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बहुजनों की सियासत करनेवालों को संदेश दे गया बहुजन दावेदारी सम्मेलन

अनिल चमड़िया ने कहा कि हम बहुजन समाज के लोग अपनी हिस्सेदारी को लेकर जिस तरह से चिंतित रहते हैं आप बताइए कि क्या आप पांच ऐसे बहुजन लेखक बतला सकते हैं, जो हिन्दी भाषा की राजनीति को डौमिनेट करते हों, जो अपने समाज को समझते हों, उनके सवाल को रखते हों? यह आप खोजेंगे तो आपको निराशा हाथ लगेगी। हमें प्रतिनिधि नहीं, प्रतिनिधित्व चाहिए जो हमारे सवालों को हल करने का माद्दा रखता हो। पटना से अरुण आनंद की रपट

बीते 7 मई, 2022 को बिहार की राजधानी पटना के इंडियन मेडिकल एसाेसिएशन का सभागार खचाखच भरा था। सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के तत्वावधान में आयोजित बहुजन दावेदारी सम्मेलन के मंच पर देश के अनेक राज्यों से आये दलित-बहुजन बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। इस मौके पर सभी ने वर्तमान के सापेक्ष दलित-बहुजनों के सवालों, हक-हुकूक और सियासत पर मंथन किया। हालांकि सम्मेलन में बहुजन महिला वक्ताओं की अनुपस्थिति खली। 

वक्ताओं के निशाने पर वे राजनीतिक दल भी रहे, जो कथित तौर पर दलित-बहुजनों की सियासत करते हैं। सम्मेलन को पूर्व राज्यसभा सदस्य अली अनवर अंसारी, वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, चर्चित पत्रकार अनिल चमड़िया, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. लक्ष्मण यादव, प्रो. शिवजतन ठाकुर, डॉ. सिद्धार्थ, वाल्मीकि प्रसाद, डाॅ. पी.एन.पी. पाल, जितेंद्र मीणा, सुमित चैहान, बलवंत यादव, राजीव यादव, अयूब राईन, विजय कुमार चौधरी, आई.डी. पासवान, नवीन प्रजापति, रामानंद पासवान, केदार पासवान, राजेंद्र प्रसाद, और डाॅ. विलक्षण रविदास आदि ने संबोधित किया।

वर्णव्यवस्था जनतंत्र के खिलाफ : उर्मिलेश

अपने संबोधन में उर्मिलेश ने कहा कि देश में वर्णव्यवस्था के रहते लोकतंत्र की परिकल्पना कैसे की जा सकती है। उन्होंने कहा कि जैसे ही लोगों को पता चलता है कि सामने वाला दलित, आदिवासी और पिछड़ा है वैसे ही उनके मूल्यांकन की कसौटी बदल जाती है। वर्णव्यवस्था का यह चरित्र भारत में जिस तरह का है दुनिया में कहीं नहीं है। जब लोग इसके खिलाफ संघर्ष करते हैं तो इसे पहचान की राजनीति का आरोप लगाकर खारिज करने की कोशिश की जाती है। भारत में वर्णव्यवस्था और उसके अंतर्विरोध को पहचाने बगैर लोकतंत्र की कल्पना असंभव है। वर्णव्यवस्था जनतंत्र के खिलाफ है। यहां के वामपंथी सबसे पढ़े-लिखे लोग हैं बावजूद इसके वामपंथ का क्षेत्र बढ़ने की बजाय सिकुड़ता ही चला गया। त्रिपुरा, बंगाल और केरल में एक समय में उनकी सरकारें थीं, लेकिन दो जगहों से खत्म हो गए। केरल में वे दूसरी बार लगातार चुनाव जीते। वहां वे दूसरी बार लगातार चुनाव क्यों जीते इसके पीछे समाज सुधार का एक बैकग्राउंड है। केरल के वामपंथियों ने नारायण गुरु और अयंकली की परम्परा का अनुसरण किया, वहां अच्छे ईमानदार और समर्थ लोग हैं।

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की चर्चा करते हुए पत्रकार उर्मिलेश ने कहा कि आज जितने भी राजनीतिक दल हैं, वह व्यक्तियों के नाम पर है। वे सब अपने-अपने साम्राज्य रक्षा में लगी हैं, जो डरा सहमा है, वह चुनाव कैसे जीत सकता है? बसपा प्रमुख मायावती की चर्चा करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि उनका पतन क्यों हुआ और कहा कि उनके पास कांशीराम की एक महान विरासत थी, उसका विस्तार नहीं करके वह अपना परिवार बचाने में लगी हैं। उन्होंने कहा कि दुखद पहलू यह है कि एक दल है जो एलायंस बनाता और तुड़वाता भी है। 

