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ब्राह्मणवाद व पूंजीवाद के रथ पर सवार आयुर्वेद

बुद्धकालीन चिकित्सा प्रणाली की बात करें तो यह युग जिस प्रकार वर्णव्यवस्था के प्रतिकूल दिखाई देता है, चिकित्सा प्रणाली के एकदम अनुकूल दिखाई पड़ता है। बुद्ध की यह उद्घोषणा कि “जो मेरी सेवा करना चाहे, वह रोगी की सेवा करे”, स्पष्ट करती है कि इस काल में भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद न होकर आयुर्विज्ञान की तरह फूली-फली होगी। पढ़ें, द्वारका भारती का यह आलेख

इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि रामदेव के आने के बाद भारतीय पुरातन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का चेहरा-मोहरा इतना बदल गया है कि आम भारतीय के भीतर यह धारणा एकदम बैठ गई है कि आयुर्वेद भारत है और भारत का दूसरा नाम आयुर्वेद ही होना चाहिए। लगभग यही स्थिति योगा के बारे में भी कही जा सकती है। साथ में यह भी कहा जा रहा है कि योगा या आयुर्वेद पर अपने विश्लेषणात्मक विचार देने वाला कोई भी विद्वान् आलोचक राष्ट्रवादी नहीं हो सकता। इस प्रकार की कई घोषणाएं हमने पिछले 6-7 वर्षों में देखी-पढ़ी हैं। इस प्रकार की स्थिति को अति सुदृढ़ बनाने में भारत के प्रधानमंत्री का भी पूरा योगदान रहा है। 

हमें यह कहने में जरा भी हिचक नहीं है कि इन राजनीतिक स्थितियों का रामदेव ने पूरा-पूरा लाभ लिया है और वह योगगुरु से कब बिजनेस गुरु बन गये, इसका लोगों को पता ही नहीं चला। आज उनका एक मजबूत व्यापारिक ढांचा बन चुका है, जिसका कई सूचनाओं के अनुसार लगभग टर्न ओवर 25,000 करोड़ रुपए वार्षिक बताया जा रहा है। इस कंपनी (पतंजलि) ने पिचले 8 वर्षों में लंबी छलांग लगाई है। योगा से शुरू होकर रामदेव चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद की दुनिया के एक बेताज बादशाह बन चुके हैं। आज वह राजनीति के बल पर इतना सशक्त हो चुके हैं कि उन्होंने एक झटके में ही कोरोना की दवाई बनाने की घोषणा भी कर डाली और बाद में दवाई के बनाने को लेकर प्रयोग की जाने वाली प्रक्रिया का कोई प्रयोगात्मक परिणाम न देने पर, अपनी ढीठता का प्रदर्शन करते हुए साफ झूठ बोला कि उन्होंने ऐसी दवाई बनाने की कोई घोषणा नहीं की। यह एक भौंडा व्यापारिक प्रदर्शन था। वह जानते हैं कि उनकी दवाई को कहीं से समर्थन न भी मिले, तो भी इसकी बिक्री को कोई रोक नहीं सकता। सरकार को इस दवाई को अपनी अनुमति देनी ही पड़ी, यह कहते हुए कि यह शारीरिक प्रतिरक्षा प्रबंधन को मजबूत करेगी।

बहुत-से लोगों ने यह प्रश्न भी उठाए हैं कि यदि रामदेव की जगह कोई दूसरा व्यक्ति यह कारनामा करता, तो क्या उसको भी इसी तरह से बख्श दिया जाता? योगा, आयुर्वेद तथा भाजपा इन तीनों का प्रत्यक्ष: परस्पर संबंध भले ही दिखाई न देता हो, लेकिन तीनों के मिश्रण से राष्ट्रवाद की चाशनी में जो पदार्थ तैयार होता हो, उसे हिन्दुत्व कहा जा सकता है। योगा के नाम पर यदि रामदेव जैसे व्यवसायी पनपते हैं, तो इसके ही बल पर मोदी जैसे व्यक्ति सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करते हैं, और देश के मुस्लिमों को भी योगा का आह्वान यह कह कर किया जाता है कि इसका हिन्दुवाद से कुछ लेना-देना नहीं, बल्कि यह राष्ट्रवाद का जरूरी अंग है। 

