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‘मैं जननी शंबूक की’ : अद्भुत और मौलिक कल्पना

इस सर्ग में शंबूक की जननी के माध्यम से दलित चेतना को उभारने का कवि उद्भ्रांत शर्मा का प्रयास हिंदी साहित्य में एक क्रांतिकारी घटना है। दलित-चेतना सिर्फ प्रतिरोध की चेतना नहीं है, न सिर्फ वर्णव्यवस्था के खंडन की चेतना है, बल्कि वह स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के मूल्यों को स्थापित करने की चेतना है। बता रहे हैं कंवल भारती

शंबूक पर जितने भी काव्य और नाटक लिखे गए हैं, उनमें अधिकांश में रामायण की कथा को ही केंद्र में रखा गया है। हालांकि उससे हटकर भी कुछ अभिनव प्रयोग हुए हैं, जैसे जगदीश गुप्त ने अपने ‘शंबूक’ खंडकाव्य में विप्र-बालक की मृत्यु सर्प-दंश से दिखाई है, और राम के साथ शंबूक का विचारोत्तेजक संवाद कराया है।[1] इसी तरह कन्नड़ के नाटककार कु. वें. पुट्टप्पा ने अपने लघु नाटक ‘शूद्र तपस्वी’ में राम ने शंबूक का वध नहीं किया है, बल्कि उसका सम्मान किया है और ब्राह्मण से भी उसको नमस्कार करवाया है, जिसके नमस्कार करते ही उसका बालक जीवित हो जाता है।[2] किंतु सबसे नई और अद्भुत कल्पना उदभ्रांत शर्मा ने अपने महाकाव्य ‘त्रेता’ में की है। यह कल्पना शंबूक की मां की है। उन्होंने रामायण की मूल कथा को ही उलट दिया है। उनकी कथा सबसे मौलिक और विश्वसनीय भी है।

पहले मूल कथा को देख लें। शंबूक की कथा वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के उत्तरकांड में आती है। कहा गया है कि एक ब्राह्मण अपने मृत बालक को लेकर राम के दरबार में गया और बोला– “राम, आपके राज्य में अधर्म हो रहा है, जिसके कारण मेरे पुत्र की अकाल मृत्यु हो गई है। यदि यह पुनर्जीवित नहीं हुआ, तो मैं यहीं अपने प्राण त्याग दूंगा और आपको ब्रह्म-हत्या का पाप लगेगा।” राम ने वशिष्ठ से इसका कारण पूछा, तो उन्होंने शूद्र शंबूक द्वारा किए जा रहे तप को इसका कारण बताया और यह परामर्श दिया कि धर्म की रक्षा के लिए उसका वध करना होगा। राम ने तुरंत पालन किया। और वहां जाकर, जहां शंबूक तप कर रहा था, उसका वध कर दिया। शंबूक के मरते ही ब्राह्मण-बालक पुनर्जीवित हो गया और आकाश से भी देवताओं ने पुष्प-वर्षा करके राम को साधुवाद दिया।[3]

इस घटना पर सबसे पहला काव्य-नाटक 1920 में स्वामी अछूतानंद ने लिखा था, जिसमें शंबूक की पत्नी तुंगभद्रा ने शंबूक के वध पर राम को शाप दिया है। किंतु शंबूक की मां के चरित्र की कल्पना उदभ्रांत से पहले किसी कवि या नाटककार ने नहीं की है। उदभ्रांत शर्मा पहले कवि हैं, जिन्होंने अपने ‘त्रेता’ महाकाव्य में ‘मैं जननी शंबूक की’ सर्ग की रचना करके शंबूक की मां के चरित्र की मौलिक कल्पना की है। उन्होंने जिस तरह मां के माध्यम से शंबूक के विद्रोह के आधार को खोजा है, वह उदभ्रांत शर्मा की गहरी संवेदनशीलता का परिचायक है। उन्होंने शंबूक की मूल कथा में परिवर्तन किया है। वह रामायण में वर्णित कथा में मृत ब्राह्मण-बालक के प्रसंग से सहमत नहीं हैं। इसलिए उन्होंने इसे पूरी तरह उड़ा दिया है। कारण, वह शंबूक के तप की वजह से बालक की मृत्यु के आरोप में कोई तर्क नहीं देखते। शंबूक की हत्या के उनके अपने अलग तर्क हैं, जो ज्यादा तर्कसंगत प्रतीत होते हैं।