उर्मिलेश ने अपने संबोधन में कुछ सवाल भी उठाये। मसलन, आज देश में इतनी भयावह स्थितियां क्यों हैं? क्या यह सब अपने आप अचानक हो गया या मंडलवादी शक्तियों की विफलता के कारण आया या आजादी की लड़ाई में ही वे तत्व थे, जिनके कारण यह परिस्थितियां बनीं? 

आगे उन्होंने कहा कि इन सब में कुछ न कुछ सच है। हालांकि यह सम्पूर्ण सच भी नहीं है। यह संशय आजादी की लड़ाई के समय भी था। हमारे राष्ट्र निर्माताओं में कैसा भारत बनाना चाहिए, इस सवाल को लेकर एक राय नहीं थी। कांग्रेस में गांधी के पूर्व एक बड़ा हिस्सा रूढ़िवादियों का था। वे ही कांग्रेस में वर्चस्व रख्ते थे। वे बड़े जमींदार होते थे, वे ही उस दौर में लड़ाई के अगुआ थे। गांधी ने उस कांग्रेस को ‘मास राजनीति’ की पार्टी में तब्दील किया। इसके फलस्वरूप नेहरू, पटेल जैसा नेता उभरे। आजादी की लड़ाई चल रही थी। उस दौर में बहुत सारी समस्याएं थीं और बहुत सारी धाराएं सामने आयीं। मसलन, भगत सिंह की धारा वैज्ञानिक जीवन पद्धति और सही ढंग से समाज संचालन को सामने रख रही थी। अगर वे 25 साल और रहे होते उनकी वैचारिकता का लाभ भारतीय समाज को जरूर मिला होता। इतनी कम उम्र में ही उन्होंने जिस तरह से अछूत, किसान समस्या पर विचार किया और ‘ड्रीमलैंड’ की भूमिका जैसा लेख लिखा उससे उनके परिप्रेक्ष्य को समझा जा सकता है। 

सम्मेलन के दौरान वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश

तीसरी धारा डॉ. भीमराव आंबेडकर की थी। वे कांग्रेस की आजादी की लड़ाई के परिप्रेक्ष्य को खारिज करते थे। उन्होंने अपने लेखन में 1920 से 1950 के दशक की भारतीय राजनीति के बारे में जो कुछ भी कहा वह आज भी उतना ही प्रासंगिक नजर आता है। आजादी की लड़ाई में वे एक ऐसे चिंतक के रूप में उभरते हैं, जो कांग्रेस के एजेंडे को पूरी तरह खारिज करते हैं। सामाजिक, आर्थिक मसलों पर उस दौर का उनका चिंतन चामात्कारिक है। श्रमिक संगठनों और महिलाओं के अधिकार के साथ उन्होंने संविधान को विस्तारित किया। उन्होंने यह महसूस किया था कि आम लोगों की जीवन दशा एक आदमी एक वोट से ही नहीं सुधरेगी। संसद में अपने आखिरी भाषण में उन्होंने चेताया था कि हम तब तक जनतांत्रिक नहीं हो सकते जब तक आर्थिक, सामाजिक जीवन में असमानता को न्यूनतम नहीं करते, तब तक भारत में संवैधानिक लोकतंत्र का भविष्य नहीं है।

केवल राजनीतिक सत्ता पर्याप्त नहीं : रिंकु यादव

विचार गोष्ठी के प्रारंभ में सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के संस्थापक रिंकु यादव ने कहा कि यह कार्यक्रम ऐसे समय में हो रहा है जब मनुवाद और काॅरपोरेट लूट का बुलडोजर संविधान पर चल रहा है। उन्होंने कहा कि एक समय था जब सामाजिक न्याय का सवाल केंद्र में होता था लेकिन यह कैसी विडम्बना है कि सामाजिक न्याय का सवाल ही राजनीति से गायब करने की कोशिश जारी है। बहुजन राजनीति की धाराएं परशुराम जयंती तक पहुंच गई हैं। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में बहुजन सवाल को ऊना या भीमा कोरेगांव में किसी राजनेता ने नहीं, बहुजन समाज के विचारवान लोगों ने खड़ा किया। उन्होंने कहा कि राजनीति सत्ता हासिल होने का यह कतई मतलब नहीं कि आर्थिक सत्ता भी हमारी ही हो।

