धर्म राज्य की स्थापना के नाम पर ब्राह्मण राज्य की आहट

भागवत के शब्दों में भी इसकी आहट प्रतिध्वनित हो रही हैं कि जो संस्था और व्यक्ति धर्म और राष्ट्र के उत्थान में कार्यरत हैं, संघ उनका सहयोगी हैं। इसका संदेश बहुत साफ़ हैं कि या तो उनके द्वारा गढ़ी गई परिभाषाओं के धर्म व राष्ट्र के उत्थान में लगें, अन्यथा पतन के लिए तैयार रहें। बता रहे हैं भंवर मेघवंशी

देश में दक्षिणपंथी धारा के व्यक्तियों और समूहों के लोगों की ज़हर उगलती हुई ज़ुबानें निरंतर लंबी होती जा रही हैं। कहीं चिंतन बैठकें चल रही हैं तो कहीं धर्म संसदें, सब तरफ़ अराजकतापूर्ण भाषा में देश के संविधान, क़ानून और व्यवस्था की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। निर्वाचन की राजनीति में लगातार मिल रही सफलताओं से उत्साहित सांप्रदायिक तत्व पूरी तरह से निरंकुश हो चुके हैं। वे अब भारतीय राष्ट्र राज्य को चुनौती दे रहे हैं। संविधान को ललकार रहे हैं और देश को धार्मिक राष्ट्र राज्य बनाने को आतुर हो चले हैं।

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