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इलाहाबाद विश्वविद्यालय : निशाने पर शुल्क वृद्धि का विरोध करने वाले प्रो. विक्रम हरिजन

प्रो. विक्रम के मुताबिक, डेनमार्क, स्वीडन, फिनलैंड, इटली, स्पेन, चेक रिपब्लिक आदि देशों में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक बिल्कुल मुफ्त है। देशों का मानव विकास सूचकांक देखेंगे या खुशहाली सूचकांक देखेंगे तो यही देश आगे हैं। पढ़ें, उनसे सुशील मानव की बातचीत

पिछले एक महीने से लगातार इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के छात्र शुल्क वृद्धि का विरोध कर रहे हैं। इस दौरान इविवि के छात्रों को विपक्षी राजनीतिक दलों के अलावा विभिन्न वर्ग के बुद्धिजीवियों का भी साथ व समर्थन मिला। लेकिन विश्वविद्यालय का कोई अध्यापक छात्रों के समर्थन में नहीं आया, सिवाय प्रो. विक्रम हरिजन के। प्रो. विक्रम के आगे आने के बाद छात्रों को लगा कि और अध्यापकगण समर्थन में आगे आएंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उलटे प्रो. विक्रम के ऊपर अनुशासनात्मक कार्रवाई की तलवार लटक गई है। अंदरखाने की सूचना यह है कि कुलपति प्रो. विक्रम के इस रवैये से बेहद ख़फ़ा हैं और इस बात को लेकर एक बैठक हुई जिसमें उनके ऊपर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने और बर्खास्त करने की चर्चा हुई। हालांकि बैठक में कुछ अध्यापकों ने कहा कि दंडात्मक कार्रवाई करने से बचा जाना चाहिए, क्योंकि अभी सारे छात्र उनके साथ हैं।

 

जब मीडियाकर्मियों ने पूछा– आपको डर नहीं लगता?

इस पूरे मसले को लेकर फारवर्ड प्रेस से बातचीत में ने प्रो. विक्रम ने बताया कि फ़ीस वृद्धि मामले में छात्रों के साथ खड़े होने के बाद तमाम अख़बार के पत्रकारों ने उनसे पूछा कि– “आपको डर नहीं लगता।” इस तरह के सवाल से मीडिया मुझे डराने की कोशिश कर रही है। वो मेरे दिमाग में यह डाल देने की कोशिश कर रहे हैं कि मुझे डरना चाहिए। अगर डर ही सब कुछ है तो देश और यूनिवर्सिटी कैसे तरक्की करेंगे। वे कह रहे हैं कि मुझे अपने छात्रों के साथ खड़े होने के लिये भी डरना पड़ेगा। 

अलग थलग कर दिये गये प्रो. विक्रम

छात्र आंदोलन में खुलकर छात्रों के साथ आने और प्रतिक्रिया में कुलपति की अगुवाई में अनुशासनात्मक कार्रवाई पर चर्चा के लिये बैठक होने के बाद प्रो. विक्रम कैंपस में अलग थलग कर दिये गये हैं। अब कोई भी प्रोफेसर उनके साथ नहीं दिखना चाहता। सबको कार्रवाई का डर है। क्या आप दलित होने के नाते, फिर शिव पर विवादित टिप्पणी के नाते पहले से ही अलग थलग थे या ताजा प्रकरण से अलग थलग कर दिये गये हैं? यह पूछने पर प्रो. विक्रम कहते हैं – “हां, कुछ तो पहले से ही था, परंतु फिर भी इतना तो था ही कि मिलने पर औपचारिक अभिवादन हो जाता था। लेकिन शुल्क वृद्धि वाले मसले पर छात्रों के साथ खड़े होने पर अब ज़्यादा हो गया। पहले यह था कि लोग मुद्दे को रफ़ा-दफ़ा करना चाहते थे। एससी/एसटी की जाति देखकर नंबर देने वाले मसले में चूंकि यह मसला यूनिवर्सिटी कमीशन के बीच में था तो ठीक था। लोगों ने उतना टारगेट नहीं किया। लेकिन अभी मामला बदल गया है। लोगों को यह अनुशासनहीनता का मामला लगता है और उन्हें अपनी नौकरी की चिंता है। मेरे शुभचिंतक भी अब कहते हैं कि सारी गलती आपकी है। आपको अपनी नौकरी की चिंता नहीं है। उनका कहना है कि शुल्कवृद्धि बच्चों का मसला था तो बच्चे लड़ते। चूंकि मैं हमेशा स्थापना के ख़िलाफ़ चला जाता हूं, इसलिये अधिकांश अध्यापक मुझसे दूरी बनाकर रखते हैं। 