लोगाें को देवता बनाने में जल्दबाजी से बचें : अनिल चमड़िया

इस मौके पर चर्चित पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि आज बहुजन कार्यकर्ताओं की चेतना के साथ अपने विचारों के प्रचार की जरूरत है। उन्होंने आगाह किया कि लड़ाई के जो औजार हैं उसको समझिये। हमारी आपकी स्थिति क्या है, हम कहां खड़े हैं? समाज में वास्तविक रूप में परिवर्तन हो यह हमारी कोशिश होनी चाहिए। देेश की वर्तमान स्थिति की चर्चा करते हुए अनिल चमड़िया ने कहा कि आज देश में दो तरह के संघर्ष चल रहे हैं। एक तरफ आम आदमी की कीमत पर संसाधानों की लूट जारी है और सरकार निजीकरण को बढ़ावा देने पर आमादा है। शिक्षण संस्थान और आरक्षण पर लगातार हमले हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि हर समय की राजनीति की अपनी जरूरतें होती हैं, वह सामाजिक शक्तियों का अपने पक्ष में उपयोग करती है। आंबेडकर की तरह विरले ही होते हैं, जो सामाजिक व्यवस्था के ढांचे में ही आमूल परिवर्तन कर पाते हैं। 

चमड़िया ने आगे कहा कि हम बहुजन समाज के लोग अपनी हिस्सेदारी को लेकर जिस तरह से चिंतित रहते हैं आप बताइए कि क्या आप पांच ऐसे बहुजन लेखक बतला सकते हैं, जो हिन्दी भाषा की राजनीति को डौमिनेट करते हों, जो अपने समाज को समझते हों, उनके सवाल को रखते हों? यह आप खोजेंगे तो आपको निराशा हाथ लगेगी। हमें प्रतिनिधि नहीं, प्रतिनिधित्व चाहिए जो हमारे सवालों को हल करने का माद्दा रखता हो। उन्होंने कहा कि हमलोगों को देवता बनाने की जल्दीवाजी से बचना चाहिए। 

संसाधनों पर ऊंची जातियों का कब्जा : सिद्धार्थ

वहीं दिल्ली से आये लेखक डाॅ. सिद्धार्थ रामू बहुजन हिस्सेदारी की वर्तमान हालात पर चर्चा की। उन्होंने सवाल उठाया कि देशव्यापी बहुजन हिस्सेदारी का क्या स्वरूप है, खेती, मकान, दुकान जितने भी क्षेत्र हैं, उसमें उनकी कितनी हिस्सेदारी है? क्या इन क्षेत्रों में आदिवासी, दलित और पिछड़े शामिल हैं? अल्पसंख्यक, ईसाइ कहने से बात नहीं बनेगी। हमें इन दोनों धार्मिक इकाइयों में जो दलित बहुजन हैं, उनकी बात करनी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि इस देश में मेहनतकश की आबादी 80 प्रतिशत है। भारत सरकार को मंडल कमीशन की अनुशंसा के बाद यदि किसी चीज से डर लगता है तो वह है जाति जनगणना का सवाल। क्योंकि उन्हें भय है कि इससे सब राज पता चल जाएगा। इसीलिए वे इसपर कुंडली मारे रहना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार राजनीतिक आंकड़े महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि इस देश पर मुगल काल से लेकर अंग्रेजों के काल तक ब्राहण शासन नहीं रहे, लेकिन यहां की सामाजिक और आर्थिक सत्ता उनके ही कब्जे में रही। उन्होंने कहा कि वर्तमान में हमारे 543 लोकसभा सदस्य हैं, जिनमें 120 ओबीसी, 86 अनुसूचित जाति और 52 अनुसूचित जनजाति के हैं। बावजूद इसके यह आंकड़ा बतलाता है कि संसद में ऊंची जाति के सांसद अपनी आबादी से दुगने की संख्या में काबिज हैं। यह स्थिति हमारे जनतंत्र की उस संस्था की है, जो 70 साल अपनी यात्रा पूरी कर चुकी है और जो लोगों के वोट से बनती हैै।

