दलित गए, आदिवासी आए

शमशेर सिंह दुल्लो 2005 से लेकर 2008 तक पंजाब कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। उन्होंने कहा कि “दलितों के भीतर जितना दम होता है, उससे कहीं ज्यादा उनसे परिक्षाएं ली जाती हैं।” पढ़ें, द्वारका भारती का यह आलेख

उत्तर प्रदेश में योगी अदित्यनाथ सरकार के एक दलित राज्यमंत्री दिनेश खटिक द्वारा इस्तीफे तथा बाद में वापसी के प्रकरण ने यह भलीभांति स्पष्ट कर दिया है कि रामराज्य की तस्वीर उभर कर राष्ट्रीय स्तर पर सामने आ गई है। हो सकता है कि इस इस्तीफे को एक राजनीतिक ड्रामा भी कहा जाए, लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि देश में किसी भी राजनीतिक दल अथवा राजनीतिक संगठन की सत्ता क्यों न रही हो, वहां किसी दलित का टिके रहना मानो मगरमच्छ के जबड़ों में कसमसाने की स्थिति से कम कभी नहीं रहा है। यदि सत्ता हिंदुत्ववादी तत्वों की रही हो तो स्थितियों की भयावहता का अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा। स्वतंत्रता के 75 वर्षों के ‘अमृतकाल’ में भी नहीं, यदि दलित की स्थिति एक घंटा बजाने वाले व्यक्ति से ऊपर नहीं उठी है तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा प्रचारित यह ‘अमृतकाल’ महज एक भौंड़ा प्रचार से ज्यादा कुछ नहीं माना जाना चाहिए।

इससे भी भयानक स्थिति यह है कि देश के लोगों को यह निरंतर बताने के प्रयास हो रहे हैं कि देश का सर्वोच्च पद एक दलित/आदिवासी के पास है तो कैसे देश के दलितों का वाजिब हक उन्हें नहीं दिए जाने का थोथा प्रचार किया जा रहा है? इन्हीं अर्थों में उत्तर प्रदेश के इन राज्यमंत्री दिनेश खटिक की स्थिति को पूरी तरह समझा जा सकता है। उनके द्वारा दिए गए इस्तीफे की भाषा को समझें तो इस बात के पुख्ता प्रमाण मिलते हैं कि वे उत्तर प्रदेश के जलशक्ति विभाग के राज्यमंत्री अवश्य माने जाते थे, लेकिन उनकी उपस्थिति कागजों तक ही सीमित रखी गयी थी। उन्होंने स्पष्ट तौर पर यह आरोप लगाया कि एक दलित होने के कारण उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। यहां यह बताना आवश्यक होगा कि खटिक उत्तर प्रदेश की हस्तिनापुर सीट से विधायक चुने गए हैं और योगी की पहली सरकार में भी राज्यमंत्री रह चुके हैं। उनका लगाया गया दोष यही है कि एक दलित होने के कारण विभाग में उनकी कोई नहीं सुनता और ना ही इस विभाग की किसी गतिविधि की उनको सूचना दी जाती है। उनके लिखे पत्रों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। उनके आरोप स्पष्ट करते हैं कि उनकी भूमिका राष्ट्रपति रहे रामनाथ कोविंद से बेहतर कदापि नहीं मानी जा सकती।  

वैसे यह भी नहीं है कि इस प्रकार की स्थितियां इस घोषित अमृतकाल से पूर्व कभी नहीं देखी गईं। दलित देश के लगभग सभी राजनीतिक दलों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे हैं, लेकिन सभी दलों में उनका स्थान सदैव एक मोहरे से ज्यादा कभी भी ऊपर उठता हुआ नहीं देखा गया है। इस पर तुर्रा यह कि उनकी थोड़ी-सी भूल का खामियाज़ा भी अपना पद गंवाकर भरना पड़ता है। उनके आगे बढ़ने के रास्ते को हमेशा तरह-तरह के अवरोधों से बंद करने का इतिहास एक खुली किताब की भांति हमारा मुंह चिढ़ा रहा है। भारत के सबसे बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस की भूमिका सबसे ज्यादा बदनाम रही है। दलितों के लिए यह दल हमेशा नामजद ‘सरकारी दल’ के तौर पर याद किया जाता रहा है। दलितों का सबसे अच्छा दोहन इसी दल ने किया था, लेकिन उसके बदले में जब अवसर आया तो इसी दल के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने जगजीवन राम को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने से रोकने के लिए अपनी सारी ऊर्जा झोंक दी थी। यह शायद कांग्रेस के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाएगा। इस दाग को कांग्रेस अब तक भी धो नहीं सकी है। 