ठीक यही तर्क आयुर्वेद के बारे में भी दिया जाता है कि आयुर्वेद हमारे राष्ट्र की स्वदेशी चिकित्सा पद्धति है। इसलिए इसका उपयोग करना ही सच्चा राष्ट्रवाद है। पाठक शायद इस प्रकार की रामदेव द्वारा की गई उद्घोषणाओं को भूले नहीं होंगे। स्वदेशी के नाम पर किया गया हो-हल्ला सबके जेहन में ही होगा।

यहां हमारा आशय रामदेव की गतिविधियों का एक जायजा लेना मात्र कदापि नहीं है। हम यहां आयुर्वेद की चर्चा इस दृष्टिकोण से करना चाहते हैं कि क्या आयुर्वेद के अर्थ सीधे वैदिक प्रणाली को ध्वनित करते हैं? आयुर्वेद क्या हिन्दुवादी या हिन्दुत्व से जुड़ा हुआ है? यह प्रश्न इसलिए उठाया जा रहा है, क्योंकि गत 6-7 वर्षों से देश के नागरिक को इस नारे की घुट्टी पिलाई जा रही है कि आयुर्वेद हिन्दू-राष्ट्र की एकमात्र ऐसी चिकित्सा प्रणाली है, जिसके स्रोत वैदिक प्रणाली में निहित हैं, यहां यह प्रश्न भी ज्यादा महत्व नहीं रखता कि आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली के द्वारा हिन्दू संस्कृति को इतना महान बताया जा रहा है कि देशवासियों को ऐसा लगता है कि उसे अब तक अंधेरे में रखा जा रहा था, भारत की महान संस्कृति के प्रति उसे अब तक ठीक तरह पढ़ाया नहीं जा रहा था। 

इस तथ्य को हम इस तरह भी समझ सकते हैं कि गाय जैसे चौपाये को हमने इतनी महत्ता से ओतप्रोत कर दिया है कि हमें उसका मूत्र व गोबर खाने की थाली तक ला दिया है। परिणामस्वरूप हमने लोगों को गाय के पेट से सीधे निकलते मूत्रपान करते हुए देखा है। यह स्थिति खतरनाक भले ही न हो, लेकिन चिंताजनक अवश्य है। चिंताजनक इन अर्थों में कि हम अभी तक भी भारत की उस पौराणिक स्थिति से खुद को बाहर नहीं ला सके हैं, जिसके बारे में शेष विश्व आज तक हंसने-ठिठोली करता रहा है। गाय के गोबर व मूत्र में अवश्य कुछ अवयव रहे होंगे, जो कि मानव समाज के काम आते होंगे, लेकिन दूसरे चौपायों में यह अवयव न हों, ऐसा कहना अंधश्रद्धा ही होगी।

ठीक इसी से मिलती-जुलती कुछ धारणाएं आयुर्वेद पर भी लाद दी गई हैं। वास्तव में कोई भी चिकित्सा प्रणाली मानव का अहित नहीं करती, वह मानव को निरोग बनाने में ही सहायक होती है। हम यहां यह चर्चा भी करना चाहेंगे कि जब आदि मानव ने अपनी चिकित्सा करना सीखा होगा, यह उसके स्वतंत्र-चिंतन का प्रथम पग भी रहा होगा। जिन लोगों ने आदि मानव-युग की जानकारी रखी होगी, वे भलीभांति जानते होंगे कि मानव जब प्राकृतिक-आपदाओं (शक्तियों) के अधीन था, उसका जीना-मरना प्रकृति के अधीन ही था, जिसें अस्वस्थ होने पर किसी चिकित्सा तक का कोई विचार तक भी नहीं होगा, लेकिन जब उसने देखा कि कुछ खाने-पीने से शरीर को कुछ राहत मिलती है, बुखार कम होता है, पेट दर्द ठीक होता है, बेहोशी दूर होती है, चोट लगने से कुछ जड़ी-बूटियों के लेप से राहत मिलती है, तो मानव चिकित्सा का एक नया युग शुरू होता है। इनमें से कुछ लोग, जो विलक्षण-प्रतिभा रखते होंगे, उन्होंने खाने-पीने वाली वस्तुओं के महत्व को समझा होगा तथा मानव शरीर पर पडऩे वाले प्रभावों के आधार पर ऐसे सर्वमान्य सैद्धान्तिक निष्कर्ष निकाले होंगे, जो प्राकृतिक-द्रव्य और शरीर-द्रव्य के बीच संगति के सूचक थे।

