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आंखन-देखी : झारखंड में ‘हर घर तिरंगा’ का हाल

विशद कुमार बता रहे हैं झारखंड के बुनियादी सुविधाओं से विहीन दुमका जिले के एक गांव निझोर की दास्तान, जहां राज्य सरकार के निर्देश पर पंचायती निकायों द्वारा हर घर तिरंगा अभियान चलाया गया

बुनियादी सुविधाओं को तरसता दुमका जिले के काठीकुंड प्रखंड के बिछिया पहाड़ी पंचायत का एक गांव निझोर गांव झारखंड का ऐसा अकेला गांव नहीं है। गांव के ठीक बीचोंबीच जोड़ा इमली के पेड़ के ठीक बगल में लोगों की बैठकी के लिए एक चबूतरा बना है। गत 12 अगस्त, 2022 को यहां पर गांव की कुछ महिलाएं और कुछ युवा यूं ही गप्पे मार रहे थे। दूसरी तरफ गांव के बच्चे अपने पारंपरिक खेलों में मशगुल थे। इसी बीच एक कमजोर कदकाठी का पहाड़िया युवक पसीने से लथपथ अवस्था में साइकिल से वहां पहुंचता है। उसकी स्थिति देख सहज ही अंदाजा लग रहा था कि वह पहाड़ के ऊबड़-खाबड़ रास्ते से आया है। उसकी साइकिल के पीछे कैरियर में तिरंगा का एक बंडल बंधा हुआ था। वह नौजवान उस क्षेत्र का वार्ड सदस्य सुनिराम हेम्ब्रम था। उसने बताया कि पंचायत के मुखिया ने उसे ये झंडे दिए हैं, जिसे 13 अगस्त से अपने-अपने घरों के ऊपर फहराना है। 

निझोर गांव शिकारीपाड़ा विधानसभा क्षेत्र में है, जहां के वर्तमान विधायक नलिन सोरेन लगातार 7 बार से प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। सोरेन के घर से महज 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह गांव निझोर।

गांव का हाल

बता दें कि इस निझोर गांव में घरों की कुल संख्या 54 है, जिसमें 48 घर पहाड़िया आदिम आदिवासी परिवारों का है और शेष 6 घर संथाल आदिवासियों का है।

जब गांव के लोगों से उनकी बुनियादी जरूरतें व सुविधाओं के बाबत बात की गई तो जो तस्वीर सामने आई यह साफ बता रही थी कि इस गांव में पेयजल, सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का आजादी के आज 75वें वर्ष और अलग राज्य गठन के 22वें साल में भी घोर अभाव है।

ग्रामीणों ने बताया कि गांव में विगत तीन वर्ष पूर्व एक भव्य पहाड़िया प्राथमिक विद्यालय भवन बनकर तैयार है। दो-मंजिली इमारत की शक्लो-सूरत यह बयां कर रही थी कि इसे लाखों रुपए की लागत से बनाया गया है , जिसमें वर्ग कक्ष, शिक्षक आवास एवं 300 छात्रों की क्षमता वाला छात्रावास भी है। हालांकि छात्रावास निर्माण का कार्य अभी भी आधा-अधूरा पड़ा है। विद्यालय में सोलर वाटर टावर है, लेकिन मोटर एक साल से ख़राब पड़ा है। स्कूल कैम्पस में पेयजल का दूसरा कोई विकल्प नहीं है। शिक्षकों के लिए आवास सुसज्जित हैं, लेकिन यहां रहने वाले शिक्षक नदारद हैं।

एक ग्रामीण मोहन सिंह ने बताया कि यहां एक शिक्षक सुभाष सिंह नियुक्त हैं, जो कभी-कभार विद्यालय आते हैं। सामान्य तौर पर वह दुमका जिला मुख्यालय में ही रहते हैं।

गांव में शिक्षा का आलम यह है कि आज भी एक भी मैट्रिक उत्तीर्ण नहीं है। सरस्वती देवी, जो इस गांव में बहु बनकर आई हैं, वह नौवीं कक्षा पास हैं। इसी तरह चंदना देवी और विद्यानंद देहरी नौवीं कक्षा पास हैं। एक युवा रामधन देहरी आठवीं तक की पढाई कर चुके हैं। अपने पिता की आकस्मिक मृत्यु के कारण वे आगे की पढाई नहीं कर पाए।

गांव के सभी परिवार मेहनत-मजदूरी से गुजारा करते हैं। लेकिन रोजगार उपलब्ध कराने के मामले में प्रशासन ने पूरी तरह आंखें मूंद ली है। गांव के 61 परिवार मनरेगा में पंजीकृत हैं। लेकिन वर्त्तमान वित्तीय वर्ष में किसी एक को भी रोजगार नहीं मिला। इसके पहले वित्तीय वर्ष 2021-22 में सिर्फ 3 लोगों को 16 दिन का रोजगार मिला था। गांव के अधिकांश मजदूरों के कार्ड काठीकुंड निवासी व मनरेगा ठेकेदार राजू नाग के पास पड़े हैं। परिवार चलाने के लिए युवक आज भी स्थानीय होटलों और हाट-बाजारों में साइकिल से लकड़ियां बेचने को विवश हैं, जिसके बदले उन्हें अधिकतम 220 रूपए तक मिल पाता है। जबकि लोगों का कहना है कि मनरेगा के तहत अगर काम मिले तो वे गांव में ही काम करने को तैयार हैं।