उदभ्रांत शर्मा ने ‘मैं जननी शंबूक की’ सर्ग का आरंभ इन पंक्तियों से किया है–

गर्व है मुझे
मैं हूं जननी शंबूक की।[4]

देखने में ये साधारण पंक्तियां हैं, परंतु अत्यंत सार-गर्भित हैं। यहां एक मां अपने उस बेटे पर गर्व कर रही है, जिसने वर्णव्यवस्था को नकार कर रामराज्य में पहला विद्रोह किया था। यह एक बड़ा विद्रोह भी था, क्योंकि रामराज्य के ज्ञात इतिहास में वर्णव्यवस्था के विरुद्ध इतना बड़ा विद्रोह नहीं मिलता। हालांकि उस दौर में जाबालीजैसे भौतिकवादी विचारक भी थे, पर उन्होंने विद्रोह नहीं किया था। शंबूक के विद्रोह के आगे बुद्ध का विद्रोह भी उतना महत्व नहीं रखता, जितना शंबूक का, क्योंकि वह एक शूद्र का विद्रोह था, जिसने वर्णव्यवस्था की अर्थवत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगाया था।

कवि उद्भ्रांत शर्मा व उनकी काव्य रचना ‘त्रेता’

डॉ. आंबेडकर ने लिखा है कि वर्णव्यवस्था केवल श्रम-विभाजन नहीं है, बल्कि वह श्रमिकों का भी विभाजन है। वे मानते हैं कि सभ्य समाज श्रम-विभाजन चाहता है, पर किसी भी सभ्य समाज में श्रमिकों का भी विभाजन करना स्वाभाविक नहीं है।[5] आंबेडकर ने इसे वाहियात व्यवस्था कहा था।[6]

शंबूक ने अपने कर्म से यह प्रमाणित किया कि तप करना, पढ़ना-लिखना और उपदेश देना एक जाति का गुण नहीं हो सकता, वरन् यह किसी भी जाति में हो सकता है। एक ब्राह्मण भी गुणहीन और अयोग्य हो सकता है, और शूद्र भी गुणवान और योग्य हो सकता है। एक शूद्र उसी स्थिति में गुणी और योग्य नहीं हो सकता, जब राज्य-शक्ति द्वारा उसके स्वाभाविक गुणों का दमन किया गया हो। शंबूक की मां बताती है कि उसने दस-ग्यारह साल की उमर से ही वर्णव्यवस्था के विरुद्ध तर्क करना शुरू कर दिया था। उसे पढ़ने का बहुत शौक था। वह ऋषि-आश्रमों में वेदाध्ययन करते ब्राह्मण-बालकों को भावाकुल होकर देखता था और छिपकर वेदों की वाणी सुनता था। यथा–

ऋषि आश्रम के पीछे
खड़े हो एकांत में
छुपकर वह सुना करता
वेदों की वाणी
गुरू द्वारा अपने शिष्यों को
सुनाए जाते वचन।[7]

मां यह सब देखकर डर जाती और उसे ऐसा करने से मना करती, क्योंकि–

अगर पता लग गया गुरुदेव को या
किसी अन्य शिष्य को तो
समाज में आ जायेगा भूचाल ही।

भूचाल इसलिए कि वर्णव्यवस्था ने शूद्र को पढ़ने-लिखने और वेद-वाणी सुनने का अधिकार नहीं दिया है। वेद सुनने का दुस्साहस कने वाले शूद्र के कान में गर्म सीसा डालने के दंड का प्रावधान था। किन्तु, शंबूक बार-बार ऐसा करता था। तब उसकी मां–

मन में कांपती रहती
और प्रार्थना करती ईश्वर से
उसे देखे नहीं कोई
‘असामाजिक’ दृष्टि वाला
यह जघन्य कृत्य करते हुए कभी।

यहां कवि ने वर्णव्यवस्था के समर्थकों के लिए बहुत ही सटीक शब्द प्रयोग किया है– ‘असामाजिक’, जिसकी दृष्टि में शूद्र के साथ सामाजिक व्यवहार वर्जित हो। लेकिन इस ‘असामाजिकता’ पर शंबूक के प्रश्न बड़े धारदार थे। वह मां से पूछता–

समाज का मुख अगर ब्राह्मण है, तो
उसे उदर भरने की आवश्यकता क्या है?
और अगर प्रातः
वह भी करता शुचि-क्रियाएं वही,
जिन्हें करते हम,
तो हममें और ब्राह्मण में क्या है अंतर
और क्यों है?