विद्वानों का मत है कि इसी को लेकर भारत में वैज्ञानिक-चेतना का आरंभ बहुत अच्छे ढंग से हुआ, क्योंकि विद्वानों का मानना था कि भारतीय वैज्ञानिकों ने भौतिकवादी दृष्टिकोण को इसका सैद्धान्तिक आधार बनाया था, लेकिन इस तथ्य को भी स्वीकार करना पड़ेगा कि बाद में वैज्ञानिक चेतना और उसके भौतिकवादी दृष्टिकोण का गला अवरुद्ध कर दिया गया, वैदिकता को इस पर लाद कर।

युनानी चिकित्सा पद्धति का इतिहास भारत के आयुर्वेद-चिकित्सा पद्धति से कहीं ज्यादातर चमकदार है, कहीं ज्यादा वैज्ञानिक भी है। यह कहा जाता है कि युनानी चिकित्सों की चिकित्सा के प्रति इतनी जिज्ञासा थी कि वे मुख से चखकर मलमूत्र की जांच करने से कभी पीछे नहीं हटे। यही कारण है कि युनानी चिकित्सा पद्धति विश्व के अन्य भागों में फैलती चली गई और भारतीय आयुर्वेद चिंतन की उस भूल-भुलैयां में ऐसा उलझा कि उसे वेदों की एक बहुमूल्य-संहिता के कूपे में बंद कर दिया गया। यदि हम युनानी और भारतीय आयुर्वेद की तुलना करें, तो कहना होगा कि युनानी चिकित्सा शास्त्रियों के लिए चिकित्सा-शास्त्र सिर्फ ज्ञान प्राप्त के लिए चिंतन-मनन का विषय कभी नहीं रहा, उन्होंने व्यवहार्य तक ही सीमित रखा। रोगी का रोग कैसे दूर हो, या कम-से-कम कुछ राहत तो मिले, उनके ज्ञानसंचय का यही लक्ष्य था। ठीक आज की आधुनिक चिकित्सा प्रणाली, जिसे हम एलोपैथी कहते हैं, की तरह।

गंठजोड़ : रामदेव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

भारत की चिकित्सा पद्धति, जिसे वास्तव में आयुर्विज्ञान का नाम देना चाहिए था, लेकिन इसे वेदों का एक भाग समझते हुए, आयुर्वेद का नाम देते हुए स्थापित कर दिया गया। आयुर्वेद नाम से ही भलीभांति स्पष्ट हो जाता है कि इस पर धर्म का आवरण जबरन डाल दिया गया। इसी संदर्भ में हम आयुर्वेद की दो पुस्तकों का विवेचन करें। आयुर्वेद के चिकित्सा शास्त्रों में ‘चरक संहिता’ तथा ‘सुश्रुत संहिता’ का हमें नाम मिलता है। इसकी बाबत विद्वानों का मानना है कि इसमें अवश्य कई वैज्ञानिक बातें मिलती हैं, क्योंकि स्पष्ट है कि कोई भी चिकित्सा पद्धति वैज्ञानिक आधारों के बिना आगे नहीं बढ़ती, लेकिन इन दोनों ग्रंथों में यह वैज्ञानिक बातें तत्वमीमांसापरक अटकल-बाकिायों के बीच इस तरह दबा दी गई हैं कि पूर्ण आयुर्विज्ञान तत्वमीमांसा का संवाहक हो कर रह गया है। जिस उद्देश्य को लेकर आयुर्विज्ञान पनपा था, वह दोयम दर्जे पर खिसक गया है। साधारण शब्दों में हम कहें तो यह कहना चाहिए कि इसे एक सांप्रदायिक स्वरूप दे दिया गया। 

कहा जा सकता है कि इन दोनों ग्रंथों ने एक समय उस विचारधारा को खुली चुनौती दे दी थी, जो यह कहती थी कि शरीर के दु:ख-दर्द ईश्वर प्रदत्त हैं, जिन्हें किसी चिकित्सा की कोई कारूरत नहीं, वह तंत्र-मंत्र या दैवी-शक्ति से ही ठीक होते हैं, क्योंकि कोई भी चिकित्सा पद्धति जब चिकित्सा की परिभाषा में होती है, स्वयं ही उस सिद्धांत का खंडन कर देती हैं कि किसी तंत्र-मंत्र या झाड़-फ़ूंक आदि से कोई बीमारी ठीक हो जाती है। जैसा कि हम पहले ही इसकी चर्चा कर चुके हैं कि चिकित्सा शास्त्र की उत्पत्ति ही इस विचार से होती है कि कोई दैवी-शक्ति बीमार की व्याधि ठीक नहीं कर सकती।

