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शैक्षणिक बैरभाव मिटाने में कारगर हो सकते हैं के. बालगोपाल के विचार

अपने लेखन में बालगोपाल ने ‘यूनिवर्सल’ (सार्वभौमिक या सार्वत्रिक) की परिकल्पना की जो पुनर्विवेचना की है, उसे हम विद्यार्थियों और शिक्षाविदों को समझना चाहिए। यह पुनर्विवेचना अंतर्विषयक बैरभाव का समाधान निकालने में भी सक्षम है। बता रहीं हैं अनामिका दास

मैं पिछले सात से भी ज्यादा वर्षों से उच्च शिक्षण संस्थानों में समाजशास्त्र की अध्येत्ता हूं। मुझे ऐसे संस्थानों में पढने का मौका मिला है, जो ‘प्रतिष्ठित’ और ‘उत्कृष्ट’ कहलाते हैं। धीरे-धीरे मुझे यह समझ में आया कि अध्यापकों और विद्यार्थियों, दोनों में ही, प्रविधि से संबंधित बैरभाव होता है, जिसे कोई विशिष्ट नाम देना संभव नहीं है। उदाहरण के लिए, मेरा स्वयं का अनुभव है कि वे विषय, जो ‘समाज विज्ञानों’ की श्रेणी में आते हैं, कई नए उभरते विषयों जैसे सांस्कृतिक अध्ययन, कार्य निष्पादन अध्ययन, ट्रामा अध्ययन आदि के प्रति एक तरह का बैरभाव रखते हैं। ऐसे मामलों में यह भी आवश्यक नहीं होता कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के मूल आधार को समझते हों। शायद यह बैरभाव विभागीय या व्यक्तिगत भी होते हैं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि ये बहुत आम हैं। साथ ही, इन बैरभाव के बारे में लिखने के क्रम में समस्या यह है कि उनके संबंध में कुछ भी साबित करना मुश्किल है और उन्हें केवल महसूस किया जा सकता है। 

कुछ प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के समाज विज्ञान विभाग, ‘विज्ञान’ शब्द की मनमानी व्याख्या करते हैं और अगर वे मार्क्सवादी राजनैतिक-आर्थिक विचारों से प्रभावित हैं तो वे ऐसे अध्ययनों से बचते हैं, जिनमें विश्लेषण का केंद्रीय आधार जाति, यौनिकता अथवा लैंगिकता होती है। दूसरी ओर, इस दकियानूसीपन की प्रतिक्रिया में जो विभाग और पाठ्यक्रम उभरे हैं, पहचान की किसी विशिष्ट श्रेणी से उनका ज़रुरत से ज्यादा जुड़ाव होता और वे चीज़ों को इतिहास और ढांचागत अवरोधों के परिप्रेक्ष्य में देखते ही नहीं हैं। कुछ प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं में, कम से कम उच्च शिक्षा के शुरुआती वर्षों में, इन दोनों छोरों के बीच कोई मध्यम मार्ग विद्यार्थियों को उपलब्ध नहीं होता। पहले तरीके में पहचान से जुड़े मुद्दों पर अध्ययनों को ख़ारिज करने की प्रवृत्ति होती है। दूसरे तरीके में अपनी या दूसरों की पहचान के रुमानीकरण की संभावना निहित होती है। इसके अतिरिक्त ‘क्या होना चाहिए’ के आधार पर अपने मत को लादने की भी प्रवृत्ति होती है और इससे भी बुरी बात यह कि इससे उन बाजारवादी शक्तियों के हाथ का खिलौना बन जाने का खतरा होता है, जो पहचान की भौंडी राजनीति से लाभ उठाना चाहते हैं या फिर तथाकथित ‘समालोचक चिंतकों’ से जुड़ने की। दोनों एक समान खतरनाक हैं, विशेषकर तब जब वे व्यक्तियों या संगठित राजनीति इसके लिए एक माध्यम बन जाते हैं।

एमफिल करने के दौरान मैं जब इन विचारों से जुझ रही थी, तभी मेरा परिचय नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, वकील और बुद्धिजीवी कंदाला बालगोपाल (10 जून, 1952 – 8 अक्तूबर, 2009) से हुआ। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन अपने गृहप्रदेश आंध्रप्रदेश में ही बिताया। यूट्यूब पर अंग्रेजी में उनके एक साक्षात्कार ने कई तरीकों से मेरा ज्ञानवर्धन किया। अपने लेखन में बालगोपाल ने यूनिवर्सल’ (सार्वभौमिक) की परिकल्पना की जो पुनर्विवेचना की है, उसे हम विद्यार्थियों और शिक्षाविदों को समझना चाहिए। यह पुनर्विवेचना उन अंतर्विषयक बैरभाव, जिनकी चर्चा ऊपर की गई है, का समाधान निकालने में भी सक्षम है। जैसे कि उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा, “आपको यह कभी नहीं कहना चाहिए कि मैं दमित हूं। आपको कहना है कि दमन गलत है। यही वह एकमात्र तरीका है, जिससे आप प्रतिरोध खड़ा कर सकते हैं … जैसे ही आप यह कहते हैं, सिद्धांत सार्वभौमिक बन जाता है – शत प्रतिशत सार्वभौमिक नहीं – लेकिन वह एक ऐसे वर्ग का निर्माण कर देता है, जो आपसे बड़ा है और आपके आगे तक जाता है…”