इसी तरह वह मंदिर में प्रवेश को लेकर सवाल करता–

हमारे भी मुख, आंख, नाक, कान,
उदर भी हैं, पांव भी, जनेंद्रिय भी
वैसे ही जैसे ब्राह्मण में होते
फिर क्यों रोक दिया जाता है हमें
मंदिरों में घुसने से?

वर्णव्यवस्था में शूद्र को पैरों की संज्ञा देने पर उसका तर्क था–

पांव अगर हम हैं तो
क्या ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
बिना पांव के होते?

एक दस-ग्यारह साल के बालक में इस तरह के तर्क पैदा हो ही सकते हैं, जब वह रोज ही अपने पिता, अपनी मां और अपने जाति-भाइयों को शूद्र होने की वजह से सवर्ण जातियों द्वारा तिरस्कृत और प्रताड़ित होते हुए देखता रहा हो। यथा–

सहस्त्रों अपने जाति-भाइयों को वह
बचपन से देखता आया था
सिर झुकाकर अपना
करते हुए काम
तुच्छ समझा जाने वाला,
झिड़कियाँ और झिड़कियों के साथ प्राय:
खाते हुए गंदी-गंदी गालियां।

यही नियति थी शूद्रों की, जिसे देखते हुए शंबूक में विद्रोह का स्वर फूटना स्वाभाविक था। लेकिन, उसकी मां को उसके विद्रोही सवालों से डर लगता था, क्योंकि रामराज्य में वह उसका परिणाम जानती थी। इसलिए वह उसे समझाने की कोशिश करती थी–

मैं तब समझाती अपने बेटे को
तुम्हारी अवस्था नहीं
ऐसे प्रश्न करने की
जन्म तुम्हारा हुआ
सेवा दूसरों की करने को ही।
शूद्र हैं हम
नहीं चाहिए हमको सोचना
किसी ब्राह्मण,
किसी क्षत्रिय की तरह।

लेकिन शंबूक पर इन बातों का कोई असर नहीं होता था। उसके दिमाग में कुछ और ही चल रहा होता था–

उठ रही थी
नव समाज को निर्मित करने हेतु
स्वस्थ संविधान-रूपी
नव्यतर शंबूक-संहिता को रच देने की
क्रांतिकारी चिंगारी।

यह कवि की गजब की अभिव्यक्ति है। ‘शंबूक-संहिता’ का विचार अस्वाभाविक नहीं है। आखिर नए कानून की जरूरत उसे ही होती है, जो वर्तमान व्यवस्था और कानून से पीड़ित और तिरस्कृत होता है। इसमें डॉ. आंबेडकर द्वारा मनुस्मृति के दहन और समानता की नई संहिता के निर्माण की कल्पना की स्पष्ट प्रतिध्वनि देखी जा सकती है।

अंत में, मां भी शंबूक को उसके हाल पर छोड़कर पति के साथ, कवि के शब्दों में अपने ‘मनु-प्रदत्त कर्म में’ व्यस्त हो जाती है।

इसके बाद कवि रामराज्य के उस काल-खंड का बोध कराता है, जिसमें भयानक अकाल पड़ता है, और जनता में त्राहि-त्राहि मच जाती है। शंबूक की मां अपने आत्म-कथ्य में उस समय का वर्णन करती है–

श्रावण मास बीतने को था लेकिन
अयोध्या में सूखा था
मेघ ऐसा लगता था रूठे थे,
दिखते थे दूर-दूर तक नहीं
और अगर दिखते भी थे तो
उनके पेट बजते थे
खाली कनस्तर से।

आगे कवि ने सूखे का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है–

अयोध्या के किसानों के घरों में
थे उदास चूल्हे
हर्ष की गर्माहट
देने वालीं उनकी आंखें
ठंडी हो चिपक गईं थीं नभ से,
ताकि बादलों की दरिद्रता पर तरस खाकर
बरस पड़ें वे ही कृषि-क्षेत्रों में।
गायों ने दुग्धदान बंद किया
हो गईं कृशकाय,
उनके बछड़े एक-एक कर
समाते जा रहे थे
काल के कराल गाल में।

इस भयानक सूखे की स्थिति में शंबूक के परिवार पर क्या गुजर रही थी, वह कवि के शब्दों में इस प्रकार है–

