h n

पुरुषोत्तम अग्रवाल के कबीर

इतिहास लेखन से पहले इतिहासकार क्या लिखना चाहता है, उसकी परिकल्पना कर लेता है और अपनी परिकल्पना के आधार पर स्रोतों का चयन और उसका अर्थारोपण करता है। वह अपने परिवेश, अपनी जाति, समाज और अपने राज्य के कृत्यों का संरक्षण और बचाव करते हुए लिखता है। बता रहे हैं देवेंद्र शरण

कबीर की परंपरा कबीर का पंथ और कबीर की साहित्यक विवेचना करने के लिए हमें उसके काल की ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में जाना होगा। ऐतिहासिक तौर पर भक्ति की उत्पत्ति दक्षिण में हुई। नयनार और अलवार संतों ने तमिलनाडू में 600 ई. से 400 ई. में भक्ति का अलख जगाया। नयनार संतों की संख्या 63 थी, जिनमें एक महिला संत कराईक्कल अम्मैयार भी थीं। सभी नयनार संत विभिन्न पृष्ठभूमि से थे, जिसमें चन्नार, विक्षियार, बेल्लास, कुरूमबर, थेवर, तेली, ब्राह्म्ण, बन्नार और अछूत शामिल थे। दसवीं सदी में राजा राम चोल प्रथम ने दरवार भजनों के अंश सुनने के बाद तेवरय खंड एकत्रित किया। नंबियादर नांबी ने इसे संग्रहित किया। नयनार संतों ने शिव को ईश्वर मानकर भक्ति के भजन और गीत लिखे। अलवार संतों की संख्या 12 बताई जाती है। इनमें अंडाल नामक महिला संत भी थी। अलवार विष्णु को ईश्वर मानकर भजन-भक्ति करते थे।

कहा जाता है कि रामानुज (1017-1137) ने विशिष्टाद्वैतवाद के जरिए जीव और जगत को ईश्वर का अंश माना। ये वैष्णव परंपरा के संत थे और इनके शिष्य रामानंद भक्ति आंदोलन को दक्षिण से उत्तर भारत 14वीं सदी में लेकर आए, ऐसा माना जाता है। भारत में सहजिया बौद्ध, नाथपंथ और कनफट्टा साधुओं की जमात भी इसी दौरान लोकप्रिय रही होगी।

भक्ति की तरह ही इस्लामिक देशों में सूफी मत की शुरुआत हुई। इराक की राविया अलवसरी 714 ई – 718 ई. के मध्य जन्म ली। उसने खौफ-ए-खुदा को इश्क-ए-हकीकी में बदल दिया अर्थात ईश्वर से निःस्वार्थ प्रेम करो। यही मत बाद में चलकर इस्लाम के साथ-साथ भारत में दिल्ली और उत्तर तक लोकप्रिय हुआ। 13वीं सदी में चिश्ती परंपरा के पहले सूफी मोईनी चिश्ती ने अजमेर में अपनी खानकाह की शुरुआत की।

तैमूर के जाने के बाद सैयद और फिर लोदियों ने राज किया। सिकंदर लोदी (1489-1517 ई.) तक राज किया। सिकंदर लोदी के पास ही पंडित, कबीर की शिकायत लेकर गए थे कि एक जुलाहा दोनों धर्मों की बखिया उधेड़ रहा है। दरअसल, कबीर दोनों धर्मों के आडंबर पर गहरा चोट कर रहे थे।

इतिहासकारों के विवरण से जान पड़ता है कि सिकंदर लोदी एक योग्य शासक सिद्ध हुआ था। उसका राज्य दिल्ली, ग्वालियर और बिहार तक फैला था। 1504 में उसने वर्तमान आगरा शहर की नींव डाली थी। वह एक उदार व्यक्ति था। युद्धोपरांत लूट की रकम में कभी हिस्सा ना लेना, निर्धनों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था करना, अनाज से चुंगी हटा लेना और अन्य व्यापारिक कर हटा लेने आदि से आवश्यकता की वस्तुएं सस्ती हो गई थीं। उसने खाद्यान से जकात कर हटा लिया था और आंतरिक व्यापार कर समाप्त कर दिया था। जानकारी मिलती है कि सिकंदर लोदी कवि था और ‘गुल’ उपनाम से कविताएं करता था। इसलिए जनता के प्रति उसका दृष्टिकोण सहृदय शासक जैसा था।[1]

डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर के विषय में कई सवाल खड़ा करते हैं। मसलन, “काशी के जूलाहे को विधवा ब्राह्मणी का पुत्र कब और क्यों बनाया गया? कबीर के समकालीन और देशभाषा में पद रचने वाले साधक-विचारक रामानंद को संस्कृत में भाष्य रचने वाले आचार्य रामानंद में कब और किसके द्वारा और क्यों बदला गया? कब और क्यों रामानंद का समय कबीर से सौ साल पीछे चला गया? क्यों कर मुक्तिबोध को कबीर आधुनिक चित के निकट लगते है? क्यों कर दिलीप चित्रे को तुकाराम मराठी के पहले कवि लगते है?”[2]

दरअसल इतिहास लेखन से पहले इतिहासकार क्या लिखना चाहता है, उसकी परिकल्पना कर लेता है और अपनी परिकल्पना के आधार पर स्रोतों का चयन और उसका अर्थारोपण करता है। इतिहासकार अपने परिवेश, अपनी जाति, समाज और अपने राज्य के कृत्यों का संरक्षण और बचाव करते हुए लिखता है। जैसे अंग्रेजों ने भारत पर राज्य करते हुए बराबर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि यह उनका ‘व्हाईट मेंस बर्डेन’ था, जिसके कारण भारत जैसे देशों को ‘सभ्य देश’ बनाने के लिए उन्हें आना पड़ा।

1828 ई. में एच.एच. विलसन ने पुस्तक ‘ए स्केच ऑफ रिलीजस सेक्टस ऑफ हिंदूज’ में लिखा कि कबीर किसी वास्तविक व्यक्ति का नाम नहीं है। यह एक पदवी भर है। कबीर की पदवी लगाकर न जाने कितने लोगों ने कबीर नाम से रचनाएं की।

कबीर को केंद्र में रखकर बनायी गयी एक पेंटिंग

यह सही है कि कबीर की लोकप्रियता की वजह से न जाने कितने लोगों ने उनके नाम पर पदों की रचना की। लेकिन विल्सन की बात आधी गलत है कि कबीर सिर्फ ‘जेनरिक’ शब्द है। पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, “पिछले दो सौ सालों से किए गए कबीर विषयक अध्ययनों की विडंबना जरूर सामने लाती है। इन दो सौ सालों में इतने सारे और इतने परस्पर विरोधी कबीर हमारे सामने प्रस्तुत किए गए कि ऐतिहासिक कबीर तक पहुंचना नामुमकिन सा लगता है।”[3]

कबीर के जन्म का वर्ष 1398 ई. कहा जाता है और मृत्यु की तिथि 1518 ई. मानी जाती है। कबीर की मृत्यु की तारीख संभवतः सही जान पड़ती है, लेकिन जन्म की तिथि 1440 ई. के आस-पास रही होगी। रामानंद का जन्म संभवतः 1400 ई. में हुआ और धार्मिक नेता के रूप में 1455 ई. तक जरूर सक्रिय रहे होंगे। कबीर का जन्म यदि 1440 ई. माना जाय तो 15 वर्ष की अवस्था में रामानंद से भेट हुई और अपनी मृत्यु के समय उनकी आयु 78 वर्ष रही होगी। सुल्तान सिकंदर लोदी ने 1488 ई. लेकर 1512 ई. तक शासन किया और 1495 ई. में वह जौनपुर गया था। ये तारीखें कबीर के जीवन से मेल खाती हैं।[4]

कबीर के निधन के करीब 50 साल के अंदर हरिराम ब्यास ने रामानंद पर और कबीर पर लिखा। सौ वर्ष के भीतर-भीतर अनंत दास ने कबीर की पूरी परिचई लिखी। भक्तमाल परंपरा का शुरुआत करने वाले नामादास कबीर के गुण गाते हैं– “भक्तिविमुख धरम सब अधरम करि गायो”। कबीर के समकालीन गगरांवगढ़ के राजा पीपा पहले ही कह चुके थे “जो कलिनाद कबीर न रोने तो लोकवेद और कलिजुग मिलकर भगति रसानल देने।”[5]