बहुजन की बात करनेवाले कर रहे ‘ए टू जेड’ की पॉलिटिक्स : अली अनवर अंसारी

पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर अंसारी ने कहा कि यह विडंबना ही कही जाएगी कि हमारे लोगों ने जिन नेताओं को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया, उनके लिए अपनी शहादतें दीं, अफसोस की बात है कि वे भी बहुजन की बात न करके ‘ए टू जेड’ की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह लोकतांत्रिक मुल्क है। सबकी बात होनी चाहिए, लेकिन परशुराम की जयंती मनाकर लोग समाज में क्या संदेश देना चाहते हैं? हमारे पुरखे अब्दुल कयूम अंसारी, जगदेव प्रसाद, बीपी मंडल और कर्पूरी ठाकुर ने जो हमें दिया, आज मंडल से निकली शक्तियां इन संघर्षोे को ही लिपने पर आमादा हैं। अपनी उपलब्धियों पर हाथ जोड़कर माफी मांग रहे हैं। उन्होंने एक भोजपुरी कहावत सुनाई कि ‘सोना लुटाइल जाए, कोयला पर छापा’।

अली अनवर ने कहा कि हिन्दुओं में जितनी जातियां हैं उतनी ही मुसलमानों में भी। वहां भी बहुजन मुस्लिम जातियां हर जगह हाशिये पर खड़ी हैं। उन्होंने कहा कि आज इन दोनों धर्मोे की इस बहुजन जनता के समन्वय की जरूरत है तभी कोई मुकम्मल संघर्ष हम खड़ा कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि देश नस्लकुशी की तरफ बढ़ रहा है। आज की राजनीति पूरी तरह से पथभ्रष्ट हो गई है। हमें चाहिए कि जहां फिरकापरस्त लोेग घर-घर जाकर नफरत बांट रहे हैं, वहां हम प्यार और मुहब्बत बांटें।

जितेंद्र मीणा ने उठाए आदिवासियों के सवाल

दिल्ली विश्वविद्यालय के जितेंद्र मीणा ने कहा कि 70 वर्षोे में मनुवाद और काॅरपोरेट का सामूहिक हमला सबसे अधिक आदिवासी समुदाय पर हुआ है। उन्होंने कहा कि संविधान सभा का निर्माण हो रहा था तो हमारे पुरखे लड़ाका जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा के समक्ष यह उम्मीद जताई थी कि आदिवासियों के साथ बेहतर सलूक किया जाएगा। उन्हें भी बराबरी का हक-हुकूक दिया जाएगा, लेकिन यह सम्मान उन्हें नहीं मिला। मोदी सरकार ने प्राइवेट इकोनाॅमी के रास्ते खोल दिये। जिसके फलस्वरूप अर्थव्यवस्था में सरकार की हिस्सेदारी कम कर दी गई।

जितेंद्र ने कहा कि जल, जंगल और जमीन से आदिवासियों को बेदखल करने की लड़ाइयां इस देश के कई हिस्सों में बदस्तूर जारी हैं, लेकिन वह यहां की मीडिया के लिए खबर नहीं है। वर्तमान में देश में 193 कोयला खदानें चल रही हैं। देश में हजारों लाखों हेक्टेयर खादानें हैं, जिसमें से 55 खदानों को मंजूरी दी गई है। इसमें से 80 से 85 प्रतिशत आदिवासी इलाके हैं। इसमें हर तरह के नियम कानूनों की अवमानना की गई है। पिछले 20 सालों में 77 लाख लोगों को अपनी जमीन से विस्थापित किया गया, जिसमें 60 प्रतिशत आदिवासी हैं। 

जितेंद्र ने कहा कि शिक्षा का निजीकरण करके सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि जिसकी हैसियत है वे शिक्षा लें। इस शिक्षा नीति के तहत आदिवासी पहले ही बाहर कर दिये गए। वे कर्ज लेकर शिक्षा के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? ऐसे में सहज सवाल है कि आदिवासी पहले अपना अस्तित्व बचाएगा या शिक्षा की सोचेगा?

