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बहस-तलब : सुनीता खाखा पर अत्याचार के मामले में चुप्पी क्यों?

बीते दिनों झारखंड की राजधानी रांची में एक आदिवासी लड़की सुनीता खाखा के साथ प्रदेश भाजपा की एक महिला नेता द्वारा क्रूरतापूर्ण व्यवहार का मामला सामने आया। इस मामले के विभिन्न आयामों के बारे में बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

झारखंड में भाजपा की बेटी बचाओ, बेटी पढाओ” अभियान की प्रमुख सीमा पात्रा को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। वह एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी की पत्नी हैं। उनके ऊपर एक आदिवासी लड़की के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने का आरोप है। लेकिन पारपंरिक मीडिया इस पूरे मामले में एक दूसरी ही तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है। वह जो खबरें चला रहा है, उसके केंद्र में सीमा पात्रा को ‘विचारवान’ और ‘ईमानदार’ आदि दिखलाने की कोशिशें हैं।

सीमा पात्रा द्वारा आदिवासी लड़की की क्रूर यातना की कहानी अभूतपूर्व लगती हैलेकिन निश्चित रूप से यह दर्शाती है कि हम अपने घरों में घरेलू कामगारों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। तथ्य यह है कि अधिकांश कुलीन वर्ग के अधिकारी उन्हें घरेलू नौकरों के रूप में कम वेतनवाली नौकरियों पर रखते हैं, जो वास्तव में इस उम्मीद में सब कुछ करने के लिए मजबूर होते हैं कि वे एक दिन स्थायीबन जाएंगे।

झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और बंगाल के गरीब प्रवासी हमारे प्रमुख शहरों में घरेलू क्षेत्र में योगदान करते हैं, जो कि एक प्रकार से बहुत बड़ा असंगठित क्षेत्र है। ये लोग अक्सर शोषण का शिकार होते हैं, क्योंकि अधिकांश किसी भी बदले की प्रतिक्रिया के डर से अपनी पहचान और पता बताने मे भी डरते हैं। वैसे भी आदिवासी लड़कियां उस नेटवर्क का हिस्सा बन जाती हैं जो मध्यम वर्ग के घरों में घरेलू कामगारों की आपूर्ति करती है। ये तथाकथित सभ्य लोगों की अपने घरेलू कामगारों को अपने शौचालय में या कुत्तों के साथ रखने की कहानियां नई नहीं हैं। आदिवासियों के साथ दुर्व्यवहार स्पष्ट रूप से भारत के मध्यम वर्ग या शुद्ध रूप से उच्च वर्णीय लोगों की धमकाने और शोषण की प्रवृत्ति को दर्शाता है, जो अपने घरेलू सहायकों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान नहीं करना चाहता, लेकिन उनकी आर्थिक कमजोरियों का फायदा उठाकर ऐश करना चाहता है। इनमें से अधिकांश ‘भक्त’ प्रवृत्ति के हैं और सभी राष्ट्रवादीअभियानों में सबसे आगे रहते हैं। इसलिए मैं कहता हूं कि हम भारतीय प्रतीकवाद के विशेषज्ञ हो गए हैं। वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे सेना में शामिल हों, लेकिन सीमा पर लड़ रहे फौजियों की तुलना में अपने को अधिक देशभक्त दिखाना चाहते हैं क्योंकि टीवी पर देशभक्ति एक बड़े प्रीमियम के साथ आती है। इसी तरह, स्वच्छ भारत अभियान, इस भ्रष्ट मध्यम वर्ग या विशुद्ध रूप से सवर्ण जातियों के लिए महज शो-पीस बन कर रह गया, जिनमें से अधिकांश ने कभी भी कूड़ावालाया सफाई कर्मचारियों की परवाह नहीं कीजो रोजाना अपनी सड़कों की सफाई करते हैं या उनकी गंदगी उठाते हैं। यह अभियान तस्वीरें लेने और मोदी जी को भेजने का कार्यक्रम बन गया ताकि वे दूसरों की तुलना में अधिक आज्ञाकारी दिखें। 

रांची के रिम्स अस्पताल में किया जा रहा है पीड़िता सुनीता खाखा का इलाज

झारखंड के रांची शहर में भाजपा की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की प्रमुख सीमा पत्र की कारिस्तनी के बारे में बात करते हैं।

रांची के सफेदपोश इलाके अशोक नगर मे रिटायर्ड आईएएस अधिकारी महेश पात्रा अपनी पत्नी सीमा पात्रा और बच्चों के साथ रहते है। 

आदिवासी लड़की सीमा कुमारी खाखा आईएएस अधिकारी की बेटी वात्सल्य के घर पर काम करती थी, जो उसे दिल्ली ले गई। जब वात्सल्य का रांची ट्रांसफर हुआ तो वह उसे रांची ले आई। यह संभवत: आठ से दस साल का अंतराल था। रांची वापस आने के बाद ही आदिवासी लड़की का शोषण शुरू हो गया और बताया जाता है कि उसके दांत तोड़ दिए गए। सीमा पात्रा पर आरोप है कि उसने आदिवासी लड़की को गरम तवे से जलाया और ऐसा बताया जाता है कि वह लड़की अब चलने फिरने की स्थिति मे भी नहीं थी। ऐसे में यदि उसने पेशाब कर दिया और वह पेशाब यदि सीमा के कमरे तक आ गया तो वह उससे जीभ से चटवाती थी। मतलब यह कि यह मामला हैवानियत का है। लेकिन कहीं पर भी सीमा पात्र को दंडित करने की बात नहीं कही जा रही है। 