हम आते थे
प्रजा-जनों की उस श्रेणी में
जिसमें पेट भरने को लोग
कुआं खोदते थे रोज
रोज पानी पीते थे।
सेठ-साहूकारों से ऋण लेकर
अथवा उनके फेंक दिए गए
अन्न के जूठे दानों को
बीन-बीन, किसी तरह हम
शांत करते थे अपनी जठराग्नि को।

सूखे से निपटने के लिए रामराज्य में कैसी-कैसी तैयारियां चल रही थीं, कवि इसका विवरण देने से भी चुका नहीं है। पानी-सिंचाई के नए तकनीकी तरीके अपनाने के बजाए सूखे को रोकने के लिए कर्मकांड किए जा रहे थे। यथा–

सुना महर्षि वशिष्ठ ने
आरंभ किया यज्ञ
इंद्र को प्रसन्न करने को।
यह भी सुना
परशुराम तपस्या करने गए
हिमालय में,
और महर्षि विश्वामित्र
अपने सहस्र शिष्यों के साथ
अपनी ध्यानाग्नि को करते हुए प्रज्ज्वलित
इंद्र को पुन: दंड देने हेतु
वन में लगाकर समाधि
लीन हैं कठिन तपस्या में।

इससे मालूम होता है कि त्रेता युग जिहालत का युग था। राजे-महाराजे और ऋषि-मुनि ऐसी मिथ्या धारणाओं से ग्रस्त थे कि इंद्र बारिश करते हैं और जब वह नाराज होते हैं, तो सूखा पड़ता है। सबसे बड़ी मूर्खता का परिचय दिया विश्वामित्र ने, जो वह इंद्र को दंडित करने के लिए समाधि लगाकर बैठ गए।

कवि के अनुसार, संभवत: यही विचार शंबूक के दिमाग में भी आया। यदि यज्ञ और समाधि से बारिश हो सकती है, तो उसे भी यही काम क्यों नहीं करना चाहिए? यज्ञ एक खर्चीला कर्मकांड था, जिसे गरीब शंबूक नहीं कर सकता था, लेकिन वह तप कर सकता था। अत: शंबूक राष्ट्र की चिंता में घर से निकल गया और दूर जंगल में जाकर समाधिस्थ हो गया। जब किसी से खबर मिली, तो उसे देखने गए उसके पिता–

जंगल के भीतर
बहुत दूर तक जब पहुंचे पतिदेव
उन्होंने देखा
एक बड़े वटवृक्ष के नीचे
पद्मासन लगाए नेत्र बंद किए
ओम का सघोष उच्चारण करते
लीन है शंबूक तपस्या में।
घबराए पिता
खा गए चक्कर
बेटे को पुकारा।

कवि का शंबूक पद्मासन लगाकर तप में लीन है, जबकि वाल्मीकि की कथा में शंबूक सिर नीचे और पैर ऊपर करके तप कर रहा था। क्या कोई तप या ध्यान उलटे लटककर किया जा सकता है?

घबराई हुई मां ने गांव की औरतों के साथ जाकर शंबूक को उठाने का प्रयास किया। पर उसकी गहन समाधि भंग नहीं हुई। शीघ्र ही जंगल की आग की तरह यह समाचार पूरी अयोध्या में फ़ैल गया, और भूचाल आ गया–

पंडितों, क्षत्रियों और वैश्यों के
वटवृक्षों के आशु-पावन चिंतन वाली
रंग-बिरंगी पत्तियों से युक्त टहनियां
सुलगने लगीं
रोष में भीतर ही भीतर
इस त्रेता में कैसे यह अनहोनी घट रही
शूद्र कर रहा है तप।
लगता है उलट-पलट
हो जायेगी सारी सृष्टि यह।

चारों तरफ हाहाकार मच गया। सूखे से संकट-ग्रस्त राष्ट्र अपनी भूख-प्यास भूल गया। सूखे से ज्यादा उसे धर्म बचाने की चिंता हो गई। क्योंकि, उनके धर्म को विश्वामित्र और परशुराम की तपस्या से नहीं, शंबूक की तपस्या से संकट पैदा हो गया था। उन्हें लगने लगा था–

जल की जगह मेघ वर्षा करेंगे
अग्नि-स्फुल्लिंगों की,
नदी में बहेगी आग
और आग की हिम-ठिठुरन से
कांपेंगे सारे नर-नारी।
हिमालय से गंगा नहीं,
ज्वालामुखी फूटेगा,
राम का नहीं,
होगा मरे हुए रावण
का राज अब।

पूरा वातावरण ‘हाय राम हाय राम’ के शब्द से गूंज गया–

हाय राम
शूद्र कर रहा है तप
जंगल में।
हाय राम
ऋषि-मुनियों-ब्राह्मणों का होगा क्या?
छिनी उनकी पावन वृत्ति,
कौन बचा पाएगा
मनुस्मृति से संरक्षित
इस महान भारत देश को
पतन के गहन गर्त में गिरने से?

