बुद्ध जयंती के मौके पर पेरियार का ऐतिहासिक संबोधन

‘पुरातत्वविद भली-भांति सिद्ध कर चुके हैं कि हिंदुओं के जितने भी प्राचीन मंदिर हैं, वे पहले कभी बौद्ध विहार थे। यहां तक बताया गया है कि श्रीरंगम, कांचीपुरम, पालनी, तिरुपति आदि मंदिर भी मूल रूप से बौद्ध विहार ही थे।’ पढ़ें, बुद्ध जयंती के एक मौके पर पेरियार का ऐतिहासिक संबोधन

बौद्ध-धर्म धर्म न होकर बुद्धि का मार्ग है

हम बुद्ध जयंती क्यों मनाते हैं? गौतम बुद्ध का जन्मोत्सव मनाने का आशय कपूर, नारियल, कुमकुम और खाद्य-पदार्थों से बुद्ध के चित्र अथवा मूर्ति की प्रार्थना करना नहीं है। इसका आशय है कि हमने अपने जीवन में बुद्ध के जीवन और उपदेशों से कुछ सीखने तथा उनके बताए मार्ग पर चलने का निश्चय कर लिया है। मुझे नास्तिक कहा जाता है यदि नास्तिक का आशय वेद, पुराणों एवं धर्मशास्त्रों में को प्रमाण मानने से इंकार करना है, उनमें आस्था न रखना है तो निस्संदेह मैं नास्तिक ही हूं। मुझे लगता है कि बुद्ध पर बोलने के लिए यह अभीष्ट एवं पर्याप्त योग्यता है। 

ऐसा व्यक्ति, जो वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों में विश्वास रखता हो, उसे इस प्रकार के अवसरों पर बोलने के लिए काफी चालाक होना चाहिए। उसे ऐसे लोगों में से एक होना चाहिए, जो जनता को मूर्ख बनाने में भली-भांति दक्ष होते हैं। उन्हें पाखंडी और आडंबरप्रिय होना चाहिए। ऐसे व्यक्ति द्वारा बुद्ध को प्राचीन ऋषि, साधु, या महात्मा, जिनका वह वास्तव में सम्मान करता है, के समकक्ष ठहरा देना असामान्य नहीं है। 

न ऋषि और न ही महात्मा 

बुद्ध न तो साधु थे, न ऋषि और न ही महात्मा। वे उन लोगों में से थे, जिन्होंने पुराने जमाने के हिंदू साधुओं, ऋषियों का वास्तविक विरोध किया था। यही वह कारण है कि उनका जन्मदिवस मनाने के लिए आज हम सब यहां एकत्र हुए हैं। जिस प्रकार बुद्ध ऋषि या महात्मा नहीं हैं, वैसे ही धर्म की स्वीकार्य परिभाषा के अनुसार बौद्ध धर्म भी कोई धर्म नहीं है। बहुत से लोग बौद्ध मार्ग को धर्म की श्रेणी में रखते हैं। वे गलत हैं। धर्म होने के लिए आवश्यक है कि उसके केंद्र में एक ईश्वर हो। दूसरी चीजें जो धर्म होने के लिए अपरिहार्य हैं, वे हैं– स्वर्ग, नर्क, मोक्ष, पाप-पुण्य, आत्मा और परमात्मा जैसी अवधारणाएं। बड़ा धर्म बनने के लिए कोई एक ईश्वर भी पर्याप्त नहीं होता। उसके अनेक ईश्वर हो सकते हैं। उन ईश्वरों की पत्नियां, रखैलें, तथा स्वीकार्य मानव-संबंध भी होने चाहिए। भारतीय सिर्फ ऐसे ही धर्म के बारे में जानते और उसे पसंद करते हैं।

तर्कशीलता : बौद्ध धर्म का महानतम लक्षण 

बुद्ध ने आरंभ में बता दिया था कि मनुष्य के लिए खुद को किसी ईश्वर से जोड़ना, उसकी चाहत रखना कतई आवश्यक नहीं है। वे चाहते थे कि मनुष्य सिर्फ मनुष्य की ही चिंता करे। उन्होंने मोक्ष, स्वर्ग, नर्क जैसी ख्याली बातों पर कुछ नहीं कहा। उनका आग्रह मनुष्य के चरित्र, आचरण और सद्व्यवहार के प्रति था। बुद्धिवादी सोच और ज्ञान, उनके अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। वही उसके श्रेष्ठत्व का आधार है। किसी बात पर सिर्फ इसलिए भरोसा नहीं करना चाहिए कि एक ऋषि ने ऐसा कहा था, अथवा किसी महात्मा ने वैसा लिखा है। किसी भी प्रज्ञावान मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है कि वह स्थितियों की अपने विवेक के अनुसार समीक्षा करने के बाद, स्वयं किसी स्वतंत्र निष्कर्ष तक पहुंचे। 

