समय को साहित्य में दर्ज करनेवाले सजग रचनाकार थे ओमप्रकाश वाल्मीकि

ओमप्रकाश वाल्मीकि की पहचान एक दलित कवि, कहानीकार अथवा दलित रचनाकार के सीमित दायरे में समेट दी गई। ऐसा साहित्य के क्षेत्र में तेजी से वैश्विक स्तर पर पहचान पाते उनके साहित्य तथा दुनिया भर में फैली उनकी ख्याति पर अंकुश लगाने हेतु किया गया या फिर साहित्यिक हलकों में भीतर तक फैले जातीय पूर्वाग्रह के कारण हुआ, कह पाना मुश्किल है। स्मरण कर रही हैं पूनम तुषामड़

ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून, 1950 – 17 नवंबर, 2013) पर विशेष

दलित साहित्य के वरिष्ठ रचनाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचनाओं पर विचार करते हुए एक बात बड़ी शिद्दत से महसूस हुई कि उनकी रचनाओं का मूल्यांकन आज तक केवल दलितवादी नजरिए से किया गया है। जबकि उनकी रचनाओं की विविधतापूर्ण शैली, आलोचनात्मक दृष्टि, एवं सामाजिक सजगता के आधार पर उनका साहित्यिक मूल्यांकन नही हो पाया। दलित साहित्य में उनकी छवि केवल स्वानुभूति प्रधान लेखक के रूप में निर्मित की गई। इतना ही नहीं, ओमप्रकाश वाल्मीकि की पहचान एक दलित कवि, कहानीकार अथवा दलित रचनाकार के सीमित दायरे में समेट दी गई। ऐसा साहित्य के क्षेत्र में तेजी से वैश्विक स्तर पर पहचान पाते उनके साहित्य तथा दुनिया भर में फैली उनकी ख्याति पर अंकुश लगाने हेतु किया गया या फिर साहित्यिक हलकों में भीतर तक फैले जातीय पूर्वाग्रह के कारण हुआ, कह पाना मुश्किल है। किंतु यह निर्विवादित रूप से सत्य है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि एक सचेतन और संवेदनशील रचनाकार थे। इस बात की तस्दीक उनके द्वारा समय-समय पर रचित उनकी अनेक घटना प्रधान रचनाएं करतीं हैं।

सामाजिक विषमता का बीज बोने वाली संस्कृति जातीय आधार पर किस प्रकार की घृणा और तिरस्कार का विष आज की पीढ़ी की धमनियों में प्रवाहित करती रही है, जिसके दुष्परिणाम स्कूल, कॉलेज, कार्यालयों से लेकर समाज के उच्च शिक्षण संस्थानों तक में दिखाई देते हैं। इस दृष्टि से ऑल इंडिया मेडिकल कॉलेज (एम्स) दिल्ली में घटित जातीय उत्पीड़न की घटनाओं के पश्चात दो दलित छात्रों द्वारा की जाने वाली दर्दनाक खुदकुशी ने वाल्मीकि जी जैसे संवेदनशील रचनाकार के अंतरमन पर इतनी गहरी चोट की, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने ‘घुसपैठिए’ नामक कहानी लिखी। 

यह कहानी वाल्मीकि की कहानी कला, यथार्थबोध एवं संवेदशील दृष्टिकोण का बेजोड़ नमूना है। इस कहानी को आधार बनाकर ही उन्होंने अपने दूसरे संग्रह का नाम ‘घुसपैठिए’ रख दिया। ‘घुसपैठिए’ कहानी से प्रस्तुत एक उदाहरण देखें– “डीन उनकी कोई भी बात सुने बगैर आरक्षण से होने वाले नुकसान पर ही बोल रहे थे। उनकी धारणा थी कि कम योग्यतावाले जब सरकारी हस्तक्षेप से मेडिकल जैसे संस्थानों में घुसपैठ करेंगे तो हालात तो दिन-प्रतिदिन खराब होंगे ही। उन छात्रों का क्या दोष जो अच्छे अंक लेकर पास हुए हैं! राकेश बहस से बचना चाह रहा था। ‘डॉक्टर साहब, आरक्षण पर हम लोग फिर कभी चर्चा कर लेंगे, अभी तो उन हालात का कोई समाधान निकालिए, जिनकी हमने चर्चा की है। दलित छात्रों का उत्पीड़न रोकिए। 