इस घोर विरोधी वातावरण में शंबूक की मां को भी बेटे की चिंता हो गई और उसके मुंह से भी निकल गया– “हाय राम, क्या होगा बेटे शंबूक का?” यही नहीं, शंबूक की मां को लोगों ने तीखे व्यंग्य-बाणों से मर्मांतक पीड़ा देनी भी शुरू कर दी। किसी ने कहा, “शंबूक के तप से इंद्रासन हिल गया और इंद्र घबराकर तेरे बेटे को सिंहासन देने जा रहा है। तू जननी शूद्र की नहीं, इंद्र की कहलाएगी।” किसी ने कहा, “देवताओं की पत्नियां तेरे चरण धोवेंगी।” किसी ने कहा, “तब, तू हमें नहीं भूल जइयो।” किसी ने कहा, “अब तुम्हारे स्वर्णिम रामराज वाले दिन आ गए।” यथा–

जब ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य
सभी मिलकर
तेरी राजमहल जैसे झोंपड़ी की,
और गंगा जैसे,
शिव-मंदिर जैसे
तेरे पवित्र तन की
गंदगी करेंगे स्वच्छ।

इन व्यंग्य-बाणों ने शंबूक की मां को आहत कर दिया। “क्या करे और क्या न करे” की स्थिति में वह रात भर सोई नहीं। इन तानों को सुनकर कौन जीना चाहेगा? उसने भी आत्महत्या तक करने की सोच ली थी। पर, तभी उसे यह विचार सूझा कि वह राम के दरबार में जाएगी और उनसे पूछेगी कि उनके आदर्श राज्य में एक अछूत जाति के नासमझ बच्चे को क्या जीने का अधिकार नहीं है? क्या उसके बालहठी तप ने किसी भीषण अपराध का रूप ले लिया है।[8] अत: वह प्रात: काल राजमहल गई। उसने सिंहद्वार पर लगे जनता-घंटे को बजाया। उस समय राम ऋषियों के साथ गुप्त मंत्रणा में व्यस्त थे। अत: द्वारपाल ने उसे रुकने को कहा। पर उसमें धैर्य कहां था? उसने उसी समय राम से मिलने पर जोर दिया। आवाज अंदर तक गई, तो राम ने उसे बुला लिया। राम ने शिष्टाचारवश उससे कुशलक्षेम पूछा। उसे यह देखकर गहरा आश्चर्य हुआ कि उसके गांव का ब्राह्मण मुखिया, लठैतों की सेना रखने वाला क्षत्रिय सामंत और स्वर्ण का व्यापार करने वाला सेठ राम के दरबार में पहले से ही मौजूद थे। उसने सोचा–

इन्हें कौन सा संकट आन पड़ा
जिसके निवारणार्थ
आ पहुंचे हैं इतने सुबह से
रामचंद्र जी के दरबार में।

कवि ने यहां शूद्रों के विरुद्ध ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की एकजुटता दिखाकर रामराज्य के यथार्थ को नंगा कर दिया है। यही तीन लोग आम जनता की क्रांति के खिलाफ राजसत्ता को उकसाने का काम करते हैं। यहां भी यही हुआ। जैसे ही राम ने कुशलक्षेम पूछा, गांव का मुखिया ब्राह्मण बोल पड़ा–

महाराज,
यही तो है माई शंबूक की
जिसके पुत्र के समाज-विरोधी कार्य से
पूरे राज्य में
समाज के समस्त अंगों में
व्याप्त हो गई
अराजकता बड़ी।

क्षत्रिय सामंत ने कहा–

महाराज,
राज्य है अकाल-ग्रस्त
दुर्भिक्ष फैला चारों ओर
….
क्यों नहीं समझ में आता आपके,
यह सब हो रहा इसलिए क्योंकि
….
एक शूद्र कर रहा है तप.