इस कसौटी पर आंका जाए तो बौद्ध धर्म वास्तव में कोई धर्म ही नहीं है। इसी कारण हमें बौद्ध जयंती पर आयोजित इस कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए विशेष प्रसन्नता हो रही है। गौतम बुद्ध के बुद्धिवादी दृष्टिकोण की प्रतिक्रियावादियों द्वारा घोर आलोचना हुई थी। वे 2500 वर्ष पहले जन्मे थे। उन दिनों इस देश में धर्म के नाम पर आदिम कर्मकांड प्रचलित थे। उन्होंने साहस और दृढ़ता के साथ उन आदिम धार्मिक कर्मकांडों और रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज उठाई। प्रतिक्रियावादियों द्वारा उनका तीव्र विरोध ही बुद्ध की महानता तथा उनके शब्दों की ताकत को दर्शाता है। बुद्ध के बाद उनके बुद्धिवादी दर्शन और संप्रदाय को नष्ट करने के लिए जिन लोगों ने लिखा और बोला, उन्होंने असभ्य हिंदू धर्म की जंजीरों को दुबारा मजबूत करने के लिए मूर्खतापूर्ण आख्यान गढ़े और सुनाए।

रामायण में बुद्ध का संदर्भ

रामायण में बौद्ध धर्म की बुराई की गई है। रामायण का बड़ा हिस्सा बाद में बुद्ध की शिक्षाओं का सामना करने, उन्हें बेअसर करने के लिए लिखा गया। गौतम बुद्ध से पहले की रामायण एक छोटी कहानी मात्र थी। वैष्णव ग्रंथ ‘नलायिरा प्रबंधम’ (तमिल में 4000 की संख्या को नलायिरा कहा जाता है। ‘नलायिरा प्रबंधम’ में भी 4000 पद हैं, जिनकी रचना 12 अलवार संतों ने मिलकर, पांचवी से दसवीं शताब्दी के बीच की थी। ‘नलायिरा प्रबंधम’ का उपलब्ध संस्करण नौवीं और दसवीं शताब्दी के बीच का है, जो श्री रंगनाथ मुनि द्वारा रचित है) तथा शैव ग्रंथ ‘थीवरम’ (शैव ग्रंथ थीवरम सातवीं-आठवीं शताब्दी की रचना है। उसकी रचना भी कई तमिल शैव संतों ने मिलकर की थी। रचनाकारों में तीन प्रमुख संत हैं– संबंदर, अप्पार और सुंदरार) जैसी विशालकाय कृतियां बौद्ध धर्म-दर्शन के प्रभाव को कम करने के लिए ही रची गई थीं। उनमें बौद्ध एवं जैन मतावलंबियों को नास्तिक, डाकू, हत्यारा और यहां तक कि वैदिक बलि प्रथा का दुश्मन बताया गया। शैव मतावलंबी अपने आराध्य की प्रार्थना कर, उनसे बौद्ध मतावलंबियों की पत्नियों के साथ बलात्कार करने की ताकत मांगते हैं। 

नास्तिक का अभिप्राय 

बुद्ध व्यक्तिवाचक संज्ञा है। व्यक्ति के संबंध में ही आमतौर पर उसका उपयोग किया जाता है। बुद्ध का अभिप्राय बुद्धि अथवा मेधा से है। कोई भी व्यक्ति जो स्थितियों की विवेचना के लिए अपनी तर्कबुद्धि का उपयोग करता है, वही बुद्ध है। यूं तो सभी मनुष्यों के पास कुछ न कुछ तर्कबुद्धि अवश्य होती है, लेकिन सिर्फ वही लोग जो अपने विवेक का समझदारी से, सकारात्मक संदर्भों में उपयोग करते हैं, ‘बुद्ध’ कहे जा सकते हैं। सिद्ध शब्द का भी वही अर्थ है। सिद्ध ऐसे व्यक्ति को माना गया है, जिसका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण हो। 

वैष्णव संप्रदाय के केंद्र में विष्णु है, जिसे अवतार और ईश्वर का दर्जा प्राप्त है। दूसरी ओर बौद्ध धर्म के केंद्र में सिर्फ मानवीय बुद्धि या विवेक है। इन दिनों किसी भी व्यक्ति को जो ईश्वरीय सत्ता में अविश्वास रखता है, नास्तिक घोषित कर दिया जाता है। मगर सच्चाई यह है कि ऐसा व्यक्ति, जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के साथ-साथ अपने विवेक का तर्कसंगत ढंग से उपयोग करता है, वही नास्तिक कहलाने का अधिकारी है। ब्राह्मणवाद का विरोध करने वालों को भी उनके विरोधी नास्तिक मान लेते हैं।

बौद्ध धर्म के संदेशों के साथ बुरी तरह छेड़छाड़

कुछ समय पहले, इरोड (तमिलनाडु का एक शहर) में बौद्ध सम्मेलन हुआ था। उसमें ‘विश्व बौद्ध सभा’ के मुखिया भंते मल्लाल शेखर ने, अपने बीज भाषण में स्पष्ट रूप से कहा था कि जितने भी लोग वहां एकत्र हुए थे, वे सभी बुद्ध थे। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका में बौद्ध को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है, जो अंधविश्वास का खंडन करते हुए, सिर्फ अपने बुद्धि-विवेक का प्रयोग करता है।

