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दलित गए, आदिवासी आए

शमशेर सिंह दुल्लो 2005 से लेकर 2008 तक पंजाब कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। उन्होंने कहा कि “दलितों के भीतर जितना दम होता है, उससे कहीं ज्यादा उनसे परिक्षाएं ली जाती हैं।” पढ़ें, द्वारका भारती का यह आलेख

उत्तर प्रदेश में योगी अदित्यनाथ सरकार के एक दलित राज्यमंत्री दिनेश खटिक द्वारा इस्तीफे तथा बाद में वापसी के प्रकरण ने यह भलीभांति स्पष्ट कर दिया है कि रामराज्य की तस्वीर उभर कर राष्ट्रीय स्तर पर सामने आ गई है। हो सकता है कि इस इस्तीफे को एक राजनीतिक ड्रामा भी कहा जाए, लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि देश में किसी भी राजनीतिक दल अथवा राजनीतिक संगठन की सत्ता क्यों न रही हो, वहां किसी दलित का टिके रहना मानो मगरमच्छ के जबड़ों में कसमसाने की स्थिति से कम कभी नहीं रहा है। यदि सत्ता हिंदुत्ववादी तत्वों की रही हो तो स्थितियों की भयावहता का अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा। स्वतंत्रता के 75 वर्षों के ‘अमृतकाल’ में भी नहीं, यदि दलित की स्थिति एक घंटा बजाने वाले व्यक्ति से ऊपर नहीं उठी है तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा प्रचारित यह ‘अमृतकाल’ महज एक भौंड़ा प्रचार से ज्यादा कुछ नहीं माना जाना चाहिए।

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लेखक के बारे में

द्वारका भारती

24 मार्च, 1949 को पंजाब के होशियारपुर जिले के दलित परिवार में जन्मे तथा मैट्रिक तक पढ़े द्वारका भारती ने कुछ दिनों के लिए सरकारी नौकरी करने के बाद इराक और जार्डन में श्रमिक के रूप में काम किया। स्वदेश वापसी के बाद होशियारपुर में उन्होंने जूते बनाने के घरेलू पेशे को अपनाया है। इन्होंने पंजाबी से हिंदी में अनुवाद का सराहनीय कार्य किया है तथा हिंदी में दलितों के हक-हुकूक और संस्कृति आदि विषयों पर लेखन किया है। इनके आलेख हिंदी और पंजाबी के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में इनकी आत्मकथा “मोची : एक मोची का अदबी जिंदगीनामा” चर्चा में रही है

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