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आदिवासी जीवन पद्धति : अतीत का अवशेष या भविष्य की राह?

यदि हम आदिवासी जीवन पद्धति को उसके मूल्यों, विशेषकर उसके लोकतांत्रिक मूल्यों, के परिप्रेक्ष्य से देखें तो हमें यह स्पष्ट समझ में आ जाएगा कि यह अतीत का अवशेष न होकर भविष्य की राह दिखाने वाली है। आदिवासी समाजों में लोकतांत्रिक जीवन की समृद्ध परंपरा हमारे लिए आशा और प्रेरणा का स्रोत हो सकती है। बता रहे हैं ज्यां द्रेज

पिछले दिनों मुझे लब्धप्रतिष्ठ लेखक और अध्येता गोपीनाथ मोहंती के घर जाने का सुखद अवसर प्राप्त हुआ। लगभग तीस वर्ष पहले मैंने उनके उपन्यास ‘परजा’ के अंग्रेजी अनुवाद को उसके प्रकाशन के कुछ ही समय बाद पढ़ा था और उसने मुझ पर गहरा प्रभाव छोड़ा था। उस समय आदिवासी जीवन पद्धति के बारे में मेरा ज्ञान न के बराबर था। आगे चलकर झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की मेरी लंबी यात्राओं के दौरान मुझे अक्सर ‘परजा’ और उसकी गहरी अंतर्दृष्टि की याद आती रही।

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लेखक के बारे में

ज्यां द्रेज

ज्यां द्रेज बेल्जियन मूल के भारतीय नागरिक हैं और सम्मानित विकास अर्थशास्त्री हैं। वे रांची विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के अतिथि प्राध्यापक हैं और दिल्ली स्कूल आॅफ इकानामिक्स में आनरेरी प्रोफेसर हैं। वे लंदन स्कूल आॅफ इकानामिक्स और इलाहबाद विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य कर चुके हैं। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति के दस्तावेजीकरण में उनकी महती भूमिका रही है। वे (महात्मा गांधी) राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के प्रमुख निर्माताओं में से एक हैं। उन्हाेंने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्मत्य सेन के साथ कई पुस्तकों का सहलेखन किया है जिनमें ‘हंगर एंड पब्लिक एक्शन‘ व ‘एन अनसरटेन ग्लोरी : इंडिया एंड इटस कोन्ट्राडिक्शंस‘ शामिल हैं। सामाजिक असमानता, प्राथमिक शिक्षा, बाल पोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं व खाद्य सुरक्षा जैसे विषयों पर शोध में उनकी विशेष रूचि है

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