इन दिनों सार्वजनिक जीवन में बुद्धि-विवेक के उपयोग को शायद ही महत्व दिया जाता है। स्कूल और कॉलेजों में विद्यार्थियों को अपनी बुद्धि और तर्कशक्ति का प्रयोग करने की शिक्षा नहीं दी जाती। न ही उन्हें परंपरा, रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर सवाल उठाना सिखाया जाता है। यदि थोड़े-बहुत लोग अपने तर्क-सामर्थ्य का स्वतंत्र उपयोग करते भी हैं तो तत्काल उनपर नास्तिक होने का ठप्पा लगा दिया जाता है, जो असल में ऐसी पदवी है, जिसका कोई अर्थ ही नहीं है। तर्कवादी यदि नास्तिक होने से इंकार करे, खुद को बुद्धिवादी कहलवाना पसंद करे तो उसे ऐसा सिद्ध करने के लिए भारी परेशानी उठानी पड़ती है। कारण है कि नास्तिक के शब्द के अर्थ को बुरी तरह बदल दिया गया है।

बुद्ध ने भी अपने समर्थकों से यह कभी नहीं कहा था कि वे जो उपदेश देते हैं, उसपर ज्यों का त्यों विश्वास कर लेना चाहिए। उन्होंने तो कहा था कि उनके शब्दों को जांचे-परखें और अपने बुद्धि-विवेक के अनुसार ही उन पर फैसला करें। बुद्धिसंगत होने के बाद ही उन्हें स्वीकार करें।

बुद्ध और पेरियार

नंगी आंखों से स्वर्ग को देखा 

गौतम बुद्ध ने अपने विचार 2500 वर्ष पहले अभिव्यक्त किए थे। वे तात्कालिक समाज की शिक्षा और ज्ञान के अनुरूप थे। मनुष्य के ज्ञान की सीमा है। अपने समय और समाज की परिस्थितियों में उन्होंने जो भी कहा था, वह आज की परिस्थितियों में न तो पूरी तरह सही है, न ही शत-प्रतिशत लागू हो सकता है। बुद्ध के विचारों को शब्दशः ग्रहण करना, मेरी दृष्टि में अलग किस्म की आस्तिकता है। उस समय के लोग नंगी आंखों से आसमान में झांकते थे। प्रकृति और समाज के बारे में बहुत मोटी जानकारी उनके पास थी। आजकल शक्तिशाली दूरदर्शी से आसमान की पड़ताल की जाती है। फलस्वरूप सूरज पर बने काले धब्बों का परीक्षण भी संभव है। हमारे पूर्वज जितना जानते थे, उसी को सबकुछ समझकर विश्वास करना, मनुष्य की रचनात्मक मेधा तथा उसके सृजन-सामर्थ्य को सीमित कर देने जैसा है।

आर्यवाद ने देश को असभ्य बनाया है

बौद्ध धर्म के बारे में हमें यही कहना सही होगा कि समय के साथ मनुष्य के ज्ञान-सामर्थ्य में वृद्धि होती है; अतएव हमें भी अपने विचारों को प्रगति और समसामयिक परिवर्तनों के अनुरूप समायोजित करते रहना चाहिए। पुराने कथनों को ही अंतिम मानकर, उनपर अड़े रहना समाज के प्रति बौद्धिक विश्वासघात और पिछड़ापन है। यह मानवीय मेधा के विकास को अवरुद्ध कर देने जैसा है।

बुद्ध ऐसे समय में उभरकर आए जब आर्यवाद ने इस देश को आदिम, बर्बर, तर्कहीनों और जड़ बुद्धिजीवियों की भूमि बना दिया था। जिन लोगों ने धर्मशास्त्रों और पुराणों की रचना की, वे अपनी तरह से बुद्धिमान रहे होंगे। उन्होंने वही लिखा था, जो उनकी साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक प्रवृतियों के अनुकूल था। सभी लोगों का कल्याण हो, पूरा समाज फले-फूले, यह उनकी चिंता का विषय कभी नहीं था। उनके द्वारा रचे गए धर्मशास्त्र और पुराण निर्विवाद रूप से इसकी पुष्टि करते हैं। 

थिरुवेल्लुवर और उनकी सीमाएं 

थिरुवेल्लुवर [श्री वेल्लुवर, प्राचीन तमिल संत कवि] के प्रति मेरे हृदय में गहरा सम्मान है, किंतु उनकी भी सीमाएं थीं। यहां तक कि प्राचीन काल का सबसे महानतम ग्रंथ, अपने समय में उपलब्ध मेधा या उस समय तक मनुष्यता के बौद्धिक विकास से परे नहीं जा पाया है। [पेरियार यहां ‘थिरुक्कुरल’ की चर्चा कर रहे हैं। थिरुक्कुरल तमिल भाषा के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक है। उसकी रचना थिरुवेल्लुवर ने की थी। पेरियार ने कई जगहों पर इस ग्रंथ की प्रशंसा की है। साथ ही उसकी कमजोरियों या असामयिक हो चुकी अनुशंसाओं की ओर इशारा भी किया है। उनका यह भी मानना है कि मूल ‘थिरुक्कुरल’ ऐसी कमजोरियों से मुक्त था। ब्राह्मणों के दक्षिण आगमन के बाद उन्होंने निहित स्वार्थ के अनुसार वहां के प्राचीन ग्रंथों को प्रदूषित किया था।] इसलिए प्राचीन ऋषि-मुनियों, बुद्ध या थिरुवेल्लुवर ने जो कहा, वही अंतिम है, या उसी को एकमात्र सत्य या मानवीय मेधा की सीमा मान लेना, पूर्णत: अनुचित है।