चरक संहिता की चर्चा करें तो इसकी संपूर्ण विषयवस्तु ब्राह्मणवादी रुझानों से पूर्णतया लैस है। इस पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी एक फ्रांसीसी विद्वान ज्यां फिलियोजेट (1906-1982), जिन्होंने भारतीय चिकित्सा विज्ञान पर गहन अध्ययन किया है, ने स्पष्ट की कि इस चिकित्सा ग्रंथ का संपादक एक वैदिक मतावलंबी रहा होगा। वास्तव में यह ग्रंथ पुरातन ग्रंथ है, इसमें बहुत-से लोगों के निदान के सूत्र व जड़ी-बूटियों की चर्चा मिलती है; विभिन्न लेखकों, वैद्यों का योगदान रहा होगा और विज्ञान के आधार पर इसकी सामग्री का संचयन होता होगा, लेकिन बाद में इसमें विशेष धर्म का मुलम्मा थोप दिया होगा। शायद इसके पीछे वैदिक परंपरा का बहुत दबाव होगा। इसके कई उदाहरण हमें और कई वैज्ञानिकों के भी मिलते हैं। इन वैज्ञानिकों ने जब यह घोषणा की कि सूर्य ग्रहण तब लगता है, जब सूर्य व पृथ्वी के सामने चंद्रमा आ जाता है, लेकिन इस घोषणा से ब्राह्मणों के धार्मिक ग्रंथों की अस्मिता पर प्रश्न उठने लगते थे, इसलिए वास्तविकता को पर्दे के पीछे ही रखा गया।

आर्यभट्ट की अनेक उपलब्धियां रही हैं। उसने सिद्ध किया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है कि चंद्रमा की छाया जब पृथ्वी पर पड़ती है, तो सूर्य ग्रहण होता है। और पृथ्वी की छाया जब चंद्रमा पर पड़ती है, तो चंद्र ग्रहण होता है, लेकिन इसी सिद्धांत का बाद में एक वैज्ञानिक ब्रह्मगुप्त खंडन करते हुए कहते हैं कि राहु-केतु राक्षस ही ग्रहणों के जिम्मेदार हैं। जबकि ब्रह्मगुप्त अच्छी तरह जानता था कि आर्यभट्ट ने जो कहा है, वह एकदम ठीक है, लेकिन ब्राह्मण ग्रंथों का दबाव उसे सही बात कहने से रोक रहा था। विद्या के रूप में वेद से हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि ठीक यही स्थिति इन चिकित्सा के ग्रंथों को झेलनी पड़ी होगी।

इस तथ्य को भलीभांति समझते हुए कि सिर्फ दवा देने से ही रोगी ठीक होगा, कोई मंत्र या तंत्र ठीक नहीं करेगा, यह घोषणा नहीं कर सकता कि इन तंत्रों और मंत्रों की कोई जरूरत नहीं है। कोई भी चिकित्सक इतना खतरा नहीं उठा सकता था। सुश्रुत संहिता में कहा गया है कि “ब्रह्मा के श्रीमुख से अष्टांग आयुर्वेद प्रकट हुए और उसे एक निचला स्थान मिला। इसलिए अपने कर्तव्य को जानने वाले वैद्य को चाहिए कि वह पुरोहित के कथनानुसार चलें।” हम सहजता से इन पंक्तियों से महसूस कर सकते हैं कि इन ग्रंथों में यहां केवल रोग निवारण की चर्चा होनी चाहिए थी, चिकित्सा से जुड़े प्रश्नों पर मंथन होना चाहिए था, वहां ब्राह्मणवाद-पुरोहितवाद ही चालक की सीट पर नजर आता है।

सुश्रुत संहिता प्रकृति पर आधारित चिकित्सा की बात करती है, मानव शरीर को प्रकृति का एक स्वरूप कहती है, परंतु जब हम इस संहिता के निर्माण के बारे में पड़ताल करते हैं, तो यह बहुत ढिठाई से वैदिक-परंपरा का यशोगान करती नजर आती है। अपने निर्माण की जानकारी देती हुई सुश्रुत संहिता कहती है कि “धन्वंतरी ऋषि ने आयुर्वेद का ज्ञान इंद्र से, इंद्र ने अश्विनी कुमारों से, अश्विनी कुमारों ने प्रजापति दक्ष से और प्रजापति दक्ष ने ब्रह्मा से प्राप्त किया हुआ था। जब धन्वंतरी ऋषि-मुनियों को आयुर्वेद का उपदेश दे रहे थे, तब सुश्रुत नाम का ऋषि भी वहां उपस्थित था, जिसने उन मौखिक उपदेशों को तंत्ररूप में निषिद्ध किया।”