बच्चों का गर्जियन समझता हूं ख़ुद को

बच्चों की बात करते हुये प्रो. विक्रम थोड़ा भावुक हो जाते हैं। कहते हैं कि बच्चे अपने मां बाप से दूर यहां पढ़ने आते हैं, तो यहां उनका कौन है। स्वाभाविक तौर पर अध्यापक ही उनका गार्जियन है। मैं खुद को बच्चों का गर्जियन मानता हूं। मेरे पास ऐसी हजारों घटनाएं हैं, जब बच्चे शुल्क नहीं भर पाने के चलते पढ़ाई छोड़कर चले जाते हैं। एक छात्र था नाम लिखाने के बाद कुछ दिन आया, फिर नहीं आया। अचानक एक दिन आया तो बताने लगा कि पैसे की दिक्कत है, पापा बीमार हैं। मुझे लगा लड़का झूठ बोल रहा है। मैंने कहा कि पिता को साथ लेकर आना। जब वो अपने पिता को साथ लेकर आया तो उन्हें सही में टीबी की बीमारी थी। वे ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे। मुझे बहुत ग्लानि हुई कि एक बीमार आदमी को नाहक ही बुलवाया। कुछ दिन बाद वह छात्र फिर ग़ायब हो गया। महीनों बाद आया तो बताया कि उसके पापा गुज़र गये। मैंने उसकी शुल्क भरी और अन्य आवश्यकताओं के लिये भी पैसे दिये। साथ ही मैंने ज़ोर दिया कि पढ़ाई का पूरा खर्चा मैं दूंगा, पर पढ़ाई मत छोड़ना। कुछ दिन बाद फिर आया तो बताया कि समोसा-चाय की दुकान कर ली है। घर-परिवार का खर्चा नहीं चल पा रहा है। तो हर शिक्षक को यह समझना चाहिये की हर बच्चे की अलग-अलग समस्या और जिम्मेदारियां होती हैं। उन्हें निभाने में वे परेशान हो जाते हैं।

छात्रों के साथ शुल्क वृद्धि का विरोध करते प्रो. विक्रम हरिजन (बाएं से तीसरे)

छात्र बनकर जो सीखा, वह प्रोफ़ेसर बनकर कैसे छोड़ दूं? 

प्रो. विक्रम ने अपनी उच्च शिक्षा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से हासिल की है। वह बताते हैं कि उनके जमाने में जब कभी जेएनयू में शुल्क वृद्धि का मामला होता था तो छात्र के साथ अध्यापक व कर्मचारी तीनों मिलकर विरोध करते थे। वहां छात्रों के किसी भी मसले को ‘छात्रों का मसला’ कहकर अध्यापकों द्वारा दरकिनार नहीं किया जाता था। लेकिन यहां इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर सोचते हैं कि यह मैटर हमारा नहीं है। वे डरे हुए हैं, इसलिये खुलकर नहीं आ रहे कि कोई कार्रवाई न हो जाये उनके खिलाफ़। प्रो. विक्रम प्रतिप्रश्न करते हैं कि जेएनयू में एक छात्र के नाते मुझे जो कुछ सीखने को मिला उस सीख को मैं प्रोफेसर बनकर कैसे छोड़ दूं?

क्या अब भी मानते हैं कि शुल्कवृद्धि का फैसला ग़लत है?

प्रो. विक्रम फ़ीस वृद्धि के फैसले को ग़लत बताते हुए कहते हैं कि इलाहाबाद के आसपास के समाज को समझा जाना चाहिए। यहां ज़्यादातर निम्न व निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों से बच्चे आते हैं। इनमें अधिकांश दलित व पिछड़ी जातियों के हैं। दूसरी बात यह कि यहां विश्वविद्यालय में हाउस रेंट बहुत ज़्यादा है। 

प्रो. विक्रम शुल्क भरने के मामले में अपने कुछ निजी अनुभव साझा करते हुये कहते हैं कि ऐसे कई घटनाएं हुई हैं, जब बच्चों के पास शुल्क भरने को पैसे नहीं थे और वो दुखी, उदास, हताश उनके पास आये और उन्होंने कई बच्चों की शुल्क भरे हैं। वो कहते हैं यह तब था जब शुल्क नहीं बढ़ी थी। अब तो 400 गुना शुल्क बढ़ा दी गई है। एक आदमी अपनी बेटी का बीएससी में एडमिशन इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से संबद्ध कॉलेज में महज शुल्क की वजह से नहीं करवा पाया। मुझे बाद में पता चला तो दुख हुआ। वे रूसो और आंबेडकर के हवाले से कहते हैं बच्चों को शुल्क की फ़िक्र ही क्यों करनी पड़े? उन्हें पढ़ने के बारे में सोचने दिया जाय न कि शुल्क के बारे में। शिक्षा और यूनिवर्सिटी को पब्लिक ही रहने दिया जाये, उसे कार्पोरेटाइज न किया जाये। वो शिक्षा के अपने निजी संघर्ष के बारे में बताते हैं वो खुद जेएनयू में इसलिये पढ़ पाये, क्योंकि वहां शुल्क महज 120 रुपए थी। शिक्षा महंगी होती तो वह नहीं पढ़ पाते। 