बावजूद इसके गौतम बुद्ध और थिरुवेल्लुवर का हम इसलिए सम्मान करते हैं कि ऐसे दौर में जब हिंदू धर्म और समाज पूरी तरह असभ्य था, लोग बर्बर थे, समाज का बहुसंख्यक हिस्सा बाकि बचे मामूली हिस्से के सुखोपभोग, वैभव और विलासिता की खातिर गुलामों की तरह काम करता था। उस दौर में बुद्धिवाद को स्थापित करना, तर्क और ज्ञान के महत्व से लोगों को परिचित कराना, केवल उन्हीं के लिए संभव था। अपने साहस के भरोसे यह उन्होंने कर दिखाया था। 

धार्मिक प्रवृति के लोग पुराणों में कही गई मनगढंत और ऊल-जुलूल बातों पर विश्वास करेंगे। उनका गुणगान भी करते रहेंगे, किंतु यदि उन्हें असली इतिहास के बारे में बताया जाए तो प्रतिक्रिया में बस इतना कहेंगे, “गोरे अंग्रेजों ने भारत के बारे में जो कहा है, उसपर विश्वास मत करो।” ये ऐसे लोग हैं, जो अपने विवेक और अपनी अंतश्चेतना के विरुद्ध मिथ्या भाषण करते हैं। वे हमेशा ऐसे लोगों से घिरे रहते हैं, जो अपनी मुक्त चिंतन शक्ति को गंवा चुके हैं। धर्म और ईश्वर के नाम पर धार्मिक लोगों ने जो भी मन में आए, बकवास करना और डींगे हांकना सीख लिया है। भले ही उनके शब्दों का इतिहास या तत्कालीन सामाजिक यथार्थ से कोई संबंध हो या न हो। उनके लिए यह महत्वहीन है। स्पष्ट है कि धर्म ने खुद को अंधविश्वास तक सीमित कर दिया है। 

पुराण गौतम बुद्ध के बाद की रचना हैं 

जिन दिनों यह कहा जा रहा था कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारत के बारे में जो लिखा है, उसपर विश्वास नहीं करना चाहिए, उन दिनों उत्तर भारत स्थित भारतीय विद्या भवन नामक संस्था के तत्वावधान में, मूर्खतापूर्ण धार्मिक आख्यानों तथा अलोकतांत्रिक शास्त्रों पर केंद्रित पुस्तकें लगातार छापी जा रही थीं। मि. मुंशी [कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी] उस संस्था के अध्यक्ष; तथा अरबपति बिरला [घनश्यामदास बिरला] और डॉक्टर राधाकृष्णन [सर्वपल्ली] उसके विशिष्ट सदस्य थे। उन्होंने ‘वैदिक युग’ [प्राचीन इतिहास और संस्कृति पर प्रकाशित पुस्तकमाला थी। प्राच्यविद रमेशचंद मजुमदार उसके संपादक थे] नामक पुस्तक प्रकाशित की थी। उस पुस्तक की रचना में मिस्टर मुंशी की बड़ी भूमिका थी। उस पुस्तक की प्रस्तावना में भी लिखा गया था, “पुराण और महाकाव्य इतिहास नहीं हैं। उनमें समकालीन घटनाओं का वर्णन नहीं है। ‘व्यास’ शब्द का अर्थ कहानी लेखक (किस्सागो) है।” वही पुराण लोगों के दिलो-दिमाग में बैठ गया। लोगों की सहज बुद्धि पर कब्जा जमाकर वे उनका मार्गदर्शन करने लगे। यही हमारी परेशानियों का सबसे बड़ा कारण है।

तीन-चौथाई से अधिक पुराणों का लेखनकाल बुद्ध के बाद का बताया गया है। बुद्ध द्वारा प्रचारित तर्कवादी शिक्षा के विरोध में, उसकी ओर से लोगों का ध्यान हटाने तथा उन्हें ब्राह्मणवाद की ओर आकृष्ट करने के लिए पौराणिक ऋषियों ने अवतारों की मनगढंत कहानियां रचीं। कृष्ण को उनका मुखिया बनाया गया। हिंदू देवी-देवताओं के चमत्कारपूर्ण कारनामे हमेशा ही लोगों के विशिष्ट आकर्षण और उत्तेजन का कारण रहे हैं। कृष्ण महाकाव्य तो पूरी तरह कामुकता और फूहड़पन से भरपूर है। इतना कुछ होने के बाद, उसे दैवीय भी घोषित कर दिया गया। भगवदगीता को तो महाभारत में बहुत बाद में, आगे चलकर जोड़ा गया था।

जाति से मेरा अभिप्राय अलग है

ऐसे अश्लील और कामुक परिवेश में कृष्ण जैसा देवता गढ़ने तथा उसकी प्रशस्ति में भजन गाने, नाटक और नृत्यों के आयोजन का भला क्या औचित्य है! कृष्णलीलाएं तो सिनेमा के पर्दे पर भी आ चुकी हैं। जो भक्त कृष्णलीला स्थल पर हाथ जोड़े या तालियां बजाते, तन्मयता से गाते-झूमते हुए नजर आते हैं, वे उसी भगवान को अपने घर में, अपनी पत्नी के पास जाने की अनुमति देने का साहस नहीं कर पाएंगे। लोगों का अंतःकरण जिस बात को करने से रोकता है, आम व्यवहार में उसका खंडन न करने का आखिर क्या कारण है? भगवान की अश्लीलता, संकीर्णता और व्यभिचार को जश्न की तरह दर्शाने वाले त्योहारों को समाज में जगह क्यों मिलनी चाहिए?