के. बालगोपाल ने यह बात प्रतिरोध का सृजन करने और उसे खड़ा करने के संदर्भ में कही थी। उन्होंने अनेक विषयों पर लेखन किया है, जिनमें राज्य की एजेंसियों द्वारा पाशविक बल का प्रयोग, लोगों के विस्थापन से होने वाली समस्याएं, अदालतों की प्रकृति और उनकी सीमाएं और इस पर भी कि अधिकारों के लिए लड़ने तथा उन्हें हासिल करने का काम गिने-चुने न्यायिक या सांविधिक ओहदेदारों तक सीमित न होकर, एक सामाजिक प्रक्रिया होने जैसे विषय शामिल हैं, जिसमें प्रत्येक समुदाय और (अथवा) व्यक्ति को यह पता हो कि ‘अधिकारों’ के साथ जीने का क्या अर्थ होता है। बालगोपाल ‘अधिकारों के लिए आंदोलन’ की जो बात करते हैं, और समाज विज्ञानों के विद्यार्थियों के किसी भी मुद्दे पर ‘समाज’ के बारे में जो विचार करना होता है, उनके संदर्भ अलग-अलग हैं। लेकिन मेरा मानना है कि ‘सार्वभौमिक’ और ‘विशिष्ट’ को समझने के लिए यह दृष्टिकोण विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकता है।

के. बालगोपाल (1952 – 2009) ने अपने वाकचातुर्य और मेधा का उपयोग कर आरक्षण-विरोधियों पर तीखे हमले किए

यह हमें वह ढांचा उपलब्ध करवाता है, जिसके ज़रिए हम विभिन्न तरीकों से हासिल किये गए अनुभवजन्य अथवा प्रयोगसिद्ध ज्ञान को समझ सकते हैं।  

जिस काल में बालगोपाल जीवित रहे और जिसमें उन्होंने अधिकारों के लिए आंदोलन की परिकल्पना की, उसके चलते उनका अधिकांश लेखन वामपंथी चिंतन से संवाद करता है। संसदीय वामपंथ से लेकर गैर-संसदीय चरम वामपंथ तक में कानून और उसके रखवालों और भारत के संविधान को कैसे देखा-समझा जाए, इस मुद्दे पर काफी असमंजस की स्थिति रही है। मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र से प्रभावित अधिकांश समाजशास्त्रीय सिद्धांतों में कानून को राज्य के एक उपकरण के रूप में व्याख्यायित किया जाता है – एक ऐसे उपकरण के रूप में, जो पुलिस और सेना के साथ बल प्रयोग के लिए इस्तेमाल होता है। लेकिन इसी तरह, विशिष्ट ऐतिहासिक विश्लेषण के साथ, संविधान को ‘बुर्जुआ’ और उदारवादी माना जाता है, जिसका ढांचा संपत्तिविहीनों की बजाय संपत्तिधारियों का सहायक होता है। मेरी राय में, कानून को कैसे देखा जाय, इसकी सबसे बढ़िया व्याख्या बालगोपाल ने की है। वे हमें एक ऐसे समाज की कल्पना करने को कहते हैं, जिसमें कानून है ही नहीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि कानून दमनकारी हो सकता है, लेकिन अगर कानून होगा ही नहीं तब क्या होगा? सबसे कमज़ोर, समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों को सबसे अधिक दमन का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि विशेषाधिकार प्राप्त लोग, शक्तिशाली लोग, वर्गीय और जातिगत नेटवर्क का उपयोग कर संसाधनों का प्रयोग अपने हित के लिए करेंगे। इसलिए एक कानूनी ढांचा आवश्यक है। 

जो व्यक्ति एक बेहतर जीवन के निर्माण के लिए काम करने का दावा करते हैं, उन्हें चाहिए कि अगर कानून प्रभु समुदायों के साथ खड़ा दिखता है तो वे कानून को पलट दें। इस तरह बालगोपाल ने जहां कानून को किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज के लिए आवश्यक बताया, वहीं उसकी समीक्षा और समालोचना पर भी जोर दिया। यह निरूपण उनके मौलिक योगदानों में से एक है।      