निझोर गांव के वासियों के बीच झंडा वितरित करते वार्ड सदस्य सुनिराम हेम्ब्रम

करीब 62 वर्षीय गांव के ग्राम प्रधान गोपाल कुंवर विगत डेढ़ वर्षों से लकवा की बीमारी से ग्रसित हैं। लेकिन वह कहीं इलाज नहीं करा पा रहे हैं, क्योंकि उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं हैं।

ऐसे बुनियादी साधनों के अभाव का दंश कोई अकेले निझोर गांव झेल रहा है, ऐसी बात नहीं है। बल्कि संथाल परगना के ऐसे सैकड़ों गांवों सहित झारखंड के हजारों गांव ऐसे हैं। ऐसे में सवाल पैदा होना लाज़िमी है कि क्या हम सचमुच आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं या सिर्फ ‘फील गुड’ करने का ढोंग कर रहे हैं?

किसी ने खुद के पैसे से खरीदा झंडा तो किसी ने एनजीओ से लिया सहयोग

अब वापस बात करते हैं केंद्र सरकार के द्वारा चलाए गए अभियान ‘हर घर तिरंगा’ की। जब मैंने झारखंड के कई क्षेत्र के मुखियाओं से जानना चाहा कि झंडा किस फंड के तहत मिल रहा है? तब अधिकांश ने इसपर अनिभिज्ञता जाहिर की। सभी ने कहा कि यह प्रखंड कार्यालय से मिला है। वहीं कईयों ने झंडा कम होने पर निजी स्तर से खरीददारी करने की बात बताई, तो किसी ने क्षेत्र के एनजीओ द्वारा भी सहयोग की बात कही। काफी लोगों से पूछे जाने के बाद यह बात सामने आई कि झारखंड सरकार ने झंडा, बैनर सहित कार्यक्रम की खरीददारी के लिए मुखियाओं को गांवों के विकास के लिये दिये जानेवाले फंड से 2,500 रुपए, पंचायत समिति सदस्य को 5,000 रुपए और जिला परिषद सदस्य को 25,000 रुपए तक खर्च करने की छूट दी गई है। लेकिन इस फंड के लिए ऑनलाइन की जटिल प्रक्रिया के कारण अधिकांश मुखियाओं ने इसका इस्तेमाल नहीं किया। सभी ने बताया हमें यह निर्देश था कि लोगों को इसके लिए अधिक से अधिक प्रोत्साहित किया जाए ताकि लोग खुद से झंडा खरीदकर लगाएं।

यह थी सरकारी तैयारी

दरअसल गत 1 अगस्त, 2022 को पंचायती राज विभाग, झारखंड सरकार द्वारा एक पत्र सभी प्रखंड विकास पदाधिकारियों को भेजा गया। इसमें इस पूरे अभियान की रूप-रेखा बतायी गई। इसमें कहा गया कि ग्रामीण क्षेत्रों के सार्वजनिक क्षेत्रों में हर घर झंडा/हर घर तिरंगा कार्यक्रम के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु स्थानीय भाषा में ढोल, डुगडुगी कला जत्था का उपयोग किया जाय।

इसके अलावा कहा गया कि राज्य सरकार (संस्कृति विभाग) व जिला उपायुक्त के स्तर से उपलब्ध कराये गये झंडों को वितरित करने में प्राप्त दिशा-निर्देशों के अनुरूप त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं से सक्रिय भूमिका अपेक्षित है। साथ ही, यह भी कि हर घर झंडा/हर घर तिरंगा अभियान के व्यापक प्रचार-प्रसर एवं ग्राम में रहनेवाले प्रत्येक ग्रामस्वामी को राष्ट्रीय ध्वज अपने मकान पर फहराने हेतु प्रोत्साहित करने के निमित्त दिनांक 4 अगस्त, 2022 को विशेष ग्राम सभा का आयोजन किया जाय।

वहीं इस अभियान हेतु 15वें वित्त आयोग मद अंतर्गत अनाबद्ध अनुदान के रूप में विमुक्त राशि से त्रिस्तरीय पंचायतों को अधिकतम 2500 रुपए प्रति ग्राम पंचायत, 5000 रुपए प्रति पंचायत समिति और 25,000 रुपए प्रति जिला परिषद अनुमान्य होगा। राज्य सरकार के पंचायती राज विभाग द्वारा हर घर झंडा/हर घर तिरंगा अभियान के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु पंचायत समिति एवं जिला परिषद द्वारा बैनर, पोस्टर एवं प्रचार वाहन का उपयोग किया जाय।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विशद कुमार

विशद कुमार साहित्यिक विधाओं सहित चित्रकला और फोटोग्राफी में हस्तक्षेप एवं आवाज, प्रभात खबर, बिहार आब्जर्बर, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, सीनियर इंडिया, इतवार समेत अनेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए रिपोर्टिंग की तथा अमर उजाला, दैनिक भास्कर, नवभारत टाईम्स आदि के लिए लेख लिखे। इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन के लिए काम कर रहे हैं

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