भक्ति आंदोलन ने तमाम देश की देशज भाषा का अपार साहित्य खड़ा किया। देशज भाषा, गुजराती, अवधी, मराठी, बंगाली, मैथिली, उड़िया और बृजभाषा इत्यादि जो जनभाषाएं थीं, के सारे भक्त कवियों ने आडंबरविहीन आंदोलन किया। इन देशी भाषा स्रोतों पर ध्यान देने से पता चलता है कि जुलाहे कबीर, कुनबी तुकाराम, दर्जी नामदेव, सुनार अख्खा और चर्मकार रैदास की उपेक्षा अंग्रेजी ढंग पर खड़े किए गए विश्वविद्यालयों ने की। अंग्रेजों ने पूरे उत्तर भारत और मध्य भारत में लोगों को कबीर को पूजते पाया। डब्ल्यूक्रुक ने 1886 में प्रकाशित ‘द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ नार्थ वेस्टर्न इंडिया’ में लिखा है कि तुलसीदास के रामायण को छोड़कर शायद किसी भी अन्य रचना को उत्तर भारत के हिंदुओं के बीच वैसी लोकप्रियता हासिल नहीं है, जैसी कबीर के बीजक को। उनकी बानियां तो हिंदू और मुसलमान सभी के मुंह से कभी भी सुनी जा सकती हैं।[6]

देशभाषा स्रोतों से यह विदित होता है कि वास्तविक जीवन पर ब्राह्मणों का वर्चस्व वास्तविक जीवन पर आधारित ना होकर निराधार फार्मूलों पर आधारित है। ब्राह्मण वर्चस्व की तस्वीर औपनिवेशिक सत्ता के साथ ब्राह्मणों के मिलीभगत के फलस्वरूप 18वीं-19वीं सदी में गढ़कर कबीर के समय पर चिपका दी गई। “उपनिवेशवाद के साथ ब्राह्मणों की जुगलबंदी के नतीजों को समझे बिना ब्राह्मणवाद को समझा नहीं जा सकता।”[7]

कबीर के समय तक विभिन्न घरेलू कुटीर उद्योगों में इजाफा हो रहा था और वर्ण-व्यवस्था को चुनौती मिल रही थी। जिन्हें वर्ण-व्यवस्था के अंतर्गत कल तक ‘निम्न कुल’ का माना जा रहा था, वहीं ब्राह्मणवाद आदिवासी गोंडों को सफल राजा बनते देखने के लिए विवश था। विवश होकर वे शूद्रों को गुरु मानने के लिए बाध्य थे। इसलिए तुलसीदास को जो कलियुग लग रहा था, उस समय आदिवासी गोंड छत्रपति राजा बन रहे थे। कबीर जाति-पांति को चुनौती दे रहे थे। कबीर अपने समय पर हाशिए की आवाज ही नहीं, जन-जन की आवाज बन गए थे। अगर हाशिए की आवाज होते तो गगरांवगढ़ के राजा पीपा यह नहीं कहते कि वेद और कलियुग से भक्ति को कौन बचाता “जो कलिनाम कबीर न होते।”[8] कबीर के पश्चात भी अकबर के समय में दिल्ली का अंतिम राजा हेमू बक्काल (बनिया) था।

“दसवीं सदी में व्यापार का पुनरोदय हुआ था। मनु महिमा का पुनरोदय वॉरेन हेस्टिंग्स की कृपा से जब ग्यारह ब्राह्मणों की कमेटी ने 1773 से 1775 तक ओरियंटलिस्ट नथानियल ब्रासी हलहेड की अध्यक्षता में हिंदू विधि यानी हिंदू लॉ को सूचीबद्ध किया।” फिर विलियम जोंस द्वारा पंडितों के सहयोग से ‘मनुस्मृति’ का पाठ “दी इंस्टीट्यूटस ऑफ हिंदू लॉ आर दी आर्डिनेंसेज ऑफ मनु” प्रकाशित हुआ। गवर्नर जनरल जॉन शोर रोमांचित थे कि ब्राह्मण विद्वानों द्वारा हिंदू विधि का निर्माण एक अंग्रेज के ‘निर्देशन’ में किया गया।[9]