आज कोई भी व्यक्ति जाति प्रथा का समर्थन करने का साहस नहीं जुटा पाता। सी. राजगोपालाचारी कदाचित इसके अपवाद हैं। वे जातिवाद को बनाए रखना चाहते हैं। यदि उनसे सीधे मिलकर, आमने-सामने सवाल किया जाता तो वे कदाचित यही कहते, “जाति से मेरा अभिप्राय कुछ अलग है।” वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों के समर्थन के अभाव में जाति क्या टिक सकती थी? वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों के बहिष्कार के बगैर जाति का उच्छेद कभी भी, भला कैसे संभव है? धर्मशास्त्रों का एकमात्र उद्देश्य है– गैर-ब्राह्मणों जैसे कि शूद्रों और पारिया जैसे अछूतों का सदा-सर्वदा तिरस्कार तथा पुरोहित वर्ग को संरक्षण प्रदान करना।

कंधे पर देवता और बुद्ध की स्तुति 

बुद्ध जयंती या बुद्ध दिवस को मनाना हमारे लिए जरूरी क्यों है? यदि बुद्ध को अलवार और नयनमार संतों की श्रेणी में रखना है तो उन्हें भुला देना ही बेहतर होगा। बुद्ध जयंती वस्तुत: वैदिक धर्मावलंबियों के लिए शत्रु-दिवस है। ब्राह्मण वर्चस्व वाला मीडिया इस तरह के सम्मेलनों की कार्रवाही के बारे में ईमानदारी से रिपोर्टिंग नहीं करेगा। बजाय इसके उनके अखबारों में एक या अधिक पौराणिक सभाओं की घोषणाओं की भरमार मिलेगी। बाद में उन सभाओं से संबंधित समाचारों से अखबार के पन्ने भर दिए जाएंगे। ऐसे परिवेश में जाति को विनष्ट कर, बुद्धिवाद के वर्चस्व को पुनर्स्थापित कर पाना कितना कठिन है, उस स्थिति का बयान संभव नहीं। अच्छा है कि उसकी कल्पना से तसल्ली कर ली जाए। 

दुनिया के भला किस देश में इतने सारे भगवान हैं, जितने हमारे देश में हैं? इतने सारे चरित्रहीन ईश्वरों की मौजूदगी का औचित्य ही क्या है? ऐसे भगवानों में आस्था और विश्वास रखते हुए, उन्हें अपने कंधों पर लादकर, बुद्ध को ससम्मान याद करने तथा उनकी स्तुति करने से कोई भला नही होने वाला। इन ईश्वरों का बहिष्कार करने के बाद लोग स्वयं बुद्ध बन जाएंगे। मनुष्य की आकृति में, मनुष्य को दुःख और सुख देने वाला, मानवीय अपराधों और सद्गुणों में लिप्त रहने वाला ईश्वर हो ही नहीं सकता। विष्णु, शिव और ब्रह्मा, इन हिंदू त्रिदेवों की कहानियों में अश्लीलता, हिंसा, फूहड़पन, हत्या आदि की भरमार है। 

गंदे पुजारी के चरण पखारना

आश्चर्य की बात यह है कि पुराणों में विश्वास रखने वाले लोग भी यहां आने, और बौद्ध जयंती के उत्सव में हिस्सा लेने का साहस जुटा लेते हैं। ये वही लोग हैं, जो मंदिर बनवाने वाले को ही दयावान और परोपकारी मानते हैं। सोचते हैं कि भक्ति सिर्फ पत्थर के स्तंभ से माथा रगड़ने पर व्यक्त की जा सकती है, यही लोग गंदे पुजारियों के पैर धोने को भी भक्तिकर्म मानते हैं। गौतम जैसे विश्व के महान बुद्धिवादी चिंतक के व्यापक प्रभाव को बेअसर करने के लिए ही इन पौराणिकों ने उनके बारे में सत्य को तोड़-मरोड़कर, उसे प्रदूषित करते हुए पेश किया है। 

जाति को नष्ट करने की हिम्मत ही नहीं है 

रामायण और महाभारत के बारे पुस्तकें आज भी हजारों की संख्या में लिखी और बेची जाती हैं। इनका क्या उद्देश्य है? क्या इसका सीधा और साफ उद्देश्य जातिवाद, अंधविश्वासों और लोगों की दास मानसिकता को बनाए रखना नहीं है? यदि भारत में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे जीवनमूल्यों से भरपूर वास्तविक लोकतंत्र की जड़ें जमानी हैं तो जातिवाद को जड़ से उखाड़ना पड़ेगा। सरकार ऐसी होनी चाहिए, जिसमें यह सब करने का साहस हो। जो जातिवाद जैसी विकृति से समाज को मुक्त कर सके। आज हमारे पास ऐसी सरकार है, जो जातिवाद की बुराइयों पर बात तो करती है, लेकिन उसमें इसे उखाड़ फेंकने का साहस नहीं है।