पाठकगण इन ऊपरी पंक्तियों से सहजता से अनुमान लगा सकते हैं कि इस चिकित्सा विज्ञान बनाम आयुर्विज्ञान जैसी पद्धति को आयुर्वेद की भूल-भूलैयां में पहुंचाया। स्पष्ट है कि जब विज्ञान पर धर्म का कफन ओढ़ाया जाता है, तो चुनौती देना कितना असंभव होता है। इतिहास गवाह है कि विज्ञान और धर्म का प्रारंभ से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है। अंतर महज इतना ही है कि विश्व की कई सभ्यताएं धर्म की जकडऩ से आजाद हो गईं और आगे बढ़ गईं, लेकिन भारत में आज भी रामदेव जैसे लोग इसी धर्म की जकडऩ के द्वारा चिकित्सा को दिव्यता प्रदान करते हुए अपना व्यापार आगे बढ़ाने में व्यस्त हैं। दिव्यता और चिकित्सा का आपसी क्या संबंध हो सकता है?

बात यहीं समाप्त नहीं होती। आप यदि भारत के चिकित्सा विज्ञान की पौराणिक स्थिति को गहनता से देखें, तो पाएंगे कि ऐसी अनर्गल बातें कही गई हैं, जिसने चिकित्सा प्रणाली को बेहद प्रभावित किया। क्या आप विश्वास करेंगे कि इस चिकित्सा प्रणाली को वर्णव्यवस्था की तीखी शूलों के दंश का शिकार भी होना पड़ा। जाति-व्यवस्था, वर्ग के तीखे-दांतों का भी शिकार होना पड़ा। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

ऐसे कई उदाहरण इन ब्राह्मणवादी ग्रंथों में देखने को मिलते हैं। साक्ष्य हमें बताते हैं कि इन वैदिकवादियों को इस चिकित्सा प्रणाली की चिंता कम, रोगियों के स्वास्थ्य की चिंता कम, वैदिकता का प्रचार-प्रसार अधिक से अधिक कैसे हो, इसकी चिंता सबसे ज्यादा रही है। सुश्रुत संहिता में कहा गया है कि वेद विहित मंत्रों का जाप करो तथा आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए वैदिक देवताओं का आह्वान किया जाए। बात यहीं समाप्त नहीं होती। इसमें ब्राह्मणों का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उन्हें प्रसन्न करने की और वैदिक-यज्ञ तथा होम आदि करने की बातें भी कही गई हैं। आयुर्वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सभी अंगों और उनके मुख्य शरीर क्रियात्मक प्रकार्यों (ऐसे कार्य जो स्वभावत: या कर्तव्य समझ कर किया जाए) पर वास्तव में वैदिक देवताओं का नियंत्रण रहता है।

आइए, एक बानगी इसी सुश्रुत संहिता से देखी जाए। यह बताती है कि “बुद्धि का अधिष्टातृ देवता ब्रह्मा है, अहंकार का ईश्वर, मन का चंद्रमा, दिशाएं कानों की, वायु चर्म की, सूर्य नेत्र का, जल स्वादत का, पृथ्वी घ्राण की, अग्नि वाक् का, हाथों का इंद्र, पैरों का विष्णु, गुदा का मित्र तथा प्रजापति जनन-इंद्रियों का।” (सुश्रुत संहिता 3.1.7., अनु.बी.)

ऐसा नहीं है कि इस सुश्रुत संहिता में कुछ काम का नहीं, यह भारत का ऐसा गौरव ग्रंथ है, जो हमें बताता है कि भारत का आयुर्विज्ञान यूनानी पद्धति से किसी प्रकार से कम नहीं रहा। इस पुस्तक के लेखक ने स्वयं इसका कुछ अध्ययन किया है, जो हमें बताता है कि गंभीर लोगों का निदान किस प्रकार किया जाता है, का विस्तृत वर्णन किया गया है, लेकिन जिस धूर्तता व अंधी-वैदिकता की धुन में इसमें अवैज्ञानिकता का प्रचार-प्रसार किया गया है, वह हमें बताता है कि इसमें रोग तो कम ठीक होते होंगे, वैदिकता का मुलम्मा ज्यादा चढ़ता होगा। ठीक यही धूर्तता का दिखावा रामदेव भी करता हुआ दिखाई दे रहा है। योग के सहारे आयुर्वेद तथा इस आयुर्वेद के बल पर वैदिकता का खुला प्रचार करना आज रामदेव की दिनचर्या का हिस्सा है।