 प्रो. विक्रम इवान इलिच के ‘डीस्कूलिंग’ का कांसेप्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि बच्चों को स्कूल में पढ़ाना दरअसल उन्हें कमज़ोर बनाना है। हम उन्हें रैशनल नहीं बनाते और अंधविश्वास में धकेलते हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली के तहत यूनिवर्सिटी से गुलाम पैदा किये जाते हैं। अध्यापक भी गुलाम होते हैं। उन्हें यूजीसी और हायर शिक्षा निदेशालय के गाइडलाइंस को मानना होता है। वैसे तो गाइडलाइंस ठीक है लेकिन यदि रेशनल सोच रखने से गाइडलाइंस को दिक्कत होती है वो हमारी स्वतंत्रता को रोकती है, तब ठीक नहीं है।

अनुदान के लिये बच्चों पर नहीं अध्यापकों पर दबाव डालना चाहिए

प्रो. विक्रम कहते हैं अद्यतन राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी टॉप 200 की सूची से बाहर है और जेएनयू प्रथम पांच की सूची में है, क्योंकि जेएनयू में प्रोफ़ेसर रिसर्च सेमिनार करते है। इससे अनुदान मिलता है। अनुदान के लिये अध्यापकों के ऊपर दबाव बनाया जाना चाहिए न कि छात्रों पर कोई अतिरिक्त दबाव बनाया जाय। आज यूनिवर्सिटी का पैसा क्यों कट रहा है? यह समझा जाना चाहिए। यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) ने एक नई कमेटी गठित की है। राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यापन परिषद (नैक) ने अपने सात मापदंड बनाए हैं। उसके सातों मापदंड पर एक यूनिवर्सिटी को खरा उतरना चाहिए, और इसी के आधार पर मूल्यांकन परिषद यूनिवर्सिर्टी को ग्रेडिंग देती है। 

प्रो. विक्रम आगे कहते हैं कि हमारी (इलाहाबाद) यूनिवर्सिटी सातों मापदंडों पर खरा नहीं उतरती। इस कारण इसे बी+ ग्रेड मिला हुआ है। वहीं जेएनयू सातों मापदंडो पर खरा उतरता है। इसलिये उसके अनुदान कटते नहीं हैं। जब आप सेमिनार करते हैं तो उसका आयोजक के खाते में नहीं, बल्कि यूनिवर्सिटी के खाते में आता है। इससे यूनिवर्सिटी की रैंकिंग आगे बढ़ती है। अगर अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार हो तो उससे भी रैंकिंग आगे बढ़ती है। किसी प्रोफ़ेसर का इंटरनेशनल स्तर का जर्नल में पेपर छपता है तो उससे रैंकिंग बढ़ती है। जैसे किसी यूनिवर्सिटी ने कई चेयर बना दिया तो हर चेयर के हिसाब से पैसा आता है। जामिया में अलग अलग डिपार्टमेंट के सैंकड़ों सेंटर होंगे। मान लीजिये कि आंबेडकर चेयर बन गया तो भारत सरकार उसको यूनिवर्सिटी के हिसाब से लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक देती है। ये पैसे यूजीसी के अलावा आते हैं। आबेंडकर फाउंडेशन बाबा साहेब के विचारों को प्रमोट करने के लिये चेयर बनाता है। जेएनयू में इसका चेयर है, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में नहीं है। इसी तरह से जोतीराव फुले चेयर के लिये अलग से पैसे आते हैं। इंटरनेशनल ग्रांट आते हैं। 

प्रो. विक्रम ज़ोर देकर कहते हैं कि यदि आप इंटरनेशनल स्तर का सेमिनार करेगें तभी तो आपको पैसे मिलेंगे। तो इसमें कमी बच्चों की नहीं अध्यापकों की है। अध्यापक बच्चों को विश्वस्तरीय शोधार्थी नहीं बना पाते हैं। यदि यूनिवर्सिटी स्टूडेंट औऱ फैकल्टी मेंबर्स को इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के साथ एक्सचेंज प्रोग्राम, कॉन्फ्रेंस और वर्कशॉप और रिसर्च करने में पार्टिसिपेट करने का मौके देती है तो इसके लिये अंतर्राष्ट्रीय ग्रांट मिलता है। सेमिनार करवाने के ग्रांट मिलते हैं। प्रोजेक्ट लाने के लिए ग्रांट मिलते है। आप ऐसा माहौल बनाइये। यूनिवर्सिटी में रिसर्च होना चाहिये, सेमिनार होना चाहिए। छात्रों और अध्यापकों का इंटरनेशनल एक्सचेंज कार्यक्रम होना चाहिए तभी जाकर विश्वविद्यालय आगे बढ़ेंगे।