ऐसी शर्मनाक हरकत पर भाजपा केवल यह कोशिश कर रही है कि सीमा पात्रा को मात्र आईएएस की पत्नी बताया जाए और पार्टी से उनके संबंध को लोगों तक न बताया जाए। जबकि उसके भाजपा के बड़े बड़े नेताओ से सीधे संपर्क थे और वह भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य भी है।

केंद्रीय अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री अर्जुन मुंडा के साथ आरोपी सीमा पात्रा (सबसे बाएं)

इस घटना की जानकारी कभी नहीं मिलती यदि सीमा पात्रा का बेटा आयुष्मान इसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाता। उसने अपनी मां की करतूत के विषय में अपने एक दोस्त को बताया। जब आयुष्मान अपने घर मे सुनीता पर अत्याचारों का विरोध कर रहा था तो उसकी मां ने उसे ही मानसिक रूप से अस्वस्थ बताते हुए मनोरोग अस्पताल मे भर्ती करवा दिया। बेटे को डर था कि मां सुनीता को और अधिक टॉर्चर कर रही होगी तो उसने अपने दोस्त आनद विवेक को इस विषय मे जानकारी दी और उसे सुनीता की मदद करने को कहा। बहुत मेहनत करके आनंद विवेक ने सुनीता से संपर्क किया और पुलिस में शिकायत दर्ज की। जब घटना का विडीयो वाइरल हो गया तो झारखंड पुलिस को भी एक्शन में आना पड़ा और सुनीता को अस्पताल मे भर्ती करवाया गया। सीमा पात्रा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 323/325/346/374 के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज की गई। 

हालांकि काफी मशक्कत के बाद सीमा पात्रा को गिरफ्तार किया गया है, लेकिन क्या यह मामला उन लोगों को लिए मिसाल बन सकेगा, जो अपने घरेलू कामगारों के साथ क्रूर व्यवहार करते हैं? वैसे एक सवाल यह भी क्या सुनीता पर हिंसा केवल घरेलू कामगारों पर हिंसा थी या आदिवासी लड़की पर हिंसा थी या यह सीमा के अंदर की गहरी ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति का संकेत करती है, जिसके कारण उसे सुनीता से घृणा करने का मानसिक आनंद मिलता रहा? मेरे विचार में इस मामले की न केवल कानूनी जांच हो अपितु सीमा पात्रा और उसके पूरे परिवार की मानसिक परीक्षण भी हो ताकि यह पता चल सके कि जातिगत अहंकार कैसे लोगों में दलितों व आदिवासियों के प्रति घृणा पैदा करता है। 

अब जैसा कि मीडिया में प्रकाशित रपटें बता रही हैं कि सीमा पात्रा के बेटे आयुष्मान ने वास्तव में अपनी मां के कुकर्मों के खिलाफ एक दोस्त को बताया था। क्या सीमा पात्रा इसलिए सुनीता से घृणा कर रही थी कि आयुष्मान उससे अच्छे से बात कर रहा था? आखिर एक मां अपने ही बेटे को जबरन मनोचिकित्सालय क्यों भेजेगी? 

खैर, जो विडियो वायरल हुआ है, उसमें यह साफ दिखता है कि जातिवादी दिमाग कैसे काम करता है। आश्चर्यजनक यह कि इस मामले कोई अभियान सामने नहीं आया है। इस घटना पर हिंदुत्ववादी खामोश है। असल में वे केवल उन कहानियों की तलाश करते हैं, जहां अपराध मे एक मुसलमान शामिल होता है। 

क्या हमारे प्रधानमंत्री जी सुनीता खाखा की घटना के बारे में बात करेंगे? वह अपने मन की बात कार्यक्रम मे अलग-अलग सवाल पर बोलते रहे हैं, लेकिन अपने 8 वर्षों में अब तक उन्होंने किसी के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा है, जो इस तरह की क्रूरता और जातिगत या सांप्रदायिक हिंसा से पीड़ित है। उन्होंने स्वच्छ भारत की चर्चा की, लेकिन एक शब्द भी स्वच्छकार समाज के उत्थान अथवा कल्याण पर नहीं बोले। रोहित वेमुला से लेकर पायल तड़वी तक और अब सुनीता खाखा, भाजपा या प्रधानमंत्री अपनी आंखे मूंद लेते है। 

झारखंड सरकार को इस मुद्दे को तार्किक निष्कर्ष पर ले जाना चाहिए। सवाल यह नहीं है कि पीड़िता आदिवासी लड़की को मुआवजा मिलेगा या नहीं, लेकिन दोषी को सजा बेहद जरूरी है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्याभूषण रावत

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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