ठीक इसी प्रकार की स्थितियां हमें चरक संहिता में भी देखने को मिलती हैं। उसमें भी रोगों के निदान के साथ-साथ आत्मा और पुनर्जन्म का विवेचन इस प्रकार हुआ है कि मानो इस ग्रंथ को रचने का यही एक मूल कारण हो। इसी प्रकार के एक प्रसंग की हम यहां चर्चा करना चाहेंगे। कथन है कि “परलोक के विषय में लोगों के मन में संदेह है कि जब मर कर इस लोक में हम च्युत (नष्ट) होंगे तब पुन: जन्म लेंगे कि नहीं, यही संदेह क्यों होता है? इसका उत्तर आचार्य ने दिया कि कुछ पुरुष हैं, जो नास्तिकता को मानने वाले हैं, वे प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हैं। और परोक्ष होने के कारण पुनर्जन्म को नहीं मानते। कुछ अन्य हैं जो आस्तिक हैं। वे शास्त्र प्रमाण से पुनर्जन्म को मानते हैं।” स्पष्ट है कि इस प्रकार के प्रसंग वैज्ञानिक-चिंतन के उपर आघात करते हुए, वैज्ञानिकता को खारिज करते हुए, वैदिकता को आगे बढ़ाने की चिंता करते हुए दिखाई देते हैं। इस प्रकार का चिंतन वैज्ञानिकता के प्रति विरोध तो है ही, वैज्ञानिकता से जुड़ी चिकित्सा प्रणाली के प्रति क्रूर मकाक भी है।

आयुर्वेद से जुड़ी यह चिकित्सा पद्धति भारत के पौराणिक आख्यानों को पुष्ट करती ही है, बल्कि भारत की वर्णव्यवस्था का पोषण भी करती दिखाई देती हैं, लेकिन मजे की बात यह है कि इस देश के पुरोहित-ब्राह्मणों ने इस चिकित्सा पद्धति आयुर्विज्ञान को भी अपने वैदिकता से लैस वैचारिक हथियारों से तार-तार किया है। चिकित्सकों को जी भर कर गालियां देते हुए उन्हें समाजच्युत करने के आदेश भी जारी किए हैं। देश के ब्राह्मण-पुरोहितों ने चिकित्सा को एक अधम पेशा घोषित कर दिया है, ठीक उसी समय जिस तरह अन्य कार्यों को नीच पेशे घोषित किया गया है। ऐसे नीच पेशे वालों, जिनमें चिकित्सा कर्म भी शामिल है, से सामाजिक दूरी बनाए रखने को कहा गया है। क्या यह एक अमानुषिक कार्य नहीं है कि जो कर्म किसी मानव का दु:ख-दर्द हरने को पनपा हो, जिसने तमाम प्रतिबंध सहन करते हुए चिकित्सा जैसे कर्म को आगे बढ़ाया हो, अपनी जान की परवाह न करते हुए प्रयोग के लिए खुद काहरीले पदार्थ पीए हों, ताकि इसके प्रभाव को महसूस किया जा सके, उन्हीं साहसी चिकित्सा कर्मियों को नीच बताया जाने लगे तो उस परंपरा को आप क्या कहना चाहेंगे? 

इस संदर्भ में हम यहां वशिष्ठ के धर्मसूत्रों से एक उदाहरण देना चाहेंगे। उसका कहना है “जिस तरह वेदों के ज्ञान से शून्य द्विज को ब्राह्मण नहीं माना जा सकता, उसी तरह से व्यवसाय करने वाले, नृत्य या नाट्य-कर्म से जीविकोपार्जन करने वाले, किसी शूद्र के आदेश का अनुसरण करने वाले, चोरी कर पेट भरने वाले और चिकित्सा का पेशा अपनाने वाले व्यक्ति को ब्राह्मण नहीं माना जाना चाहिए।” 

इसी तरह गौतम धर्मसूत्र के स्वर भी इसी प्रकार के हैं। उनका कहना है कि “ब्राह्मण ऐसे किसी व्यापारी से तो अन्न ग्रहण कर सकता है जो स्वयं दस्तकार न हो; किन्तु उसे किसी दस्तकार, व्यभिचारी स्त्री, अपराधी, बढ़ई, शल्य चिकित्सक और ऐसे ही अन्य व्यक्तियों से अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।”

