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मौजूदा संदर्भ में डॉ. आंबेडकर का स्त्री विमर्श

लैंगिक विमर्श को लेकर डॉ. आंबेडकर स्पष्ट दृष्टिकोण रखते थे। उनका लैंगिक परिप्रेक्ष्य क्या था? वे जाति को किस प्रकार देखते थे? अपनी पुस्तक “जाति का विनाश” (1936) में वे बताते हैं कि भारतीय संदर्भ में विभिन्न समुदायों में वर्गीय अंतर किस प्रकार जाति में बदल गए। बता रही हैं डॉ. संयुक्ता भारती

डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956) पर विशेष

भले ही हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश कर गये हैं और सुविधाओं एवं तकनीक की दृष्टि से आधुनिक भी होते जा रहे हैं, लेकिन आज भी भारत में स्थितियां विषम ही हैं। फिर वह चाहे शिक्षा का मामला हो, या फिर सामान्य रहन-सहन के संदर्भ में। यहां तक कि भाषा व बोली के संकेतों में भेद मूलक सोच परिलक्षित होते हैं। ऐसा भी कह सकते है कि हम तकनीक के क्षेत्र में आगे हैं, परंतु हमारी सोच अब भी यथावत रूढिवादी है। 

अभी कुछ दिनों पहले ही अपने शहर भागलपुर के एक भीड़-भाड़ वाले इलाके से गुजर रही थी। वहां एक रेस्तरां के साइन बोर्ड पर नजर पड़ी। देखकर माथा ठनका। साइन बोर्ड पर लिखा था– “सेकेंड वाइफ”। जाहिर तौर पर यह शब्द युग्म खास तरह की/पितृसत्तात्मक मानसिकता को इंगित करता है जो कि आज भी महिलाओं के संदर्भ में भारतीय पुरुषों के दिमाग में भरा पड़ा है। हालांकि अब यह एक तरह पैटर्न बन गया है और लोगों को लगता है कि उनके ऐसे शब्दों के उपयोग से उनके व्यवसाय को लाभ पहुंचेगा। लेकिन मामला केवल यहीं तक सीमित नहीं है। 

इसी तरह की एक घटना मेरे साथ हुई। एक दिन मेरी तीन साल की बेटी गरिमा हिंदी की एक कविता, जो उसने यू-ट्यूब से सीखी थी, गुनगुना रही थी। उसकी पंक्तियां थीं– “धोबी आया, धोबी आया, कितने कपड़े लाया”। जाहिर तौर पर इस पंक्ति में बच्चों के लिए न तो कुछ मनोरंजन है और ना ही शिक्षाप्रद। तो सवाल है कि आज बच्चों को क्या सिखाया जा रहा है? और यह भी कि क्या इन पंक्तियों के माध्यम से अबोध मन में जातिवाद का विषैला बीज नहीं बो रहे?

दरअसल, समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिहाज से भी देखें तो आज बेशक हम स्त्री-विमर्श को लेकर आए दिन कोई न कोई चर्चा करते रहते हैं और इस तरह की गतिविधियां अकादमिक गलियारे में होती रहती हैं, लेकिन अभी भी समाज में महिलाओं के शारीरिक बनावट, उनके रहन-सहन, सामान्य व्यवहार आदि को केंद्र में रखकर फब्तियां कसी जाती हैं। यहां तक कि टेलीविजन और सिनेमा के पर्दे पर भी ऐसी फब्तियों से गुरेज नहीं किया जाता। 

25 सितंबर, 1947 को मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज में “छात्र संसद” काे संबोधित करते डॉ. आंबेडकर

तात्पर्य यह कि हमारे देश में महिलाएं ऐसी घटनाओं का शिकार ना हों, इसके लिए कानून है, परंतु राज्य और उसका तंत्र तथा समाज के लोग इसके प्रति संवेदनशील नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि महिलाएं चाहे वह अवयस्क हो या शादीशुदा महिलाएं या फिर अधेड़ महिलाएं, सभी को अपशब्द व द्विअर्थी शब्दों का शिकार होना पड़ता है। कई बार ऐसा देखा जाता है कि लोग इन शब्दों को मजाक कहकर टाल जाते हैं। जबकि असलियत में यह पितृसत्ता के वर्चस्व को बनाए रखने की साजिश है।

