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संपूर्ण क्रांति दिवस के मौके पर राजद व वामपंथी दलों ने दिखायी एकजुटता, कहा– वर्तमान आपातकाल से भी बदतर

डी. राजा ने इस मौके पर कहा कि यह देश सभी लोगों का है। आंबेडकर ने हमको संविधान दिया। वह संविधान सबको बराबरी का दर्जा देता है और भाजपा आरएसएस के लोग हिन्दुत्व और मुसलमान के विभाजन के नाम पर देश में दहशतगर्दी कायम करना चाहते हैं। पढ़ें, अरुण आनंद की रपट

बीते 5 जून, 2022 को संपूर्ण क्रांति दिवस के मौके पर बिहार की राजधानी पटना के बापू सभागार में राजदनीत गठबंधन का सम्मेलन आयोजित किया गया। हालांकि इस आयोजन से कांग्रेस दूर रही। जबकि अन्य घटक दलों के नेता यथा सीपीआई के राष्ट्रीय महासचिव डी. राजा, सीपीएम के नेता अतुल कुमार अनजान, भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य व राजद नेता तेजस्वी यादव आदि सम्मेलन में शामिल रहे। इस मौके पर लगभग सभी वक्ताओं ने संपूर्ण क्रांति के विमर्श पर विस्तार डाला तथा मौजूदा दौर में देश के समक्ष संकटों के लिए केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया। वहीं इस मौके पर सामाजिक न्याय के मुद्दों जैसे भूमि सुधार के सवाल पर भी वक्ताओं ने अपनी बात रखी।

लालू ने किया एकजुट होकर लड़ने का आह्वान

इस मौके पर राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने वीडियो संदेश में कहा कि संपूर्ण क्रांति आंदोलन के माध्यम से जेपी ने लंबी और परिवर्तनकारी लड़ाई का आगाज किया था। उनका संकल्प था कि समाज के अंतिम पायदान पर खडे़ लोगों को मुख्यधारा में लाना है। उन्होंने तानाशाही के खिलाफ संघर्ष किया। देशभर की जनतांत्रिक पार्टियां उनके आह्वान पर एकजुट हुईं और तानाशाही का खात्मा हुआ। उन्होंने कहा कि फिरकापरस्त ताकतें आज देश को डूबाना चाहती हैं। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार चरम पर है। देश में सिविल वार की स्थिति पैदा कर दी गई है। मैं आपसे इनके खिलाफ लड़ने का आह्वान करता हूं। हम सब को एकजुट होकर लड़ना है।

डॉ. आंबेडकर ने दिया समता का अधिकार सुनिश्चित करनेवाला संविधान : डी. राजा

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के महासचिव डी. राजा ने कहा कि आज देश के सामने बड़ी-बड़ी चुनौतियों का पहाड़ खड़ा हैं। उन्होंने सवाल उठाये कि आज गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार क्यों बढ़ रहे हैं? उन्होंने तमिलनाडु और आंध्र को अपेक्षाकृत इन स्थितियों से अलग राज्य के रूप में होने की बात कही। उन्होंने माना कि मोदी सरकार की न कोई अर्थ नीति है और न ही कोई समाज नीति। उनके प्रधानमंत्री बने 8 साल हो गए, लेकिन उनके अच्छे दिन आने के वादे, वादे ही रह गए। उन्होंने प्रतिप्रश्न किया कि मोदी जी सबका साथ, सबका विकास और सबका साथ के आपके नारे का क्या हुआ? 

कार्यक्रम को संबोधित करते सीपीआई के महासचिव डी. राजा

राजा ने कहा कि आप यहां के किसान, नौजवान और छात्रों के साथ हो या अडानी, अंबानी के साथ? आप पूंजीवाद का साथ दे रहे हो। उन्होंने कहा कि देश में आज नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का दौर चल रहा है। भाजपा और आरएसएस की चर्चा करते हुए राजा ने कहा कि ये वो शक्तियां हैं, जो धर्म के नाम पर जनता को विभाजित करके अपना उल्लू सीधा करना चाहती हैं। उन्हाेंने कहा कि यह देश सभी लोगों का है। आंबेडकर ने हमको संविधान दिया। वह संविधान सबको बराबरी का दर्जा देता है और भाजपा आरएसएस के लोग हिन्दुत्व और मुसलमान के विभाजन के नाम पर देश में दहशतगर्दी कायम करना चाहते हैं। उन्होंने आह्वान किया कि जीने के लिए लड़ो, लड़ने के लिए जीओ और लड़ते-लड़ते आगे बढ़ो।