आपस्तंभ धर्मसूत्र भी इसी तरह की टिप्पणी करता है कि “किसी काय-चिकित्सक, लुभ्धक (शिकारी), शल्य चिकित्सक (बहेलिया) और व्याभिचारिणी या षंढ (विषमलिंगी) द्वारा प्रदत अन्य ग्रहण नहीं करना चाहिए।” बात यहीं समाप्त नहीं होती। काय चिकित्सकों से भिक्षा प्राप्त करने की भी सख्त मनाही की गई है।

इसी प्रकार की मनाही मनु ने भी की है। उसने कहा है कि उच्च वर्ण के व्यक्तियों को चिकित्सकों द्वारा प्रदत्त अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। मनु का सीधा आदेश है कि “चिकित्सक से प्राप्त अन्न मवाद की तरह दूषित होता है।” उसने यह भी जोड़ा है कि “चिकित्सा कर्मियों की उपस्थिति मात्र से ही देवता और पूर्वज अप्रसन्न हो जाते हैं।”

हम कह सकते हैं कि हकीमों, जर्राहों को एक तरह से समाज से बाहर निकालने के सारे प्रयत्न किए गए थे। आप अनुमान लगा सकते हैं कि इन कथित धार्मिक घोषणाओं से समाज में इन चिकित्सकों की क्या दुर्गति हुई होगी?

इन चिकित्सकों के बारे में यह घोषणा भी की गई थी कि यदि कोई चिकित्सक किसी उच्च जाति के व्यक्ति का उपचार करते समय कोई गलत तरीका अपनाए, उसके लिए कड़े दंड का प्रावधान भी है।

बुद्धकालीन चिकित्सा प्रणाली की बात करें तो यह युग जिस प्रकार वर्णव्यवस्था के प्रतिकूल दिखाई देता है, चिकित्सा प्रणाली के एकदम अनुकूल दिखाई पड़ता है। बुद्ध की यह उद्घोषणा कि “जो मेरी सेवा करना चाहे, वह रोगी की सेवा करे”, स्पष्ट करती है कि इस काल में भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद न होकर आयुर्विज्ञान की तरह फूली-फली होगी। जिस प्रकार बुद्ध वैदिक पुरोहितों की विचारधारा पर आक्षेप करते हैं, चिकित्सा प्रणाली को पूर्ण आदर देते दिखाई देते हैं।

बुद्ध रोगी के उपचार संबंधी पांच बातें महावग्ग में करते दिखाई पड़ते हैं। राहुल सांकृत्यायन द्वारा किए गए अनुवाद को हम देखते हैं कि “भिक्षुओ! पांच बातों से युक्त रोगी-परिचारक रोगी की परिचर्या करने योग्य होता है : (1) दवा ठीक करने में समर्थ होता है; (2) अनुकूल-प्रतिकूल (वस्तु) को जानता है; प्रतिकूल को हटाता है, अनुकूल को देता है; (3) किसी लाभ के ख्याल से नहीं, मैत्री पूर्ण चित्त से रोगी की सेवा करता है; (4) मलमूत्र, थूक और वमन के हटाने में घृणा नहीं करता और (5) रोगी को समय-समय पर धार्मिक कथा द्वारा समुत्तेजित, संप्रहर्षित करने में समर्थ होता है।”

यहां जानकारों का मानना है कि बुद्ध जो पांचवां गुण बताते हैं, वह ‘चरक संहिता’ में नहीं मिलता। यह गुण की करुणा को दर्शाता है।

बौद्ध संस्कृति में जीवक कोमारभच्च नाम के एक प्रसिद्ध चिकित्सक का वर्णन मिलता है। जीवक के बारे में और उसकी चिकित्सा पद्धति के बारे में विनय पिटक में उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि जीवक मगध नरेश बिंबसार का चिकित्सक होने के साथ-साथ बुद्ध का मित्र भी था। बताया जाता है कि वह उनकी चिकित्सा भी किया करता था। बौद्ध होने के कारण वह संघ के भिक्षुओं की चिकित्सा की आवश्यकता की पूर्ति भी किया करता था।

