मनरेगा मज़दूरों ने किया ‘हल्ला बोल’

यह योजना 2009 के आम चुनाव में यूपीए के पुनर्विजयी होने के अनेक कारणों में से एक था। लेकिन 2014 में भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार ने पहली ही बार सत्ता में आने के बाद इस महत्वपूर्ण योजना, जिसने श्रम बाज़ार में मज़दूरों की मज़दूरी और उनके महत्व को एकाएक बहुत बढ़ा दिया, की उपेक्षा शुरू कर दी। बीते 2-4 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर मजदूरों के प्रदर्शन के बारे में बता रहे हैं स्वदेश कुमार सिन्हा

गत 2-4 अगस्त, 2022 को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) से संबद्ध देश भर के मज़दूरों ने केंद्र सरकार के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका। करीब पचास से अधिक जन संगठनों ने मनरेगा संघर्ष मोर्चा के बैनर तले दिल्ली में संसद भवन के नज़दीक जंतर-मंतर‌ पर तीन दिवसीय दिया। लेकिन मजदूरों के हल्ला बोल को दिल्ली से प्रकाशित लगभग सभी अखबारों और न्यूज चैनलों ने कोई जगह नहीं दी। हालांकि कुछेक जनपक्षीय वेबपोर्टल और लघु पत्रों ने इस प्रदर्शन पर विस्तार से जानकारी दी।

मनरेगा मज़दूरों की प्रमुख मांग यह रही कि लंबे समय से मज़दूरी का भुगतान नहीं हो रहा है, जिसका भुगतान कराया जाए। उन्होंने यह मांग उठाई कि मज़दूरी बढ़ाई जाए तथा इसका बजट बढ़ाया जाए। दरअसल, मनरेगा के तहत काम करने वाले मज़दूरों को मज़दूरी नहीं मिली है। मनरेगा संघर्ष मोर्चा द्वारा जारी विवरणिका के मुताबिक, केंद्र सरकार पर मनरेगा मज़दूरों का‌ लगभग 6000 करोड़ रुपए का बकाया है। इसी के चलते अलग-अलग राज्यों के मनरेगा मज़दूरों को जंतर-मंतर की ओर रुख करना पड़ा। 

उल्लेखनीय है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में लगभग 13 करोड़ मनरेगा मज़दूर पंजीकृत हैं।‌ इनके लिए अलग‌-अलग राज्य सरकारों ने 200 रुपए से लेकर 250 रुपए तक की मज़दूरी का निर्धारण किया है। प्रदर्शन के दौरान यह सवाल भी प्रमुखता से उठाया गया कि केंद्र सरकार मनरेगा के बजट‌ में लगातार कमी करती जा रही है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में मोदी सरकार ने मनरेगा के मद में बजटीय आवंटन में 15 हजार करोड़ रुपए की कमी की। पिछले वित्तीय वर्ष में इस मद में बजटीय आवंटन 97 हजार 34 करोड़ रुपए था, जो इस साल 72 हजार 34 करोड़ रुपए रहा। 

प्रदर्शन के दौरान मजदूरों ने मनरेगा के डिजिटलाइजेशन पर भी सवाल खड़ा किया। उनका कहना था कि मोबाइल एप के जरिए फोटो अपलोड कराने‍ के नियम ने उनकी परेशानी को बढ़ा दिया है। अनेक इलाकों में इंटरनेट की अनुपलब्धता की वजह से एप पर फोटो अपलोड नहीं हो पाता है और इसके कारण मजदूरी काट ली जाती है। मनरेगा संघर्ष मोर्चा के सदस्यों ने केंद्र सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे राज्यों में मनरेगा में भ्रष्टाचार का बहाना बनाकर केंद्र सरकार ने वित्तीय आवंटन जारी ही नहीं किया, जिसके चलते लाखों मज़दूरों को सीधे तौर पर नुकसान हो रहा है‌। यद्यपि इन दोनों राज्यों की सरकारों ने केंद्र सरकार पर यह आरोप लगाया है कि दूसरे दल की सरकारों के होने के कारण केंद्र भेदभाव की नीति अपना रही है। उनके इस आरोप में दम भी नजर आता है क्योंकि इस योजना में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार आदि भाजपा शासित राज्यों में भी भारी भ्रष्टाचार फैला हुआ है। अभी हाल ही में यह ख़बर आई थी कि उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में 400 मृत मज़दूरों का पैसा बैंक में ट्रांसफर करके निकाल लिया गया था। 