“देखिए, छोटी-मोटी घटनाओं को इतना तूल मत दें। दलित उत्पीड़न जैसा मेरे कॉलेज में कुछ नहीं है। और मैं इन वाहियात चीजों को नहीं मानता। हमारे घर में तो भंगिन को भी ‘अम्मा’ कहा जाता था। डीन जैसे अपने आप से बाहर ही नहीं निकल रहे थे।”

वाल्मीकि जी आंबेडकरववादी विचारों से प्रेरित लेखक थे। इसका सटीक उदाहरण उनकी कहानी “मुम्बई कांड” कही जा सकती है। वे अपनी रचनाओं में सचेतन रूप से प्रतिशोध एवं प्रतिरोध के बीच की बारीकियों को स्पष्ट करते चलते हैं। इस कहानी का पात्र सुमेर ‘मुंबई कांड’ की प्रतिक्रिया स्वरूप जूते की माला लेकर उठ खड़ा होता है, लेकिन कदम बढ़ाते ही उसके मन में विचार कौंधता है। “अरे! में यह क्या कर रहा हूं। मुंबई में किसी ने मेरे विश्वास पर चोट की और मै यहां पर किसी की आस्था पर चोट करने जा रहा हूं। कुछ गांधी को ‘बापू’ कहते हैं, कुछ आंबेडकर को ‘बाबा’। वहां बाबा कहने वाले मारे गए, यहां बापू कहने वाले भी मारे जा सकतें हैं। ‘बाबा’ कहने वालों पर भी गाज गिर सकती है। जो भी हो मारे तो निर्दोष ही जाएंगे … नही .. .यह रास्ता ना तो बुद्ध का है और न ही अंबेडकर का।”

वाल्मीकि का साहित्य एक समतामूलक समाज का स्वप्न देखने वाले रचनाकार का साहित्य है, इसलिए उनकीरचनाओं के पात्र केवल दलित ही नही बनते, बल्कि समाज में संघर्षरत अन्य आमिताओ की भी वे पुरजोर हिमायत करते हैं। जिसका बहुत्व सटीक उदाहरण है उनके द्वारा रचित कहानी ‘जंगल की रानी’, जो रचनाकार ने उन घटनाओं को आधार बना कर लिखी थी, जिनमें जल, जंगल और जमीन की लड़ाई में संघर्षरत आदिवासी स्त्रियों को सत्ता और व्यवस्था के खूंखार दरिंदों द्वारा जबरन अपनी हवस का शिकार बनाया जा रहा था। 

साहित्य समालोचक व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी विषय के प्रोफेसर डॉ. रामचंद्र कहते हैं कि ‘जंगल की रानी’ कहानी में लोकतांत्रिक पाखंडों की धज्जियां उड़ जाती हैं। महिमामंडित संस्कृति का भांडा फूट जाता है। मानवीय मूल्य बिखर कर तार तार हो जाते हैं।

ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून, 1950 – 17 नवंबर, 2013)

दरअसल, जाति समाज की एक कटु सच्चाई है, जिसका प्रभाव हम आज भी अपनें इर्द-गिर्द महसूस करते हैं। ऐसी ही उनकी एक कहानी है ‘प्रोमोशन’, जिसमें वाल्मीकि ने मजदूर संगठनों के बीच पसरे जातिवाद का खुलासा किया। कहना अतिशयोक्ति नहीं कि समकालीन घटनाओं को साहित्य में यथार्तवादी नजरिए से दर्ज करना ओम प्रकाश वाल्मीकि को मुंशी प्रेमचंद के माफिक रचनाकार बना देता है। 

खास यह कि यह केवल उनकी कहानियों में ही नहीं, उनकी कविताओं में भी सामने आता है। हालांकि कहा तो यह जाना चाहिए कि उनकी कविताओं का मूल्यांकन भी इस नजरिए से नहीं किया गया है। बतौर उदाहरण ओम प्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘फसल’ (सितंबर, 1986) है, जिसमें वह मिहनतकश मजदूरों और किसानों के खून-पसीने से सींची फसल का हवाला देते हुए मालिक और मजदूर के बीच की असमानता एवं शोषण को अभिव्यक्त करते हैं।