व्यापारी ने जहर उगला–

ऐसी अवस्था में
हमारा व्यापार हो जाएगा बंद
क्योंकि हमारे अधिकतर ग्राहक
ब्राह्मण या क्षत्रिय हैं।

ब्राह्मण मुखिया ने अपनी घृणा में यहां तक कह दिया कि दुर्भिक्ष में भी, जहां लोगों को खाने के लाले पड़े हुए हैं, शंबूक का परिवार दूध-मक्खन खाता है। यथा–

इसे कष्ट हो सकता है क्या?
गांव के अनेक घरों में
थोड़ा-थोड़ा कार्य करके
इसे इतना मिल जाता है अनाज,
दुग्ध, छाछ, दही और मक्खन भी,
बड़े ही आनंद से सपरिवार
इसका जीवन कट रहा।

शासक और शोषक वर्ग यह कैसे समझते कि जब गायों तक ने दूध देना बंद कर दिया था, एक-एक करके बछड़े मर रहे थे, और खेत सूख रहे थे, तो उस गरीब शूद्र को अनाज, दूध और मक्खन कैसे कोई दे सकता था? इस झूठ से शंबूक की मां जान गई कि कितना गहरा षड्यंत्र उसके खिलाफ चल रहा है। यथा–

तो यह था खेल शातिर
सोचा-समझा और पूर्व-निर्धारित
अर्द्धरात्रि में ही
स्वयंभू प्रभुओं ने
समाज के
गुपचुप मंत्रणा थी कर ली।

ऐसी स्थिति में न्याय की कोई आशा शंबूक की मां को रामराज्य से नहीं रह गई थी। राम ने भले ही उसे न्याय करने का आश्वासन दिया था, पर उसने जान लिया था कि अन्याय ही होगा। उसने उचित ही कहा राम से–

यह प्रतीत हो रहा
हमारे गांव के आदरणीय मुखिया
पहले ही आपके समक्ष
मुझे दोषी सिद्ध कर चुके
जन्म देने के लिए शंबूक को।

कवि के अनुसार, वह राम को बताती है कि उसका बेटा शंबूक दूसरों की दुनिया से अलग था। वह समाज की विचित्रताओं, उसके विद्रूपों और विडंबनाओं को लेकर प्रश्नाकुल रहता था। वह समाज के कठिन प्रश्नों से मुक्ति के लिए सुदूर जंगल के निविड़ एकांत में चिंतन में लीन रहता था। क्या यह ऐसा पाप है, जिसकी सूचना देने के लिए मुखिया, सामंत और व्यापारी अलस्सुबह ही आपके पास आ गए? उसका कृत्य अपने शोधन के लिए है। यह अपराध कैसे हो गया? अगर यह अपराध है, तो दंड की भागी उसकी यह जननी भी है।[9] उसने देखा कि उसकी बातें सुनकर–

गुरुदेव महर्षि वशिष्ठ
ग्राम-मुखिया पंडित जी,
राजधानी के अनेक
उपस्थित भद्रजनों और
मंत्रिपरिषद के भी
सुमंत सहित बिशिष्ट जनों के
मुख तमतमा गए
आंखों में तैरने लगे लाल डोरे।

शंबूक की मां ने समझ लिया था कि उसके बेटे को ये छोड़ेंगे नहीं। वह राम को प्रणाम कर घर वापस आई, तो उसे अपने पति का रक्त से लथपथ शव देखने को मिला। ऊंची जाति के लोगों ने शंबूक के पिता की हत्या कर दी थी। यह भीड़ द्वारा की गई उसी तरह की हत्या (मॉब लिंचिंग) थी, जिस तरह आज हिंदुत्ववादियों की हिंसक भीड़ अपने विरोधियों की हत्या करती है।

पति की लाश को देखकर उसे शीघ्र ही पता चल गया कि रामराज्य में शूद्र के जीवन का कोई मूल्य नहीं। वह अपनी स्वतंत्रता से ध्यान-चिंतन भी नहीं कर सकता। पति की अंत्येष्ठि करते समय उसे लगा–

मुर्दे की चिता से
उठ रहीं थीं जो लपटें
उनमें मुझे भस्म होते दिखते थे
न्याय के
सद्धर्म के महान ग्रंथ।

इन पंक्तियों में प्रखर दलित-चेतना की अभिव्यक्ति हुई है। कवि ने शहादत की गाथा लिखी है, जिसमें नए शास्त्र, नए मूल्य जन्म ले रहे थे।