डॉ. राधाकृष्णन ने यह कहने का साहस दिखाया है, “हमने राजाओं और जमींदारों को उखाड़ फैंकने का साहस कर दिखाया है। स्थायी और दूरगामी लाभों के लिए हमें जातिवाद को नष्ट कर देना चाहिए। यह करने के लिए हमारे पास लोहे के दिल वाले इंसान होने चाहिए।” सरकार के पास ऐसा विचार तो है किंतु जातिवाद पर हमला करने की इच्छा नहीं है। हमारा लक्ष्य ईश्वरविहीन समाज की स्थापना करना नहीं है। हम ऐसा समाज चाहते हैं जिसमें सत्य और विवेक देवताओं के रूप में मौजूद हों। 

बुद्ध : क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए अपरिहार्य 

23 जनवरी 1954 को हमने इरोड में एक बौद्ध सम्मेलन का आयोजन किया था। उसके आयोजन के पीछे हमारा उद्देश्य क्या था? क्या उससे हमारा इरादा खुद को बौद्ध धर्म का अनुयायी घोषित करना था? उसके माध्यम से क्या हम हिंदू धर्म को उजाड़ कर बौद्ध धर्म को लाना चाहते थे? नहीं। फिर बुद्ध के नाम पर सम्मलेन आयोजित करने का क्या कारण था? वह इसलिए कि हम मानते हैं कि हम जो बदलाव लाना चाहते हैं, हिंदुओं की जिन बुराइयों को हम नष्ट करना चाहते हैं, गौतम बुद्ध की शिक्षाएं उसका संपूर्ण समर्थन करती हैं। गौतम बुद्ध का दर्शन, उनके सिद्धांत और उपदेश हमारे स्व:सम्मान एवं बुद्धिवादी आंदोलन के साथ, उसके समर्थन में खड़े हैं। ईश्वर, जाति, गोत्र, धर्मशास्त्र, पुराण और महाकाव्य हमारी पराधीनता के कारण हैं। ऐसी चीजें हैं, जिनसे हम मुक्त होना चाहते हैं। जबकि जीवनमूल्यों से भरपूर गौतम बुद्ध की शिक्षाएं और उनका दर्शन हमारे क्रांतिधर्मा लक्ष्यों के लिए बेहद मूल्यवान हैं। 

हमारे आदर्शों के प्रतीकपुरुष

कुछ चीजें जिनका हम आज प्रचार-प्रसार करते हैं, वे गौतम बुद्ध की ढाई हजार वर्ष पुरानी शिक्षाओं में पहले से ही शामिल हैं। बौद्ध धर्म हमारे आदर्शों के लिए आधार स्रोत, मानक संस्था की तरह है। जिन दिनों इस रामासामी (पेरियार) द्वारा स्व:सम्मान आंदोलन के आदर्शों का प्रचार आरंभ किया गया था, तब कुछ ऐसे भी लोग थे, जिनका मानना था कि उसमें कोई बड़ी, अनोखी या महत्वपूर्ण बात नहीं है। वे सोचते थे कि मैं गीता से बड़ा नहीं हो सकता। ऐसे लोगों के लिए कम से कम बौद्ध धर्म का होना बड़ा ही प्रोत्साहनपरक और उत्साहवर्धक है। हमारे आदर्शों को किनारे करना, उन्हें मिटा पाना परंपरावादियों के लिए आसान नहीं होगा। उन्हें यह बताने की जरूरत है कि बुद्धिवाद उतना ही पुराना है, जितना कि बौद्ध धर्म; और हम जो आज प्रचार कर रहे हैं, उसमें कुछ भी नया नहीं है। 

बुद्ध हिंदुओं के लिए भी मान्य और पूजनीय 

ऐतिहासिक जरूरतों की खातिर हिंदुओं ने बुद्ध के धर्म-दर्शन को स्वीकार किया था। यहां तक कि उनकी पूजा भी की जाती रही है। हालांकि इतिहास हमें यह भी बताता है कि बौद्ध धर्मालंबियों को सताया जाता था। उनकी हत्या भी कर दी जाती थी। उनके मठों को जला दिया गया था। यहां तक कि उनके धर्म-दर्शन को भी हिंदू कट्टरपंथियों ने बहुत पहले ही उखाड़ दिया था। कुछ बौद्ध मतावलंबियों को गहरे समुद्र की तलहटियों में डुबा दिया गया था। इतने सारे षड्यंत्रों और दमन के बावजूद हिंदुओं के लिए कभी संभव नहीं हो पाया कि वे हिंदू मानस में बसी गौतम बुद्ध की यादों को मिटा सकें।