आगे उन्हेांने कहा कि अपने देश की बजट का 16 प्रतिशत सुरक्षा पर खर्च हो रहा है। पिछले 5-7 सालों में पुलिस कैम्प 80 प्रतिशत आदिवासी इलाकों में खुले हैं। एक संघर्ष पिछले 17 मई, 2021 से छतीसगढ़ में चल रहा है। वहां आदिवासियों के 1 लाख 74 हेक्टेयर के जंगल अडानी को दे दिया गया। सरकार का नियम है कि इन इलाकों में किसी तरह के जंगल को नही काटा जाएगा। इस आंदोलन के साल भर होने को है। वहां 4 आदिवासियों की जान अब तक जा चुकी हैं, लेकिन यह यहां की मीडिया के लिए खबर नहीं है। गुजरात की चर्चा करते हुए जितेंद्र ने कहा कि वहां नर्मदा तापी लिंक परियोजना में आदिवासियों की 8 लाख हेक्टेयर जमीन को छिना जा रहा है। एक प्रतिमा की स्थापना के लिए 50-60 गांवों को विस्थापित कर दिया गया। यही हाल उड़िसा का है। वहां 1993 से ही आदिवासियों का आंदोलन चल रहा है। 

दावतों से मजबूत नहीं होगी भारत की धर्मनिरपेक्षता

उतर प्रदेश से आये बलवंत यादव ने बतलाया कि भारत का लोकतंत्र लेटरर इंट्री के द्वारा जनता के दुश्मनों के कब्जे में चला गया है। आज दोस्त दुश्मन की पहचान जिसे हम भाजपा, राजद के रूप में समझ रहे हैं दरअसल वह नहीं है, उसके पीछे छिपी वह काॅरपोरेट शक्तियां हैं जिनके चंगुल में भारत की राजनीतिक पार्टियां कैद हैं। प्रतीकात्मक दुश्मन खड़ा करके वास्तविक दुश्मन को छिपाया जा रहा है। एक्टिविस्ट एवं चिकित्सक डाॅ. परमानंद पाल ने कहा कि समायोजन और क्लेम जैसे शब्दों के उपयोग से यह ध्वति होता है कि हम मांगने जा रहे हैं। मैं उससे उपर की बात कह रहा हूं। मैं सामाजिक, सांस्कृतिक दावेदारी की बात कह रहा हूं। संविधान में यह कहा गया था कि भारत के जो स्टेट होंगे वे सेक्यूलर होंगे, लेकिन आज तक भारत में इसे लागू नहीं किया गया। उन्होेंने कहा कि हिन्दुत्व आज विशाल रूप में खड़ा है। राजनीतिक दलों द्वारा दावतें दी जा रही हैं, इससे क्या आपको लगता है कि धर्मनिरपेक्षता को ब़ढ़ावा मिलेगा? इस तरह की प्रवृति से न तो वैज्ञानिक चेतना का प्रसार होगा, न धर्म निरपेक्षता बढ़ेगी – हां धार्मिक तुष्टिकरण को बढ़ावा जरूर मिलेगा। 

पसमांदा समाज को मिले हक

दरभंगा से आये लेखक अयूब राईन ने कहा कि पिछले 20-25 वर्षों से पसमांदा आंदोलन इस देश में चल रहा है, लेकिन इसके बावजूद इन्हें सिस्टम में जो हिस्सेदारी मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज की तरह ही 85 प्रतिशत मुस्लिम बहुजन भी हाशिये पर हैं। आज जरूरत इस बात की है कि हिंदू-मुस्लिम दोनों बहुजन तबकों की एकता कायम हो और हिस्सेदारी के सवाल को प्रमुखता के साथ आंदोलन का रूप दिया जाए। उन्होंने कहा कि रामनवमी की जुलूस में हड़बोंग करने वाले वही बहुजन हैं, जो सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा गुमराह किये जाते रहे हैं।

उतर प्रदेश से आये रिहाई मंच के अध्यक्ष राजीव यादव ने कहा कि आज इस देश में 65 हजार गांवों में विश्व हिन्दू परिषद् की कमिटियां काम कर रही हैं। जिस तरह से भिंडरावाले को इंदिरा गांधी ने पाला आज मोदी योगी इन सांप्रदायिकों के पालनहार बने हैं। उन्होेंने कहा कि गुजरात और उतर प्रदेश सांप्रदायिक शक्तियों का अभयारण्य बन गया है। मनुवाद हर लड़ाई को सांप्रदायिकता के हथियार से लड़ता है। पूरे उतर भारत में वह यही कर ही रहा है। अति पिछड़ा वर्ग बिहार के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने कहा कि आज लोकतंत्र को बुलडोजर तंत्र में बदल दिया गया है। सरकार हिन्दू-मुस्लमान के नाम पर देश को दंगे में झोंकने पर आमादा है। ऐसे में हम बहुजन समाज के लोगों को एकत्रित होना बहुत जरूरी है। हमें गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए क्योंकि बहुजन समाज संख्या में बहुत बड़ा है। आगे उन्होंने यह भी कहा कि बिहार में अति पिछड़े समाज की हालत अत्यंत दयनीय है। उनके पास भूमि नहीं है और ना ही अन्य किसी प्रकार के संसाधनों पर उनका अधिकार है। 