वाल्मीकि की कथा को एक नया मोड़ देते हुए उदभ्रांत ने शंबूक के तप को सूखे की स्थिति से जोड़ा है। जिस सूखे की त्रासदी से मुक्ति के लिए वशिष्ठ यज्ञ करते हैं, और विश्वामित्र इंद्र को दंडित करने के लिए तप करने चले जाते हैं, उसी संदर्भ में शंबूक के तप को भी देखे जाने की जरूरत है। उदभ्रांत जो बात कह नहीं पाए हैं, वह यह है कि मामला शंबूक के तप का नहीं था, वरन् तप के आडंबर का उपहास उड़ाने का था। शंबूक के लिए यह हास्यास्पद था कि यज्ञ और तप का अनुष्ठान करने से वर्षा हो सकती है। जो काम वर्षा पर निर्भरता कम करने के लिए नहरें बनाकर सिंचाई के साधन बढ़ाकर किया जाना चाहिए था, उसे रामराज्य के शासक यज्ञ और तपस्या के अनुष्ठान से करने का ढोंग कर रहे थे। यदि तप करने से बारिश हो सकती है, तो राज्य के प्रत्येक नागरिक को तप करना चाहिए था। यही सोचकर शंबूक ने भी तप करके अपना राष्ट्रीय कर्तव्य ही पूरा किया था। लेकिन ब्राह्मण इसमें वर्णव्यवस्था का उल्लंघन के साथ-साथ, अपनी तपस्या का उपहास भी देख रहे थे। यह महत्वपूर्ण है कि कवि ने भी शंबूक की मां से तप का खंडन करवाकर प्रगतिशील चेतना का परिचय दिया है–

सच तो यह था, मुझको
लगती थी यह मूर्खता उसकी।
मैं भी सोचती थी
उसके बाप की ही तरह
और बाप की ही तरह क्यों
समाज की तरह
कि तप-वप में क्या रक्खा?
यह तो है
पूर्ण अनुत्पादक कार्य
युवा हो गया है वह
उसे चाहिए
अपनी युवा शक्ति का करे
रचनात्मक सदुपयोग।

श्मशान से लौटने पर शंबूक की मां को एक और खबर मिलती है कि रामराज्य ने शंबूक को ‘समाजद्रोही’ घोषित कर दिया है।[10] लेकिन ‘समाजद्रोही’ क्यों, ‘धर्मद्रोही’ क्यों नहीं? उसने समाज की तो कोई हानि नहीं की थी। पर कवि ने ठीक ही ‘समाजद्रोही’ कहा है, क्योंकि धर्म के ठेकेदार धर्मद्रोह को ही समाजद्रोह का रूप देकर राजसत्ता पर दंड के लिए दबाव बना सकते थे। मंत्रिपरिषद का भी यही तर्क था–

उसके इस अपराध से
फ़ैल गई है समाज में
अव्यवस्था और अशांति
अपरिपक्व क्रांति घटित होने का
संकट मंडरा रहा।

मंत्रिपरिषद ने शंबूक को कठोर दंड देने की संस्तुति की, जिसे मानकर राम ने उसे मृत्यु-दंड दिया। कवि ने राम के द्वारा शंबूक का सिर काटने वाले प्रसंग का चित्रण नहीं किया है। उसका सांकेतिक वर्णन ही उस घटना का मार्मिक दिग्दर्शन करा देता है। यथा–

राम जी के दूत ने
आदेश यह सुनाया है–
माई शंबूक की,
पहुंच जाए अविलम्ब जंगल में
उस जगह, जहां कर रहा है शंबूक
अपावन तप।

माई ने घबराते हुए मन से वहां जाकर देखा– अयोध्या के राजा राम संपूर्ण मंत्रिपरिषद, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, वशिष्ठ और सुमन्त, कुछ सशस्त्र सैनिक वहां मौजूद थे, और–

खड़े थे तपस्या-लीन
शंबूक के समक्ष
दायें हाथ से खींचे तलवार
इस युग के सर्वश्रेष्ठ मानव
सूर्यवंशियों के गौरव
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम,
जिनकी रावण पर विजय के उपरान्त
बड़ी थी जनप्रियता इतनी–
उनको लोगों ने
शुरू कर दिया था कहना
भगवान ही।

खड़े थे भगवान
उसे वर देने नहीं,
‘ओम् नम: शिवाय’
का जाप करने वाले
उसके अपवित्र शीश को
उसके धड़ से
पृथक करने।