संघ की बात करें तो उसमें भिक्षुओं के स्वास्थ्य का बहुत ख्याल रखा जाता था और किसी ऐसे औषधि, जिसें ऐसा तत्व प्रयोग करना हो जो संघ में प्रचलित न हो, उसके प्रयोग की आज्ञा बुद्ध से लेनी होती थी। ऐसा कहा जाता है कि बुद्ध यद्यपि आयुर्वेद को मुक्तिदाता की श्रेणी में रखते हों, लेकिन बौद्धकालीन कोई ऐसा बौद्ध ग्रंथ नहीं है। आयुर्वेद के वैदिक विचारों को बुद्ध कभी स्वीकार नहीं कर सकते थे। वैसे भी बुद्ध के उपदेश मूलत: चिकित्सा विज्ञान पर आधारित माने जाते हैं। कहा जाता है कि बुद्ध के उपदेश दु:ख निवारण में औषधि का कार्य करते देखे जाते हैं।

बुद्ध के उपदेशों की आयुर्विज्ञान संबंधी जड़ी-बूटियों की तुलना करने वाली एक कविता है–

संसार में जो नाना प्रकार की जड़ी-बूटियां हैं,
धम्मरूपी बूटी के सामने कुछ भी नहीं।
भिक्षुओ! उसे पीओ।
धम्म की बूटी को पीकर अजर-अमर हो जाओ।
भावना करते हुए परम ज्ञान का साक्षात कर सभी,
उपाधियों के मिट जाने पर निर्वाण पा लो। 

(मिलिंद प्रश्न में भिक्षु कश्यप द्वारा किये गये हिन्दी अनुवाद)

बौद्धकाल में तंत्र-मंत्र के मिश्रण से रहित औषधियों के प्राचीनतम सुव्यवस्थित वर्णनों में से एक का उल्लेख ‘विनय पिटक’ के ‘महावग्ग’ में मिलता है। वहां बुद्ध अपने शिष्यों के लिए औषधियों का निर्देश करते हैं। यह औषधियां साधारण प्रकार की हैं, परन्तु उन पर विधिसम्मत व्यवस्था की छाप स्पष्ट है। हमें इसमें ‘आकाश गोत्तो’ नामक शल्य चिकित्सक का भी ज्ञान होता है, जिसने भगंदर की शल्य-चिकित्सा की थी। राकहिल रचित ‘लाइफ ऑफ बुद्धा’ में हमें तक्षशिला विश्वविद्यालय में आत्रेय के अधीन जीवक के चिकित्सा शास्त्र पढऩे का उल्लेख मिलता है। (भारतीय दर्शन का इतिहास, लेखक एन.एन.दास, पृष्ठ 231)

हम यहां यह स्पष्ट करना चाहेंगे कि बुद्ध चिकित्सा विज्ञान के पक्षधर थे, लेकिन ब्राह्मणों के धर्मशास्त्रों द्वारा पोषित और प्रचारित तत्वों के प्रति उनका रुख वही था, जो एक वैदिक-विरोधी का होना चाहिए। जंगलों में रहने वाले वनवासियों, आदिवासियों ने इन जड़ी-बूटियों की तलाश में अपना जीवन खपाया होगा। बाद में इसको संहिता का रूप देने के लिए ब्राह्मणवादी सिद्धांतों का मुलम्मा चढ़ाया होगा। उसने इन संहिताओं को वो रूप दे दिया कि उनके एक हाथ में कोई दवाई होगी तथा दूसरे हाथ में वह तलवार जिससे मानवता की हत्या भी होती होगी। इस प्रकार का सैद्धान्तिक विचार आज भी आयुर्वेद से अलग नहीं हुआ है। यह आयुर्वेद आज भी उसी रथ पर सवार है, जो सदियों पहले था। इस संदर्भ में हम रामदेव के गत 6-7 वर्षों के क्रियाकलाप देख सकते हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

द्वारका भारती

24 मार्च, 1949 को पंजाब के होशियारपुर जिले के दलित परिवार में जन्मे तथा मैट्रिक तक पढ़े द्वारका भारती ने कुछ दिनों के लिए सरकारी नौकरी करने के बाद इराक और जार्डन में श्रमिक के रूप में काम किया। स्वदेश वापसी के बाद होशियारपुर में उन्होंने जूते बनाने के घरेलू पेशे को अपनाया है। इन्होंने पंजाबी से हिंदी में अनुवाद का सराहनीय कार्य किया है तथा हिंदी में दलितों के हक-हुकूक और संस्कृति आदि विषयों पर लेखन किया है। इनके आलेख हिंदी और पंजाबी के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में इनकी आत्मकथा “मोची : एक मोची का अदबी जिंदगीनामा” चर्चा में रही है

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