प्रो. विक्रम बताते हैं कि कैसे इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय का एक अंग होकर भी जी.बी. पंत सामाजिक संस्थान अलग नजर आता है। वहां रामचंद्र गुहा आते हैं, प्रभात पटनायक आते हैं। वहां पर जगजीवन राम चेयर की बात हो रही है। कुछ दिन पहले ही वहां ‘नायकों’ पर सेमिनार हुआ। वहां पर हमेशा रिसर्च और सेमिनार होते रहते हैं। वहां पर बद्री नारायण ने फोर्ड फाउंडेशन की ग्रांट पर दलित रिसोर्स सेंटर की स्थापना की थी। फोर्ड का ग्रांट करोड़-अरबों में आता है। क्या इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर फोर्ड पाउंडेशन की ग्रांट के लिये अप्लाई नहीं कर सकते? लेकिन शायद ऐसा माहौल नहीं मिल पा रहा है। इतना ज़्यादा भेदभाव, झगड़ा है, साल्व नहीं कर पाते। 

छात्रों के लिये हो परामर्श केंद्र व शिकायत निवारण प्रकोष्ठ

प्रो. विक्रम छात्रों के विकास के मसले पर कहते हैं कि बच्चों का विकास समग्रता में देखना चाहिए जिसकी हमारे यहां कमी है। एक बच्चा क्यों परेशान है, उसके लिये एक शिकायत निवारण प्रकोष्ठ बनना चाहिए। एक लड़की की जो समस्या है, जो वो अपने माता पिता से नहीं कह पाती, उसके लिये काउंसिलिंग की व्यवस्था होनी चाहिये। संपूर्णता में बच्चे का विकास होगा, तभी तो वह अच्छा रिसर्च कर पाएगा। बहुत सी समस्याएं हैं। किताबें फ्री में मिलनी चाहिए बच्चों को। जैसे कि प्राइमरी के बच्चो को मिलता है, वैसे ही मिलना चाहिए। बच्चों के आर्थिक मसले पर प्रो. विक्रम कहते हैं स्कॉलरशिप ज्यादा होनी चाहिए और हर बच्चे के लिये होनी चाहिए। सब तो जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जेआरएफ) नहीं निकाल सकते न? एमए के बच्चों को स्कॉलरशिप नहीं मिलता। पैसे की समस्या नहीं होनी चाहिये छात्रों को। लेकिन हमारे यहां सबसे बड़ी समस्या पैसे की ही है। 

प्रो. विक्रम केंद्रीय विश्वविद्यालयों के भविष्य पर चिंता जताते हुये कहते हैं कि भारत सरकार द्वारा यूनिवर्सिटी के व्यवसायीकरण की जो नीति अपनाई गई है, वह भी एक समस्या है। जेएनयू को साढ़े चार लाख करोड़ रुपये लोन दिया गया है। ऐसे ही साढ़े छः लाख करोड़ रुपये दिल्ली यूनिवर्सिटी को लोन दिया गया है। लोन देकर आप यूनिवर्सिटी को एक तरह से बंधक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। जब लोन किसी के सिर पर आता है तो आप जानते ही हैं लोन चुकाने में क्या हालत होती है। क्योंकि भारत सरकार सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का व्यवसायीकरण करना चाहती है, सेल्फ फाइनेंस के कोर्स खोले जा रहे हैं। तभी लोन की व्यवस्था हो रही है। प्राइवेट यूनिवर्सिटी खोली जा रही है। लवली प्रोफेशनल और जिंदल यूनिवर्सिटी में कौन पढ़ेगा? जाहिर तौर पर एलीट का बच्चा पढ़ेगा। पहले भी एलीट के भी बच्चे पढ़ते थे। निजीकरण से नये रूप में वर्ण व्यवस्था लागू हो रही है। अब जिसके पास पैसे होगा वो पढ़ेगा।

जहां शिक्षा निःशुल्क है वो देश मानव सूचकांक में आगे हैं

डेनमार्क, स्वीडन, फिनलैंड, इटली, स्पेन, चेक रिपब्लिक आदि देशों में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक बिल्कुल मुफ्त है। देशों का मानव विकास सूचकांक देखेंगे या खुशहाली सूचकांक देखेंगे तो यही देश आगे हैं। इसका मतलब है कि जिन देशों में शिक्षा मुफ्त है, वे देश बहुत आगे हैं। जहां शिक्षा महंगी है, वहां खुशहाली नहीं है। 

 (संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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