अब कबीर को ही लेकर कैसी भ्रांतियां बनाई गयीं, उसका उदाहरण भी अजीब है। कबीरपंथी इस बात को मानते हैं कि कबीर का लालन-पालन नूर अली नामक जुलाहे के यहां हुआ। उसकी माता का नाम नीमा था। किंतु हिंदुओं के दृष्टि से इसमें दो दोष होते– पहला वह एक मुसलमान होता और दूसरा जुलाहे को नीच जाति माना जाता है। इसलिए हिंदुओं ने इन दोषों से छुटकारा पाने के लिए उनकी असली मां को विधवा ब्राह्मणी बताया गया और बाद में उन्हें चमत्कारी ढंग से उत्पन बताया गया।[10]

फोर्ट विलियम कॉलेज के विलियम प्राइस ने नेटिव कोर के दुभाषियों के प्रयोगार्थ एक संकलन 1827 में तैयार किया। इसे उन्होंने ‘नामादास का कबीर’ विषयक पुस्तक छपवाया और उसमें एक टीका भी शामिल थी। कबीर के जन्म प्रसंग के बारे में यह टीका बतलाती है–

“गुरू रामानंद की सेवा में एक ब्राह्मण तत्पर रहे दोऊ बेर दर्शन करै एक कन्या बाल रंडा रहे वह कहै मो कूं दर्शन कराओ एक दिन लै गए दर्शन कर प्रणाम किया, स्वामी जू ने आशिर्वाद दिया, पुत्रवती हो। ब्राह्मण बोला यह तो बाल रंडा महाराज। स्वामी बोले मेरा वचन व्यर्थ नहीं पुत्र हो गया गर्भ न जाना जाएगा कलंक न लगैगा जगत के जीवन का उद्धार करैगा सो रामानंद स्वामी के वचन सो गर्भ रहा दश महीने पर भया, लहर तलाब में डारि आई। अली जूलाहा ने पाया– सो पाला वही कबीर भया।”[11]

इसके पहले बालक दास के अनुसार कबीर की मां को किसी बनिया स्त्री को होना था, लेकिन दुर्भाग्यवश जब रामानंद ने उस स्त्री को प्रातः काल आने को कहा तो अभागी ने रामानंद को भोजन भात के लिए किसी ब्राह्मणी को भेज दिया। उस स्त्री को आते देख स्वामी जी ने दूर से ही हरिभक्त पुत्र की मां बनने का आशीर्वाद दे दिया। वही बच्चा विधवा ब्राह्मणी के कोख से जन्म लेने और त्याग दिए जाने के कारण कबीर बना।[12]

अब सवाल उठता है कि क्या शूद्र या दलित व्यक्ति ज्ञानी और महान नहीं हो सकता? उसके लिए क्यों जरूरी लगता है कि उसका रक्त या पूर्व जन्म सवर्ण या ब्राह्मण ही हो। जबकि उस भक्ति आंदोलन में कर्मकांड के विरोध का स्वर देने वाले सारे निर्गुण संत निम्नकुल से ही थे।

दरअसल 18वीं और 19वीं सदी में अंग्रेजों से मिलीभगत कर ब्राह्मणों ने मनुस्मृति को पुनर्जन्म दिया। इसके पहले यह बस एक स्मृति थी। 1794 ई. में अंग्रेज बहादुर द्वारा कराए गए हिंदू विधि निर्माण ने मनुस्मृति को न सिर्फ पुनर्जीवित किया वरन् हिंदुओं के एकमात्र स्रोत के रूप में स्थापित कर दिया।[13]

अयोध्या प्रसाद ‘हरिऔध’ अपनी पुस्तक ‘कबीर वचनावली’ में मानते हैं कि विधवा ब्राह्मणी वाली कथा सही है। यह कोई नहीं कहता कि कबीर साहेब नीमा और नीरू के पुत्र थे। रामचंद्र शुक्ल को कबीर की बातों में कोई दार्शनिकता नहीं दिखती। वो बड़थ्वाल जी कबीर को जुलाहा वंश में जन्मे मानते है।[14]