देश में अघोषित आपातकाल : तेजस्वी

इस मौके पर देश की वर्तमान स्थिति की चर्चा करते हुए तेजस्वी यादव ने कहा कि पूरे देश में आज एक अघोषित आपातकाल लागू है। बिहार में ‘डबल इंजन’ की नहीं ‘ट्रबुल इंजन’ की सरकार है। आज न यहां तो संविधान सुरक्षित है न यहां के नौजवान, बेरोजगार। बिहार को न विशेष राज्य का दर्जा मिला न विशेष पैकेज का लाभ ही मिला। नीति आयोग के आंकड़ों को देखिये तो शिक्षा, चिकित्सा, कुपोषण इन सब मानकों पर बिहार फिसडी राज्यों में गिना जाता है। यह बेराजगारी का हब बन गया है। शिक्षा का हाल बुरा है। कोई सिस्टम सरकार का काम नहीं कर रहा है। यह सरकार समाज में जहर फैलाने का काम कर रही है। तेजस्वी ने यह भी कहा कि कभी भी सांप्रदायिक शक्तियों के आगे हमने घुटने नहीं टेके। हमलोगों ने खूब तोड़ मिहनत की और महागठबंधन को सत्ता में लेकर आये लेकिन कुछ लोग चोर दरवाजे से सत्ता में आ गए। आज उनके शोषण, उत्पीड़न और अत्याचार से बिहार की जनता त्रस्त है। 

उन्होंने कहा कि मेरी दिली कामना है कि यह महागठबंधन महज सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं हो। जो जहर समाज में फैला दिया गया है उसको मिटाने में सदियां लग जाएंगी। यह कैसी विडम्बना है कि कोई भी इस व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज मुखर करता है तो उसके घर ईडी और सीबीआई छापा मारने को चल पड़ती है। यह विचित्र स्थिति देश में पैदा की जा रही है कि जो लोग विस्थापन का सवाल उठाते हैं, सांप्रदायिक जहर को पाटने के बारे में चिंतित रहते हैं, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती किसानी और अमन चैन की बात करते हैं उन्हें देशभक्ती की कसौटी पर छद्म राष्ट्रवाद के सहारे टारगेट किया जाता है। 

तेजस्वी ने नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए कहा कि महत्वकांक्षा अच्छी बात है लेकिन अति महत्वकांक्षा अच्छी बात नहीं है। अगर हमें पद प्यारा होता तो भाजपा के साथ समझौता करके हम भी मुख्यमंत्री हो जाते लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। आज संघ इस देश को अपने थिंक टैंक गोलवलकर के ‘बंच ऑफ थाॅट्स’ के आधार पर चलाना चाहती है। आज जरूरत इस बात की है कि हमारा गठबंधन इसके खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष के लिए आगे आये।

कार्यक्रम को वीडियो संदेश के जरिए संबोधित करते लालू प्रसाद

अच्छे दिन आज के आपातकाल का नाम : दीपंकर 

वहीं भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि सन् 1974 भारत की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है लेकिन हम आपका ध्यान इससे 7 साल पहले 67 में हुई नक्सलवादी क्रांति की ओर दिलाना चाहते हैं जो इस देश के राजनीतिक और सामाजिक बदलाव में मील का पत्थर है। इस आंदोलन के बाद दो बातें हमें दिखलाई पड़ती हैं। पहली यह कि इसके बाद बहुत से राज्यों में चुनाव हुए। जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हुआ करती थीं 1967 में मध्यावधि चुनाव हुए तो पहली बार 9 राज्यों में बदलाव के संकेत नजर आये। संसदीय विपक्ष मजबूत हुआ और उसे एक धार मिली। दूसरी स्थिति यह हुई कि देश में बड़ा किसान आंदोलन खड़ा हुआ और गरीबों का राज्य स्थापित करने के लिए मजदूर किसानों की एकता मजबूत हुई। बिहार के मुजफ्फरपुर और भोजपुर के एकबारी में लोगों ने अपनी महान शहादतें दीं। जगदीश मास्टर, रामेश्वर अहीर सामंती दमन का विरोध करते हुए शहीद हुए। 