ब्राह्मणों ने उन्हें विष्णु का अवतार घोषित किया

आखिरकार ब्राह्मणों को, गौतम बुद्ध को विष्णु के दसवें अवतार के रूप में मान्यता देनी ही पड़ी। इस तरह सब कुछ को पचा लेने वाले हिंदू धर्म ने शैव और वैष्णव संप्रदाय की भांति, बौद्ध धर्म को भी हिंदू धर्म की उपशाखा मान लिया। संभव है प्राचीनकाल में उन्होंने अच्छा व्यवहार किया हो, संभव है न भी किया हो, लेकिन यह सचाई है कि भारत भूमि से बौद्ध धर्म कभी भी पूरी तरह गायब नहीं हो सका। यहां तक कि स्वतंत्र भारत की सरकार को भी मानना पड़ा कि इस देश में बुद्ध को भुला पाना आसान नहीं है। इसलिए शैव और वैष्णव संपद्राय, जो हिंदू धर्म का दायां और बायां हाथ थे, को छोड़ते हुए बुद्ध की शिक्षाओं को बौद्ध धर्म-दर्शन की शिक्षाओं को सरकारी पहचान के रूप में सहेजा गया। 

राष्ट्रीय झंडे में धम्मचक्क

बौद्ध धर्म के प्रतीक धम्मचक्क को हमारे राष्ट्रीय झंडे में सम्मानित स्थान प्राप्त हुआ। सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के शिखर पर बनी चार शेरों की मूर्ति को राष्ट्रीय प्रतीक की मान्यता मिली, वही हमारे सैन्य अधिकारियों ने कंधों पर, मंत्रियों की गाड़ियों के बोनेट्स पर, सरकारी वाहनों, आम आदमी के काम आने वाले पोस्टकार्ड, जिनका सुदूर गांवों में बहुतायत से प्रयोग होता है, शोभायमान है। आजादी के बाद से ही गौतम बुद्ध के जन्मदिवस को सरकारी अवकाश घोषित किया जा चुका है।

क्या हमारे आंदोलन को कमजोर किया जा सकता है 

इन शब्दों का अभिप्राय क्या है? इसका अभिप्राय है कि आजाद भारत की सरकार ने गौतम बुद्ध और उनकी शिक्षाओं को मान्यता दी है। उन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना है। सरकार के लिए यह संभव नहीं था कि किसी हिंदू, शैव या वैष्णव प्रतीक को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकार कर सकें। इसका आशय यह है कि भारत के राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से हिंदू प्रतीक सर्वथा अनुपयुक्त हैं। अपनी जनता के इतिहास में मैं इसे एक क्रांतिकारी पड़ाव के रूप में चिह्नित करता हूं। 

इसलिए, यदि हम यह कहते हैं कि हमारे द्वारा शुरू किया स्व:सम्मान आंदोलन बुद्ध की 2500 वर्षों पुरानी शिक्षाओं पर आधारित, उसी का विस्तार था, तो लोग आसानी से समझ सकते हैं कि हम जो करते हैं, वह सरकार द्वारा अनुमन्य, उसके द्वारा अनुशंसित कार्यक्रम से परे कुछ भी नहीं है। इसलिए ब्राह्मणों, कांग्रेसियों, धर्माधीशों, शंकराचार्यों और मठाधिपतियों के लिए हमारे आंदोलन को, जो असल में सुधारवादी आंदोलन है, रोकना/ सीमित कर पाना असंभव है। 

कुरल में ब्राह्मणवादी शिक्षाओं के अनुरूप प्रक्षेपण 

ब्राह्मणों की एक कुटिलनीति बुद्धिवादी चिंतकों को अपना बताकर, उनकी शिक्षाओं को तोड़-मरोड़कर पेश करने की रही है, जिससे वे उन्हें अलोकतांत्रिक और वर्चस्ववादी ब्राह्मणवादी शिक्षाओं के अनुरूप ढाल सकें। पहले यह काम उन्होंने बुद्ध के लिए किया, उसके बाद थिरुवेल्लुवर के साथ। स्व:सम्मान आंदोलन द्वारा कुरल को अपना नीति-ग्रंथ मानने से पहले ब्राह्मण, साथ में उनके शूद्र अनुचर भी, कुरल के बारे में बढ़-चढ़कर दावे करते थे। उनका असली उद्देश्य कुरल की शिक्षाओं को, ब्राह्मणवाद के अनकूल ढालने की नीयत से, तोड़ना-मरोड़ना तथा उसके अर्थ का अनर्थ करना था। 

ब्राह्मण टीकाकार पेरीमेलाझगर ने अपनी टीका में आर्यों की बहुत-सी शिक्षाओं को शामिल किया है। इस प्रकार वे थिरुवेल्लुवर की शिक्षाओं को पूरी तरह तोड़ने-मरोड़ने, उनमें अंतर्निहित मूल सत्य पर पर्दा डालने में लगभग कामयाब रहे हैं। [पेरीमेलाझगर 13वीं के टीकाकार थे। कुरल पर उनकी टीका के कारण जहाँ अनेक विद्वान उनकी सराहना करते हैं, वहीं अनेक विद्वान उन पर कुरल में प्रक्षेपण का आरोप भी लगाते हैं।] हमारे आंदोलन द्वारा कुरल तथा उसमें निहित सत्य को दुबारा दुनिया के सामने लाने के बाद ही, उसके प्राचीन गौरव और दीप्ति की वापसी संभव हो सकी है। आज पूरी तमिल-भूमि कुरल संगठनों और समूहों से भरी है। स्कूलों और कॉलेजों में कुरल के अध्ययन में लगातार वृद्धि हो रही है। जैसे-जैसे कुरल के अध्ययन को बढ़ावा दिया जा रहा है, वैसे वैसे रामायण एवं महाभारत जैसे जातिवादी और अंधविश्वासों से भरपूर आर्य ग्रंथों का प्रभाव कमजोर पड़ता जा रहा है। 