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करते मनरेगा मजदूर

विगत दिनों केंद्र सरकार ने खुद माना कि इस योजना के तहत विभिन्न राज्यों को दिया जाने वाला करीब 7000 हज़ार 257 करोड़ का रुपए का भुगतान अभी नहीं हुआ है। 

बताते चलें कि मनरेगा एक ऐसी योजना है कि जिसमें ग्रामीण मजदूरों को साल भर में सौ दिन काम की गारंटी का प्रावधान है। इसके तहत एक मजदूरों को एक जॉब कार्ड उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां करती है। जंतर-मंतर पर जुटे मजदूरों ने समवेत स्वर में कहा कि सरकार सौ दिन के बदले साल में 30-40 दिन से अधिक काम नहीं देती। साथ ही बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार के कारण कई जगह मज़दूरों से काम कराकर मज़दूरी नहीं दी जाती या फिर फर्ज़ी मज़दूरों से काम कराकर उनका पैसा हड़प लिया जाता है। दिल्ली में धरने पर आए कई मज़दूरों तथा उनके नेताओं ने इस संबंध में अनेक दिलचस्प बातें बतलाईं। मसलन, प्रत्येक जॉब कार्डधारक को सौ दिन काम का हक मिलता है, लेकिन यह कार्ड ग्राम पंचायत स्तर पर बनाया है। इसमें जितने भी लाभार्थी होते हैं, उनकी‌ लिस्ट ऑनलाइन होती है। समय-समय पर इस लिस्ट में संशोधन किया जाता है और नए नाम जोड़े जाते हैं और अपात्र लोगों का नाम काटा जाता है। लेकिन इस कार्ड को बनवाने में व्यापक भ्रष्टाचार सभी राज्यों में फैला है। पात्रों के नाम काटकर फर्ज़ी और अपात्रों के नाम से कार्ड बना लिए जाते हैं। उनके नाम से ‌फर्ज़ी बैंक खाते खोलकर धनराशि हड़प ली जाती है। अक्सर ऐसा भी होता है कि सूची में संशोधन के नाम पर ढेरों पात्र‌ लोगों के नाम काट दिए जाते हैं तथा उन्हें पुनः जोड़ने के लिए धनराशि की मांग की जाती है। 

प्रदर्शनकारी एक और मज़दूर ने अपनी व्यथा बताते हुए बताया कि ऑनलाइन भुगतान में भी काफी भ्रष्टाचार है। बैंक में पैसा ट्रांसफर हो जाने के बाद भी ग्राम प्रधान और संबंधित अधिकारी मज़दूरों से यह मांग करते हैं कि वे बैंक से पैसा निकालकर उनका हिस्सा दें, नहीं तो उनको अपात्र घोषित करके उनका नाम ‌मनरेगा‌ लिस्ट से हटा दिया जाएगा। धरने में आए कई मज़दूरों ने राष्ट्रीय मोबाइल निरीक्षण प्रणाली (एनएमएनएस) ऐप के संबंध में भी अपनी चिन्ताएं व्यक्त की। इस ऐप का आरंभ पिछले साल ही किया गया था, ताकि योजना का उचित निरीक्षण सुनिश्चित किया जा सके तथा मज़दूरों को काम और उनकी धनराशि आदि के बारे में जानकारी दी जा सके। परंतु इसमें अनेक खामियां हैं। पहली खामी तो यही कि मज़दूरों को स्मार्टफोन खरीदना होता है। इसके लिए उन्हें कर्ज़ लेना पड़ता है, जिससे उनकी पहले से ख़राब आर्थिक स्थिति और अधिक बिगड़ जाती है। दूसरा यह है कि अक्सर नेटवर्क न मिलने के कारण उन्हें सूचनाएं सही समय पर नहीं मिल पातीं।