फ़सल हो या कविता
पसीने की पहचान है दोनों ही।

बिना पसीने की फ़सल
या कविता
बेमानी है।

आदमी के विरूद्ध
आदमी का षडयंत्र–

धब्‍बे : जिनका स्‍वर नहीं पहुंचता
वातानुकूलित कमरों तक
और न ही पहुंच पाती है
कविता ही
जो सुना सके पसीने का महाकाव्‍य
जिसे हरिया लिखता है
चिलचिलाती दुपहर में
धरती के सीने पर
फ़सल की शक्‍ल में।

समाज में जाति का घिनौना रूप देश के अलग अलग हिस्सों में दलितों पर होने वाले हिंसात्मक हमलों के रूप में देखा जा सकते हैं। मसलन, हरियाणा की ही बात करें तो गोहाना, मिर्चपुर, झज्जर, पानीपत आदि घटनाएं। गोहाना कांड में दलितों के साठ घर जलाए गए तथा एक युवक राकेश उर्फ लारा की जेल में हत्या कर दी गई, जिसके पश्चात पूरे हरियाणा में इस घटना के विरोध में प्रदर्शन हुए। वाल्मीकि की कविता ‘बिटिया का बस्ता’ इस घटना से उपजे आक्रोश को अभिव्यक्त कर पाने में पूर्णतः सफल रही है।

जल रहा है सब कुछ धुआं-धुआं
बिटिया सो नहीं रही है
अजनबी घर में
जहां नहीं है उसका बस्ता
गोहाना की चिरायंध
फैली है हवा में
जहां आतताई भांज रहे हैं
लाठी, सरिये, गंडासे,
पटाखों की लड़ियां
दियासलाई की तिल्ली
और जलती आग में झुलसता भविष्य

गर्व भरे अट्टहास में
पंचायती फ़रमान
बारूदी विस्फोट की तरह
फटते गैस सिलेंडर
लूटपाट और बरजोरी

तमाशबीन …
शहर …
पुलिस …
संसद …
ख़ामोश …

भूमंडलीकरण के दौर में पूंजीवाद तेजी से अपनी जड़ें समाज में जमाता है और तीव्रता से कोई भी जंगल एक आलीशान बिजनेस हब में तब्दील हो जाता है। इस जंगल के उजाड़ने की पीड़ा उस जंगल के मासूम जीव-जंतु और परिंदे ही जान सकते हैं। दूसरी तरफ सत्ता से सत्ता से सांठगांठ कर भ्रष्टाचार व लूट-खसोट के साथ किसानों की जमीनों पर कब्जा करते पूंजीपति हैं, जिन्होंने किसानों पर झूठे मोटे कर्ज कर्ज लादकर उन्हें उनके ही खेत में किसान से दिहाड़ी मजदूर बना दिया है। अपनी ऐसी दयनीय दशा से निराश और खिन्न होकर न जाने कितने ही किसानों ने आत्महत्या कर ली। वाल्मीकि की ‘खेत उदास हैं’ कविता इस दृष्टि से बेहतरीन कविता है, जो उपरोक्त दोनों स्थितियों का बेहद हृदय विदारक वर्णन करती है।

चिड़िया उदास है–
जंगल के खालीपन पर

बच्चे उदास हैं–
भव्य अट्टालिकाओं के
खिड़की-दरवाज़ों में कील की तरह
ठुकी चिड़िया की उदासी पर

खेत उदास हैं–
भरपूर फ़सल के बाद भी
सिर पर तसला रखे हरिया
चढ़-उतर रहा है एक-एक सीढ़ी
ऊंची उठती दीवार पर

लड़की उदास है–
कब तक छिपाकर रखेगी जन्मतिथि

किराये के हाथ
लिख रहे हैं दीवारों पर
‘उदास होना
भारतीयता के खिलाफ़ है!’

बंद कमरों में भले ही
न सुनाई पड़े
शब्द के चारों ओर कसी
सांकल के टूटने की आवाज़

खेत-खलिहान
कच्चे घर
बाढ़ में डूबती फ़सलें
आत्महत्या करते किसान
उत्पीडित जनों की सिसकियों में
फिर भी शब्द की चीख़
गूंजती रहती है हर पल।

कहने का तात्पर्य यह है कि जनमानस के बीच दलित साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार के रूप में प्रसिद्धि पाने वाले ओमप्रकाश वाल्मीकि को किसी संकुचित दायरे में कैद करने की बजाए उनके साहित्य का विभिन्न स्तरों पर मूल्यांकन किए जाने की आवश्यकता है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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