यही कार्य अब हम बौद्ध धर्म के साथ कर रहे हैं। रूढ़िवादी और परंपरापोषी हिंदुओं को हतोत्साहित करने के लिए बौद्ध धर्म के आदर्शों, उसमें अंतर्निहित वास्तविक मूल्यों का प्रचार किया जा रहा है। उनकी ईर्ष्या और क्रोध हमें परेशान नहीं करते।

ऋषि-मुनियों के उपदेश वृथा हैं

गौतम बुद्ध ने तर्क और बुद्धिवाद को प्रथम स्थान पर रखा था। उन्होंने प्राचीन ऋषियों अथवा कथित दिव्य मनीषियों के लिखे को बुद्धिसंगत (ज्ञान) मानने से इंकार कर दिया था। वे चाहते थे लोग अपने विवेक से काम लें और उसकी मदद से खुद सत्य का साक्षात करें। तथाकथित ईश्वर के अस्तित्व अथवा उसकी सत्ता पर कोई टिप्पणी करने से इंकार के साथ-साथ उन्होंने आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारने से भी मना कर दिया था। दावा किया जाता है कि कथित आत्मा स्वयं तथाकथित परमात्मा के तेज से अस्तित्ववान होती है। इस कारण वह ईश्वर के विचार को ही परोक्ष रूप में स्थापित करती है। चूंकि ईश्वर को प्रत्येक दृष्टि से संपूर्ण एवं विकाररहित बताया गया है, अतएव ईश्वर की अनुभूति को पाप, पुण्य, अवगुण या सद्गुण, अच्छे अथवा बुरे कर्मों से नहीं जोड़ा जा सकता। इस तरह से आत्मा और परमात्मा के बीच अनुचित और अप्रमाणिक तादात्मय के कारण, गौतम बुद्ध की कसौटी पर उन्हें भारी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था।

बुद्ध ने सभी प्रकार की मूर्तिपूजा, मानवरूपी देवताओं की अभ्यर्थना, रूढ़िवाद, परंपरावाद और अंधविश्वास की निंदा करते हुए उनका बहिष्कार करने का उपदेश दिया था। लगभग वे सभी बातें जिन्हें आर्यमत के अनुसार पवित्र एवं दिव्य माना जाता था, उन्हें गौतम बुद्ध की तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था।

विध्वसंक हथियारों वाले देवता 

पुरातत्वविद भली-भांति सिद्ध कर चुके हैं कि हिंदुओं के जितने भी प्राचीन मंदिर हैं, वे पहले कभी बौद्ध विहार थे। यहां तक बताया गया है कि श्रीरंगम, कांचीपुरम, पालनी, तिरुपति आदि मंदिर भी मूल रूप से बौद्ध विहार ही थे। ऐसे मंदिर जो कभी गौतम बुद्ध की आभा से पूरी तरह देदीप्यमान थे, जहां प्यार, अनुराग, समर्पण, सहानुभूति सब कुछ सहज प्राप्य थे, उन मंदिरों को युद्धोन्मादी देवताओं की रम्यस्थली बना दिया। उनके हाथों में जानलेवा हथियार थमा दिए गए। ऐसा कोई हिंदू देवता नहीं है, जो जानलेवा, विध्वंसक हथियारों से न खेलता हो। ये दिखाते हैं कि भगवान बनने के लिए उस सत्ता के खाते में कुछ हत्याओं का होना जरूरी है। 

शैव और वैष्णव उपदेशों के दौरान बढ़-चढ़ कर दावे करते हैं कि उनका देवता प्यार करने वाला है। यह सब मनगढ़ंत तानाशाही और पाखंड पूर्ण है। उनके ये लंबे-चौड़े दावे देवताओं की हथियार बंद छबि को देखते ही हवा हो जाते हैं। प्रेम और हिंसा के बीच भला क्या संबंध हो सकता है? सबसे आश्चर्यजनक और दिलचस्प बात यह है कि युद्धोन्मादी देवताओं की भीड़ के बावजूद, दूसरे राष्ट्र के नागरिकों की अपेक्षा हिंदू कुल मिलाकर, तुलनात्मक रूप से सर्वाधिक कायर हैं।

[स्रोत : कलेक्टेड वर्क ऑफ़ पेरियार, संपादक के. वीरामणि, सेल्फ रेस्पेक्ट प्रोपेगेंडा फाउंडेशन चेन्नई, पेरियार ने यह संबोधन 15 मई, 1957 को चेन्नई के एगमोरे स्थित महाबोधि संगठम् परिसर में बुद्ध की 2501वीं जयंती के मौके पर आयोजित समारोह में किया था। (स्रोत : Velivada.com)]

(अंग्रेजी से अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप, संपादन : नवल) 


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