इस सर्ग में शंबूक की जननी के माध्यम से दलित चेतना को उभारने का कवि का प्रयास हिंदी साहित्य में एक क्रांतिकारी घटना है। दलित-चेतना सिर्फ प्रतिरोध की चेतना नहीं है, न सिर्फ वर्णव्यवस्था के खंडन की चेतना है, बल्कि वह स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के मूल्यों को स्थापित करने की चेतना है। वह धर्म और जाति के आधार पर किसी के भी दमन और शोषण का विरोध करने की चेतना है। इस दृष्टि से शंबूक के वध के संबंध में कवि ने ‘रामराज्य’, ‘मर्यादा’ और ‘सीमा’ शब्दों का सही विवेचन किया है। राम ने शंबूक का वध पूरे शूद्र समाज को चेतावनी देने के लिए और द्विजों को अभय-दान देने के लिए किया था। यथा–

सुस्थापित करने वाली मर्यादा
और भी सुदृढ़ करने रामराज्य
ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों को देने अभयदान
और मेरे जैसे निर्बल, असहाय
अनगिनती शूद्रों को
देते हुए
परोक्ष नहीं,
प्रत्यक्ष चेतावनी
अपनी सीमा में रहने के लिए।

डॉ. आंबेडकर ने एक जगह लिखा है कि शंबूक की हत्या के लिए राम को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि तत्कालीन न्याय-व्यवस्था में यही न्याय था। राम का राज्य वर्णव्यवस्था पर आधारित था। एक राजा के रूप में वर्णव्यवस्था को बनाए रखने के लिए वह बाध्य थे। इसलिए उस शंबूक को मारना उनका कर्तव्य था, जो ब्राह्मण होने के लिए तप कर रहा था।[11] लेकिन दंड से विद्रोह को दबाया जा सकता है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता। रामराज्य में शूद्रों में अपने दमन और शोषण के लिए दोषी वर्णव्यवस्था के विरुद्ध आवाजें उठ रही थीं और उन आवाजों में सबसे मुखर आवाज शंबूक की थी। हम कह सकते हैं कि शंबूक का विद्रोह रामराज्य में त्रेता-काल की पहली बगावत थी, और राम के द्वारा उसका वध पहली शहादत थी। शंबूक शहीद हुआ था। उदभ्रांत शर्मा ने इस शहादत को अपनी रचनाशीलता में जिस शिद्दत से उभारा है, वह अद्भुत है। अगर वह जगदीश गुप्त की तरह राम को अवतार-पुरुष मानते,[12] तो शायद ही वह इस महान शहादत का इतना प्रखर चित्रण कर पाते। उन्होंने मानवीय कमजोरियों के साथ मानव-रूप में ही राम को स्वीकार किया है।

कहना न होगा कि, उदभ्रांत शर्मा की काव्य-रचना ‘मैं जननी शंबूक की’ दलित विमर्श की दृष्टि से ही नहीं, स्त्री-विमर्श की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण कृति है।

[1] ‘शंबूक’, जगदीश गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2005, देखिए ‘प्रतिपक्ष’ अंश, पृष्ठ, 45

[2] ‘शूद्र तपस्वी’, कु. वें. पुट्टप्पा, अनुवादक : बी. आर. नारायण, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, संस्करण 2005

[3] ‘वाल्मीकीय रामायण’, उत्तरकांड, सर्ग 74, 75, 76

[4] ‘त्रेता’, महाकाव्य, कवि : उदभ्रांत, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दरिया गंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2009, पृष्ठ 395

[5] डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर : राइटिंग एंड स्पीचेज, खंड – 1, शिक्षा विभाग, महाराष्ट्र सरकार, मुंबई, 1989, पृष्ठ 47

[6] वही, पृष्ठ 63

[7] ‘त्रेता’, महाकाव्य, पृष्ठ 398

[8] वही, पृष्ठ 414

[9] वही, पृष्ठ 428-430

[10] वही, पृष्ठ 439

[11] डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर : राइटिंग एंड स्पीचेज, खंड – 1, शिक्षा विभाग, महाराष्ट्र सरकार, मुंबई, 1989, पृष्ठ 47 एनीहिलेशन ऑफ कास्ट, पृष्ठ 61

[12] ‘शंबूक’, जगदीश गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2005, “मैं धरा का पुत्र हूँ, तुम ब्रह्म के अवतार”, पृष्ठ 76

(संपादन : नवल/अनिल)


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कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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