बीते 25 जुलाई, 2022 को राष्ट्रपति पद का पदभार ग्रहण करने के बाद राष्ट्रपति भवन में द्रौपदी मुर्मू व पूर्ववर्ती राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (तस्वीर साभार : राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली)

अगर कम्युनिस्ट पार्टियों की चर्चा करें तो उन्होंने भी दलितों को अपने दरवाजे की रौनक बनाए रखने से ज्यादा कभी नहीं समझा। देश का सबसे बड़ा सर्वहारा वर्ग उनकी दृष्टि में तिनका ही रहा। हमारे पास कोई ऐसा उदाहरण नहीं जो यह बता सके कि देश के कम्युनिस्ट दलितों को ऊंचे पदों तक पहुंचाने में कोई रुचि रखते रहे थे। दलित वहां भी अस्पृश्य ही माने गए। दलितों को वहां भी कुर्सियां लगाने तथा उन्हें उठाने तक ही सीमित रखा गया। 

इसी प्रकार समाजवादी दलों में भी दलितों की भूमिका अहम होने के बावजूद ऊंचे पदों से दूर ही रखा गया। दलितों में से कोई लालू प्रसाद जैसा नेता बनने के अवसर कभी नहीं बनते देखे गए। समाजवादियों की भूमिका को इंगित करते हुए 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में बोलते हुए डॉ. आंबेडकर को कहना पड़ा था– “संविधान की निंदा मुख्य रूप से कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी कर रही है।”

इसी संदर्भ में हम यहां देश के प्रख्यात समाज शास्त्री प्रो. आनंद कुमार के शब्दों को उद्धृत करना चाहेगें जो उन्होंने ‘समता मार्ग’ नामक अपने पोर्टल में व्यक्त किए हैं– “सोशलिस्ट पार्टियों ने दलितों को अपनी पार्टी में प्रतिनिधित्व देने के मामले में क्या रुख अपनाया और क्यों कभी कोई दलित इस पार्टी के सर्वोच्च पद पर नहीं पहुंच पाया? यह एक प्रश्न है, जिसका आजतक भी कोई जवाब नहीं मिलता हुआ देखा गया है।” 

भाजपा का इतिहास भी इस मामले में दलितों के प्रतिकुल ही रहा है। यह बताता है कि एक दलित राजनेता बंगारू लक्षमण जो कि एक वर्ष तक भाजपा के अध्यक्ष रहे थे, सिर्फ कुछ एक राशि के भ्रष्टाचार के आरोप में पदच्युत कर दिए गए, तो दूसरी ओर ऊंची जाति के केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा के प्रति बड़ा दिल दिखाते हुए ढिठाई से पार्टी में बनाकर रखा गया, जिसके बेटे पर बहुत क्रूरता से किसान आंदोलन से जुड़े निरीह किसानों को अपनी थार जीप से कुचलने का आरोप लंबित है। उसकी जगह यदि कोई दलित नेता होता तो क्या इतना बड़ा दिल भाजपा का शीर्ष नेतृत्व दिखा पाता? जवाब है– कदापि नहीं।

ठीक इसी प्रकार की स्थितियां पंजाब में कोई भिन्न नहीं देखी जाती। शमशेर सिंह दुल्लो 2005 से लेकर 2008 तक पंजाब कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। उनसे इसी लेख के संदर्भ से मेरी फोन पर बात हुई तो उनका जैसे दर्द छलक आया। उन्होंने कहा कि “दलितों के भीतर जितना दम होता है, उससे कहीं ज्यादा उनसे परिक्षाएं ली जाती हैं।” एक बार इन्होंने ही एक दलित सम्मेलन में कहा था कि “कांग्रेस में भी दलितों के प्रति गुटबंदी का माहौल आज भी कम नहीं देखा जाता।” उनकी इसी बात का प्रमाण पंजाब के मुख्यमंत्री रहे चरणजीत सिंह चन्नी के विरुद्ध जाट सिख नेताओं का व्यवहार अनायास ही दे जाता है। उनके विरुद्ध खुलकर बोलने वाले सुनील जाखड़ की भूमिका का अवलोकन किया जा सकता है। यहां तक कि पंजाब में कांग्रेस की हार का ठीकरा चरणजीत सिंह चन्नी के सिर पर फोड़ने की कोशिशों को सभी ने देखा है। 

खैर, रामनाथ कोविंद पूर्व राष्ट्रपति हो गए और उनकी जगह द्रौपदी मुर्मू आ गई हैं। यदि इन्हीं मोहरों के आने-जाने का नाम ही आजादी का ‘अमृतकाल’ है तो क्या आने वाला समय दलितों की बेहतरी का, उनकी आजादी का, माना जा सकता है?  

(संपादन : समीक्षा/नवल/अनिल)


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