इससे महिलाओं के आत्मसम्मान को चोट पहुंचती है। वे तनाव झेलती हैंं और उनपर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव कई स्तरों पर उन्हें कमजोर बनाता है। भारत मे इन सबका सबसे अधिक शिकार दलित-बहुजन समाज की महिलाएं होती हैं। एक तरह से उन्हें दो प्रकार की ज्यादतियों का शिकार होना पड़ता है– एक, जातिगत भेदभाव और दूसरा, स्त्री होने की वजह से भेदभाव। इन परिस्थितियों में हमें फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर का स्मरण अनायास हो जाता है। इसकी वजह यह कि इस समस्या की स्पष्ट तौर पर पहचान इन बहुजन नायकों ने ही की। इसी क्रम में डॉ. आंबडेकर ने 9 अप्रैल, 1948 को संविधान सभा के समक्ष हिन्दू कोड बिल का प्रारूप प्रस्तुत किया, जिसमें मूल रूप से तो भले ही बिना वसीयत किए मृत्यु को प्राप्त हो जाने वाले हिंदू पुरूषों और महिलाओंं की संपत्ति के बंटवारे के संबंध में कानूनों को संहिताबद्ध किए जाने का प्रस्ताव था, लेकिन इसका संबंध महिलाओं की अन्य समसयाओं से भी था। मसलन, यह विधेयक मृतक की विधवा, पुत्री और पुत्र को उसकी संपत्ति में बराबर का अधिकार देता था। इसके अतिरिक्त, पुत्रियों को उनके पिता की संपत्ति में अपने भाईयों से आधा हिस्सा प्राप्त होता। हिन्दू कोड बिल दो प्रकार के विवाहों को मान्यता देता था– सांस्कारिक व सिविल। उसमें हिन्दू पुरूषों द्वारा एक से अधिक महिलाओं से शादी करने पर प्रतिबंध और तलाक संबंधी प्रावधान भी थे। विधेयक में यह प्रावधान भी था कि किसी विवाह को अदालत द्वारा अवैध घोषित कर देने के बाद भी उससे उत्पन्न संतानों की वैधता प्रभावित नहीं होगी।

भारतीय स्त्रियों को ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के कारण होनेवाली परेशानियों पर डॉ. आंबेडकर की दृष्टि पैनी थी। वे चाहते थे कि महिलाएं किसी भी तरह से जुल्म व अत्याचार का शिकार ना हों। फिर अत्याचार करनेवाला या फिर उन्हें उत्पीड़ित करनेवाला उनका पति ही क्यों न हो। इसके लिए विधेयक में उन्होंने तलाक के लिए सात आधारों का प्रस्ताव किया था– परित्याग, धर्मांतरण, रखैल रखना या रखैल बनना, असाध्य मानसिक रोग, असाध्य व संक्रामक कुष्ठ रोग, संक्रामक यौन रोग व क्रूरता।

जाहिर तौर पर डॉ. आंबेडकर इस सोच को बदल देना चाहते थे कि पति हर हाल में परमेश्वर के समान होता है, फिर चाहे उसमें अवगुण ही अवगुण क्यों ना हों, या फिर वह अत्याचारी व उत्पीड़क क्यों ना हो। 

इसी प्रकार लैंगिक विमर्श को लेकर डॉ. आंबेडकर स्पष्ट दृष्टिकोण रखते थे। उनका लैंगिक परिप्रेक्ष्य क्या था? वे जाति को किस प्रकार देखते थे? अपनी पुस्तक “जाति का विनाश” (1936) में वे बताते हैं कि भारतीय संदर्भ में विभिन्न समुदायों में वर्गीय अंतर किस प्रकार जाति में बदल गए। आंबेडकर जाति को एक ऐसा बंद वर्ग बताते हैं, जिसका मुख्य लक्षण है जाति के अंदर ही विवाह। उनकी यह मान्यता थी कि सबसे पहले ब्राह्मण वर्ग ने स्वयं को बंद किया और अन्यों को बाहर कर दिया। फिर अन्य जातियों को भी ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया। आंबेडकर मानते थे कि इसके लिए उनके उपर कड़ी रोक लगाई जाती थी और महिलाओं पर कठोर नजर और नियंत्रण में रखा जाता था। आंबेडकर की यह राय थी कि जाति के निर्माण, संरक्षण और पुनरूत्पादन के लिए महिलाओं का इस्तेमाल किया जाता था। उनका कहना था कि निम्न जातियों और महिलाओं के दमन के लिए जाति-लैंगिक गठजोड़ जिम्मेदार है और उसका समूल नाश आवश्यक है। इस प्रकार आंबेडकर जाति के साथ-साथ लैंगिक विभेद का भी उन्मूलन करना चाहते थे। उदाहरण के लिए सन् 1927 में महाड़ सत्याग्रह के दौरान महिलाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने अपनी व्यथा का वर्णन किया था। उन्होंने कहा था– “तुम लोगों ने हम पुरूषों को जन्म दिया है। तुम लोग जानती हो कि कैसे अन्य लोग हमें जानवरों से भी कमतर मानते हैं। कुछ स्थानों पर लोग हमारी छाया भी उन पर नहीं पड़न देना चाहते। दूसरे लोगों को अदालतों और कार्यालयों में सम्मानजनक कार्य मिलता है। परंतु तुम्हारे गर्भ से पैदा हुए पुत्रों को इतनी नीची नजरों से देखा जाता है कि हम पुलिस विभाग में चपरासी भी नहीं बन सकते। अगर हममें से कोई तुमसे पूछे कि तुमने हमें जन्म क्यों दिया तो तुम क्या उत्तर दोगी? हम लोगों और कायस्थ व अन्य ऊंची जातियों की महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए संतानों में क्या अंतर है…।”

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

संयुक्ता भारती

तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, बिहार से पीएचडी डॉ. संयुक्ता भारती इतिहास की अध्येता रही हैं। इनकी कविताएं व सम-सामयिक आलेख अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

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