मनुवादी मीडिया पर उठे सवाल

झारखंड से आये आई.डी. पासवान ने कहा कि जो व्यक्ति समाज अपने प्रतीक का सम्मान करना नहीं जानता, वह समाज कभी सुरक्षित नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि मनुवाद की सांप्रदायिकता कोई नई बात नहीं है, वह जन्मजात है। उन्होंने कहा कि आज शूद्रों को गजालत से बाबा साहब का संघर्ष, आदर्श और उद्वेश्य ही बाहर निकाल सकता है। दिल्ली से आये पत्रकार सुमित चैहान ने कहा कि उन्हें आज अपने पुरखों की जमीन पर आकर उर्जा मिल रही है। उन्होंने कहा कि भारत आज बहुत विकट हालात से गुजर रहा है। यहां परेशानियों और बर्बरता का दौर चल रहा है। इसे हमारे लोग नहीं बना रहे हैं, क्योंकि मनुवादी मीडिया में हमारे लोग हैं ही कितने? टीवी चैनल में हमारे लोग नहीं हैं। वे हिन्दू-मुस्लिम की विभाजक रेखा को और चैड़ा कर रहे हैं ताकि रोजगार और महंगाई के सवाल को गौण किया जा सके। उन्होंने कहा कि हिदुओं का ब्राहण और मुसलमानों के अशराफ एक दूसरे के खाद पानी हैं। असली पीड़ा पसमांदा, आदिवासी, दलित और पिछड़े भुगतने को मजबूर हैं। 

संवैधानिक प्रावधानों को खत्म करने पर आमादा : डा‍ॅ. शिवजतन ठाकुर

पटना विश्वविद्यालय के प्रो. डॉ. शिवजतन ठाकुर ने कहा कि डाॅ. आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से बहुजन हिस्सेदारी के सवाल को भी हल करने की कोशिश की थी लेकिन उन संवैधानिक प्रावधानों को भाजपा सरकार खत्म करने पर आमादा है। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. लक्ष्मण यादव ने कहा कि यह ऐसा समय है जब लिखने-पढ़ने वाले लोगों में भी एक ठहराव-सा आ गया है, इस गैप को भरने की जरूरत है। आर.एस.एस. और भाजपा की चर्चा करते हुए लक्ष्मण ने कहा कि वे जनता को जनता की भाषा में समझाकर उन्हें अंधविश्वासी बना रहे हैं और हम अपने ही लागों को रोक पानेे भी असमर्थ हैं। उन्होंने कहा कि ब्राहणवाद और सैयदवाद एक-दूसरे को खाद पानी दे रहे हैं। उन्होंने मधेपुरा की चर्चा करते हुए कहा कि यह समाजवाद का प्रभाव है कि उस शहर के विभिन्न चौराहों पर अन्य शहरों की तरह उन्हें देवी- देवता की मूर्तियां नहीं मिली। वहां बीएन मंडल, बीपी मंडल और आंबेडकर की प्रतिमाएं दिखीं। लेकिन वहां भी रामनवमी के मौके पर इस साल पहली बार लोगों का समूह तलवार लेकर प्रकट हुआ। उन्होंने कहा कि ब्राहणवाद और काॅरपोरेट मिलकर भारत को नष्ट करने में लगा है। 

इस मौके पर सभा को इंजीनियर राजेंद्र प्रसाद, विलक्षण रविदास, हरिश्चंद्र आदि वक्ताओं ने भी संबोधित किया। सभा में मौजूद लोगों में महेंद्र सुमन, रंजन कुमार गुप्ता, ब्रजनंदन यादव, इंजीनियर नागेंद्र यादव, सुनील, गौतम आनंद, मीरा यादव, विष्णुदेव मोची, ललित यादव, उत्पल बल्लभ, सूरज यादव, रंजन यादव, मृणाल, सोनम राव आदि मुख्य थे।

(संपादन : नवल/अनिल)


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चिंतन के जन सरोकार

लेखक के बारे में

अरुण आनंद

लेखक पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं

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