दीपंकर ने कहा कि जेपी आंदोलन से दो धाराएं निकलीं। एक धारा जनता पार्टी से होते हुए बीजेपी के रास्ते गई। उस रास्ते के लोग इस सभागार में नहीं हैं, दूसरा रास्ता हमारे वक्ताओं ने बता दिया। महागठबंधन में शामिल चार पार्टियां हैं। तीन कम्युनिस्ट धाराओं माले, सीपीआई और सीपीएम है और एक राजद। इनसे हमारे रिश्ते नये हैं। संसदीय राजनीति का हमारा खट्टा-मीठा रास्ता रहा है। 1974 का आपातकाल तो खत्म हो गया लेकिन आज एक अघोषित आपातकाल स्थायी रूप से मौजूद है। अच्छे दिन आज के आपातकाल का नाम है। सीबीआई, ईडी कब किसको जेल में डाल देगी यह कहना मुश्किल है। इस मुल्क को आज ऐसे संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया गया है कि हिन्दुस्तान रहेगा कि नहीं यह सवाल खड़ा हो गया है। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक हिंसा बहुत बुरी चीज है। और उससे भी बुरी चीज है सांप्रदायिक फासीवाद जो देश की पहचान को ही खत्म कर देना चाहती है। पहले अयोध्या की बात चली और आज वह बात ताजमहल पर पहुंच गई है। जिन प्रतीकों पर हमें नाज था, उसे गुलामी का प्रतीक बतलाया जा रहा है। इससे बड़ी चुनौती गुलाम भारत में इससे पहले नहीं आई थी। इस देश की मिट्टी अब लोकतांत्रिक नहीं रह गई। अगर यह देश हिन्दू राष्ट बन गया तो इससे अधिक विपत्ति कुछ हो नहीं सकती। इस बड़े खतरे से निबटने के लिए बड़ी लड़ाई छेड़नी होगी।

मंच पर मौजूद राजद व वामपंथी दलों के नेतागण

उन्होंने माना कि सन् 1967 का नक्सलबाड़ी आंदोलन और 1974 का संपूर्ण क्रांति आंदोलन हमारी विरासत है। गांव और शहर से पैदा हुए इन दोनों आंदोलनों ने लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की, लेकिन आज का निजाम विरोध की हर आवाज को कभी अरबन नक्सल के नाम पर तो कभी हिन्दू भावना के आहत होने के नाम पर कुचलने पर आमादा है। मेरी कामना है कि यह गठबंधन महज विधानसभा चुनाव लड़ने का गठबंधन बनकर नहीं रह जाए, इसे रोज-रोज की लड़ाई का गठबंधन बनाना होगा। आज सांप्रदायिक शक्तियों की नजर आज बिहार पर है। वे इसे उत्तर प्रदेश की तरह बुलडोजर राज्य बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि बिहार में यह गठबंधन महज चुनावी जीत तक ही सीमित नहीं हो। यह आमूलचूल परिवर्तन के लिए हो, जो भगत सिंह, आंबेडकर, नक्सली आंदोलन और जेपी की विरासत को आगे ले जाए।

बिहार से फिर हो बड़े आंदोलन का आगाज : ढावले

वहीं सीपीएम के पोलित ब्यूरो सदस्य अशोक ढावले ने कहा कि संपूर्ण क्रांति दिवस की यह 48वीं सालगिरह है। बिहार से यह जर्बदस्त आंदोलन उठा था और तीन महीने के अंदर देश से तानाशाही सरकार उखडी़ थी। उन्होंने कहा कि आज हम संकल्प लें कि सम्पूर्ण क्रांति की 50 वीं सालगिरह जो 2024 में 5 जून को पूरी होगी, उस समय लोकसभा चुनाव भी आनेवाला है। उन्होंने आह्वान किया कि हम सब क्यों नहीं बिहार से एक जर्बदस्त आंदोलन का आगाज करें ताकि अघोषित इमरजेंसी में जी रही जनता को सुकून मिले। ढावले ने 1990 के उस दौर का स्मरण साझा किया जब लालकृष्ण आडवाणी की सांप्रदायिक रथ यात्रा कई राज्यों से आते हुए बिहार पहुंचने को थी। उस समय एक ही मुख्यमंत्री था, जिसने रथ यात्रा को रोक दिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। वह थे लालू प्रसाद। बिहार में इस सांप्रदायिक रथ यात्रा को रोका गया। राजद और वामपंथी पार्टियों ने सांप्रदायिकता के साथ कभी समझौता नहीं किया।