हजारी प्रसाद दिवेदी का कहना है कि कबीर अपने को बार-बार जुलाहा कहा है, कोरी कहा है, लेकिन कभी अपने को हिंदू या मुसलमान नहीं कहा है।[15]

एफ.ई. केइ ने अपनी शोध पुस्तक में लिखा है कि निस्संदेह कबीर एक मुस्लिम नाम है। कुछ हिंदू कहते हैं कि यह कर-वीर है, कर (हाथ) वीर (नायक) और इसके व्याख्या मां के हथेली से प्रकट होने के रूप में की गई है। लेकिन इस व्युत्पत्ति को कोरी कल्पना कह कर खारिज किया जा सकता है।[16] अबुल फ़जल ने ‘आईना-ए-अकबरी’ में कबीर को ‘मुवाहिद’ बताया है। मुसलमान होने के लिए मुवाहिद (एकेश्वरवादी) व्यक्ति ही मुसलमान कहा जा सकता है। जो कबीर नहीं थे और ‘अबुल फ़जल’ यह बात जानते थे। महाराष्ट्र के संत तुकाराम (1607-1649) भी कबीर को ‘मोमिन’ कहते हैं। यह शब्द मुस्लिम जुलाहे के लिए कहा गया लगता है।[17]

कबीर ने बार-बार अपने को जुलाहा कहा है। लगता है कि 15वीं-16वीं सदी में शूद्र कही जाने वाली जातियां विभिन्न कुटीर उद्योग में लगी थीं। इन छोटी जातियों के कारण भारतीय कुटीर उद्योग वस्त्र, तेल, गुड़, लोहे के समान, मिट्टी के बर्तन, सोना चांदी के काम, बुनकर, बढ़ई, कहार और चमार जैसी जातियां आत्मनिर्भर थीं। उत्पादन में उनकी हिस्सेदारी सबसे अधिक थी, इसलिए समाज में भी इनका मान-सम्मान जरूर रहा होगा। लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद सुनियोजित तरीके से कुटीर उद्योग का विनाश 1794 में मनुस्मृति को पुनर्जीवित करके जमींदारी प्रथा को सशक्त करके इन विभिन्न जातियों को हाशिए पर लाने का काम किया गया। अनेक दलित, आदिवासी और उन्हें मजबूर होकर बंधुआ मजदूरी पर उतरना पड़ा। अनेक लोगों पर बाद मे ‘अपराधी जाति, जनजाति अधिनियम-1871 व 1911’ सवर्णों के मिलीभगत से लगा दिया गया और उसका शोषण इनके द्वारा ज्यादती के हद तक हुआ।

इसलिए कबीर का समय व्यापारिक गतिविधियों के लिए अहम रहा होगा। भक्ति के लोकवृत्त में कबीर जैसे कवि अपने जीवन और कविता दोनों के जरिए व्यापार की ऐतिहासिक प्रगतिशीलता और व्यापारी के आत्मसम्मान का रेखांकन कर रहे थे। बौद्ध धर्म और जैन धर्म को भी ब्राह्मण वर्चस्व के विरोध में बहुजन का भरपूर समर्थन हासिल हुआ था।[18]

कबीर अंधविश्वास और पाखंड को मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। हिंदू और इस्लाम धर्म के पाखंड के प्रति कबीर का विद्रोह इस बात का संकेत है कि कबीर आडंबरहीन, निर्गुण ईश्वर की आराधना में लीन थे। कबीर का विरोध करने वाले विशेषकर ब्राह्मण थे। कबीर जिस तरह हिंदू धर्म के संस्कारों और प्रथाओं का विरोध कर रहे थे, अपनी अलग सैद्धांतिक धारा चला रहे थे, उससे ब्राह्मणों के प्रभाव और सम्मान पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था। यही ब्राह्मणों की नाराजगी का कारण था। कबीर कहते थे कि ब्राह्मण आध्यात्मिक सत्य की अज्ञानता के कारण मुक्ति का मार्ग दिखाने में विफल रहे। कबीर कहते हैं–

“तूं ब्राह्मण, मैं काशी का जुलाहा।
मुहि तुहि बराबरी कैसे कै बनहि।
हमरे राम नाम कही उबरो वेद भरोसे पांडे डूब मरहि।”[19]