प्रदर्शन को संबोधित करते सीपीआई के राष्ट्रीय महासचिव डी. राजा

पूर्वी उत्तर प्रदेश में मज़दूरों, किसानों और छात्रों के बीच सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता चतुरानन ओझा के मुताबिक उनके इलाके में, विशेष रूप से देवरिया और सलेमपुर में, मनरेगा के नाम पर स्थानीय सांसद एवं विधायक अनेक योजनाओं का शुभारंभ कर देते हैं, लेकिन मनरेगा में उसके लिए फंड ही नहीं होता। अभी पिछले दिनों ही सलेमपुर जिले में जल अमृत योजना‌ के तहत पानी के लिए तालाब बनाने की योजना का स्थानीय सांसद ने शिलान्यास किया, लेकिन बाद ‌में पता लगा कि वहां पर मनरेगा योजना में इस काम के लिए कोई फंड ही नहीं था। उन्होंने आगे बताया कि उत्तर प्रदेश में किसी भी मनरेगा मज़दूर को 35 दिन से अधिक काम नहीं मिलता। वर्ष 2005 में जब इस योजना की शुरुआत की गई थी तब एक मनरेगा मज़दूर को 220 रुपए मिलता था। आज 2022 में उससे भी कम मज़दूरी मिल रही है। जबकि आज श्रम बाज़ार में अकुशल मज़दूर की मज़दूरी 500 रुपए तक हो गई है। इसलिए आज कोई मज़दूर परिवार केवल मनरेगा के सहारे अपना जीवन नहीं जी सकता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अलग-अलग राज्यों में यह दर अलग-अलग है। 

बहरहाल, मनरेगा योजना और उसके मजदूरों की विषमताओं की सूची लंबी है। कई बार कुछ प्रयास भी किये गये। मसलन, दिसंबर 2021 के बाद से पश्चिम बंगाल में कोई भुगतान नहीं किया गया था, इस संबंध में मज़दूरों का प्रतिनिधिमंडल सांसदों से भी मिलने गया। राकांपा की सुप्रिया सुले ने उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया और आश्वासन दिया कि वे इन मामलों को संसद में उठाएंगीं। सीपीआई (एम) के जे. वेंकटेशन और पी. आर. नटराजन ने आश्वासन दिया कि वे ग्रामीण विकास मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखेंगे। मजदूरों ने तमिलनाडु के वीसीके के सांसद थिरुमावलन से भी मुलाकात की।

ध्यातव्य है कि मनरेगा योजना की शुरूआत 7 सितंबर, 2005 में संसद में एक कानून बनाकर लागू किया गया था। तब केंद्र में कांग्रेसनीत यूपीए गठबंधन में वामपंथी दल भी शामिल थे। इस योजना के पीछेबेल्जियम में जन्मे और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्री जयां द्रेज की अहम भूमिका थी। कई लोगों का यह भी मानना है कि यह योजना 2009 के आम चुनाव में यूपीए के पुनर्विजयी होने के अनेक कारणों में से एक था। लेकिन 2014 में भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार ने पहली ही बार सत्ता में आने के बाद इस महत्वपूर्ण योजना, जिसने श्रम बाज़ार में मज़दूरों की मज़दूरी और उनके महत्व को एकाएक बहुत बढ़ा दिया, की उपेक्षा शुरू कर दी। नरेंद्र मोदी ने तो अपने पहले कार्यकाल के प्रारंभ में ही संसद में अपने भाषण में मनरेगा को असफलताओं का‌ स्मारक बतलाया था। वास्तव में उनकी सरकार इस योजना को उसी समय समाप्त कर देना चाहती थी, परंतु जनदबाव के कारण लगातार बजट में कटौती के बावजूद इसे चलाना पड़ा। अब सरकार योजना मद में कटौती कर, मजदूरों का भुगतान रोक कर, काम में कटौती कर इस महत्वाकांक्षी योजना की प्रासंगिकता को ही समाप्त कर देना चाहती है। 

दूसरी ओर, आज बढ़ती गरीबी, बेरोज़गारी और बेतहाशा बढ़ती महंगाई में भारी वृद्धि के कारण मनरेगा में काम की मां बढ़ गई है। इसमें और वृद्धि कोविड महामारी के दौरान पाबंदियों ने कर दी जब प्रवासी मजदूर अपने गांव लौटे। इसकी वजह से मज़दूरों का अपने गाँवों की ओर पलायन से मनरेगा में काम की माँग और बढ़ी। ऐसे में यह केंद्र की जिम्मेदारी थी कि वह मनरेगा मजदूरों की मदद करती, लेकिन सरकार ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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