हर साल अक्तूबर के पहले हफ्ते में बालगोपाल की पुण्यतिथि पर ह्यूमन राइट्स फोरम, जिसकी स्थापना उन्होंने सन 1990 के दशक के उत्तरार्ध में की थी, सामाजिक-राजनैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण किसी विषय पर बालगोपाल स्मृति व्याख्यान का आयोजन करता है। कोविड-19 महामारी की वजह से पिछले दो व्यख्यायनों में मैंने अपनी उपस्थिति ऑनलाइन दर्ज की थी। इस साल व्याख्यान में मैं सशरीर उपस्थित हुई। विषय था– ‘हिंदुत्व और प्रजातंत्र’ एवं वक्ताओं में अरुंधती रॉय, क्लिफ्टन डी. रोजारियो, जहाँ आरा और मिहिर देसाई शामिल रहे। बालगोपाल से मेरी मुलाकात उनके लेखन के ज़रिए हुई थी। लेकिन कार्यक्रम में भागीदारी करने से मुझे यह अहसास हुआ कि वे लोगों की स्मृतियों में किस कदर जीवित हैं। कई वक्ताओं ने उनकी यादें साझा कीं। जैसे कि वे अधिकांश समय अपने काम में लगातार कैसे लगे रहते थे, कैसे वे विचारों में डूबे रहते थे, कैसे यात्रा के दौरान भी उनका लेखन कार्य जारी रहता था और कैसे उनका हास्य-विनोद अत्यंत मितभाषी था। इसके साथ ही, उनकी अनेक रचनाओं में, जिनमें पुलिसिया दमन, पुलिस हिरासत में हिंसा और मंडल-विरोधी प्रदर्शनों पर उनके लेख शामिल हैं, वे अपने शब्दचातुर्य और मेधा का उपयोग, सन्दर्भ और तथ्यों को जाने-समझे बिना बड़ी-बड़ी बातें करने वाले अध्येताओं पर तीखे हमले करने के लिए किया करते थे। उदाहरण के लिए, सन 1986 में इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली में प्रकाशित उनके लेख ‘एंटी-रिजर्वेशन, यट वन्स मोर’ की ये शुरूआती पंक्तियां देखें– 

“भविष्य में क्या होने वाला है, उसके संकेत आज देखे जा सकते हैं। उनके पोस्टरों को पढना और उनके तर्कों को सुनना मन को एक अजीब से असहजता से भर देता है। ऐसा लगता है मानों वे एक संकेत हों कि इस देश के सड़कों पर आज से बीस, तीस या चालीस साल बाद क्या हो रहा होगा। यह अतीतबोध ऐसा प्रतीत होता है, मानों हम वह सब कुछ पहले कभी देख चुके हैं। सरसरी निगाह से देखने पर कुछ भी चिंताजनक नहीं लगता। बल्कि किंचित मनोरंजक जान पड़ता है। सैकड़ों युवा लड़के और लड़कियां, जो बढ़िया खाते-पीते हैं, अच्छे कपड़े पहने हैं, सड़कों पर निकल पड़े हैं। उनके हाथों में पोस्टर हैं और वे नारे लगा रहे हैं। उन्हें देख कर यह साफ़ हो जाता है कि वे पिकनिक पर जाने के आदी हैं, प्रदर्शन करने के नहीं। वे प्रदर्शन भी ऐसे कर रहे हैं मानों पिकनिक पर जा रहे हों। जो नारे वे लगा रहे हैं, वे भारत की राजनीति से जुड़े नहीं लगते। उनमें से अधिकांश अंग्रेजी में हैं और उनमें वह सुरीलापन और लय-ताल नहीं हैं, जिसके हम आदि हैं। बल्कि वे विज्ञापनों और स्टीकरों की तरह संक्षिप्त हैं।”

बालगोपाल से विद्यार्थी, शिक्षाविद और अध्येता यह भी सीख सकते हैं कि उचित आचार-व्यवहार की सीमाओं में रहते हुए भी मुद्दों पर मजाहिया तरीके से अपनी बात कैसे रखी जाए।  

समाज को के. बालगोपाल का योगदान बहुत बड़ा है। उनकी आधी से भी ज्यादा रचनाओं को मैं पढ़ नहीं सकती क्योंकि मैं तेलुगू भाषा से वाकिफ नहीं हूं। परन्तु जैसा कि अनेक चिंतकों, कार्यकर्ताओं, अध्येताओं और वकीलों ने जोर देकर कहा है, बालगोपाल का लेखन कई अर्थों में अनूठा है और वह राजनीति, कानून और समाजशास्त्र में दिलचस्पी रखने वाले विद्यार्थियों को हमारे स्थानीय संदर्भों में अन्तर्निहित सैद्धांतिक ढांचे से परिचित करवा सकता है। इसके अलावा, व्यक्तिगत स्तर पर, उनकी सोच युवा अध्येताओं को सिखा सकती है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निष्प्रयोजन बैरभाव को कैसे समझें और उससे कैसे निबटे।

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अनामिका दास

लेखिका हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद में समाज शास्त्र की पीएचडी शोधार्थी हैं

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