लोहिया की सप्तक्रांति ही थी जेपी की संपूर्ण क्रांति : जगदानंद

उनसे पहले राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने कहा कि 1974 का संपूर्ण क्रांति आंदोलन लोहिया की सप्तक्रांति ही थी, जिसमें नर-नारी समता और धार्मिक सौहार्द्र की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि हम सब को आज पुनः क्रांति की मशाल जलाने के लिए तैयार होना है, क्योंकि 2022 में 1974 से ज्यादा भयानक स्थिति इस देश की हो गई है। संविधान को कुचला जा रहा है। 

देश में विषम हालात : अनजान

सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव अतुल अनजान ने कहा कि आज देश विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है। इस बदले परिवेश में विपक्ष, नौजवान विपक्ष, समतावादी सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ भूमिका क्या हो इसपर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज देश की अर्थव्यवस्था तबाही के रास्ते पर है। पहले एक डाॅलर की कीमत 64 रुपये के बराबर थी। आज उसकी कीमत 78 रुपये के बराबर हो गई है। फिर भी हमारे प्रधानमंत्री को एतराज नहीं है। 40 साल में बैंक तबाह हो रहे हैं। फिक्स पर 5 प्रतिशत दिये जा रहे हैं और महंगाई दर 6.7 प्रतिशत हो गई है। यह देश कर्जदार हो गया है और चौथा खंभा कुंठित व लुंठित होकर मरणासन्न है। उसे इस देश से कोई लेना-देना नहीं। बड़ी विपक्षी पार्टियां पस्त हैं। सरकार सिर्फ खुदाई करने के अभियान में लगी है कि कहां शिवलिंग है और कहां राम हैं। निर्यात 43 अरब डाॅलर है। हमारी स्थिति यह है कि कपड़ा सूखाने वाली रस्सी भी चीन से आ रही है। किसान तबाह हो गए। बीज, खाद, यूरिया के दाम बढ़ गए। एमएसपी में कितना कवर होता है। किसान मजबूर होकर कम कीमत पर धान गेहूं बेचते हैं यह दोहरी लूट है। सरकार खामोश हैै। रुपये की कीमत घटती जा रही है। बैंकों को विदेशी कंपनियों के हाथों बेचा जा रहा है।

महज सत्ता परिवर्तन नहीं था संपूर्ण क्रांति का उद्देश्य : सिद्दीकी

राजद के प्रधान महासचिव अब्दुल बारी सिद्दिकी ने कहा कि संपूर्ण क्रांति का यह दिन हमलोगों के लिए ऐतिहासिक दिन है। आज ही के दिन जेपी ने संपूर्ण क्रांति की घोषणा की थी। जेपी का उद्वेश्य महज सत्ता परिवर्तन तक ही सीमित नहीं था। वे चाहते थे कि समाज से दलित शोषित का भेदभाव मिटे, समाज की जो कुरीतियां हैं उसका सफाया हो। सिद्दिकी ने कहा कि किसी संगठन में बहस और आंदोलन न हो तो समझिये वह संगठन मृत हो गया। उन्होंने कहा कि आज शिक्षा के नाम पर हम अशिक्षित लोगों की जमात पैदा कर रहे हैं। आज समाज को शिक्षित-प्रशिक्षित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज देश में भय, घृणा और द्वेष का वातावरण संगठित रूप से बनाया जा रहा है। जिनके हाथ में शासन है वही इस माहौल को बनाये रखना चाहते हैं। 

कार्यक्रम को भाकपा माले के नेता धीरेंद्र झा, के.डी. यादव सहित अन्य नेताओं ने भी संबोधित किया तथा संचालन राजद के राष्ट्रीय महासचिव व पूर्व सांसद सह विधायक आलोक मेहता ने किया। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अरुण आनंद

लेखक पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं

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