रखे हुए हैं, इसे आने वाली पीढ़ी और धार देगी, हमारे संघर्ष की जीत पक्की है। आज पूरे आन्दोलन क्षेत्र के ग्राम सभाओं ने अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए अपने अपने ग्राम सभाओं से फायरिंग रेंज के विरोध में प्रस्ताव पारित किये है। प्रस्ताव की कापी झारखंड के राज्यपाल एंव सरकार को भेज दी जा रही है। 

विरोध सह संकल्प सभा में पड़हा सभा ने फायरिंग रेंज का विरोध प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया कि झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार व्यापक जनहित में प्रस्ताव पारित कर इस अधिसूचना को स्थाई रूप से परियोजना को रद्द करे। साथ ही कार्यक्रम में शामिल रहे सौ गांवों के ग्राम प्रधानों ने एक स्वर में 25 अप्रैल टूटूवापानी आन्दोलन स्थल से पद यात्रा कर राज्यपाल को ज्ञापन देने पर अपनी सहमति दी।

कार्यक्रम में रतन तिर्की, बासवी किंडो, दयामनी बारला, प्रभाकर तिर्की, बलराम, जेम्स हेरेंज, अनिल मनोहर, जस्निता केरकेट्टा, कुरदुला, ज्योति लकड़ा, मेघा श्रीराम, सेलेटिन कुजूर, सुनील मिंज, जेरोम जेराल्ड कुजूर, प्लादीयूस सेवती पन्ना, लाद टोप्पानो, मंथन, आर्यन उरांव, जनार्दन भगत, सतीश उरांव, प्रमोद खलखो, मकदली टोप्पो आदि उपस्थित थे।

क्या है मामला?

गौरतलब है कि युद्ध अभ्यास के लिए अंग्रेजों ने नेतरहाट के इस इलाके में जमीन का अधिग्रहण किया था। बाद में मैनूवर्स, फील्ड फायरिंग एंड आर्टिलरी प्रैटिक्स एक्ट, 1938 की धारा 9 के तहत 1991-92 में तत्कालीन बिहार सरकार ने न केवल इसकी अवधि का विस्तार किया बल्कि क्षेत्र का विस्तार करते हुए 8 गांवों से बढ़ा कर 245 गावों को तोपाभ्यास के लिए पायलट प्रोजेक्ट के रूप में अधिसूचित कर दिया। इस संबंध पीयूसीएल द्वारा अक्टूबर, 1994 में जारी रपट बताती है कि सरकार की मंशा इसके जरिए स्थाई विस्थापन एवं भूमि अर्जन की योजना को आधार दिया जाना था। केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति के प्रतिनिधियों ने माना कि रूटीन तोपाभ्यास के कारण ही यह पायलट प्रोजेक्ट जैसी परियोजना सामने आई है। अतः केन्द्रीय समिति ने निर्णय लिया यदि पायलट प्रोजेक्ट को समाप्त करवाना है, तो तोपाभ्यास को ही रोकना होगा। इसी निर्णय के तहत 20 मार्च 1994 से पहला सत्याग्रह आन्दोलन की घोषणा हुई, जिसमें लाखों की संख्या में सत्याग्रह में उपस्थित होकर सभी ने 22 मार्च 1994 को फायरिंग अभ्यास के लिए आई सेना के गाड़ियों के काफिले को वापस किया था, तब से लेकर आज तक सेना नेतरहाट के पठार पर तोपाभ्यास के लिए नहीं आई है। लेकिन मूल सवाल यानी जमीन का सवाल यथावत है। जमीन पर आदिवासियों काे अधिकार नहीं दिया गया है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विशद कुमार

विशद कुमार साहित्यिक विधाओं सहित चित्रकला और फोटोग्राफी में हस्तक्षेप एवं आवाज, प्रभात खबर, बिहार आब्जर्बर, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, सीनियर इंडिया, इतवार समेत अनेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए रिपोर्टिंग की तथा अमर उजाला, दैनिक भास्कर, नवभारत टाईम्स आदि के लिए लेख लिखे। इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन के लिए काम कर रहे हैं

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