हैदराबाद ऑनर किलिंग : सच कबूलना अनिवार्य

यह घटना कई सवालों पर गंभीरता से विचार करने की मांग करती है। एक तो यह कि सदियों से अंदर से घुन की तरह खोखला बनाने वाले जाति के सवाल को उच्च स्तर पर कभी भी ईमानदारीपूर्वक हल करने का कोई इमानदराना प्रयास नहीं हुआ। अलबत्ता जाति उन्मूलन की जगह जाति के सवाल से बचने का काम होता रहा है। अली अनवर अंसारी की टिप्पणी

हैदराबाद में पिछले दिनों ऊंची जाति के एक गरीब मुसलमान परिवार ने अपनी बेटी से प्रेम करने पर एक, गरीब दलित लड़के नागराजू की हत्या कर दी। अपनी फितरत के मुताबिक भाजपा-संघ परिवार के लोग इसे हिंदू-मुसलमान का मामला बनाना चाहते हैं। मगर, यह मामला मजहब का नहीं जाति का है। अगर उस सैय्यद मुसलमान लड़की से प्रेम करने वाला लड़का पसमांदा मुसलमान भी होता तो उसका भी हश्र कमोवेश ऐसा ही होता। 

उपरोक्त घटना में एक प्रेरक बात यह है कि उस लड़की-लड़के का प्रेम सच्चा था। लड़की ने लड़के को अपने भाइयों के हमले से बचाने की जी-तोड़ कोशिश की। 

यह घटना कई सवालों पर गंभीरता से विचार करने की मांग करती है। एक तो यह कि सदियों से अंदर से घुन की तरह खोखला बनाने वाले जाति के सवाल को उच्च स्तर पर कभी भी ईमानदारीपूर्वक हल करने का कोई इमानदराना प्रयास नहीं हुआ। अलबत्ता जाति उन्मूलन की जगह जाति के सवाल से बचने का काम होता रहा है। यह बीमारी अमीर-गरीब, उंच-नीच सभी जातियों में अभी भी गहरे बैठी हुई है। हमारे खून-हड्डी में यह घुसा हुआ है। 

नागराजु व अशरीन की शादी की तस्वीर

सवर्ण मानसिकता और नेतृत्व वाली जमातों का पूरा कारोबार तो इसी उंच-नीच वाली वर्णव्यवस्था पर टिका हुआ है। मगर, सामाजिक न्याय की बात करने वाली जमात भी इस बीमारी से लड़ने के बजाय इससे बचने की ही कोशिश करती रही है। सवर्ण जातियां हिंदू हों या मुसलमान, ये आपस में रोटी-बेटी का रिश्ता कायम कर लेते हैं। पिछड़ी जातियां आपस में ऐसा नहीं कर रही हैं। दलित-पिछड़े हिंदू हों या मुसलमान, ये भी अपनी-अपनी जातियों के बंधन में जकड़े हुए हैं। सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी इनका व्यवहार इसी तरह का है। इसके विपरीत सवर्ण जातियों के बीच राजनीतिक और सामाजिक एकता ज्यादा दिखती है। सांप्रदायिक राजनीति करने वालों को यहीं से खाद-पानी मिलता है। 

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बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर और डॉ. राम मनोहर लोहिया की बात करने वाले कई नेता भी अब खुलकर मनुवादी दर्शन के नक्शेकदम पर चल निकले हैं। जाति के सवाल पर ये खुलकर बोलने से न सिर्फ परहेज करते हैं, बल्कि सवर्णों के मान-मनुहार में लगे हुए है। मुसलमानों में जाति के सवाल से तो मानो इनलोगों ने पूरी तरह अपनी आंखें मूंद रखी हैं। गांधी से लेकर डॉ. आंबेडकर, डॉ. लोहिया, यहां तक कि मार्क्सवादी चिंतक राहुल सांकृत्यायन तक इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट हैं। इन सभी का कहना है कि धर्म बदलने से भी इंसान की सामाजिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं होता है। 

हिंदू धर्म की पूरी संरचना वर्णव्यवस्था पर टिकी हुई है। इस्लाम में तो उसूलन उंच-नीच नहीं है। फिर भी अमलन, उंच-नीच का यह सिस्टम यहां बदस्तूर कायम है। मुस्लिम फिरकापरस्ती और हिंदू सांप्रदायिकता के इसी नाभि स्थल पर चोट करने की जरूरत है। वोट के लिए दलित-मुस्लिम एकता की बात करने वाले हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने, इस घटना की निंदा की रस्म अदायगी तो कर दी है, लेकिन मुसलमानों में जातीय दुराग्रह पर वह मौन हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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