“कबीर अपनी जाति से भागने के बजाए वर्ण-व्यवस्था के मूल तर्क पर प्रहार करते हैं। वे जानते हैं कि जन्मजात पूज्यता और अपूज्यता को सिरे से खारिज किए बिना न वास्तविक नैतिकता की पराकाष्ठा संभव है, न उत्तरदायी व्यक्तित्व की। कबीर जाति पर आधारित सम्मान-असम्मान की धारणा को समाप्त करने की लड़ाई लड़ रहे थे।[20]

दूसरी तरफ हिंदी पट्टी से परे भी गुजरात, महाराष्ट्र इत्यादि इलाके में छाई कबीर की लोकप्रियता से तुलसीदास घबराए दिख रहे थे। इसलिए ‘मानस’ में तुलसीदास स्वयं के मुख से कहलवाया कि–

“पूजहि विप्र सकल गुण हीना।
शूद्र न पूजहूं वेद प्रवीणा।।”

कबीर की लोकप्रियता और उनकी दृढ़ता के आगे ब्राह्मणवाद अत्यंत क्षुब्ध और असहाय प्रतीत होता है। कबीर ने मूर्ति-पूजा ही नहीं, हिंदू और मुसलमानों की अनेक प्रथाओं का दृढ़ता से विरोध किया, जो केवल बाह्य आडंबर और अंधविश्वास थीं। उन्होंने तीर्थ, अनुष्ठान, शुद्धि, उपवास, जनेऊ, खतना, कंठीमाला आदि अनेक आडंबरों का खंडन किया। कबीर किसी भी रूप में जीव हत्या के पाप के विरुद्ध थे और बहुत सख्ती से अहिंसा के सिद्धांत को मानते थे। वे हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के द्वारा पूजा में बलि चढ़ाने के विरुद्ध थे। वे वेद, पुराण और कुरान आदि धर्म ग्रंथों पर विश्वास नहीं करते थे।[21]

योग यज्ञ जप संयमा तीरथ व्रतदाता।
नवधा वेद किताब है झुठे का वाता।।
काहू को शद्धै फुरै काहू करमाती।
मान बड़ाई लै रहै हिंदू तुरुक दुजाती।।

कबीर और तुकाराम आधुनिकता का पूर्वाभाष देने वाले कवि है। ऐतिहासिक रूप से कबीर ने न तो कोई नया धर्म चलाया और न कोई निराला पंथ निकाला। उनके सौ साल बाद कबीरपंथ स्थापित हुआ। काशी के तुरंत बाद नाम आता है सुरति गोपाल साहब का। ये वही पंडित सर्वजीत थे, जो कबीर को शास्त्रार्थ में परास्त करने की इच्छा लेकर दक्षिण से आए और कबीर के शिष्य बन गए। इसका मतलब है कि कबीर की ख्याति ना सिर्फ हिंदी पट्टी, वरन् मुख परिचय और दक्षिण भारत तक फैला था, ऐसा लगता है।[22]

किवदंतियों के अनुसार कबीर बहुत बड़े घुमक्कड़ थे, उन्होंने दुरस्थ स्थानों, जैसे वलख और बुखारा तक की यात्राएं की थी। कहा जाता है कि शेख तकी से मिलने एक दिन वह झूंसी गए। कबीर और शेख तकी समकालीन और एक दूसरे के मित्र जैसे लगते हैं। यह भी कहा जाता है कि गुरु नानक ने कबीर से भेंट की थी और वह उनके साथ काफी स्नेह और सम्मानपूर्वक पेश आए। गुरु नानक देव का जन्म 1469 ई. और मृत्यु 1539 ई. बताई जाती है। इससे पता चलता है कि कबीर 15वीं सदी के अंत तक स्वस्थ जीवन जी रहे होंगे।[23]

ऐसा प्रतीत होता है कि कबीर के मुखर विरोध और आडंबरों पर कुठाराघात के कारण रूढ़िवादी हिंदू और मुसलमान दोनों ही उसके विरोधी हो गए। कबीर की बढ़ती लोकप्रियता और विरोधी स्वर को रोकने के अन्य तरीके जब कारगर नहीं हुए तो लोगों ने अपने सुल्तान से अपील करने का निश्चय किया। सिकंदर लोदी ने 1495 ई. में जौनपुर का दौरा किया तो कबीर विरोधियों ने शिकायत की।[24]

मुल्ला पंडितों की शिकायत है कि–

निदै सकल धरम की आसा।
पट दर्शन अरु बारह मासा।।
ऐसी विधि सब लोक विरागा।
हिंदू मुसलमान तै न्यारा।।
ता तैं हमैं माने ना कोई।
जब लग जुलाहा कासी होई।।

अर्थात, कबीर ने मुसलमान होते हुए भी मुसलमानों की रीति-रिवाज को त्याग दिया है। हिंदुओं की रीति-रिवाज की भी निंदा करता है। वेद, तीर्थ, नवग्रह, व्रत, श्राद्ध सभी की निंदा करता है। पूज्य ब्राह्मणों की निंदा करता है। इस कबीर ने लोगों को बिगाड़ दिया है, इसको काशी से निकाला जाए। इसके काशी रहते हमारी कोई सुनने वाला नहीं है। असली संकट तो यही है कि “ता तैं हमैं माने ना कोई।” इसका मतलब है कि कबीर की लोकप्रियता सिर्फ हाशिए तक सीमित रहती तो लोग निपट लेते। किसी धर्म स्थापना की आवाज होती तो शायद एडजस्ट कर लेते। लेकिन “ये तो धर्म सत्ता के विरुद्ध मनुष्य की सत्ता की आवाज है।” यह विवेकवान व्यक्ति की सत्ता और आवाज है तथा जो व्यक्ति आवाज दे रहा है, उस पर न तो प्रलोभन का असर है, न समझाने बुझाने का– यह आदमी खतरनाक है। ऐसे खतरनाक आदमी के विरुद्ध हिंदू-मुसलमान के प्रतिनिधि एक हैं, और उनका माई-बाप भी एक ही है दिल्ली का सुल्तान।[25]

हो सकता है कि कबीर को सिकंदर लोदी द्वारा अनेक यातनाएं दी गई हों। लेकिन कबीर पर उसका कोई असर न होता देख सुल्तान सिकंदर ने कबीर से क्षमायाचना मांगी।

साचा राम कबीर तुम्हारा।
अब कै राख्यो जीव हमारा।।
काजी मुल्ला मरम न जाने।
सिर जन हार तुम्हारी मानै।।

सिकंदर ने कबीर को भेंट देनी चाही, लेकिन दृढ़ता से कबीर ने अस्वीकार कर दिया– “जो मांगे सो भगत न होई। मन दिढ़ राखै निज जन सोई।”[26]

यह मान्यता है कि काशी में मरने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति होती है और मगहर में मरने पर गधा योनि में जन्म लेना पड़ता है। लेकिन काशी में मरने पर स्वर्ग मिलता है, जैसी मान्यता को कबीर ने व्यवहारिक चुनौती दे डाली।

लोका मति के भोरा रे।
जो कासी तन तजै कबीरा, तो रामहि कौन निहोरा रे।।

अर्थात, काशी में ही मरना अगर स्वर्ग प्राप्ति की गारंटी है तो राम (ईश्वर) को क्यों निहोरा करें। तब ही रामहि (निर्गुण राम) बेकार हरी। कबीर मगहर में ही मृत्यु को प्राप्त हुए।

इस बात की बिल्कुल संभावना है कि सुल्तान के फरमान के कारण कबीर को बनारस छोड़कर मगहर जाना पड़ा हो। चाहे कबीर को सजा के तौर पर बनारस से निष्कासित किया गया हो, या उन्होंने अपने बुढ़ापे में शांतिपूर्ण स्थान की खोज में स्वयं बनारस छोड़ा हो, लेकिन हिंदुओं के बीच मगहर अमंगल स्थान माना जाता था। किंतु कबीर का मानना था कि स्थान कोई अपवित्र, अमंगल नहीं होता, बल्कि मनुष्य का ईश्वर से संबंध महत्वपूर्ण होता है।[27]

कबीर मध्यकाल से बहुत आगे आधुनिक और क्रांतिकारी थे। उन्होंने धर्म से ईश्वर को बिल्कुल अलग कर दिया और निर्गुण ईश्वर को भजते हुए यह बतलाया कि ईश्वर किसी आडंबर, रीति-रिवाज और दान दक्षिणा, पशुबलि, हिंसा, सम्प्रदायवाद और धार्मिक कहे जाने वाले किताबों से परे है। वह तो मनुष्य के हर सद कर्मों में है। ‘कबीर शायद संसार के कुछेक संतों में हैं या अकेले हैं, जो मुसलमान होते हुए भी मुसलमान नहीं हैं और न हिंदू हैं।’ बस हैं तो मानवतावादी और कहते हैं–

“एक निरंजन अलह मेरा, हिंदु तुरक दहू नहीं नेरा॥
राखूँ ब्रत न मरहम जांनां, तिसही सुमिरूँ जो रहै निदांनां।
पूजा करूँ न निमाज गुजारूँ, एक निराकार हिरदै नमसकारूँ॥”[28]

[1] विजय कुमार, सिकंदर लोदी का इतिहास, 2020
[2] पुरुषोत्तम अग्रवाल, ‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’, राजकमल पेपर बैक्स, चौथा संस्करण पृष्ठ 19
[3] वही, पृष्ठ 19 
[4] एफ. ई. केइ, ‘कबीर और कबीर पंथ’ (अनुवाद कंवल भारती), फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली
[5] पुरुषोत्तम अग्रवाल, पूर्व में उद्धरित, पृष्ठ 22
[6] वही, पृष्ठ 25
[7] वही, पृष्ठ 29
[8] वही, 39-34
[9] वही, 75-76
[10] एफ.ई. केइ, पूर्वोक्त, पृष्ठ 59
[11] पुरुषोत्तम अग्रवाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ 169
[12] वही, पृष्ठ 165
[13] वही, पृष्ठ 160
[14] वही, पृष्ठ 159-760
[15] वही, पृष्ठ 158
[16] एफ.ई. केइ, पूर्वोक्त, पृष्ठ 59-60
[17] पुरुषोत्तम अग्रवाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ 164
[18] वही, पृष्ठ 51
[19] एफ. ई. कई, पूर्वोक्त, पृष्ठ 72-73
[20] पुरुषोत्तम अग्रवाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ 38
[21] एफ. ई. केइ, पूर्वोक्त, पृष्ठ 108
[22] पुरुषोत्तम अग्रवाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ 70
[23] एफ. ई. केइ, पूर्वोक्त,  पृष्ठ 202
[24] पुरुषोत्तम अग्रवाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ 193-194
[25] वही, पृष्ठ 194
[26] वही, पृष्ठ 195
[27] वही, पूर्वोक्त, पृष्ठ 75
[28] पंडित श्यामसुंदर दास, कबीर ग्रंथावली,  पद संख्या 338

(संपादन : समीक्षा/नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया
बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 
दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 
महिषासुर एक जननायक’
महिषासुर : मिथक व परंपराए
जाति के प्रश्न पर कबी
चिंतन के जन सरोकार

लेखक के बारे में

देवेन्द्र शरण

लेखक रांची विश्वविद्यालय, रांची के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘शेड्यूल्ड कास्ट्स इन दी फ्रीडम स्ट्रगल ऑफ इंडिया’ (1999), ‘भारतीय इतिहास में नारी’ (2007), ‘नारी सशक्तिकरण का इतिहास’ (2012) और ‘मेरे गीत आवारा हैं’ (काव्य संग्रह, 2009) शामिल हैं।

संबंधित आलेख

दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास (पांचवीं कड़ी का अंतिम भाग)
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस...
दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास (तीसरा भाग)
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस...
दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास (दूसरा भाग)
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस...
हिंदी नवजागरण के मौलिक चिंतक पेरियार ललई सिंह
सनद रहे कि यदि दलित नायकों पर केंद्रित उनके नाटक हिंदी क्षेत्र में दलित-चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे तो वहीं...
संस्मरण : गाेरखपुर में राजेंद्र यादव
नब्बे के दशक में वे एक बार गोरखपुर आए थे। गोरखपुर विश्वविद्यालय में तब प्रेमचंद पीठ की स्थापना हुई थी। इसके निदेशक प्रो. परमानंद...